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शनिवार, 18 अप्रैल 2026

नर्क की छाया - रीमा भारती, उपन्यास अंश

 साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है धीरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लोकप्रिय उपन्यासकार रीमा भारती जी के उपन्यास 'नर्क की छाया' का एक अंश-

नर्क की छाया - रीमा भारती

रीमा भारती अपने फ्लैट के बेडरूम में आराम कर आइने के सामने बैठी अपने मेकअप को अंतिम टच दे रही थी।
आजकल रीमा भारती एकदम फ्री थी।
और जब वह फ्री होती थी, उसके डिपार्टमेंट ने उसे कोई खतरनाक मिशन नहीं सौंपा होता था, तो वह मनोरंजन के मूड में होती थी। अपनी व्यस्त जिन्दगी से चन्द लम्हें चुराकर क्लब, पार्टियों और अपने दोस्तों के साथ घूमती थी। उसका रोज का यही शगल होता था।

और आजकल वह यही कर रही थी।
रीमा भारती मेकअप करके उठ खड़ी हुई और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई।
इस वक्त वह अपने पसंदीदा लिबास में थी।
उसने आसमानी रंग की साड़ी और उसी से मैच करता हुआ ब्लाउज पहना हुआ था। अपने बॉबकट बालों को पीछे ले जाकर आसमानी रंग के स्कार्फ से बांधा हुआ था। कानों में सोने के टॉप्स चमक रहे थे। इस लिबास में वह आसमान से उतरी अप्सरा लग रही थी।
रीमा भारती !
आई०एस०सी० अर्थात् भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था इण्डियन सीक्रेट कोर की नम्बर वन एजेन्ट । दीस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत, जो अपने जिस्म पर दो नहीं, बल्कि हजारों आंखें रखती है और एक जासूस होने के नाते मामूली-सी घटना पर संदेह करना उसका पेशा था। मां भारती की शरारती, उद्दण्ड किन्तु लाडली बेटी। वो बला, जिससे मौत भी पनाह मांगे।
रीमा भारती ने ड्राइंगरूम में पहुंचकर मेज पर रखा अपना वेनिटी बैग उठाया।
उसी पल !
फोन की घण्टी बज उठी।
रीमा भारती ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
"हेलो।"
"रीमा!"

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

The डेड man's प्लान- समीर सागर, उपन्यास अंश

 साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है एक बिलकुल अलग कथानक पर आधारित लेखक समीर सागर के प्रथम उपन्यास 'The डेड man's प्लान' के उपन्यास का अंश।

 

 शहर : पुणे (महाराष्ट्र)
दिनांक 19-दिसंबर-2017
समय : शाम 05:15

वो किसी पुरानी सी वीरान इमारत का एक कमरा था, जिस इमारत को शायद किसी वजह से सालों पहले अधूरा छोड़ दिया गया था। जिसको देख कर ही गुमान होता था कि एक लंबे वक़्त से किसी को इस इमारत की याद तक नहीं आई थी। दीवारों पर प्लास्टर नहीं था और ईटो का लाल रंग उस कमरे को एक भयानक सा रूप दे रहा था। खिड़कियों के लिए छोड़ी गयी जगह से, कमरे में हवा की आवाज़ सीटी की तरह गूँज रही थी और उस कमरे के बीचों-बीच इस समय लोहे की एक टंकी रखी हुई थी, जिसके अंदर से उठती हुई आग की तेज़ लपटें उस पूरे कमरे को गर्म कर रही थीं। और साथ ही तप रहा था वह चेहरा, जो उस आग के पास खड़ा हुआ था। लपटों की रौशनी में उसका गोरा चेहरा भी आग की ही तरह लाल नज़र आ रहा था। उसके बिखरे हुए बाल, चेहरे पर बड़ी हुई दाढ़ी, अंगारों की तरह दहकती हुई उसकी आँखें और उसके भींचे हुए जबड़े चीख-चीख कर कह रहे थे कि वह आग सिर्फ आग नहीं बल्कि किसी ज्वालामुखी के फटने की शुरुआत है।


