साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है धीरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लोकप्रिय उपन्यासकार रीमा भारती जी के उपन्यास 'नर्क की छाया' का एक अंश-
नर्क की छाया - रीमा भारती
आजकल रीमा भारती एकदम फ्री थी।
और जब वह फ्री होती थी, उसके डिपार्टमेंट ने उसे कोई खतरनाक मिशन नहीं सौंपा होता था, तो वह मनोरंजन के मूड में होती थी। अपनी व्यस्त जिन्दगी से चन्द लम्हें चुराकर क्लब, पार्टियों और अपने दोस्तों के साथ घूमती थी। उसका रोज का यही शगल होता था।
और आजकल वह यही कर रही थी।
रीमा भारती मेकअप करके उठ खड़ी हुई और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई।
इस वक्त वह अपने पसंदीदा लिबास में थी।
उसने आसमानी रंग की साड़ी और उसी से मैच करता हुआ ब्लाउज पहना हुआ था। अपने बॉबकट बालों को पीछे ले जाकर आसमानी रंग के स्कार्फ से बांधा हुआ था। कानों में सोने के टॉप्स चमक रहे थे। इस लिबास में वह आसमान से उतरी अप्सरा लग रही थी।
रीमा भारती !
आई०एस०सी० अर्थात् भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था इण्डियन सीक्रेट कोर की नम्बर वन एजेन्ट । दीस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत, जो अपने जिस्म पर दो नहीं, बल्कि हजारों आंखें रखती है और एक जासूस होने के नाते मामूली-सी घटना पर संदेह करना उसका पेशा था। मां भारती की शरारती, उद्दण्ड किन्तु लाडली बेटी। वो बला, जिससे मौत भी पनाह मांगे।
रीमा भारती ने ड्राइंगरूम में पहुंचकर मेज पर रखा अपना वेनिटी बैग उठाया।
उसी पल !
फोन की घण्टी बज उठी।
रीमा भारती ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
"हेलो।"
"रीमा!"









