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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

बाबा ठाकुर

नाम -बाबा ठाकुर
मूल नाम -
प्रकाशक - माया पॉकेट बुक्स, मेरठ

उपन्यास साहित्य में बहुत से प्रयोग होते रहे हैं। कथानक के स्तर पर यह प्रयोग हो या न हो पर लेखक के नाम पर अनेक प्रयोग देखने को मिलते हैं।
  जब उपन्यास साहित्य में अश्लील उपन्यासों का दौर आता, हर दूसरे लेखक ने एक महिला जासूस को मैदान में उतारा और 'सैक्स- एक्शन' के आवरण में लिपटे उपन्यास प्रकाशित होने लगे।
बाबा ठाकुर, जरा पहचानो चित्र किस प्रसिद्ध उपन्यासकार का हैं?
   इस समय में माया पॉकेट बुक्स ने अश्लील साहित्य के विरोध में अपना लेखक 'बाबा ठाकुर' भी मैदान में उतारा जो साफ- सुधरे उपन्यास होने का दावा करता है।
  याद रहे इसी दौर में एक और Ghost writer देवा ठाकुर भी थे।
  अब बाबा ठाकुर के प्रथम उपन्यास की 'लेखकीय' घोषणा पढ लीजिए।
श्री गणेश

शनिवार, 20 नवंबर 2021

कैसे बना मैं उपन्यासकार- तरुण इंजिनियर

 'मैं उपन्यासकार कैसे बना' शृंखला के इस अंक में आप पढेंगे उपन्यासकार तरुण इंजिनियर के उपन्यासकार जीवन के आरम्भिक अंश कैसे बन उपन्यासकार बने।

कैसे बना मैं उपन्यासकार

दोस्तो,

मैं आपको बता दू कि मेरा जन्म बिजनौर के एक छोटे से कस्बे किरतपुर के रस्तोगी परिवार में सन् 1960 में हुआ था,मेरा पूरा नाम तरुण कुमार रस्तोगी है

बचपन से ही मैं नटखट व लेखक प्रवृत्ति क रहा हूँ। जिसकी वजह से मेरे पिता श्री रामनाथ रस्तोगी ने मुझे घर से दूर, नैनीताल पढने के भेज दिया था। उनका मानना था कि घर से दूर रहकर शायद मेरे जहन से लेखक रूपी कीड़ा एकदम‌ मर जायेगा, पर ऐसा हुआ नहीं।

      नैनिताल की वादियों में पहुंचकर, मेरे दिमाग ने शब्दरूपी झील में, कलम की परवार चलानी फिर शुरु कर दी क्योंकि नैनिताल का वातावरण ही कुछ ऐसा है, यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर ना कुछ लिखने वाला भी लिखना शुरु कर देता है।

      यही मेरे साथ हुआ। पढाई के साथ-साथ मेरी लघु कहानियाँ, कवितायें व गजलें देश की नामी-गिरामी पत्रिकाओं 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी' व 'नंदन' में प्रकाशित होने लगी। प्रशंसकों के पत्र  आते रहे। मैं एक के बाद एक कहानियाँ लिखता गया। कुछ हास्य लेख मेरे 'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स' व 'पंजाब केसरी' में भी छपे। दिन कटते रहे...साल कटते रहे, अचानक एक दिन मेरी मुलाकात हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार रानू से हो गयी। जो उस समय नैनिताल की एक सत्य घटना पर आधारित 'पूजा' उपन्यास लिखने के लिये आये हुये थे। मेरी उनसे मुलाकातें होती रही, फिर मुलाकातें दोस्ती में बदल गयी और कुछ ही दिनों में रानू जी मेरे अच्छे दोस्तों में से एक बन गये। जितना मैं उनके सम्पर्क में आता गया,‌ मेरे अंदर भी उपन्यासकार बनने की ललक जागने लगी। मैं उनके साथ बैठकर छोटे-छोटे शाॅट लिखने लगा। उन्हें पसंद आये और उन्होंने मेरी प्रशंसा की, मेरा हौसला बढ  गया। 

