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गुरुवार, 24 अगस्त 2023

खाली आंचल- सुरेश चौधरी, उपन्यास समीक्षा

उपन्यास - खाली आँचल
लेखक -   सुरेश चौधरी, 
उपन्यास समीक्षा- सूरज शुक्ला

हा विधाता! क्यों दिए कोमल हृदय, 
हर जरा सी बात पर होता सदय, 
सह न जाता, यह कठिनतम ताप है!
सच कहूँ, संवेदना अभिशाप है। 
- सूरज 
पर...वह जरा सी बात न थी... 
आकाश को आकाश भर दुख मिले, धोखे मिले, दर्द मिला, और यह सब उन्होंने दिया जो उसके अपने लगते थे, जिनके लिए उसने अपने सुख, अपनी खुशियां , अपनी सारी कामनायें त्याग दी। 
कहते हैं, प्यार में आदमी अंधा हो जाता है, आकाश भी हुआ पर उसके अंतर्मन में वह अंतर्दृष्टि मौजूद थी, जिससे वह सही-गलत का आकलन कर सकता था, उसने किया भी और हमेशा करता रहा और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।


एक बार‘विम्मी’ दी ने मुझसे कहा था, ‘भाई, कोई सही या गलत नहीं होता है, सब परिस्थितियों का खेल है, जो आज सही है, वह कल गलत लगेगा और जो आज गलत है वह कल सही लगेगा’ और सच कहूँ तो लगभग यही आकाश के साथ हुआ। 

रविवार, 11 दिसंबर 2022

काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा - योगेश मित्तल

 काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा 
काम्बोजनामा :वेदप्रकाश काम्बोज की लेखन यात्रा

कुछ लोग अपनी जीवनी लिखते हैं - कुछ किसी अन्य की, लेकिन इमोशन के बादशाह राम पुजारी जब कुछ लिखते हैं, अपना सब कुछ उसमें इस तरह झोंक देते हैं, इस कदर झोंक देते हैं कि लिखी हुई पुस्तक खूबसूरत शब्दों की एक गंगा बन, आनन्दप्रद शीतल धारा की तरह  मन-मस्तिष्क और आत्मा में मीठे-मीठे एहसास और प्रसंग, चित्र की भाँति उकेरती और चलचित्र की भाँति उभारती चली जाती है। 
काम्बोजनामा - जासूसी साहित्य में वर्षों शीर्ष पर रहने वाले दिग्गज उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज की सहज-सरल जीवनी नहीं है। यह उनका जन्म से अब तक का जिन्दगीनामा भी नहीं है। यह तो वेद प्रकाश काम्बोज के लेखकीय जीवन के अनन्त अच्छे-बुरे, सरल-कठिन, खट्टे-मीठे प्रसंगों की बेहद खूबसूरत झांकी है, जिसके लिए मैं आदरणीय वेद प्रकाश

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

चौसर- जितेन्द्र नाथ, समीक्षा

नाॅवल - चौसर
लेखक - जितेंद्र नाथ

प्रकाशक - सूरज पॉकेट बुक्स
समीक्षक - दिलशाद
सिटी ऑफ इविल वाले

अभी अभी जितेंद्र नाथ जी की चौसर पढ़कर पूरी की। इससे पहले मैने उनकी राख पढ़ी जिसने शानदार छाप छोड़ी थी। राख में पुलिस कार्यप्रणाली का सजीव रूप प्रतीत हुआ। चलिए बात करते हैं चौसर की, जिसकी कहानी शुरू होती है होटल पर्ल रेसीडेंसी से, रिसेप्शन पर रात के साढ़े नो बजे फोन बजता है। उधर से एक व्यक्ति अपने बेटे के बारे में पूछता है की क्या मेरा बेटा होटल पहुंच गया। सुबह को ज्ञात होता है कि विष्टा टेक्नोलोजी के पंद्रह एंप्लॉज जो पर्ल रेसीडेंसी में ठहरे थे अभी तक नही आए। ड्राइवर सहित सभी एंप्लॉयज के नंबर बंद जा रहे थे। सूचना पुलिस को दी जाती है। सिग्मा ट्रेवलर्स के दफ्तर से बस की आखिरी लोकेशन का पता चलता है। बस को घेर लिया जाता है लेकिन उसमे अजनबी ड्राइवर निकलता है। अब सभी का दिमाग चकरा जाता है की सभी यात्री कहां गए और ड्राइवर क्यों बदला।
           अगली सुबह एक नदी में एक एंप्लॉय की लाश मिलती है।  एक दृश्य में 26 ग्यारह की याद ताजा हो जाती है। जब आतंकवादी एक होटल में हतियारो को गरजाते हुए हुए घुसते हैं। बेहद ही लाइव दृश्य महसूस होता है। आपको नोवल में अनेकों सवाल मिलेंगे जैसे...
- बस अपने गंतव्य तक क्यों नही पहुंची?
- जो ड्राइवर पकड़ा गया था वह खाली बस लेकर क्यों जा रहा था?
- क्या एम्प्लेयर्स मिल सके?
- किसका हाथ था एंप्लायस के गायब कराने के पीछे?

