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रविवार, 19 अप्रैल 2026

आनंद कुमार सिंह, साक्षात्कार

 साहित्य देश की साक्षात्कार शृंखला में इस बार आपके लिए प्रस्तुत है युवा लेखक आनंद कुमार सिंह का साक्षात्कार ।
 माता शांति सिंह और पिता अजित प्रसाद सिंह के घर पैदा हुये आनंद कुमार सिंह को बचपन से ही पढने में रूचि रही है। कभी बालमन बाल साहित्य में रूचि रखता था और समय के साथ यह रूचि लेखन‌ में परिवर्तित हो गयी। 
आनंद कुमार सिंह पेशे से पत्रकार हैं।
पत्रकारिता के अब तक के अपने 20 वर्ष के करिअर में उन्हें तीन बार श्रेष्ठ पत्रकार होने का पुरस्कार मिल चुका है।
वे क्राइम, राजनीति, स्पोर्ट्स, बिजनेस आदि क्षेत्रों में गहरी रुचि रखते हैं।
कहानी लिखने का उन्हें हमेशा से शौक रहा है। कहानी लेखन की कई प्रतियोगिताओं में वे विजेता रह चुके हैं।
उन्हें शतरंज खेलने का भी काफी शौक है। प्रेस क्लब, कोलकाता के वह लगातार तीन वर्षों से चैंपियन हैं।
मूल रूप से बिहार के रहने वाले आनंद कुमार सिंह का जन्म, पढ़ाई-लिखाई, कोलकाता में हुई। हालांकि बचपन का उनका बड़ा हिस्सा रेणुकूट में गुजरा है।
   यह साक्षात्कार ekbookjournal के संचालक श्री विकास नैनवाल जी के सहयोग से यहाँ प्रकाशन हुआ है।

प्रश्न – लेखन क्षेत्र में आज लेखक आनंद कुमार सिंह का नाम पाठक वर्ग के लिए अपरिचित नहीं रहा है। लेकिन जैसा की साक्षात्कार की परम्परा है उसी परम्परा अनुसार हम आपका विस्तृत परिचय जानना चाहेंगे ?
उत्तर – मेरा जन्म कोलकाता में हुआ हालांकि जन्म के बाद ही पिताजी की नौकरी के कारण हम लोग रेणुकूट चले गये। मेरी प्रारंभिक शिक्षा (चौथी कक्षा तक) वहीं हुई। पिताजी को पढ़ने का शौक था तो वहीं से शौक मुझे भी आ गया। बचपन, चंपक, नंदन, चंदामामा, कॉमिक्स से शुरू होते ही जल्द ही एससी बेदी के राजन-इकबाल सीरीज तक पहुंच गया। घर में उस वक्त सरिता, रीडर्स डाइजेस्ट से लेकर कई अन्य पत्रिकाएं आती थीं। मैं सबकुछ पढ़ जाता था भले ही वो बच्चों के लिए न हो। रेणुकूट के पहाड़ी इलाके में बारिश के बाद जंगली पत्तों की जो खुशबू आती थी वो आज भी जेहन में रची-बसी है। उस वक्त खेलकूद के अलावा मनोरंजन का साधन केवल किताबें-मैगजीन आदि पढ़ना ही था।
       इसके बाद हम लोग वापस कोलकाता आ गये। पांचवीं से बीएससी तक की पढ़ाई मैंने यहीं की। यहाँ आने के बाद भी किताबें पढ़ने का शौक बरकरार रहा। मुझे वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का चस्का लग गया। तीन तिलंगे, विधवा का पति, केशव पंडित, कानून का बेटा, कोख का मोती की यादें आज भी हैं। स्कूली जीवन में ही मुझे सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास मिल गया। हालांकि यह याद नहीं कि पहले मैंने उनके जेम्स हेडली चेज के अनुवादित उपन्यास पढ़े या फिर उनके स्वरचित उपन्यास। लेकिन जो भी उनकी लेखनी बेहद धमाकेदार लगी। दुस्साहसिक, ऑन टू योर फेस..वाली। जहाँ वीपीएस हमें मनोरंजन की दुनिया का रोलर-कोस्टर राइड कराते थे वहीँ एसएमपी रियलिस्टिक दुनिया के दायरे में रहकर इंटरटेनमेंट का तड़का प्रदान करते थे। पैसे न होने के कारण किराये पर किताबें लेकर पढ़ता था और खूब पढ़ता था। एसएमपी को पढ़ने के बाद अन्य किसी हिंदी लेखक की किताबें कम ही पढ़ी। एसएमपी के अलावा मैं अंग्रेजी नॉवल पढ़ने लगा। इसमें शुरूआत सिडनी शेल्डन के उपन्यासों से हुई। लेकिन मेरे लिए लेखक मायने नहीं रखता था...कोई भी किताब मिल जाये...तमन्ना बस यही रहती थी। किताबें पढ़ने का सिलसिला आज भी जारी है। 