मंगलवार, 18 जून 2024

कानून का पाण्डव, करेगा ताण्डव- केशव पण्डित, उपन्यास अंश

 साहित्य देश के लोकप्रिय स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार पढें चर्चित उपन्यासकार केशव पण्डित का दहकते शोले सा उपन्यास 'कानून का पाण्डव करेगा ताण्डव' का एक रोचक अंश ।
"मुझे सबसे बड़ा अफसोस तो मिस्टर केशव पण्डित पर हो रहा है योर ऑनर ! मिस्टर पण्डित ने अपनी जिन्दगी में मुजरिमों के खिलाफ केस लड़े तो उन्हें मुजरिम साबित करके सजा दिलवाई। किसी निर्दोष की पैरवी की तो उसे निर्दोष साबित करके बा-इज्जत बरी कराया। यानि इन्होंने हमेशा कानून की मदद की। इन्साफ के इस मन्दिर में मुजरिमों को सजा और मजलूमों को इन्साफ ही दिलवाया। कभी भी किसी मुजरिम को बचाने और मजलूम या निर्दोष को फंसाने की चेष्टा नहीं की। इन्हें जब पूरा विश्वास हो गया कि इनका मुवक्किल सच्चा और निर्दोष है, तभी उसे अपना मुवक्किल बनाया और मुजरिम को सजा दिलवाकर उसे इन्साफ दिलवाया। लेकिन...।"
          अधेड़ व अधगंजे सरकारी वकील कालीचरण वर्मा ने अपनी वाणी को अल्प-विराम दिया, फिर कठघरे में मुल्जिम के रूप में खड़े दढ़ियल युवक को घृणा भरी नजरों से देखा, फिर न्याय की कुर्सी पर विराजमान जज महोदय से सम्बोधित होकर बोला "... लेकिन इस बार मिस्टर पण्डित कैसे गच्चा खा गये... मेरी समझ से परे की बात है। मैं ये इल्जाम भी नहीं लगा सकता कि मिस्टर पण्डित ने जानबूझकर एक मुजरिम को बचाने के लिये ये केस अपने हाथ में लिया। क्योंकि मुजरिम मजनूं एक टैक्सी ड्राइवर है, जो कि स्वयं को बचाने के लिये बहुत मोटी रकम खर्च नहीं कर सकता। मिस्टर पण्डित लाख-दो लाख रुपयों के लिये तो अपना ईमान नहीं बेचेंगे... अपने जमीर का गला नहीं घोटेंगे। मुजरिम कोई बड़ी हस्ती होता तो सोचा भी जा सकता था कि मिस्टर पण्डित ने मोटी रकम के लालच में एक मुजरिम को निर्दोष साबित करने को ये केस ले लिया। वैसे भी मिस्टर पण्डित की सच्चे और ईमानदार वकील की छवि है। इनसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये कानून और अदालत को भ्रमित करके इन्साफ का गला घोंटने की चेष्टा करेंगे...।"
"आप कहना क्या चाहते हैं मिस्टर वर्मा...?" भीनी-भीनी मुस्कान के साथ पूछा जज महोदय ने।
"यही कि जिन्दगी में पहली मर्तबा मिस्टर पण्डित से गलती हो गई है। शायद मुजरिम इनके सामने रोया-गिड़गिड़ाया होगा झूठी कसमें खाकर स्वयं को निर्दोष बतलाया होगा और मिस्टर पण्डित भावनाओं में बह गये होंगे। एक मुजरिम को निर्दोष समझकर इन्होंने उसकी पैरवी करने की गलती कर डाली। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मिस्टर पण्डित अपनी जिन्दगी में पहली बार कोई केस हारेंगे। इनके लगातार जीतने का रिकॉर्ड टूटेगा। इनकी वो काबिलियत धूल में मिल जाने वाली है, जिसके कारण लोग इन्हें दिमाग का जादूगर कहते हैं। मुझे इनके हारने का अफसोस तो है ही, लेकिन इस बात पर गर्व भी महसूस हो रहा है कि दिमाग के जादूगर को शिकस्त देने का श्रेय मुझे मिलेगा। क्योंकि आज ही मैं ये साबित कर दूंगा कि कठघरे में खड़े मजनूं नाम के इस भोले-भाले नजर आने वाले हैवान ने ही सलोनी का कत्ल करके मेरे मुवक्किल मिस्टर प्रकाश की दुनिया उजाड़ डाली है...।" 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

जीने का हक- प्रकाश पाराशर, उपन्यास अंश

साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार पढें  उपन्यास 'जीने का हक' का रोचक अंश।
रवि माथुर - जीने का हक
प्रकाशक- दुर्गा पॉकेट बुक्स, मेरठ

'हैलो यंगमैन।' मैंने उसे उठाते हुये कहा- 'तुम यहां छिपे हुये क्या कर रहे हो ?'
'मैं तुमसे नहीं बोलता।' वह कुछ अकड़ कर बोला ।
'क्यों ? अब तो साबित हो चुका है कि मैं तुम्हारी आंटी का पर्स चुराने वाला चोर नहीं हूँ। मैंने उन्हें मारा भी नहीं है।'
'अब तुम यहां क्यों आये हो ?' उसने फिर अकड़ कर पूछा और साथ ही मुझे कुछ शक भरी नजरों से देखा ।
'तुमसे मिलने । तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।' मैं मुस्करा कर बोला ।