रविवार, 10 अप्रैल 2022

मास्टर माइण्ड- शुभानंद

पुस्तक का नाम : मास्टरमाइंड 
° लेखक का नाम : शुभानंद 
• प्रकाशक एवं स्थान : सूरज पॉकेट बुक्स , ठाणे ( महाराष्ट्र )
• मूल्य ( पेपर बैक ) : ₹ 118
   किंडल : ₹ 50 ( अनलिमिटेड )
• पेज संख्या : 345
• भाषा : हिंदी 
लेखक के बारे में -
              IIT , बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षित शुभानंद ने बचपन से ही लिखने के लिए कलम उठा ली थी और लिखने के शौक के कारण उपन्यास लिखते चले गए । इनकी लिखने की खास बात यह है कि सरल भाषा शैली पर जटिल व तेज रफ्तार कहानी जो पाठक को एक ही सिटिंग में अंत तक पढ़ने के लिए बाध्य करती है । शुभानंद मुंबई में अपनी लेखिका व डॉक्टर पत्नी रुनझुन व पुत्र मानस के साथ रहते हैं । लेखन के अलावा संगीत सुनने , इंटरनेशनल टी.वी. सीरीज देखने में रुचि रखते हैं ।
पुस्तक के बारे में -
              अमेजॉन किंडल पर शुभानंद कृत जावेद , अमर , जॉन सीरीज का चतुर्थ उपन्यास मास्टरमाइंड पड़ा ।
       इस उपन्यास में तीन मुख्य पात्र हैं , जिनके नाम जावेद , अमर , जॉन हैं । यह तीन भारतीय सीक्रेट सर्विस के जांबाज़ जासूस हैं । अमर , जॉन को ' मेरी जान ' और जॉन , अमर को ' मेरे आम ' कहकर पुकारता है । जैसा कि इस उपन्यास के टाइटल  ' मास्टरमाइंड ' को देखकर विदित होता है कि यह आतंकवाद पर आधारित कहानी है । हां , तो यह असल में आतंकवाद और साजिश पर आधारित कहानी ही है । एक ऐसी साजिश जिसमें कदम कदम पर रोंगटे खड़े कर देने एवं चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं ।
        मास्टरमाइंड , इतना शातिर की सीक्रेट सर्विस को धता बताकर अपने मास्टर प्लान के तहत सीक्रेट सर्विस के जासूस के खिलाफ कुछ ऐसे सबूत प्लांट करता है , जिससे कि सीक्रेट सर्विस का जासूस जेल चला जाए और सीक्रेट सर्विस अपने जासूस को निर्दोष साबित करने में लग जाए ताकि वह अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचा सके । लेकिन सीक्रेट सर्विस अपने ही जासूस के जेल जाने के पीछे के कारणों को तलाशने लगती है और तेजी से इन्वेस्टिगेशन शुरू कर देती है । तब जाकर सीक्रेट सर्विस के अपनी जांच पड़ताल में कुछ ऐसे खुलासे होते हैं । जिन्हें जानकर सीक्रेट सर्विस के एजेंट एवं चीफ आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।
         