प्रश्न- जैसा की आपने बताया बचपन में ही आपको पढने की रूचि थी। फिर यह रूचि पढने से लेखन की तरफ कब बढ गयी ?

सोमवार, 11 सितंबर 2023

विनोद प्रभाकर- साक्षात्कार

 21 वर्ष की उम्र में मैं एक सफल उपन्यासकार और प्रकाशक बन चुका था- विनोद प्रभाकर

साक्षात्कार की इस शृंखला में इस बार प्रस्तुत है लोकप्रिय साहित्य के सितारे विनोद प्रभाकर उर्फ सुरेश साहिल जी का प्रथम साक्षात्कार। मेरठ निवासी विनोद प्रभाकर जी ने यहां अपने वास्तविक नाम से जासूसी लेखन किया वहीं सुरेश साहिल के नाम से लौट आओ सिमरन जैसी चर्चित कृति का सर्जन भी किया।
वर्तमान में मेरठ के मलियाना में निवासरत सुरेश जी निजी शिक्षण संस्थान का संचालन करते है और दीर्घ समय पश्चात अपनी रचना लेखन में व्यस्त हैं।

01. लोकप्रिय साहित्य में विनोद प्रभाकर या सुरेश साहिल का नाम काफी चर्चित रहा है। लेकिन हम एक बार अपने पाठकों के लिये आपका जीवन परिचय जानना चाहेंगे।

- मेरा जन्म मेरठ जिले के मलियाना ग्राम में हुआ था। जो मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है। मेरे पिता श्री किरन सिंह मेरठ जिले की सरधना तहसील के हबड़िया गांव के एक छोटे किसान परिवार से थे। और मेरठ नगर महापालिका में सरकारी ओहदे पर थे।

               मेरी शिक्षा ग्रेजुएट तक रही। किसी कारणवश मुझे पोस्ट ग्रेजुऐशन की पढाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। पूर्व संस्कार ही रहे होंगे की कक्षा पांच तक पहुंचते -पहुंचते मेरे अंदर का लेखक जागृत हो चुका था।  यह बचपन का वह दौर था, जब क्लासरूम में बच्चों के झुण्ड के बीच फिल्मी गानों पर परोडी बनाकर सुनाता था। और ताज्जुब इस बात का रहा कि दस फिट दूर बैठे सख्त मिजाज अध्यापक को मेरी आवाज सुनाई नहीं देती थी। उस वक्त के मेरे ही ग्रुप का एक बच्चा (जिसका नाम शायद चतर सिंह था) कहीं से दो अजीब सी लैंग्वेज सीख कर आया था। और मैं एकमात्र स्टुडेंट था जो हफ्ते भर में उससे धाराप्रवाह उस लैंग्वेज में बातें करने लगा था। वह दोनों भाषायें में आज भी धाराप्रवाह बोलना जानता हूँ। मुझे नहीं लगता लिखने में और बोलने में संस्कृत जैसी प्रतीत होती दोनों भाषायें कहीं बोली भी जाती रही होंगी या अब भी कहीं बोली जाती होंगी।

 बहरहाल, दोनों भाषाओं का इतिहास कुछ भी हो, मगर अब यह भाषायें उन दो देशों की राष्ट्रीय भाषायें बन चुकी हैं, जो मेरे आने वाले उपन्यास के दो काल्पनिक देश हैं।