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

शलभ - उपन्यास अंश

उपन्यास जगत में तहलका मचा देने वाले
उपन्यासकार शलभ 
के पांच महान उपन्यास

प्यासी
यह कहानी है एक ऐसी औरत की, जो औरत होते हुए भी औरत नहीं थी। जिसकी अधूरी प्यास ने उसे कहां से कहां पहुंचा दिया और वह अपनी प्यास के लिये पतन के गहरे गर्त में गिरती ही चली गई परन्तु क्या उसकी अनबुझ प्यास बुझ सकी ? कैसी प्यास थी वह ?... एक अपूर्ण औरत की दिलचस्प कहानी ।
इन्तकाम
यह इन्तकाम की आग में जलते हुए एक ऐसे युवक की सनसनी खेज गाथा है, जिसने एक हरे-भरे परिवार को तबाह कर दिया ! 
इन्तकाम दो ऐसी युतियों को दर्दनाक गाथा है, जिन्हें परिस्थितियों ने एक विचित्र मोड़ पर ला खड़ा किया। 
एक ऐसे बाप की कहानी है जिसने ...बाप ने इन्तकाम लेने के लिये बेटी और उसके पति की हत्या का इरादा करके भी आत्महत्या कर ली...! 
क्यों ? ...
रहस्य और सनसनी खेज घटनाओं से भरा कथानक ।
चितचोर
यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो प्यार का देवता था। जिसने अपनी पत्नी का हर अपराध हंसकर क्षमा कर दिया, किन्तु उसकी पत्नी उसके विश्वास को छलती रही और एक ऐसे गैर पुरुष की बांहों में झूलती रही, जिसकी शक्ल भी उसने नहीं देखी और जब उजाले में एक दिन  शक्ल देखी तो वह चीख उठी ! 
और उसकी हत्या कर दी।
विश्वास
यह है एक युवताइ की आंसू भरी गाथा... जो अपने प्यार को पाकर भी उसे छू नहीं सकती थी। यह चित्रण है भाई-बहन के पावन रिश्ते का और समाज में होने वाले अत्याचारों ओर जुल्मों का । अविश्वास और विश्वास के ताने-बाने में बुना शलभ का एक महान यादगार उपन्यास ।
उपासना
यह उपन्यास है 'शलभ' को लेखनी से बनी एक तस्वीर जो समाज में बिखरे दर्दो... आंसुओं और नफरत का सजीव चित्रण करती है।

और इनके बाद शलभ का आगामी आकर्षण है-
रहस्य, रोमांच, प्यार, नफरत, आंतू और दर्दो से भरी रचना-
जलन
प्रभात पाकेट बुक्स ३३ हरीनगर, मेरठ-२

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

क्राइम एक्सपर्ट- राकेश पाठक, उपन्यास अंश

साहित्य देश के उपन्यास अंश में इस बार पढें लोकप्रिय साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार राकेश पाठक जी के चर्चित उपन्यास 'क्राइम एक्सपर्ट' उपन्यास का एक अंश।
फोन की घण्टी बजने पर स्टाफ के साथ जश्न मना रहे इन्सपेक्टर मुकेश तिवारी ने रिसीवर उठाया तथा कान से लगाकर बोला- “हैलो, कौन ?"
"कांग्रेचुलेशन, मिस्टर तिवारी ।" दूसरी तरफ से मानो कोई गहरे कुंयें से बोल रहा था-"तुमने बहुत बड़ा कारनामा कर दिखलाया है।"
“हां, कारनामा तो किया ही है मैंने।”- मुकेश तिवारी सीने पर लगे सोने के तमगे को सहला कर बोला, "रिंगो को खत्म कर दिया है मैंने। वो साला कानून और पुलिस डिपार्टमैंट के लिये सिरदर्द और चैलेंज बना हुआ था। तभी तो सरकार ने उस पर पूरे एक करोड़ रुपये का इनाम रखा था। लेकिन तुम कौन हो ?"


“रिंगो।"
“क्या बकते हो ? पुलिस वाले से ही मजाक ? रिंगो को तो मैंने मार दिया।"
"रिंगो के पंच तत्वों से बने शरीर को ही ना, उसकी आत्मा को तो नहीं ना ?” - मानो कोई जख्मी नाग ही फुफंकारा हो, “थोड़ा-सा चूक गया मैं और तेरी गोलियों का शिकार हो गया। वरना तेरे जैसे पुलिस वाले मेरी जेबों में पड़े रहते थे। ओवर कॉन्फीडेन्स का शिकार हो गया था मैं। खरगोश और कछुवे वाली बात ही हो गई। खरगोश ने सोचा कि कछुआ तो शाम तक भी विनिंग स्पॉट पर नहीं पहुंच पायेगा, और वो सो गया। जब नींद टूटी तो कछुआ रेस जीत चुका था। मैं आत्मा हूँ 'रिंगो की आत्मा' ।"

बुधवार, 28 जून 2023

तथास्तु- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास अंश

साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है प्रसिद्ध उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा जी के पुत्र शगुन शर्मा जी के उपन्यास 'तथास्तु' का एक रोचक अंश।
तथास्तु - शगुन शर्मा

अपने आलीशान चैंबर में अपनी ऊंची पुश्तगाह वाली चेयर पर मौजूद रागिनी ने रिवाल्विंग चेयर को घुमाया और अपने सामने मेज के पार बैठे शख्स का खुर्दबीनी से मुआयना किया।