        वो कौन सा प्लान था जिसे जानने के बाद सीक्रेट सर्विस के एजेंट आश्चर्यचकित रह जाते हैं ? 
        आखिर उस मास्टरमाइंड का ऐसा कौन सा प्लान था जिसके तहत मास्टर माइंड ने सीक्रेट सर्विस को अन्य दिशाओं में उलझाकर रख दिया ?
        क्या मास्टरमाइंड अपने प्लान को अंजाम तक पहुंचा पाता है ?
        क्या सीक्रेट सर्विस को पता चल पाता है कि मास्टरमाइंड कौन है और किस के इशारे पर काम कर रहा था ?
        क्या सीक्रेट सर्विस असल मास्टरमाइंड तक पहुंच पाती है ?
        क्या सीक्रेट सर्विस का एजेंट जेल से आजाद हो पाता है ?
° मेरी रुचि का कारण -
          मुझे स्पाई ( जासूसी ) थ्रिलर बहुत पसंद हैं ।इस उपन्यास में अमर और रिंकी के बीच के वार्तालाप और क्रियाकलाप बहुत अच्छे लगे । अमर सीक्रेट सर्विस का एजेंट और रिंकी भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की एजेंट थी । जो अपने अपने मिशन के तहत एक दूसरे से अचानक मिल जाते हैं । अमर और रिंकी को ना जाने कब एक दूसरे से प्यार हो जाता है । अमर , रिंकी को अपनी सोलमेट मानने लगता है ।
पुस्तक के बारे में मेरी राय -
            यह उपन्यास अपने आप में पूर्ण उपन्यास है । लेकिन लेखक ने इस कहानी के अंत में कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिए जिससे कि पाठकों के मन में जिज्ञासा बढ़ जाती है कि अब इन किरदारों का आगे चलकर क्या होगा क्या नहीं । मेरी नजर में लेखक महाशय ऐसा ना करते तो भी उपन्यास की कहानी पूर्ण ही होती ।
मेरी संस्तुति
            यह उपन्यास जासूसी थ्रिलर पढ़ने वालों को बहुत पसंद आएगा । जो लोग जासूसी थ्रिलर पढ़ते हैं मैं उन्हें उपन्यास पढ़ने का सुझाव देना ज्यादा पसंद करूंगा ।
पाठक  : प्रेम कुमार मौर्य
• दिनांक : 31 मई 2020

सोमवार, 17 जनवरी 2022

बवण्डर - सुरेश चौधरी, समीक्षा

नाॅवल – बवंडर
लेखक – सुरेश चौधरी
प्रकाशन – रवि पॉकेट बुक्स
पृष्ठ - 288
समीक्षक – दिलशाद (सिटी ऑफ इविल)
सुरेश चौधरी की कलम से निकली है इस बार देशभक्ति से ओत प्रोत एक्शन, थ्रिल और रोमांस की बेहद ही मार्मिक कहानी। जो प्रत्येक पाठक को अंत तक झंझोड़ देगी। 
     देशभक्ति है अपने देश से प्रेम और देश के लिए प्राण न्योछावर करना। तब क्या हो जब बीच में परिवार या धर्म आ जाए। इसको भी सुरेश जी ने बेहद ही शानदार तरीके से बताया है की देश सर्वोपरि है। देशप्रेम के स्थान को परिवार, प्यार, धर्म, कोई कीमती चीज भी जगह नहीं ले सकती। देश की सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है जो देश को नुकसान पहुंचाती है। किंतु देश के मतवाले, जिनके हृदय में देश प्रेम बसा है तब तक देश को कोई बाल बराबर भी नुकसान नही पहुंचा सकता। 

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

प्रायश्चित - रानू, उन्यास समीक्षा

रानू – प्रायश्चित- 1977

सन् 1970 व 1980 ईं के दशक के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार रानू की प्रसिद्धि इतनी ज्यादा थी कि इस समय उनके नाम से कई जाली उपन्यास भी हाथोहाथ बिक जाते थे। उनकी पत्नी सरला रानू भी उन्यासकार थी। पति-पत्नी दोनों एलीगन रोड़ इलाहाबाद में रहते थे। उनकी पत्नी को भी उनकी प्रसिद्धि का भरपूर लाभ मिला। 

प्राश्चित उपन्यास का पहला संस्करण 1977ई. में हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था।