रविवार, 10 जुलाई 2022

दिलशाद अली - साक्षात्कार

 मैं हाॅलीवुड को टक्कर देने वाले उपन्यास लिखना चाहता हूँ। 
दिलशाद अली- साक्षात्कार शृंखला- 11
    साहित्य देश की साक्षात्कार शृंखला में 'पहला उपन्यास- पहला साक्षात्कार' में इस बार प्रस्तुत है उत्तरप्रदेश के हापुड़ जिले के निवासी युवा उपन्यासकार दिलशाद अली का साक्षात्कार।
   Flydreams Publication से सन् 2021 में प्रकाशित '
सिटी ऑफ इविल' दिलशाद अली जी का प्रथम उपन्यास है।
1. सर्वप्रथम साहित्य देश की तरफ से आपका हार्दिक स्वागत है। आपके प्रथम उपन्यास 'सिटी ऑफ इविल' के लिए शुभकामनाएं। 
साक्षात्कार  के आरम्भ में हम आपका जीवन परिचय जानना चाहेंगे।
दिलशाद अली-   सर्वप्रथम गुरप्रीत जी का बहुत-बहुत आभार, जिंहोने मुझे इंटरव्यू के लायक समझा। तत्पश्चात साहित्य देश और सभी पाठकों का हृदय से आभार, आपने मुझे एक लेखक के रूप में स्वीकार किया। आशा है आपका प्यार हमेशा यूं ही बरकरार रहेगा। हालांकि अभी तक मेरा पहला नॉवल प्रकाशित हुआ है किन्तु आपके प्यार ने मुझे नए लेखक का एहसास नहीं होने दिया। आपके प्यार की बदौलत मैं लिख रहा हूँ और लिखता रहूँगा।

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

साक्षात्कार- सत्यपाल

  साहित्य मस्तिष्क के संवाद का विषय है- सत्यपाल

   साक्षात्कार श्रृंखला -11

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में ऐसे अनेक सितारे हुये हैं जिन्होंने अपनी कलम से उपन्यास साहित्य को अनमोल मोती प्रदान किये हैं और इस क्षेत्र में एक विशेष पहचान स्थापित की है।

     साहित्य देश अपने साक्षात्कार स्तंभ में लोकप्रिय साहित्य के सामाजिक उपन्यासकार 'सत्यपाल' जी का साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत कर रहा है, जिसमें अपने लेखन, तात्कालिक समय और अपने उपन्यासों के संबंध में विस्तृत चर्चा की है।

सत्यपाल उपन्यासकार
सत्यपाल
01.लोकप्रिय सामाजिक उपन्यासकारों में 'सत्यपाल' एक विशेष नाम रहा है। लेकिन ज्यादातर पाठकों की जानकारी 'सत्यपाल' नाम तक ही सीमित है। आप एक बार पाठकों को अपना संपूर्ण परिचय अवश्य दीजिए। (जन्म, शिक्षा, परिवार आदि के बारे में)

-  मेरा पूरा नाम सत्यपाल चावला है। मेरा जन्म अप्रैल 1955 में एक कृषक परिवार में गाँव बनियानी, जिला रोहतक, हरियाणा, भारत में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। तत्पश्चात परिवार दिल्ली आ गया। शेष शिक्षा दिल्ली में ही हुई। लिखने का शौक कहिए या जुनून बचपन से ही था। तुकबंदी करना छटी कक्षा से ही शुरू हो गया था। हायर सेकंडरी तक आते-आते निबंध, कहानी और मुक्त कविताएं इत्यादि भी लिखना शुरू कर दिया था। क्योंकि परिवार निम्न मध्यम वर्ग में था, माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। छोटे स्तर की एक डेयरी से भरण-पोषण चलता था। मैं पढ़ने में तेज था। अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ट्यूशन देने के कारण मेरा स्वयं का शिक्षा का आधार भी मजबूत हो जाता था और कुछ आय भी हो जाती थी। समाज के लिए उपयोगी था इसलिए मुझे प्यार ओर आदर मिलता था। स्कूलिंग के उपरान्त हालांकि मुझे पहली ही लिस्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय के डी.ए.वी. कॉलेज में बी.काम.आनर्स में प्रवेश मिला किंतु आर्थिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मुझे आगे की पढ़ाई पत्राचार द्वारा करनी पड़ी। मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी.काम. कर ली। घर की तरफ से स्पष्ट आदेश था कि पहले नौकरी प्राप्त करो। और कागज़ काले (लिखना) करना बंद करो। ट्यूशन, नौकरी के लिए कम्पीटीशन, सैल्फ स्टडी और लेखन सब साथ-साथ चले। कुछ नौकरियां कुछ-कुछ दिन ही चली। स्टेट बैंक की कलैरिकल परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण कर लिया तब लगा कि अब चैन मिला। इधर शादी भी हो गई। एक पुत्री और दो पुत्रों जन्म हुआ आज मैं रिटायर्ड हूँ। परिवार सैटल है। मैं हिन्दी में स्नातकोत्तर करना चाहता था। मैंने रिटायर होने के बाद इग्नू से हिन्दी स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में पास कर लिया। 