रविवार, 27 अक्टूबर 2019

प्रेम वाजपेयी कहते हैं।

प्रेम वाजपेयी कहते हैं।
आपका हजार बार शुक्रिया


इधर हजारों की संख्या में मुझे मेरे पाठकों के खत मिले हैं। उन खतों में मुझे जो प्यार दुलार, मान, सम्मान और हौंसला और उत्साह मिला है। उसके लिए मैं अपने पाठकों का बहुत ही कृतज्ञ हूँ। इसके ऐवज अगर मैं उनका हजार बार शुक्रिया अदा करूं तो यह भी कम होगा। उन सभी खतों में चेतना की एक लहर भी मुझे दिखाई पड़ी है। मुझसे भारी संख्या में पुराने उपन्यासों की सूची की मांग की गई है। पाठकों ने लिखा है कि अब वे नकली के मामले में बहुत ही सावधान हो गये हैं और उन्हें धोखा नहीं दिया जा सकता। फिर भी मैं एक बात दोहराना उचित समझता हूं कि मेरे नये उपन्यास अब सिर्फ मनोज पाकेट बुक्स में ही प्रकाशित होंगे। अगर कोई प्रकाशक आपको यह सूचना देता है कि वह प्रेम वाजपेयी का नया उपन्यास छाप रहा है तो उसे कदापि सच न मानें। निश्चित रूप से वह जाली उपन्यास होगा।
       आप मेरे जाली उपन्यासों के बारे में भ्रमित न हो। इसके लिए मेरा निवेदन है कि आप मुझे एक पत्र लिख कर मुझसे मेरे पुराने उपन्यासों की सूची मंगा लें। दस पैसे खर्च करने पर आपको सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य में प्रकाशित होने वाले अपने उपन्यासों की सूचना आपको देता रहूंगा तथा जाली उपन्यासों के बारे में भी आपको जानकारी मिलती रहेगी।
        जैसा की आपको मालूम है कि मेरे नकली उपन्यासों के प्रकाशन का केन्द्र मेरठ है। अभी-अभी मेरठ से कुछ जाली उपन्यास निकाले गये हैं। इन उपन्यासों पर मैं कानूनी कार्यवाही करने तो जा ही रहा हूँ। फिर भी आप मेरठ से निकलने वाले नकली उपन्यासों से सावधान रहें।
      मेरे नाम से निकाले गये उपन्यास एकदम जाली हैं। मन छुपी पीड़ा, दर्द के साथी, एक चुभन गुलाब की, उजले मोती काले पंख, वासना की देवी, पाप की पुतली, ढलती रात का सपना। मेरे लिखे उपन्यास नहीं है। इन जाली उपन्यासों को बेचते हुए यदि किसी बुलसेलर को पायें तो उसका पता नोट करके हमारे पास अवश्य भेजें।
       एक बार फिर मैं अपना नया उपन्यास लेकर आपके सामने आया हूँ। आप बड़े ध्यान से इस उपन्यास को पढे़ और पढ़ने के बाद दो शब्द मुझे अवश्य लिखें। आपके पत्रों से मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है। मुझे यह ज्ञान मिलता है कि आपकी रूचि कैसी है। आप कैसा उपन्यास पसंद करते हैं।

आशा है सानंद होंगे
शुभ कामनाओं सहित
प्रेम वाजपेयी
एफ-1/27, कृष्णनगर, दिल्ली-51

(उपन्यास 'लटके हुए लोग' के लेखकीय से



रविवार, 15 सितंबर 2019

मैं जासूसी उपन्यासकार क्यों बना?- अमित खान

मैं जासूसी उपन्यासकार ही क्यों बना ?