रागिनी का पूरा नाम रागिनी माथवन था। वह यौवनावस्था के नाजुक दौर को पहुंची किसी ताजा खिले गुलाब-सी सुंदर युवती थी उसकी आवाज में जैसे जादू और आंखों में हद दर्जे का आकर्षण था। बला के हसीन चेहरे पर शैशव का अल्हड़पन तथा गजब का आत्मविश्वास था।
           वह मुंबई फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड की नामचीन प्लेबैक सिंगर थी और आज निर्विवाद रूप से वालीवुड की टॉप सिंगर कही जाती थी। उसकी मधुर आवाज हिंदुस्तान के कोने-कोने में गूंज रही थी।
महज उन्नीस बरस की आयु में यह आज कामयाबी की उस बुलंदी पर पहुंच चुकी थी जो केवल विरलों को ही नसीब होती थी।
उसके सामने बैठे शख्स का नाम भीखाराम भंसाली था। जो कि बाॅलीवुड का सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक था। जिसकी वालीवुड में चौतरफा डिमांड थी और जिसके बारे में यह कहते आम सुना जा सकता था कि किसी फिल्म के साथ उसका नाम जुड़ना ही उस फिल्म की कामयाबी की लगभग गारंटी था।
रागिनी को इस तरह अपनी तरफ देखता पाकर भंसाली के चेहरे पर असंमजस के भाव आ गए।
"लगता है मुझे यहां देखकर आपको कोई खुशी नहीं हुई मिस रागिनी?" भंसाली तनिक खिन्न भाव से बोला ।
"यह आपकी गलतफहमी है जनाब भंसाली साहब।" दुनिया की सबसे मथुर आवाज की स्वामिनी ने अपने होठों पर एक चित्ताकर्षक मुस्कराहट लाते हुए कहा- "आप जैसी शख्सियत से मिलकर भला कौन होगा जो खुश नहीं होगा। खैर... जाने दीजिए।" उसने निःश्वास
भरी- 'और यह बताइए कि आप क्या लेना पसंद करेंगे। ठंडा या... ।"

गुरुवार, 22 जून 2023

52 गज का बौना- केशव पण्डित, उपन्यास अंश

52 गज का बौना- केशव पण्डित
उपन्यास अंश

"तुम अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हो बावन गज के बौने। तुम कुँए के मेंढक हो, जो स्वयं को पानी का राजा समझ बैठता है। वो ऊंट हो जो कभी पहाड़ के करीब से गुजरा ही नहीं। दीवार पर रेंगती वो छिपकली हो जिसने कभी मगरमच्छ को देखा ही नहीं। वो पिल्ले हो, जिसने कभी शेर की तस्वीर भी नहीं देखी। तुम सिर्फ बावन इंच के हो लेकिन अपनी परछाई को देखकर ये गलतफहमी पाल बैठे कि तुम्हारा कद बावन गंज का है। बिल्ली का बच्चा भी चूहों पर हुकूमत कर सकता है लेकिन जब वो शेर के सामने पड़ता है तो भीगी बिल्ली बन जाता है। इसी तरह तुमने जुर्म के चूहों पर हुकूमत करके खुद को बावन गज का राक्षस समझ लिया है। लेकिन अब तुम्हारा पाला कानून के शेर से पड़ा है तो अपनी औकात मालूम हो जायेगी। कांच का टुकड़ा भले ही कितना मोटा हो, लेकिन वो पत्थर से टकराने पर चकनाचूर हो जाता है। तुम तो कानून की चक्की में कूदने की भूल कर रहे हो। दो पाटों के बीच फंसकर चूरमचूर हो जाओगे।”
उपन्यास के मुख्य पात्र
बिच्छू - एक लड़की के पीछे पड़ा गुमनाम व सनकी आदमी, जो लड़की के दुश्मनों तथा चाहने वालों का जानी दुश्मन है।
सलीम लंगड़ा -लंगड़ा गैंगस्टर, जो क्रिकेट का शौकीन है और दुश्मन को बैट से मारता है।
भीखू भिखारी - गैंगस्टर भी है और मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठकर भीख भी मांगता है। 
शकीला बेगम-सौतेली मां द्वारा बना दिया गया हिजड़ा, जो शैतान से भी चार कदम आगे है। 
टोनी गोवानी-टी.बी. का मरीज गैंगस्टर, जो अपने शिकार को जहर के इंजेक्शन लगाता है।
बावन गंज का बौना-बार-बार भेष बदलने वाला वो छलावा, जो गैंगस्टर्स से भी टैक्स वसूलता है।
और इनके मुकाबले पर सीना ताने खड़ा है-