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

जयदेव चावरिया - साक्षात्कार शृंखला-10

साहित्य देश ब्लॉग साक्षात्कार के क्रम में प्रकाशित कर रहा है नवोदित उपन्यासकार जयदेव चावरिया का साक्षात्कार।

  जयदेव चावरिया हरियाणा के रेवाड़ी जिले के निवासी हैं। अपने प्रथम उपन्यास से पूर्व जासूसी कहानियों के माध्यम से पाठकों मे मध्य अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। सूरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित 'माय फर्स्ट मर्डर केस' लेखक का प्रथम उपन्यास है।
  'प्रथम उपन्यास, प्रथम साक्षात्कार'  साक्षात्कार शृंखला-10

उपन्यासकार जयदेव चावरिया
उपन्यासकार जयदेव चावरिया
1. जयदेव भाई, सर्वप्रथम आपको आपके प्रथम उपन्यास पर हार्दिक शुभकामनाएं। आज आप एक उपन्यासकारों की श्रेणी में पहुँच गये। बहुत से पाठक आपसे परिचित हैं, फिर भी हम एक बार आप विस्तृत परिचय जानना चाहेंगे।

   मैं जयदेव चावरिया में हरियाणा जिला रेवाड़ी का रहने वाला हूँ।  वैसे मेरा असली नाम जितेंद्र हैं पर मेरे दोस्त और मेरे परिवार वाले सभी मुझे जयदेव कहकर पुकारते थे। इसलिए मैंने अपना नाम जितेंद्र से जयदेव कर दिया। चावरिया मेरे पिता जी का गोत्र है। मेरे पिता जी का नाम रामलाल चावरिया है मेरे पिता जी के देहांत हुए करीब 18 साल हो गये। पिता जी रेलवे में काम करते थे।      पिता जी के देहांत के बाद पिता जी की जॉब मेरी माता जी (रेनू देवी जी) को मिल गयी। मेरे परिवार में मेरी बड़ी रजनी, उनसे छोटा भाई महेश, उनसे छोटी बहन पूजा फिर, आखिरी में 

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

9. साक्षात्कार- नरेन्द्र नागपाल

उस दौर में प्रकाशक लेखकों का शोषण करते थे- नरेन्द्र नागपाल

साहित्य देश का उद्देश्य रहा है लोकप्रिय साहित्य के उन सितारों को सामने लाने का जिन्होंने अपनी सशक्त लेखनी के दम पर साहित्य में एक विशेष पहचान स्थापित की। लेकिन समयचक्र में कुछ लेखक आज साहित्य पटल से अदृश्य हैं। ऐसे ही एक लेखक हैं दिल्ली निवासी नरेन्द्र नागपाल जी। जिन्होंने अपनी कलम से अविस्मरणीय पात्रों का सृजन किया है। स्वयं नाम के अतिरिक्त उन्होंने तात्कालिक प्रसिद्ध लेखकों के नाम से लेखन भी किया है। इस साक्षात्कार में उन्होंने पूर्णतः सत्यता के साथ अपने लेखन जीवन के कुछ अविस्मरणीय घटनाओं का वर्णन किया है।
   साक्षात्कार की इस 09 शृंखला में प्रस्तुत है नरेन्द्र नागपाल जी का साक्षात्कार।
1. सर्वप्रथम हम आपसे आपके जीवन के बारे में जानना चाहेंगे? (जन्म कहां हुआ, शिक्षा और वर्तमान आदि)
- मेरा जन्म दिल्ली में हुआ है।  यहीं शिक्षा दीक्षा भी हुई है। मैं स्नातक हूँ। फिलहाल मैं वेस्ट पटेलनगर में निवास कर रहा हूँ।
- Born in Delhi Graduate Presently living in West Patel Nagar 