 मैं समझता हूँ, उपन्यास लेखन अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है । जिसमें पात्रों के माध्यम से आप अपने मन की बात कहते हैं । दूसरे शब्दों में, उपन्यास-लेखन एक जादू की तरह है । जैसे काला जादू ! उपन्यासकार एक जादूगर की तरह रंगमंच पर खड़ा होता है और वह अपने दिमाग रूपी हैट में-से घटनाओं का ऐसा चमत्कारी जाल निकालकर दिखाता है, ऐसा महिमा-मंडल चारों तरफ बुनता है कि सब बेहद मन्त्र-मुग्ध होकर कागज़ पर लिखे शब्दों को पढ़ते हैं ।

       जिस उपन्यासकार में पाठकों को शब्दों से चिपकाने का जितना ज्यादा कौशल होगा, वह उतना ही कामयाब उपन्यासकार बनेगा  ।

         कहने को सब कुछ काफी आसान है, लेकिन फिर भी यह जादू बिखेरना कोई बच्चों का खेल नहीं । उसके लिये उपन्यासकार के पास कठोर परिश्रम, अगाध कल्पनाशीलता और पाठकों की नब्ज परखने का ख़ास आला होना चाहिए ।

       बचपन से ही मुझे अच्छा लगता था, रहस्यमयी रचनाओं का ताना-बाना बुनना । मैं घंटों के लिये ऐसे कल्पना-लोक में खो जाता, जो एक अजब ही दुनिया होती । थ्रिल (रोमांच) से मुझे प्यार था, आज भी है । ज़रा सोचिये, आम जिन्दगी में भी कितना थ्रिल होता है । जिन्दगी में कितने अद्भुत होते हैं वो क्षण, जब आपको मालूम ही नहीं होता कि अगले पल क्या होने वाला है ? क्या घटने वाला है ? सब कुछ सस्पेंसफुल होता है । फिर चाहे वह सस्पेंस कैरियर को लेकर हो या जिन्दगी और मौत को लेकर । थ्रिल आखिर जिन्दगी में कहाँ नहीं है ? हर जगह रोमांच है । हर जगह सस्पेंस है । और जब हमारी जिन्दगी ही इतनी रोमांचकारी होती है, तो फिर व्यवसाय भी कोई रोमांचकारी ही क्यों न चुना जाये । यही सोचकर मैं जासूसी उपन्यासकार बन गया ।

     श्रद्धेय देवकीनंदन खत्री से शुरू हुआ भारत में जासूसी उपन्यास का यह सफ़र इब्ने सफी और ओमप्रकाश शर्मा से लेकर आज तक जारी है ।
      फिर भी एक बात का दुःख अवश्य है । भारत में जासूसी साहित्य को वह सम्मान आज भी नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था । जबकि वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे शलाका पुरुष इस क्षेत्र में हुए हैं, जिन्होंने अद्भुत लेखन-कार्य किया है । आज भी जासूसी साहित्य को भारत में साहित्य के नाम पर कूड़ा परोसने वाला एक व्यवसाय समझा जाता है । जबकि विदेशों में जासूसी साहित्यकारों ने अथाह मान-सम्मान प्राप्त किया है । अगाथा क्रिस्टी, इयान फ्लेमिंग और जेम्स हेडली चेइज जैसे दर्जनों उपन्यासकार इस बात के साक्षी हैं । इतना ही नहीं, शरलाक होम्ज पात्र के रचयिता आर्थर कानन डायल को इंग्लैंड में ‘सर’ जैसी मानद उपाधि से भी अलंकृत किया गया ।

क्या भारत में ऐसा संभव है ?
हरगिज नहीं ।
अभी जासूसी साहित्य के लिये यहाँ एक खुली मानसिकता की आवश्यकता है । स्वस्थ्य बहस की आवश्यकता है ।

       फिर भी मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं एक जासूसी उपन्यासकार हूँ और मुझे दया आती है उन कुंठित मानसिकता वाले लोगों पर, जो जासूसी उपन्यासों को सिर्फ इसलिये नहीं पढ़ते, क्योंकि उनकी निगाह में यह एक स्तरहीन साहित्य है ।

ज़रा सोचिये, वह मनोरंजन के कितने महत्वपूर्ण साधन से वंचित हैं ।

     मैं इस कामना के साथ इस लेखकीय को बंद करता हूँ कि एक दिन हालात सुधरेंगे । एक दिन जासूसी साहित्य को भारत में वही दर्जा हासिल होगा, जो विदेशों में हासिल है ।

अब आज्ञा चाहूंगा ।
आपका अपना
अमित खान
मुंबई – 400104
सम्पर्क सूत्र : foramitkhan@gmail.com

यह खास लेखकीय, जो "मैडम नताशा का प्रेमीे" उपन्यास का हिस्सा है।  


शनिवार, 1 जून 2019

अभिमन्यु पण्डित लेखकीय

अभिमन्यु पण्डित के प्रथम उपन्यास 'अभिमन्यु का चक्रव्यूह' का लेखकिय ।
परमप्रिय पाठकों,
सादर अभिनन्दन!

