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बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

क्या सुन रहे हो- हास्य रस,आरिफ मारहर्वी

 साहित्य देश के स्तम्भ के हास्यरस में आज प्रस्तुत है लोकप्रिय उपन्यासकार 'आरिफ मारहर्वी' के उपन्यास 'भयानक भिखारी' से एक रोचक हास्य अंश । 



 भयानक भिखारी - आरिफ मारहर्वी
फिर उन्हें गाईड एक खम्बे के निकट खड़ा हुआ दिखाई दिया । वह खम्बे से कान लगाये इस प्रकार खड़ा था जैसे कुछ सुनने की कोशिश कर रहा हो । सोजी ने गाईड पूछा-

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

मजेदार समोसे- रोचक किस्सा

साहित्य देश के हास्य रस स्तम्भ में प्रस्तुत है प्रसिद्ध उपन्यासकार कर्नल रंजीत के उपन्यास 'वह कौन था' का एक हास्यपूर्ण किस्सा।

"बाबा, तुम समोसे क्या बनाते हो, गजब ढाते हो !" मेजर कहा ।
   ठाकुर हिम्मत सिंह मेजर की इस प्रशंसा पर प्रसन्न हुए। उन्होंने ऊंची आवाज में कहा - "बाबा नन्दू, इधर आओ और इनको बताओ कि तुम हमारे घर में नौकर कैसे हुए थे !"
"सरकार, मैं यह कहानी इतनी बार मेहमानों को सुना चुका हूं कि अब उसे दुहराते हुए शर्म आती है।" नन्दू बाबा ने निकट आकर कहा – “मगर मालिक का हुक्म कौन टाल सकता है, साहब ? मैं बावर्ची की नौकरी की खोज में था। बड़े ठाकुर साहब यानी मालिक के दादाजी ने मुझे देखा तो उनको विश्वास न आया कि मैं बावर्ची भी हो सकता हूं। खैर उन्होंने मुझे आजमाने की ठान ली। हुक्म हुआ कि मैं रसोईघर में जाकर दोपहर का खाना तैयार करूं, सबसे पहले वे खाकर देखेंगे। सो हुजूर, खाना बन गया।
       ठाकुर साहब खाने के लिए बैठे। मैंने नौकरानी के हाथ पाली परोसकर भिजवाई। थाली में केवल दाल की कटोरी थी और परांठे थे। में धड़कते दिल के साथ रसोई में इन्तजार कर रहा था । वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद थी। बड़े ठाकुर साहब ने बार-बार दाल मंगवाई, यहां तक कि उनका पेट भर गया। फिर वे रसोई में आकर बोले- 'मैं तो सिर्फ दाल ही खाता रहा, बाकी जो चीजें तुमने पकाई होंगी, वे तो पड़ी रह गई...!" मैंने केवल एक बरतन उनके आगे रख दिया जिसमें दाल थी और कहा- 'मैंने और कुछ नहीं बनाया था, सरकार ! बस दाल ही बनाई थी और इस विश्वास के साथ बनाई थी कि आप इसके सिवा और कोई चीज मांग ही नहीं सकेंगे ।' बड़े ठाकुर साहब ने मेरी पीठ बनवाई और उसी दिन से मैं इस घर का सेवक चला आ रहा हूं।" नन्दु बाबा ने हाथ हिलाकर कहा मेजर की नजरें उसके हाथों पर पड़ी तो वह आश्चर्य से उसके मैले हाथों की ओर देखने लगा ।
   नन्दू बाबा ने मेजर की निगाहें अपने हाथों पर जमी देखी तो उसने तुरन्त अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे छिपा लिए।

उपन्यास-  वह कौन था
लेखक -    कर्नल रंजीत

शुक्रवार, 2 जून 2023

प्यार करना तो बुरी बात है- हास्यरस

साहित्य देश की हास्य रस स्तम्भ में इस बार पढें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक धीरज के उपन्यास 'वतन के आँसू' का एक हास्यजनक किस्सा।

रामलाल ने अंदर आते ही शीला को अपने आलिंगन में ले लिया था तथा उसके लाल सुर्ख रसीले होंठों को अपने होंठों के मध्य भींच लिया था !

"छोड़ो भी...आप भी बस !"- शीला ने स्वयं को रामलाल की कैद से मुक्त कराते हुए कहा—शर्म से उसका चेहरा लाल-भभूका हो गया था तथा वह घबराई हुई नजरों से उस कोने की तरफ देखने लगी, जहां उनके दोनों बच्चे खड़े थे।

“आहा जी...पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली-पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली।” - सुमिता ताली पीटते हुए उछल-उछलकर कह रही थी ! 