दिमाग का जादूगर-केशव पण्डित । 

तेज रफ्तार व अविस्मरणीय कथानक
Keshav pandit novel केशव पण्डित

अब पढें 'बावन गज का बौना' उपन्यास अंश

"मैं गैंगस्टर बाहुबली सिंह बोल रहा हूं केशव पण्डित.... बाहुबली । मेरे आदमियों ने तेरी गाड़ी को चारों तरफ से घेरा हुआ है। उनके पास ना सिर्फ एक से एक खतरनाक हथियार हैं, बल्कि वो बमों से भी लैस हैं। अगर तू एक मिनट के भीतर बाहर नहीं निकला तो ये लोग पहले तेरी गाड़ियों पर अन्धाधुन्ध फायरिंग करेंगे और बम फेंककर तुझ समेत तेरी गाड़ी के भी परखच्चे उड़ा देंगे।” 

रविवार, 18 जून 2023

सात जुलाई की रात- विकास सी एस झा

साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में उस बार प्रस्तुत है युवा उपन्यासकार विकास सी एस झा द्वारा रचित 'सी.एस.टी. सीरीज' के उपन्यास 'सात जुलाई की रात' के रोचक अंश।

'सात जुलाई की रात' के कुछ अंश :

मेफेयर रेस्टोरेंट।
बांद्रा, मुम्बई।
ड्रीम हाउस का विजेता आदित्य आहूजा अपनी मौजूदा गर्लफ्रैंड तान्या मुखर्जी, जो शो के अंदर उसकी को-कंटेस्टंट भी थी, के साथ इस वक्त बांद्रा के एक रेस्टोरेंट के अंदर मौजूद था जहां वे किसी गंभीर चर्चा में रत दिख रहे थे।
"आदी, मुझे उस रात के बाद से पता नहीं क्यों हमेशा एक डर सा लगा रहता है।" तान्या मुखर्जी ने चेहरे पर आशंका के भाव लिए हुए आदित्य आहूजा से कहा।
"इसमें डरने की कौन सी बात हुई भला ? जिसे जाना था, चला गया। तकदीर की लिखी को कौन काट सकता है !" आदित्य आहूजा ने समझाते हुए तान्या से कहा।
सात जुलाई की रात

"यार, लेकिन मुझे गीता की खुदकुशी वाली बात पर अब भी यकीन नहीं होता। इतना क्या पागलपन सवार हो गया था उसे। अच्छी-खासी जिंदादिल लड़की थी, पता नहीं क्यों ऐसा कदम उठा बैठी ?" तान्या के चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था।
"यार, तुम ये पूछ रही हो ? पता तो है तुम्हें सब।" आदित्य ने उसकी ओर देखा।

हत्यारिन हूँ-विषभरी- हादी हसन, उपन्याश अंश

 साहित्य देश के 'उपन्यास अंश' स्तम्भ के अंतर्गत इस बार प्रस्तुत है उपन्यासकार हादी हसन साहब के नये उपन्यास 'हत्यारिन हूँ-विषभरी' का एक अंश। मेजर रणवीर बराड़ का कारनामा।

 उपन्यास  अंश....
डिसूजा वो शख्स था जिस पर लाल बिहारी अपने बाद सबसे ज्यादा विश्वास किया करता था।
"आवा डिसूज़ा...आवा...!" लाल बिहारी मोटे सिगार का कोना शार्पनर से छीलता हुआ बोला—"क्या खबर लाए हो...?"
डिसूजा ने शनील की लाल रंग की थैली उसके सामने रख दी। 
"ई का है ?"
"हीरे...मिस्टर लाल...इन्हें उसी रँजीत से हासिल किया गया है जो हमारे बिज़नेस में सेंध लगाने के लिए आया था।" डिसूजा भारी प्रभावी स्वर में बोला।
"रँजीत का का बना ?" 
"वही जो होना था।" 
"लाश...?"
"लाश कभी बरामद नहीं होती क्योंकि हमारे केस में लाश की बरामदगी एक सिरदर्द साबित होती है।"

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

अपाहिज फरिश्ता - सरला रानू

अपाहिज फरिश्ता - सरला रानू

उदयपुर विश्वविद्यालय कुछ अपने नाम जैसा ही अत्यन्त अलग एवम् प्रिय। अनेक शहरों के लड़के-लड़किया, अमीर-गरीब तथा सभी धर्मों के छात्र इस विद्यालय को शोभायमान बनाए हुए थे। अगस्त का महीना यूं भी छात्र- छात्राओं के अन्दर नया उत्साह उत्पन्न कर देता है—क्योंकि इलेक्शन आरम्भ हो चुके थे। छात्रों में एक नया जोश सहज ही देखा जा सकता था, किन्तु शाम होते ही चीखते एम्प्लीफायर खामोश हो जाते, जैसे इस समय चारों ओर खामोशी व्याप्त थी। कुछेक लड़के-लड़कियां अपने होस्टल के कमरों में पढ़ाई में व्यस्त थे, कुछ बैडमिंटन खेल रहे थे, तो कुछ प्रेमिकाओं की झलक के लिए 'गर्ल्स होस्टल' के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे थे। लड़कियां भी कम नहीं थीं किसी-न- किसी बहाने अपने प्रियतम को दर्शन दे दिया करती। माहौल कुछ अजीब था। 