जिस तरह किसी भी मां को अपना पहला बच्चा प्यारा होता है, जौहरी को पत्थरों में हीरा प्यारा होता है, गुलशन के महकते फूलों में गुलाब प्यारा होता है, उसी तरह किसी भी लेखक के लिये उसका पहला उपन्यास प्यारा होता है, जिसे वह ताउम्र नहीं भूल पाता, क्योंकि उसी से उसकी पहचान बननी शुरू होती है। मैं अपनी इस प्यारी चीज को आप सबको समर्पित करता हूं। मेरी यह सौगात आपके नाम है। केशव पण्डित जैसे किरदार का जलवा ही समझिये जिसने मुझे प्रेरित किया कि मैं भी अपने टूटे-फूटे शब्दों से इस किरदार को लेकर पूरा केशव पुराण ही लिख सकूं। इस केशव पुराण की यह पहली कृति है, जिसके प्रकाशक हैं—'रवि पॉकेट बुक्स'।


          केशव पण्डित को मुख्य पात्र के रूप में लेकर अनेक उपन्यासों की इस घुड़दौड़ में पहली बार एक लंगड़ा घोड़ा मैदान में उतरा है, जो अभी इस रेस में सबसे पीछे है, अगर जौकी ने इस घोड़े को उसी अन्दाज में दौड़ाया, जिसकी मैंने परिकल्पना की है, तो दौड़ का एक अद्भुत आनन्द आप सब ले सकेंगे। हार-जीत का फैसला भविष्य के गर्भ में है--भविष्य, जिसे न कोई जान सका और न जान सकता है। इस घोड़े पर जो जौकी सवार है, उसका नाम है अभिमन्यु पण्डित और प्रस्तुत उपन्यास है--'अभिमन्यु का चक्रव्यूह'।

बुधवार, 1 मई 2019

अमित श्रीवास्तव जी के उपन्यास का लेखकीय

फरेब उपन्यास के लेखकीय से...

नमस्कार दोस्तों,
         आपके समक्ष अपना पहला उपन्यास प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी और गर्व का अनुभव हो रहा है। यह उपन्यास कई लोगो की मेहनत का नतीजा है। सर्वप्रथम मैं धन्यवाद अदा करता हूं अपने माता पिता और मेरी धर्मपत्नी शालिनी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा साथ दिया। और मेरे हर निर्णय का समर्थन किया। यदि शुभानंद जी और सूरज पाकेट बुक्स ने मुझ पर विश्वास नहीं दिखाया होता तो यह बुक आप के सामने नही आ पाती। यह बुक जो इतनी अच्छी बनी उसमे सूरज पाकेट बुक्स की क्रिएटिव टीम का बहुत बड़ा हाथ है। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूं मिथिलेश गुप्ता जी, देवेन पांडे जी, एडिटर डॉ प्रदीप शर्मा जी, शाहनवाज भाई और निशांत मौर्य जी का जिन्होंने इसके कवर और डिजाईन पर मेहनत की, खास कर शाहनवाज भाई जी की मेहनत तो कबिले तारीफ थी, क्योंकि उन्होंने विभिन्न विचारों को ध्यान में रखकर कवर बनाया। विशेष आभार प्रकट करना चाहूँगा रमाकान्त मिश्र जी और आदित्य वत्स जी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया, साथ ही शुभानंद जी का, जिनसे एक नया लेखक इस मुकाम पर पहुँचा। अंत मे आभार प्रकट करता हूं उन समस्त पाठकों का जिन्होने अपना बहुमूल्य समय देकर इस उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की। मैं उम्मीद करता हूं यह उपन्यास आप सब की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