"मैं तुम्हारी मम्मी को प्यार कर रहा था, सुमि !"

“ल....लेकिन प्यार करना तो बुरी बात है !" 

“तुमको किसने कहा ?"-  रामलाल के चेहरे पर नागवारी वाले भाव उभरे थे !

"परसों, जब राखी आंटी मौल्हले वाले एक अंकल से प्यार कर रही थीं, तो मौहल्लेवालों ने अंकल को कितना मारा था!"

रविवार, 25 दिसंबर 2022

हास्य रस- संग्राम- राज भारती

   साहित्य देश के हास्यरस स्तम्भ के अंतर्गत इस बार प्रस्तुत है राज भारती जी के उपन्यास 'संग्राम' का एक रोचक प्रसंग। 
  कथा नायक संग्राम और एक युवती कविता के मध्य एक वार्ता अंश
''तुम एक बहादुर लड़की हो।''- मैंने धीमी आवाज में कहा । ''कोई लड़की बुजदिल नहीं होती ।"
''कुछ तो होती है ।'' - मैं मुस्कराए बिना ना रह सका । 
''वह लड़कियां नहीं बकरियां होती है ।''
''हालांकि मैंने बकरियों को भी सींग मारते हुए देखा है ।''
''वह बकरियां नहीं लड़कियां होती है ।'' - वह बोली।

उपन्यास - संग्राम
लेखक -    राज भारती
उपन्यास समीक्षा - संग्राम

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

यामी- आलोक सिंह खालौरी, हास्य रस

मासिक माॅर्निग वाॅक
 'साहित्य देश' के स्तम्भ 'हास्य रस' में इस बार प्रस्तुत है उपन्यासकार आलोक सिंह खालौरी जी के उपन्यास 'यामी' से चंद हास्य पंक्तियाँ -मासिक माॅर्निग वाॅक.
“और सर मॉर्निंग वॉक हो रही है।”–विजय बोला। 
“हाँ भाई, क्या करें, अब नियम है तो है, चाहे कुछ हो जाए हम अपनी मासिक मॉर्निंग वॉक कभी नहीं छोड़ते।”–आलोक सहज भाव से बोला। 
“मासिक मॉर्निंग वॉक ?”–रिया बोली। 
“हाँ भाई, हर महीने नियम से आधा घंटा मॉर्निंग वॉक करनी ही करनी है चाहे कुछ हो जाए।” 
“जरूरी है सर, सेहत का ख़्याल रखना भी।”–रिया सहज भाव से बोली। 
“बिलकुल, जीवन में अनुशासन बेहद जरूरी है।”–आलोक भी सहज स्वर में बोला। 
विजय ने गौर से लेखक की तरफ देखा। उसे कहीं से कहीं तक विनोद का एक भी भाव नजर नहीं आया।

शनिवार, 20 अगस्त 2022

हास्य रस - काॅनमैन- सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी मर्डर मिस्ट्री लेखन के लिए विख्यात, वहीं उनके उपन्यासों में हास्यरस भी देखने को मिलता है। पाठक जी के प्रिय पात्र पत्रकार सुनील चक्रवर्ती के मित्र रमाकांत अपने विशेष अंदाज के लिए जाने जाते हैं। 
  उपन्यास 'काॅनमैन' का एक दृश्य देखें जहां रमाकांत एक युवती के साथ कैसे हास्य अंदाज में बातचीत करते हैं।

रमाकान्त ने उसके बालों की तरफ उंगली उठाई।
"ये विग है ?” वो बोला ।
“नहीं।” वो बड़े सब्र से बोली।
“विग है। "
“नहीं, भई ।”
"मेरे खयाल से तो विग है !”
“तुम्हारा खयाल गलत है।”
“विग है. मोतियांवालयो।”
“अच्छा, भई, विग है।"
“कमाल है? लगता तो नहीं !"
युवती ने आंखें तरेरीं।


मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

डायमंड क्वीन- एस.सी. बेदी, हास्यरस

नमस्ते पाठक मित्रो,
   साहित्य देश ब्लॉग के स्तम्भ हास्यरस में आज आपके लिये प्रस्तुत है एक नया आनंददायक किस्सा।
  आपने बहुत से उपन्यासों में हास्य-व्यंग्य पढे होंगे, विशेषकर जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी और टाइगर (जे.के. वर्मा) के उपन्यासों में। इस शृंखला की प्रथम अंक में आपने कुशवाहा कांत जी के `उड़ते-उड़ते` हास्य संग्रह से  जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांतनामक हास्यरस पढा, इस शृंखला को आगे बढाते हुये हम आज यहां एस.सी. बेदी जी के उपन्यास `डायमंड क्वीन` का एक हास्य अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।

     विमान जब उड़ कर ब्रिटेन की सीमा पार करके बाहर आ गया तो भगत ने निकट से गुजरती परिचारिका को बुलाया-
“मिस लैला।”
उसने चौंक कर भगत की तरफ देखा-“आपने मुझे पुकारा?”
“इस विमान में और लैला कौन हो सकती है?”
“लेकिन मेरा नाम लिली है।”
“लैला हो या लिली, नाम की ऐसी की तैसी, वैसे तुम हो खूबसूरत।”
“आप क्या लेना पसंद करेंगे?”
“तुम दे नहीं सकोगी।”
“आपकी हर इच्छा को पूरा करना मेरा फर्ज है।”
“तो जल्दी से एक गर्मा गर्म चुम्बन दे दो।”
“लेकिन चुम्बन जैसी कोई वस्तु विमान में मौजूद नहीं।”
“तुम्हारे पास होंठ मौजूद हैं मिस लैला।”
“ओह...अभी आती हूँ।”
थोड़ी देर बाद वह भगत के निकट आकर खड़ी हो गयी। उसके होंठों पर मुस्कान थी।
“यानि फंसी।”- भगत बुदबुदाया।
“मैं आपकी बगल में बैठ सकती हूँ।”
भगत एक तरफ को सरक गया और होंठों को जीभ फेर कर चुम्बन के लिये तैयार करने लगा।
सीट पर बैठ कर उसने नकली रबड़ के होंठ भगत को थमा दिये।
“इन्हें जब तक चाहें आप चूम सकते हैं।”- कहने के साथ ही वह हंसती हुयी उठी और आगे बढ गयी।
………………………………..
इसी उपन्यास का एक ओर दृश्य देखें
  “इंजन में खराबी आ गयी है। तुमने कई विमान दुर्घटनाओं के बारे में सुना होगा, आज देख लो विमान दुर्घटना में आदमी जब आसमान से धरती पर गिरता है तो उसके  किस प्रकार चिथड़े उड़ते हैं।”
“मिस्टर भगत।”- लिली बोली,-“आप समझदार आदमी हैं, यात्रियों को इस तरह मत डराइये”
“तो किस तरह डराऊ?”
 
उपन्यास – डायमंड क्वीन
लेखक –  एस. सी बेदी
प्रकाशक- यंग लेडी प्रकाशन, मेरठ

अन्य महत्वपूर्ण लिंक
उपन्यास समीक्षा- डायमंड क्वीन
जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत


सोमवार, 6 जुलाई 2020

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत
 (लोकप्रिय साहित्य के सितारे कुशवाहा कांत जी के प्रकाशन से 'चिनगारी' मासिक पत्रिकाएं निकला करती थी। पत्रिका में 'श्री चमगादड़' नाम से वे कुछ हास्य- व्यंग्यात्मक स्तंभ भी लिखा करते थे। बाद में इन्हीं हास्य-व्यंग्य को एक पुस्तक रूप में 'उड़ते-उड़ते' शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य 'जनसेविका पुलिस' उसी पुस्तक से लिया गया है।- साहित्य देश