अपाहिज फरिश्ता - सरला रानू
        आज रविवार था, इसीलिए शायद ऐसा समां बंधा था। ठंडी हवा चारों ओर चहलकदमी कर रही थी। आकाश में चांद दिखने लगा था। लॉन के एक कोने में विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध छात्र नेता बैठे हुए थे। उनकी संख्या चार थी। चारों के हाथों में सिगरेटें सुलग रही थीं। अनायास प्रथम छात्र नेता बोला- "हमारा ग्रुप आज यूनिवर्सिटी में काफी चर्चित है— इसका श्रेय अमित तिवारी को जाता है।”

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

मायाजाल - विक्की आनंद

मायाजाल - विक्की आनंद

साहित्य देश के उपन्यास अंश स्तम्भ के अंतर्गत इस बार पढें लोकप्रिय उपन्यासकार विक्की आनंद के उपन्यास मायाजाल का एक रोचक अंश।

विनोद के पलटने तक मोना अपने सांचे में ढले दूध जैसे गोरे बदन से कपड़े उतार चुकी थी। सिर्फ अण्डरवियर्स शेष रह गए थे। उसके गोरे बदन पर काले रंग की चड्ढी और काले ही रंग की चोली अलग से चमक रही थी।
दरवाजा अंदर से बंद करके मुड़ने पर विनोद उसे विस्मय से देखता का देखता रह गया।
मायाजाल - विक्की आनंद

उसने ऐसा दिलकश-दिलफरेब-हाहाकारी हुस्न पहली बार देखा था।

मोना ने तौबा शिकन अंदाज से दोनों हाथ उठाकर अंगड़ाई ली। उस घड़ी वह किसी नृत्यांगना जैसी मुद्रा में पंजों के बल खड़ी थी। अंगड़ाई लेते समय उसके उन्नत वक्षों में अतिरिक्त तनाव आ गया था। उसने विनोद की ओर देखते हुए कातिलना अंदाज में घनेरी पलकों और नाक को हल्की-सी जुम्बिश दी।

फिर उसका निचला अधर दांतों के बीच दब गया।

गहरी लाल लिपिस्टिक उसके अधरों को अलग-सी चमक प्रदान कर रही थी। व्हिस्की के नशे में थी वह।

उसी नशे में उसके नेत्र जगमग-जगमग कर रहे थे।

आमंत्रण की मुद्रा में उसने अपनी दोनों गुदाज बांहें फैला दीं।

खुद विनोद भी गहरे नशे में था।

जिस होटल में वह ठहरा था, उसके ठीक बाहर मोना से एक गुण्डे ने छेड़छाड़ शुरू कर दी। ऐन वक्त पर पहुंचकर विनोद ने उसे गुण्डे से बचा लिया। गुण्डे ने पहले चाकू, उसके बाद उस्तरे से उस पर वार करने चाहे थे, लेकिन उसका एक भी वार कामयाब न हो सका।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

फंदा- अनिल सलूजा, उपन्यास अंश

फन्दा - अनिल सलूजा, बलराज गोगिया, प्रथम उपन्यास

  साहित्य देश के 'उपन्यास अंश' स्तम्भ में इस बार प्रस्तुत है अनिल सलूजा द्वारा लिखित प्रथम उपन्यास 'फंदा' का अंश। यह बलराज गोगिया सीरीज का प्रथम उपन्यास है और अनिल सलूजा जी के नाम से प्रकाशित होने वाला भी प्रथम उपन्यास है।
फन्दा - अनिल सलूजा, बलराज गोगिया, प्रथम उपन्यास

"क.... कौन हो तुम...." - बड़ी मुश्किल के बोल फूट पाया कुलकर्णी साहब के होंठों से।
रंगत एक दम से स्याह पड़ी हुई थी कुलकर्णी साहव की आंखों में खौफ के साये मंडराने लगे थे....। फटी-फटी आंखों से वे अपने सामने खड़े उन पांच नकाबपोशों को देख रहे थे जो कि उनके आठ साल के बेटे बबलू की खोपड़ी से स्टेनगन लगाये खड़े थे।
काले कपड़े में झांकते पांचों नकाबपोशों के होठों पर जहरीली मुस्कान रेंग गई।
एक नकाबपोश आगे बढ़ा- स्टेनगन अपने कंधे पर रखा और मुस्कान को और तेज करते हुए बोला- "जाहिर है हम अच्छे लोग नहीं हैं वर्ना काले कपड़ों में अपने मुंह छुपाकर तुम्हारे पास क्यों आते ।"
"क्या....क्या चाहते हो ?"
“हां....यह सवाल तुमने अच्छा किया।" - नकाबपोश अपनी स्टेनगन को कुलकर्णी साहब के सीने के सटाते हुए बोला- "बलराज गोगिया को फांसी का हुक्म तुमने ही सुनाया था न कुलकर्णी ?"
बुरी तरह से चौंके कुलकर्णी साहब....।