                       दिसम्बर 2012 में जब मैं पहली बार फेसबुक की दुनिया में शामिल हुआ तब लोगों में हिन्दी नावेल के प्रति जागरूकता नही थी। आज वक्त बदल चुका है। नये लेखकों को अच्छे मंच मिल चुके है। पुराने लेखकों ने फिर से कलम उठा ली है। उदाहरण परशुराम सर, एस सी बेदी सर, अमित खान सर हैं। यह बदलते वक्त की निशानी है। यह सब ऐसे ही नही बदला इसको बदलने में फेसबुक और वाट्सअप पर बन रहे अनेक ग्रुप का अभूतपूर्व योगदान भी रहा है। जिन्होने इस विधा में जान डाल दी। सर्वप्रथम मेरा जुड़ाव हुआ सुरेन्द्र मोहन पाठक ग्रुप और अनिल मोहन लिजेंड ग्रुप से, जहाँ मैने बहुत सी जानकारी प्राप्त की, अनील मोहन लिजेंड ग्रुप में मेरी मुलाकात हुई आदित्य वत्स जी से जिन्होने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। नौ सितम्बर 2016 मेरे जन्मदिन के दिन मुझे ऐसा गिफ्ट मिला जिसे मैं भूल नही सकता। आदित्य जी ने इस दिन एक ग्रुप बनाया "दिवाने दे क्रेजी" और इस का एडमीन मुझे बना दिया यहाँ से मुझे फरेब लिखने की प्ररेणा मिली और यहाँ से सूरज पॉकेट बुक्स और उनके लेखकों से मेरी जान-पहचान हुई जिनके कारण फरेब अपने मुकाम पर पहुँचा।


            ‌‌18 फरवरी 2017 की सुबह जब मैं सो कर उठा तो एक अशुभ समाचार मेरा इंतजार कर रहा था। लोगो के दिलो पर राज करने वाले स्व.वेद प्रकाश शर्मा जी नही रहे। यह घटना मुझे बहुत आहत करने वाली थी। मैं समझ नही पा रहा था इस घटना को कैसे सहन करूँ। उस समय फरेब अपने अन्तिम स्टेज पर था। यू तो मैने अपने जीवन में अनेक लेखको को पढ़ा पर अन्त में तीन लेखको को ही पढ़ता था जिन में सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनील मोहन, ओर स्व. वेद प्रकाश जी थे। सब अपनी विशेषताओं के कारण पंसद थे पर वेद जी का स्थान अलग था। मेरे उपन्यास की शुरुवात वेद जी से ही हुई। आज भी उनके नाम के साथ कई उपन्यास जहन में आते हैं जिनमे रामबाण, कठपुतली, डमरुवाला, बीवी का नशा, दहेज में रिवॉल्वर, देवकांता सन्तति, असली खिलाड़ी, शिखंडी, बहू मांगे इंसाफ, जिगर का टुकड़ा, प्रमुख हैं। उनकी यादें सदा इस दिल में रहेगी। फरेब समर्पित है स्व. वेद प्रकाश शर्मा जी को जिनके कारण यह छोटा कलमकार कुछ लिख पाया।
        फरेब की यह कहानी सुमित अवस्थी के मर्डर केस से प्रारंभ होती है। पुलिस लाख कोशिश के बाद भी कातिल को नही पकड़ पाती जब इस केस की जड़ें चंद्रेश मल्हौत्रा के केस से जुड़ती हैं। जिसकी बीवी कुछ दिनो से लापता है। तो कइयों की जिन्दगी में तूफान आते हैं। फरेब की ऐसी दास्तान सामने आती है जो आप के होश उड़ा देगी। सुमित अवस्थी के कातिल को जान कर आप हैरान हो जायेंगे। इस बुक के प्रति अपनी निष्पक्ष राय मुझे फेसबुक या मेल आईडी पर दें। आपके सुझावो के इंतजार में-


