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Sunday, June 20, 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-11

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 10    ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
नाश्ता करके हम पटेलनगर के लिए निकले! भारती साहब घर पर नहीं थे! 
मैंने ऊपर खेल खिलाड़ी के आफिस में जाकर खेल खिलाड़ी की डाक देखी! पढ़ने में वक़्त लगता, इसलिए सारी डाक इकट्ठी करके एक बड़े ब्राउन लिफाफे में रख लीं और जवाब देने के लिए कुछ पोस्ट कार्ड साथ में डाल लिये! 
"अब किधर चलें?" वालिया साहब ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए मुझसे पूछा! 
"बैक टू पैविलियन...!" मैंने कहा! 
"नहीं यार, इतनी जल्दी घर जाकर क्या करेंगे? चलो, कनाट प्लेस चलते हैं!" और वालिया साहब ने स्कूटर पटेलनगर से शंकर रोड पर ले आये! फिर काफी देर सीधे चलने के बाद राम मनोहर लोहिया अस्पताल (तब के विलिंग्डन हास्पिटल) के पास से मोड़ लिया! 
फिर बंगला साहब गुरुद्वारे के निकट, बाहर ही फुटपाथ के समीप स्कूटर रोक दिया और बोले - "योगेश जी, आप यहीं रुको, मैं जरा मत्था टेक आऊँ!"
"मैं भी चलूँ..?" मैंने कहा! 
"फिर स्कूटर कौन देखेगा? पार्किंग में खड़ा किया तो ख्वामखाह टाइम वेस्ट होगा!"
"ठीक है!" मैंने कहा और स्कूटर के साथ खड़ा हो गया! वालिया साहब मत्था टेकने चले गये! स्वभाव से यशपाल वालिया भी धार्मिक प्रवृत्ति के थे! पर किसी विशेष गुरुद्वारे या मन्दिर जाने की उनकी आदत नहीं थी! चांदनी चौक गये तो शीशगंज गुरुद्वारे में मत्था टेक लिया! सेन्ट्रल सेक्रेटियेट गये तो रकाबगंज में मत्था टेक दिया! बिड़ला मन्दिर के निकट से गुज़रे तो वहाँ सिर झुकाने चले गये।

Friday, June 18, 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -10

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 9   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था -  ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता! 
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये! 
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में  जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!  

Thursday, June 17, 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -09

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 8   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
"तूने तो गद्दारी करने की ठान ली है, पर हमें तो व्यापार करना है! सारी खबरें रखनी ही पड़ेंगी!" गौरी भाई साहब मुस्कुराते हुए गर्दन हिलाते हुए बोले! 
"मैंने कौन सी गद्दारी कर दी...?" मैंने पूछा! 
"अब मेरा मुंह मत खुलवा!" गौरीशंकर गुप्ता बोले - "हमारे दुश्मनों के यहाँ रविवार को भी चाय नाश्ता करने पहुँचा हुआ था!  या कह दे नहीं गया था - रविवार को तू विजय पाकेट बुक्स में...!"
"जगदीश जी ने बताया है कुछ.,.?" 
"अरे जगदीश जी को देख कर तो तू और  राजभारती टी स्टाल में घुस गये थे! पता चलने पर राज भाई ने एक लड़के को साइकिल से राणा प्रताप बाग भेजा था! उसने तुझे भी वहाँ देखा था और बाकी सबको भी! चल, अब भी कह दे कि तू नहीं गया था विजय पाकेट बुक्स में...!" गौरीशंकर गुप्ता निरन्तर मुस्कुरा रहे थे! 
"असली जासूस तो आपलोग हो!" मैं हंसा - "आपने तो पूरी जासूसी एजेन्सी खोल रखी है! योगेश मित्तल सांस  भी लेता है तो आपको पता चल जाता है - कहाँ पर खड़े होकर सांस ली थी! पर उस दिन आप मुझे दरीबे में छोड़, अचानक कहाँ गायब हो गये थे...?"
"हम पटेलनगर गये थे, यह तो जगदीश जी ने तुझे बता ही दिया था बेटा... फिर क्यों पूछ रहा है?" गौरीशंकर गुप्ता बोले! राजकुमार गुप्ता इस बीच बिल्कुल खामोश रहे, लेकिन वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे! 