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

बड़ा गेम-03 सर्वनाश- अनुराग कुमार जीनियस

बड़ा गेम- उपन्यास अंश
अनुराग कुमार जीनियस
 विक्रम और शुभांकर डी को मौजपुर आए पाँच दिन बीत चुके थे। आज छठवां दिन था। सोनू के गायब होने से उपजे केस के चलते वे दोनों वहां थे।और वह केस जो तमाम दुश्वारियों के बाद आखिरकार हल हो गया था।और अब उन्हें वहां से चले जाना चाहिए था पर वे रुके थे और उसके पीछे एक बड़ी वजह थी। प्रशांत जो दो दिन पहले मंगल की बहन के यहां शादी में गया था,जा तो मंगल भी रहा था पर ऐन मौके पर कुछ ऐसी प्रॉब्लम खड़ी हो गई की प्रशांत को अकेले ही जाना पड़ा वरना उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते थे कि वे दो जिस्म एक जान हैं। हरदम साथ रहना पसंद करते थे। वे दोनों एक दूसरे से बेइंतेहा मोहब्बत करते थे_प्रशांत ने उन दोनों को जिद करके रुकने पर मजबूर किया था।उसने कहा था की दो दिन बाद उसका बर्थडे है।उसे सेलिब्रेट करके जाएं। प्रशांत की जिद के आगे ही वे मजबूर हो गए थे और रुक गए थे।वरना  उनका तो इरादा केस निपटने के बाद ही राजनगर वापस जाने का था।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

कत्ल की सौगात - राहुल

कत्ल की सौगात - राहुल
उपन्यास अंश

चांदनी रात भी इतनी भयानक हो सकती है, सीमा ने सपने में भी नहीं सोचा
था। भागते-भागते उसकी सांस फूल गई थी और शरीर का अंग-अंग थकावट से इस तरह टूटने लगा था कि उसे लगा वह अगले ही पल धमाके से बम की तरह फट जाएगी और अंग-अंग पत्थरों की तरह नीचे घाटी में लुढ़कता हुआ अपना अस्तित्व खो देगा 'हे भगवान!' सीमा पीड़ा और दुःख से पसीने में नहाई हुई आकाश पर
चमकते चांद को देखकर चीख पड़ी 'अरे रक्षा करो भगवान... मुझे इन राक्षसों से बचाओ...।'
तभी उसे ठोकर लगी पर वह औंधे मुंह गिरी। अगर वह अनायास हाथ न टिका देती तो उसका चेहरा चट्टान से टकराकर कीमा बन जाता।
"धांय!"
ठीक उसी पल एक गोली सनसनसाती आई और उसके सिर के बालों को जलाती हुई निकल गई।

बुधवार, 30 नवंबर 2022

काम्बोजनामा- रामपुजारी

 काम्बोजनामा- रामपुजारी 

आइए हम सभी काम्बोज सर के जन्मदिन के अवसर पर शुभकामना संदेश भेजें।

इस अवसर पर #काम्बोजनामा से एक झलकी आप सभी के लिए प्रस्तुत है...

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बंद आँखों से तो आमजन भी सपने देख लेते हैं लेकिन जो खुली आँखों से सपने देखे उसे या तो लोग दीवाना, पागल कहते हैं या फिर विचारक अथवा दार्शनिक! अठारह साल का किशोर मन अपनी सपनों की दुनिया में खोया रहता। मन में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता, जिसका जिक्र वह किसी से भी नहीं कर पाता था। पड़ोस के ही बाबूराम स्कूल में वह पढ़ता था। जब स्कूल में नहीं होता था तो वह शॉप पर होता था। उसके पास वक़्त ही कहाँ था। वहीं वह अंतर्मुखी वेद अपने सपनों में खोया हुआ अपने पिता जितेंद्र सिंह काम्बोज का हाथ बँटाता था। आर्टिफ़ैक्ट्स और हैंडीक्राफ्ट की ये सोविनियर शॉप उस जमाने में लालकिले की एक बड़ी मशहूर शॉप थी।

बुधवार, 23 नवंबर 2022

मैं गुनहगार हूँ- मोहन मौर्य

मैं गुनहगार हूँ- मोहन मौर्य
उपन्यास अंश
 सुबह के या फिर देखा जाए तो रात के 4 बज रहे थे। यह वह वक़्त होता है, जब लोग अपने-अपने बिस्तरों में चैन की नींद सोये हुए रहते हैं। रात की शिफ्ट में काम करने वाले लोग, खासतौर पर सरकारी विभाग के अधिकारी वर्ग भी इस समय सोने से नहीं बच पाते। यह वह वक़्त भी होता है जब लैला-मजनू बनकर देर रात तक एक-दूसरे से चैट करने नौजवान लोग या सोशल मीडिया पर नौजवान बनकर रहने वाले रसिक वृद्ध लोग भी अपनी चैट से थक-हारकर सो जाते हैं। आखिर उन्हें सुबह उठकर अपना-अपना काम भी करना होता है। 