    साहबों! अगर अपने राम सच न बोल, तो पुलिस के समान जनसेवक कर्मचारी भूत-भविष्य-वर्तमान कभी भी नहीं मिलेंगे। हमारे प्रांत की पुलिस तो सेवा भाव में सबसे 'फ्रण्ट' पर है। ट्रेनिंग पीरियड में इन्हें जबानी अभ्यास भी कराया जाता है, ताकि आगे चलकर ये सेवक जनता की माँ-बहनों को धड़ाके के साथ याद रख सकें।
भारत में सुराज होने पर इन जनसेवकों का रोजगार कुछ ठ-ठ-ठप्प पड़ गया है, वर्ना अंग्रेजी पीरियड में आँखों के एक ही इशारे पर इनकी जेबें भर जाती थी। आजकल तो इन बेचारों को कोई ठोस कार्य ही नहीं रह गया है, अत: हम जनता का कर्तव्य है कि इन्हें कोई नवीन कार्य सौंपें।
         एक दिन की बात सुना दूँ। बीच बाजार में अपने एक मित्र जी मिल गये, गोद में चारसालीय 'प्रोडक्शन' लादे। बच्चा बड़ा प्यारा लग रहा था, सो अपनेराम ने बड़े लाड़-प्यार-दुलार से उसे चूमा-चाटा, फिर बातचीत का सिलसिला जो चला तो अन्त में सिनेमा देखने के निश्चय पर आकर रूका। अब मित्रजी बड़े फेर में पड़े। सिनेमा देखने का निश्चय हो चुका, समय भी दस-बारह मिनट ही रह गये, सामने सिनेमा भवन का लाउडस्पीकर रेंक रहा था...मगर गोद का बच्चा वे किसे दें? घर दूर था, पहुँच कर लौटने में काफी देर हो जाती।
"रहने दो कल देख लेंगे..."- अपनेराम‌ ने तसल्ली दी।
       वे बोले-"नहीं यार! आज ही देखेंगे। इतने दिन के बाद तो घोंसले से निकले हो...इस बच्चे को मैं लाया ही क्यों? इसे लेकर सिनेमा में बैठे भी नहीं सकता। शैतान रो-रो दूसरों से गाली सुनवायेगा। इसे खड़े-खड़े लिये रहो तो चुप, जरा भी बैठे कि रोनाध्याय प्रारंभ... "
       तभी अपनेराम की नजर सामने जा पड़ी-थाना! ...बस उपाय दिमाग में आ गया। चट बोला-"मित्र! बच्चा मुझे दो..."
"क्या करोगे?"-कहते हुए मित्र जी ने बच्चे को दे दिया। मैं तूफानमेलीय रफ्तार से बच्चे को लेकर थाने की ओर भागा। अगर वे मेरे अन्तरंग मित्र न होते तो 'उचक्का मेरा बच्चा ले भागा' था, अत: चुपचाप वही मूर्ति बनकर खड़े रहे।
थाने में आया। थानेदार साहब कुर्सी पर बैठे हुए मेज पर टाँग पसार रहे थे।
" क्या है?.."
"सा-साहब! यह ब-ब-बच्चा खो गया है।"- अपनेराम ने कहा।
" खो गया है?..कैसे?..."
"ऐसे ही...हमें उस मोड़ पर रोता हुआ मिला..."
"आपको मिला?...".
" जी हाँ...यों समझ लीजिए, हमने इसे प-प-पाया...आप इसे सम्हालिये...मैं चला..."
"सुनिये...अपना नाम-पता तो बता दीजिये.."
"जरूर-जरूर! लिखिये श्री-श्री...जरा जल्दी कीजिए मुझे सिनेमा जाना है..?"
थानेदार साहब ने मेरी हुलिया लिख ली।
         अपनेराम की सूझ पर मित्रजी दंग रह गये। ठाट से हम लोगों ने साथ-साथ सिनेमा देखा। फिर लौट कर दोनों आदमी थाने गये तो देखा मित्रजी का बच्चा ठाट से जलेबी तोड़ रहा था।
थानेदार साहब बोले-"यह बच्चा तो साहब बड़ा रोता है...पुलिस दौड़ रही है, मगर इसके बाप का पता नहीं"
"मैं खोज लाया साहब !... ये हैं..."- अपनेराम ने कहा।
" आप इसके बाप हैं?"
" जी हाँ"- मित्रजी ने कहा।
"जी हाँ- सेंट-पर-सेंट असली बाप साहब! बड़ी मुश्किल से इनका पता लगा सि-सि-सिनेमा के अन्दर..." मैं बोला।
"सिनेमा के अन्दर?"
"जी-जी नहीं, सिनेमा के बा-बाहर ...ये बिचारे रोते हुए इसे खोज रहे थे।"
"लीजिये साहब। आप अपना लड़का सम्हालिये..बड़े लापरवाह हैं आप लोग...इन्होंने आपके बच्चे को यहाँ पहुँचाया है और आपको यहाँ तक लाये भी हैं, इसलिये इन्हें कुछ इनाम..."
"अवश्य..."-मित्रजी ने पाँच का नोट मेरी ओर बढाया।
हम लोग हँसते हुए वापस हुए।
पुलिस के लिये यह नया काम कैसा रहा साहब? इति श्री इलस्ट्रेटेड-वीकलीयो नम:।
पुस्तक - उड़ते-उड़ते
लेखक-  कुशवाहा कांत

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 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...