प्रस्तुत अंश वेदप्रकाश काम्बोज जी के उपन्यास 'मौत की आवाज' से है। यहां कुंदन कबाड़ी, फन्ने खां तातारी और गोकुल मदारी जासूस विजय से मिलने जाते हैं और विजय को अपना परिचय देते हैं।
तो अब पढिये इन तीनों पात्रों का परिचय इन्हीं की जुबान से-
और गुरुदेव का उच्च नाद करते हुए तीन नमूनों ने उसके पैर पकड़ लिए। चकित सा विजय पहले तो उन तीनों के काले सिरों को देखता रहा जो उसके पैरों के निकट इस तरह एकत्रित हो गए थे जैसे तीन विभिन्न रेखाएं एक बिन्दु पर आकर मिल गई हों।
विजय ने आशीर्वाद की मुद्रा में अपने हाथ फैलाये और फिर गुरू ने गम्भीर मुद्रा में कहा- 'सदा खाओ गुड़ के सेव ।'
'धन्य हैं गुरुदेव आप धन्य हैं।' उन तीनों ने उसके पैर पकड़े हुए समवेत स्वर में कहा। किसी ने भी सिर उठाकर देखने की चेष्टा नहीं की।