सोमवार, 26 जुलाई 2021

द ट्रेल- अजिंक्य शर्मा, समीक्षा

द ट्रेल - अजिंक्य शर्मा 
उपन्यास समीक्षा- संजय आर्य
                                उपन्यास समीक्षा-03
 "एक और नई मर्डर मिस्ट्री जिसमे रहस्य के साथ जज्बातों का सैलाब भी है जिसमे आप खो जाएंगे । कातिल को पकड़ने में इस बार पाठकों को बहुत मशक्कत करनी होगी । अंत काफी चौकाने वाला है।"
         'द ट्रेल' अजिंक्य शर्मा का सातवां उपन्यास है और  उनके पहले उपन्यास 'मौत अब दूर नही' को पाठकों से अच्छा प्रतिसाद मिला था जिसके कारण  लेखक से पाठकों की उम्मीद बढ़ गई थी जिस पर 'द ट्रेल' के माध्यम से लेखक 100 प्रतिशत खरे उतरे है, और मिस्ट्री लेखक के रूप में अपना सिक्का एक बार फिर से जमाने मे सफल रहे है। 
        'द ट्रेल' को मैंने एक बार पढ़ना शुरू किया तो खत्म करके ही माना। उपन्यास का अंत काफी हैरत अंगेज है  उनके अन्य उपन्यास से इतर इसमें जज्बातों का तूफान भी है । ऐसी मर्डर मिस्ट्री की आप भी खुद को जासूस मानते हुवे कातिल की तलाश करने लग जाएंगे।

मंगलवार, 15 जून 2021

पहली वैम्पायर- विक्रम ई. दीवान, उपन्यास समीक्षा

एक पिशाचनी की दिल दहला देने वाली ख़ौफ़नाक कहानी
उपन्यास :- पहली वैम्पायर
लेखक :     विक्रम ई. दीवान 
प्रकाशन :  बुक कैफे पब्लिकेशन
पृष्ठ संख्या -184
उपन्यास समीक्षा - संजय आर्य

वारलॉक श्रृंखला के बाद 'पहली वैम्पायर' का पाठकों को बेसब्री से इंतजार था। लगता है विक्रम ई.दीवान सर ने कसम खाई है कि वो पाठकों को नए नए तरीकों से डराकर ही रहेंगे। और इस बार पाठकों को उन्होंने एक ऐतिहासिक डरावनी कहानी के माध्यम से डराने का न केवल बेहतरीन प्रयास किया है बल्कि डराने में सफल भी रहे है। 
        कहानी की पृष्ठभूमि में है- सन 1818 का ब्रिटिश काल और उनका ठगों के साथ संघर्ष। ब्रिटिश कैप्टेन जोनाथन स्मिथ एक घमंडी और सनकी आदमी है उसके साथ इंग्लैंड की ही मानवविज्ञानी एलेन भी रहती है जो भारत घूमने आई है। स्मिथ को एक दिन जब अपने इलाके में एक आदमी की पेड़ पर उल्टी लटकी लाश मिलती है।और जैसे किसी जीव ने उसके शरीर से खून की आखरी बून्द तक  निकाल ली  हो, उसके बाद शुरू होती है स्मिथ की खोजबीन और उसका सामना होता है खून पीने वाली पिशाचिनी से और वो एक अघोरी की सहायता लेता है। 
पिशाचिनी की कहानी काफी रोचक और ख़ौफ़नाक है।एक बानगी देखिये।
"मुझे लगता है, तुम और कैप्टन दोनों इस जीव को बहुत हल्के में ले रहे हो।

बुधवार, 9 जून 2021

बिच्छू का खेल- अमित खान

साहित्य देश अपने ब्लॉग पर एक नया स्तम्भ आरम्भ कर रहा है- उपन्यास समीक्षा। जिसमें आप विभिन्न पाठकों द्वारा लिखी ्यी रोचक समीक्षाएं पढेंगे। 
इस क्रम में सब से पहले हम हरियाणा निवासी सुनील भादू जी द्वारा लिखित एक समीक्षा यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
  अगर आप भी किसी उपन्यास पर समीक्षा लिखते हैं तो हमें भेज सकते हैं। 
Emial- sahityadesh@gmail.com
उपन्यास- बिच्छू का खेल
लेखक- अमित खान
प्रकाशक- Book cafe
एमेजन‌ लिंक- बिच्छू का खेल
उपन्यास समीक्षा- सुनील भादू
पर सुपरहिट वेब सीरीज़ बनी। पर वेब सीरीज और उपन्यास दोनों की कहानी अलग लग रही है।