बुधवार, 19 जनवरी 2022

इंतकाम - प्रकाश भारती

प्रशांत सीरीज का पहला उपन्यास

इन्तकामप्रकाश भारती (उपन्यास अंश)
कॉपीराइट © 1986 प्रकाश भारती द्वारा
ISBN 978-93-85898-87-7

       औसत दर्जे की उस चाय की दुकान में पहुंचना मेरी मजबूरी थी।
उस रोज शनिवार था और उस वक्त रात के बारह बज चुके थे। लम्बी कार ड्राइविंग, थकान, सुस्ती और ऊपर से अकेलेपन की बोरियत। इन सबकी वजह से मेरी हालत खस्ता थी। बार–बार उबासियां आ रही थीं ! आंखें रह–रहकर मुंदने लगती थीं। मेरी तकदीर अच्छी थी कि रास्ते में एक्सीडेंट नहीं हुआ और करीमगंज से विशालगढ़ मैं सहीसलामत पहुंच गया था।
लेकिन अपने फ्लैट तक पहुंचने में अभी कम से कम आधा घंटा और लगना था। और अब शहरी सीमा में क्योंकि यातायात अपेक्षाकृत बढ़ता जा रहा था इसलिए और ज्यादा रिस्क लेना खतरनाक था। अपनी थकान और सुस्ती से वक्ती तौर पर कुछ निजात पाने के लिए मुझे कड़क चाय या स्ट्रांग कॉफी की जरूरत महसूस होने लगी। 

धीरे–धीरे मेरी वो जरूरत जोरदार तलब में बदलती चली गई ।
आखिरकार, एम्बेसेडर साइड में पार्क करके मजबूरन मुझे उस दुकान में, जिस पर ग्लोरी रेस्टोरेंट का बोर्ड लगा था, जाना पड़ा ।
मामूली शक्ल–सूरत और लिबास वाले तीन आदमी वहां मौजूद थे । उनमें से, एक मेज पर बैठे, दो आदमी ब्रेड स्लाइस और आमलेट खाते हुए चाय सुड़क रहे थे । अलग बैठा तीसरा आदमी चाय के गिलास में रस्क भिगो–भिगोकर खा रहा था ।
एक नौकर सिंक के पास खड़ा गिलास, प्लेटें, प्याले वगैरा धो रहा था । और दूसरा जिस ढंग से चीजें समेट रहा था उससे जाहिर था कि दुकान बंद होने में ज्यादा देर नहीं थी। 

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद, उपन्यास अंश

 अब उसके लिये कत्ल करना बहुत जरूरी हो गया था...इस ताबड़तोड़ भयानक घटनाचक्र में यही एकमात्र उसके बचाव का मार्ग रह गया था।

      अपने अँधेरे कमरे में वह बड़ी देर से इन्हीं विचारों के बवंडर में इधर-उधर घूमे जा रहा था। अपने तीव्र मानसिक तनाव में वह कमरे की बत्ती जलाना भी भूल गया था। एकाकीपन तथा घना अँधेरा मन को और भी विचलित कर देता है।

          तनाव में इधर से उधर और उधर से इधर चलते हुये वह सिगरेट पर सिगरेट फूँके जा रहा था। उसके  मस्तिष्क में सुधा के वाक्य गूँज-गूँज कर प्रलय मचा रहे थे। 

29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद
29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद

“केवल चौबीस घण्टे...इससे अधिक समय मैं तुम्हें नहीं दे सकती।”

“मेरे पेट में पनप रहा तुम्हारा बच्चा- अब मुझे कुलबुलाता अनुभव हो रहा है।”

उसने सुधा से आँख न मिलाते हुये कहा- 

शुक्रवार, 31 मई 2019

पुतली - राजवंश

 पुतली-  राजवंश,
 उपन्यास अंश 

खन खन खन खन।
 प्याली फर्श पर गिरकर खनखनाती हुई नौकरानी के पैरों तक आई और टुकड़े-टुकड़े हो गई। नौकरानी के बदन में कंप-कंपी जारी हो गई। उसने भयभीत नजरों से प्याली के टुकड़ों को देखा ओर फिर उस धार को देखा जो चाय गिरने से उसके पैरों के पास से बिस्तर तक बनती चली गई थी। फिर उसकी भयभीत निगाहें आशा के चेहरे पर रुक गईं। आशा का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो रहा था। आँखें उबली पड़ रही थीं। वह कुछ क्षण तक होंठ भींचे नौकरानी को घूरती रही, फिर एकदम फूट पड़ी- ‘ईडियट...किस गंवार ने बनाई है यह चाय...?’
  ‘ज...ज...जी...म...मैंने मालकिन!’ नौकरानी भय-भीत लहजे में हकलाई।
           ‘जाहिल गंवार है तू। यह चाय है या जुशांदा-पानी की तरह ठण्डी और शर्बत की तरह मीठी। इससे पहले भी तूने किसी बड़े घराने में नौकरी की है? किस गधे ने नौकर रखा है तुझे?’
  ‘ज...ज...जी...ब...बड़े मालिक ने।' नौकरानी हकलाई।

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