नरेन्द्र नागपाल
2. आपने किन-किन लेखकों को ज्यादा पढा है औए कौन-कौन सी रचनाएँ आपकों अच्छी लगी।
- मुझे याद है जब मैं छठवीं कक्षा में था तब मुझे एस सी बेदी जी की राजन इकबाल श्रृंखला और रायजादा (जो कि एक ट्रेड नेम था) द्वारा लिखे गये राम रहीम श्रृंखला के उपन्यास पढ़ना बहुत अच्छा लगता था। उन दिनों मैं इन उपन्यासों के सेट, जिनमें की छः उपन्यास हुआ करते थे, दो ही दिन में ही पढ़ डालता था।  मुझे याद है अक्सर मैं रजाई के भीतर घुसकर सोने के बजाय यह उपन्यास पढ़ा करता था। एक बार तो मेरी मम्मी ने मुझे रजाई के भीतर उपन्यास पढ़ते हुए पकड़ लिया। फिर क्या हुआ होगा वह तो आप भी समझ सकते हैं... हा हा हा..
मुझे वेद प्रकाश शर्मा जी के उपन्यास पढ़ना भी पसंद था। मैंने उनके द्वारा लिखी गयी देवकान्ता श्रृंखला आठवीं कक्षा में पढ़ी थी और उसके बाद उनके द्वारा लिखे हर एक उपन्यास को बड़े चाव के साथ पढ़ा।
कुमार कश्यप जी द्वारा लिखी गयी विक्रांत-बटलर श्रृंखला भी मुझे बहुत पसंद आई थी। उनके लिखे उपन्यास मुझे काफी भावुक कर देते थे और पढ़ते पढ़ते मेरी आँखों से आँसू निकल आते थे। विमल चटर्जी जी के टैंजा श्रृंखला ने भी पढ़ते हुए मुझे काफी भावुक कर दिया था।
सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की विमल श्रृंखला मैंने काफी देर में पढ़नी शुरू की। उस वक्त तक मैं काफी परिपक्व हो गया था और मुझे विमल का किरदार काफी पसंद आया था। मुझे राज भारती जी द्वारा लिखे गये कुछ फंतासी उपन्यास भी काफी पसंद आये थे। वह चूँकि मेरे घर के नजदीक रहा करते थे तो अक्सर मैं उनके पास पहुँच जाया करता था। वह बेहतरीन इनसान थे और लेखन क्षेत्र से जुड़े लोगों में मुझे वह सबसे अच्छे लगे थे।
- #Class 6th onwards I loved Rajan-Iqbal series of S.C.Bedi and Ram-Rahim series of trade name writer Raizada.I used to read their 6 Books pocket Set in 2 days.
Many a times I read them in Quilt while sleeping.And one day my Mummy caught me and guess what would be happened next...
#2. I was fond of Late Sh Ved Prakash Sharma,
Read his Dev Kanta Santti in class 8th and thereafter his every novel
#3.Vikrant- Butler series by Kumar Kashyap made me cry too much
#4. Tainza series by Vimal Chatterjee was also an emotional series
5.Vimal Series of SMP I started very lately while getting maturing and liked the Character
#6. I also liked some Fantasy books of late Sh Raj Bharti.And also he was my first GoTo person living nearby...He was the nicest person in this Field I have ever met...May God rest him Peace