आपका
अमित श्रीवास्तव
लेखक- अमित श्रीवास्तव जी



रविवार, 24 फ़रवरी 2019

लेखक की कलम से- गुलशन नंदा

  ब्लॉग पर एक नया स्तम्भ आरम्भ किया है। जिसके अंतर्गत लेखकों के लेखकिय प्रकाशित किये जायेंगे। इस स्तंभ का आरम्भ गुलशन नंदा के एक लेखकिय से कर रहे हैं। जिसमें गुलशन नंदा ने नकली उपन्यास और स्वयं के उपन्यासों में लगे अश्लीलता के आरोपों पर लिखा है।

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प्रिय पाठक बंधु,
       यह मेरा सौभाग्य है कि आप सबके सहयोग एवं विश्वास के कारण मेरा नाम आज भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक, बल्कि निदेशक में बसने वाले हिन्दी पाठकों में भी प्रिय है। यह भी आपके सहयोग एवं स्नेह का फल है कि मेरी रचनाओं को आज हिन्दी उपन्यासों में सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकें होने का गर्व प्राप्त हुआ है। मुझे आशा है कि मेरी प्रत्येक रचना को आप अपनी आशाओं के अनुकूल ही पायेंगे।
           किन्तु अधिक लोकप्रियता कभी-कभी परेशानी का कारण भी बन जाती है। तीन-चार वर्षों तक मेरे नाम से प्रकाशित जाली उपन्यासों ने मेरे मन को अशांत बनाये रखा। केन्द्रीय गुप्तचर विभाग, पाठकों एवं विक्रेताओं के अमूल्य सहयोग ने अब मुझे जाकर इस अशांति से मुक्ति दिलाई।
               अब एक नया लांझन इस लोकप्रियता के कारण मुझ पर लगाया जा रहा है। मेरे उपन्यासों के बारे में कुछ तथाकथित आलोचक तथा लेखक यह भ्रम फैला रहे हैं कि मेरी लोकप्रियता अश्लील एवं सैक्स से भरपूर उपन्यास लिखने हुई है।  यह एक अजीब बात है कि मेरे उन उपन्यासों में भी, जिनमें रोमांस न के बराबर है साहित्यकारों को अश्लीलता दिखाई देती है। संभव है, मेरी कुछ प्रारम्भिक रचनाओं में, जो मैंने विद्यार्थी जीवन में लिखी थी, रोमांस का कुछ अंश अधिक हो, किंतु बाद में‌ लिखे ग ए मेरे अधिकतर उपन्यासों के संबंध में इस प्रकार का आरोप उचित नहीं । ऐसा प्रतित होता है है, जैसे उन्होंने मेरे उपन्यास पढे बिना इस प्रकार के छींटे कसे हैं।
                    जब तक मुझे अपने पाठकों का स्नेह एव विश्वास प्राप्त है, इस प्रकार के लांछन मुझे निरुत्साह नहीं कर सकते। फिर भी मेरे आलोचकों से मेरा निवेदन है कि यदि वे मेरे उपन्यास पढकर स्वस्थ आलोचना करें तो मेरे लिए वह पथ-प्रदर्शक हो सकती है। लोकप्रियता के कारण यह अनुमान लगा लेना कि उपन्यास अश्लील होगा- सरासर अन्याय है, जिसके बारे में मैं इतना कह सकता हूँ कि कोई भी पुस्तक लाखों की संख्या  में तभी बिक सकती है यदि वह हर घर में खुलेआम पढी जा सके। अश्व पुस्तक न माँ बेटी के सामने पढ सकती है, न पिता पुत्र के सामने। मुझे संतोष और प्रसन्नता है कि मेरी रचनाएँ परिवार के सभी सदस्य एक -दूसरे से छुपाए बिना पढ सकते हैं।
                       मैं पाठकों से अनुरोध करूंगा कि वे मेरे इन उपन्यासों को पढकर सदा की तरह मुझे अपने विचार लिखें। साथ ही मैं उ‌नके भरपूर स्नेह के लिए आभार प्रदर्शित करता हूँ।

7, शीश महल 5-A, पाली हिल्ज,
बांद्रा, मुम्बई-400050
                                                                आपका
                                                             गुलशन नंदा

(सन् 1985)

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...