कहानी की शुरुआत मुख्य किरदार अखिल से होती है। अखिल के पिता उसे एक वकील बनाना चाहते है। अखिल का एडमिशन लॉ कॉलेज में करवाने के लिए उनको एक लाख की जरूरत होती है। वो अगले दिन उस्मान भाई के पास जाता है पर उस्मान भाई उसे एक भी पैसा नही देते,  रात को अखिल के पिता देर से आते हैं और अपने साथ एक लाख रुपए लेकर आते हैं। 
     अगले दिन सुबह पुलिस इंस्पेक्टर तिवारी आता है और अखिल के पिता को उस्मान भाई की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लेता है। 
उस्मान भाई की वाइफ सभी वकीलों को अखिल के पिता का केस लड़ने से मना कर देती है पर क्रिमिनल लॉयर तलोनी अखिल के पिता का केस लेता है और उसे लड़ता है। पर तलोनी उस केस को हार जाता है और अखिल उर्फ़ ‘बिच्छू’ के पिता को एक झूठे मर्डर के इल्ज़ाम में फाँसी हो जाती है। 
फिर अखिल को पता चलता है कि उनकी मौत के लिये तलोनी ज़िम्मेदार है, तब अखिल अपने फ़ादर की मौत का बदला लेने के लिये तलोनी के मर्डर की प्लानिंग बनाता है। यह ‘बिच्छू का खेल’ था - ज़बरदस्त खेल ।
- क्या सच में तलोनी ने अखिल (बिच्छू) के साथ धोखा किया था? 
- ऐसी कौनसी बात थी जो तलोनी ने अखिल से छुपाई?
- अब क्या करने वाला था बिच्छू? क्या सजा देने वाला था वो
- तलोनी को या फिर उसे कुछ नही करने वाला था ?
- क्या सच में अखिल के पिता ने उस्मान भाई का कत्ल किया था ?