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-08

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 7   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
राणा प्रताप बाग पहुँचकर, फिर उसी हाल में महफ़िल जमी, जहाँ किताबों का भण्डार था और वीपी पैकेट और रेलवे के बण्डल तैयार किये जाते थे। 
आज की महफ़िल में वासुदेव और हरविन्दर नहीं थे! वे वापस कानपुर और लुधियाना चले गये थे, लेकिन आज की महफ़िल में इन्देश्वर जोशी भी हम सबके साथ ही एक फोल्डिंग कुर्सी पर बैठा था, जैसे वह विजय पाकेट बुक्स में नौकरी करने से पहले साथ ही बैठा करता था।
थोड़ी देर बाद कुछ और लोग आ गये, जिन्हें मैं नहीं जानता था, किन्तु वे सभी उम्रदराज थे, अत: मेरे लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि वे सब विजय कुमार मलहोत्रा के पुराने एवं घनिष्ठ मित्र हैं। 
विजय जी उन्हें राजहंस के हिन्द व मनोज में छपने का किस्सा सुनाने लगे। 
उन सब बातों में न मेरे लिए कुछ नया था, ना ही बताने योग्य नया। 
अचानक वालिया साहब ने एक दस का नोट इन्देश्वर जोशी की ओर बढ़ाते हुए धीरे से कहा - "इन्देश, यार मेरे लिए एक पान ले आ..!" फिर मेरी ओर देख कर बोले -"एक योगेश जी के लिए भी..!"
"आओ योगेश जी, चलते हो?" इन्देश ने उठते हुए मेरा हाथ थामते हुए मुझसे कहा -"चलो, पान ले आयें।"
मैंने पहले भी बताया है - मैं एकदम मस्तमौला था! छोटी-बड़ी गाड़ियों में बैठने और घूमने वालों से भी मेरी दोस्ती थी तो फटे और मैले कपड़ों में दिखने वालों से भी बहुत मुहब्बत भरे रिश्ते थे मेरे। 
       और एक आदत उन दिनों मेरी जिन्दगी का खास अंग थी, वह यह कि कितना ही जरूरी कहीं जाना हो, अचानक कोई भी किसी काम को कहे, मना करना तो मैंने सीखा ही नहीं था! 
यहाँ तक कि जब मैं बंगला साहब गुरुद्वारे के सामने कनाट प्लेस में रहता था, तब कई अड़ोसी-पड़ोसी मुझसे कभी कोई  मामूली सा बाज़ार का काम सौंप देते थे तो चाहें कितना ही व्यस्त रहा होऊँ, कभी इन्कार नहीं करता था! वहाँ के पड़ोसियों ने बाज़ार से आधा किलो चीनी ला देने और स्टुडियो से फोटो ला देने ही नहीं, रीगल या रिवोली सिनेमा हॉल में फिल्म 'हाऊस फुल' रही हो तो मुझसे फिल्मों के टिकट तक ला देने का काम लिया था!
मेरी कनाट प्लेस के सिनेमा हॉल्स के गेटकीपर्स से भी उन दिनों अच्छी खासी जान-पहचान थी, जिसे आप दोस्ती भी कह सकते हैं।

Wednesday, June 16, 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 07

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 6  ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