रविवार, 13 अगस्त 2017

लता तेजेश्वर

समीक्षा : हवेली

प्रेम के विदरूप सच को उजागर करती :हवेली

'हवेली' लता तेजेश्वर का पहला उपन्यास है। छब्बीस अनुच्छेदों से विभक्त उपन्यास का तानाबाना एक पुरानी हवेली के इर्द-गिर्द बुना गया है जहां घटित होनेवाली अनेक घटनाओं के कारण रहस्य व रोमांच की स्थिति उत्पन्न होती है। 
उपन्यास का आरंभ अजनीश के माध्यम से होता है जो अपने इमार पिता, माँ और कॉलेज में पढ़ रहे छोटे भाई को गाँव में छोड़ कर जीवनयापन के लिए अपना रुख मुम्बई की ओर करता है। यहाँ आते ही वह ठगी का शिकार होता है लेकिन एक अजनबी उसकी मदद कर इंसानियत का परिचय देता है। ऑफिस में नौकरी पाने के बाद समुद्र तट पर एक बार फिर उसकी मुलाकात उस अजनबी से होती है जो मेयर चंद्र शेखर होते हैं। उनके परिवार में पत्नी अवनि के अलावा बेटी अन्वेशा व बेटा राहुल है। कॉलेज में पढ़ने वाली अन्वेशा को यदा कदा डरावने सपने आते रहते हैं। अन्वेशा व राहुल में आपसी बाल सुलभ नोंक झोंक चलती है। अन्वेशा को अपने कुत्ते पलटु से गहरा लगाव है। पानी में तैरने के बाद अन्वेशा की तबियत बिगड़ती है तब उनके चिकित्सक डॉ रमेश शर्मा उसके लिए किसी मनोचिकित्सक से सलाह लेने की सोचते हैं। दूसरे ओर पेशे से अध्यापिका मेहंदी मुम्बई के भीड़ भाड़ वाले इलाके में अपनी माँ गौतमी और छोटी बहिन स्वागता के साथ दो बैडरूम वाले फ्लैट में रहती है। गौतमी पहले नर्स के रूप में काम करती थी लेकिन बाद में ह्रदय रोग से पीड़ित होने पर उसे नौकरी छोड़ कर घर बैठना पड़ता है। गौतमी का पति उसे छोड़ कर चला जाता है इसलिए उसका विश्वास घात मेहंदी हर पुरुष में देखती है। स्वागता अन्वेशा के साथ ही कॉलेज में पढ़ती है। 
कॉलेज के पिकनिक के जाते समय किसी कारण कुछ बच्चे बस से उतर जाते है और जंगल में खो जाते हैं। अन्वेशा के खो की खबर पा कर चंद्र शेखर अजनीश को भेजते हैं तो स्वागत की खोज में मेहंदी चल पड़ती है। रास्ते में नोंक झोंक के बीच दोनों की मुलाकात होती है फिर वह हवेली पहुँच वहीँ रहने लगते हैं। 
हवेली में रहते हुए एक रात अन्वेशा रहस्यमय ढंग से उसके तहखाने में बेहोश मिलती है फिर ऐसे ही घटना मेहंदी के साथ भी घटित होती है। यहीं अजनीश व मेहंदी की निकटता भी बढ़ने लगती है। वहीँ अंकिता हवेली में ही आत्महत्या की प्रयास करते मेहंदी उसे बचाती है।  दोनों तरह की स्थितियों को लता ने सामने रखा है। 
मेहंदी व अजनीश के प्रेम प्रसंग के साथ ही मेयर चंद्र शेखर, उनकी पत्नी अवनि, अन्वेशा, राहुल, मेहंदी की माँ गौतमी, स्वागत के सहपाठी निखिल, सुहाना नीरज, संजय, नीलिमा, अभिषेक, जुई, प्रो.सुनील, अमृता, फातिमा, वृद्धा जैसे पात्रों के सहारे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है। वाचमैन, रघुकाका, पूर्णिमा, डॉ रमेश , महेश के माध्यम से उपन्यास अपने चरम तक पहुँचता है। उपन्यास में जुई एक शरारती छात्र के रूप में सामने आती है। 
उपन्यास की भाषा सरल है। और शैली में रोचकता ऐसी कि एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो कौतूहलवश पढ़ते ही जाते हैं। उपन्यास का आवरण अच्छा है लेकिन मुद्रण का कुछेक कमियाँ जरूर खटकती है। उपन्यास की भूमिका में प्रशिद्ध कथाकार संतोष श्रीवास्तव ने इसे विभिन्न घटनाओं से गुजरती हवेली का सच कहा है। मेरी नज़र में यही सच उसे रोचक व पठनीय बनाता है।
प्रकृति व व्यक्ति का चित्रण अनेक स्थान पर लता ने बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से किया है -
" पत्थरों को काटते हुए नदी सरगम गया रही थी, दूर पहाड़ से गिरते हुए जल प्रपात सूर्य की झिलमिलाती हुई रंगीन किरणे उस जल प्रपात में घुल कर और भी सोभियमान दिख रही थी। सूर्य कि रश्मि जल की तरंगों में प्रतिविम्बित हो कर दूर हवेली में अपनी सुंदरता को निहार रही थी। (पृष्ठ-72)
प्रकृति से मनुष्य के सम्बन्ध व उसके प्रति गहरे अनुराग को लता भी गहनता से महसूसती है।
" प्रदूषण भरी हवा, गाड़ियों का शोर शराबा, एक दूसरे से आगे बढ़ जाने की अधीरता हमें इस सुंदर प्रकृति से दूर ले जाती है।"(पृष्ठ-74)
भले ही लता तेजेश्वर ने 'हवेली' को पूरी तरह काल्पनिक उपन्यास बनाया है और पात्रों का सच्चाई के साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं बताती लेकिन सही मायने में देखें तो रहस्य व रोमांच के बहाने 'हवेली' प्रेम के चरम व उत्कर्ष, उसकी सफलता-विफलता विदृप सच को हमारे सामने लाने का सार्थक प्रयास है।
समीक्षक : महावीर रवांलटा
संभावना - महरगाँव
पत्रलय:मोल्टाड़ी, पुरोला
उत्तरकाशी (उत्तराखंड)

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