आप सौ परसेन्ट एक ईमानदार और सच्चे इन्सान हैं, वफ़ादार और अच्छे इन्सान हैं, लेकिन कभी कभी वक़्त आपके खिलाफ हो जाता है और जब वक़्त आपके खिलाफ हो, आपकी ईमानदारी में दूसरे को बेईमानी नज़र आती है। सच्चाई में झूठ नज़र आता है। ऐसे समय कोई सफाई देना या अपने अज़ीज़ को यह समझाना कि आप ईमानदार हैं, सच्चे हैं, शुभचिन्तक हैं, दोस्त हैं, सब बेकार होता है। ऐसे समय खामोश रह जाना ही सबसे उत्तम कदम होता है।
         यह सब मैं इसलिये बता रहा हूँ, क्योंकि जो-जो लोग, मेरी पीठ पीछे भी हमेशा मेरी तारीफ करते थे, सराहना करते थे - राजहंस और हिन्द - मनोज के विजय पाकेट बुक्स से विवाद में एकदम अकारण मुझे शक की निगाहों से देखने लगे थे। हालांकि बाद में, मैं उन सबके लिए भी वही पहले वाला प्यारा-दुलारा योगेश मित्तल बन गया था, लेकिन कुछ समय तक मुझे कड़वाहटें, जिल्लतें और उपेक्षा भी सहनी पड़ी थी। 
       विजय पाकेट बुक्स में वासुदेव और हरविन्दर से भारती साहब ने उन्हीं दिनों मेरा प्रथम परिचय कराया था। बाद में तो हम कई बार मिले, पर उस रोज भी वासुदेव और हरविन्दर बहुत मुहब्बत से मिले। हाथ पकड़ कर वासुदेव ने कई बार हाथ हिलाया।
 उसने यह भी कहा -"आपका नाम तो कई बार सुना था। मिलने का अवसर पहली बार मिला है।"
हरविन्दर ने भी हाथ मिलाया, पर सहज अन्दाज़ में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाकर छोड़ दिया। 
विजय कुमार मल्होत्रा उस समय एक साइड में खड़े, इन्देश्वर जोशी से पहले से, विजय पाकेट बुक्स में काम कर रहे पैकर को, वासुदेव, हरविन्दर, सावन और मीनू वालिया की पुरानी सभी किताबों के दो-दो बण्डल निकाल कर कार की डिकी में रखने का आदेश दे रहे थे। उस समय मुझे विजय कुमार मल्होत्रा के उस आदेश का मतलब समझ में नहीं आया था, पर बाद में सब पता चल गया था। 
     वे सारी किताबें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए निकलवाई जा रही थीं। दरअसल विजय कुमार मलहोत्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हमेशा राजहंस की किताबों की बिक्री पर ही ज्यादा जोर देते रहे थे, लेकिन अब उन्हें समझ आ गया था कि उन्हें अपने सभी लेखकों पर बराबर का जोर लगाना चाहिए था। 
उस समय विजय कुमार मल्होत्रा की पीठ मेरी तरफ थी। अपने वर्कर को सब कुछ समझाने के बाद जैसे ही वह पलटे, उनकी नज़र मुझपर पड़ी और छूटते ही वह बोले - "ये मनोज का जासूस कब आया?"
मुझे काटो तो खून नहीं। 

Tuesday, June 15, 2021

पहली वैम्पायर- विक्रम ई. दीवान, उपन्यास समीक्षा

एक पिशाचनी की दिल दहला देने वाली ख़ौफ़नाक कहानी
उपन्यास :- पहली वैम्पायर
लेखक :     विक्रम ई. दीवान 
प्रकाशन :  बुक कैफे पब्लिकेशन
पृष्ठ संख्या -184
उपन्यास समीक्षा - संजय आर्य

वारलॉक श्रृंखला के बाद 'पहली वैम्पायर' का पाठकों को बेसब्री से इंतजार था। लगता है विक्रम ई.दीवान सर ने कसम खाई है कि वो पाठकों को नए नए तरीकों से डराकर ही रहेंगे। और इस बार पाठकों को उन्होंने एक ऐतिहासिक डरावनी कहानी के माध्यम से डराने का न केवल बेहतरीन प्रयास किया है बल्कि डराने में सफल भी रहे है। 
        कहानी की पृष्ठभूमि में है- सन 1818 का ब्रिटिश काल और उनका ठगों के साथ संघर्ष। ब्रिटिश कैप्टेन जोनाथन स्मिथ एक घमंडी और सनकी आदमी है उसके साथ इंग्लैंड की ही मानवविज्ञानी एलेन भी रहती है जो भारत घूमने आई है। स्मिथ को एक दिन जब अपने इलाके में एक आदमी की पेड़ पर उल्टी लटकी लाश मिलती है।और जैसे किसी जीव ने उसके शरीर से खून की आखरी बून्द तक  निकाल ली  हो, उसके बाद शुरू होती है स्मिथ की खोजबीन और उसका सामना होता है खून पीने वाली पिशाचिनी से और वो एक अघोरी की सहायता लेता है। 
पिशाचिनी की कहानी काफी रोचक और ख़ौफ़नाक है।एक बानगी देखिये।
"मुझे लगता है, तुम और कैप्टन दोनों इस जीव को बहुत हल्के में ले रहे हो।

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