3. आपके मन में लेखक बनने का विचार कैसे आया और आप किस से प्रभावित हुये?
- जैसे कि मैंने बता ही दिया है कि मैं ऊपर बताये गये सभी लेखकों से काफी प्रभावित था। एक बार मुझे ख्याल आया कि मैं पढ़ने के बजाय क्यों न कुछ लिखने की कोशिश करूँ।  यह ख्याल आते ही मैंने अपनी डायरी में अपना पहला उपन्यास लिखना शुरू किया। जब मैं उपन्यास लिख चुका था तो मैंने उसे गृहशोभा पत्रिका के सम्पादक द्वारा सम्पादित भी करवाया था।
- As you know I was impressed by all of the above Writers...One day I thought why do you read them...Start writing...then I wrote my first novel in a Diary...then edited it from the editor of GrehShobha...

4. जासूसी साहित्य में आपके नाम से प्रथम उपन्यास प्रकाशित हुआ, तो प्रकाशन आसानी से हो गया या कोई परेशानी भी देखनी पड़ी?
- मुझे अपने पहले उपन्यास को प्रकाशित करवाने के लिए लगभग एक साल की भागदौड़ करनी पड़ी थी। फिर जब मैंने उस वक्त प्रकाशक को चार उपन्यास छपवाने के लिए बारह हजार रूपये दिये तो वह उन्हें छापने के लिए राजी हुआ था।
यह उपन्यास निम्न थे-

  1. 22 दिसम्बर
  2. जुर्म का आशिक
  3. 5 लुटेरे
  4. मैडम एक्स

- It took me atleast 12 months to get published my first novel and even I paid 12000 to Publish 4 Novels atleast...then he Published...
  1. 22 December
  2. Jurm ka Aashiq
  3. 5 Lutere
  4. Madam X

5. आपने अपने नाम के अतिरिक्त और किन-किन छद्म नामों से लिखा है?
- मैंने लगभग 25 उपन्यास अनिल मोहन के लिए लिखे हैं। 18 उपन्यास मैंने रीमा भारती नाम से, 6 उपन्यास सीमा कपूर नाम से और 22 उपन्यास केशव पण्डित के 2,3 ट्रेड नेम से लिखे हैं।
-About 25 Novels for Anil Mohan
18 Novels for Trade name Rima Bharti
6 Novels for Seema Kapoor
22 novels for 2,3 Trade names of Keshav Pandit

6. आपके स्वयं के नाम से कितने उपन्यास आये हैं? (संख्या) और आपने किन-किन पात्रों को आधार बना कर लिखा है?(आपके द्वारा स्थापित नायक आदि)
- मैंने अपने नाम से लगभग 74 उपन्यास लिखे हैं।  श्रृंखला की बात करूँ तो अर्जुन भारद्वाज श्रृंखला, जिम्बो श्रृंखला, केशव पंडित श्रृंखला, रीमा भारती श्रृंखला, जेम्स बांड श्रृंखला, ऊर्जा मस्तान श्रृंखला, कॉनमैन श्रृंखला और कई एकल थ्रिलर्स मैंने लिखे हैं।
- About 74 Novels in my name ...
Arjun Bhardwaj Series,Jimbo Series, Keshav Pandit Series, Rima Bharti Series,James Bond Series,Oorja Mastaan Series,Conman Series and various Thrillers


7. 'काली' जैसा उपन्यास एक अलग कथानक पर है, क्या ऐसे और भी उपन्यास आपने लिखे हैं?
- असल में काली अर्जुन भारद्वाज श्रृंखला का उपन्यास है। और मैं आपको बताऊँ कि इस श्रृंखला का हर एक उपन्यास मेरी बेहतरीन रचनाओं में से एक है। हर एक उपन्यास किरदार का अलग भावनात्मक कोण पाठकों के समक्ष लेकर आता है।
- Actually Kaali belongs to Arjun Bhardwaj Series and every novel of that series is Master Piece of mine which shows the different Emotional angle of the Character.


8.  जासूसी उपन्यास साहित्य का एक सुनहरा दौर खत्म हो गया, आपकी दृष्टि में इसका कारण क्या रहा है?
- उस दौर में प्रकाशक लेखकों का शोषण करने लगे थे। वह एक तरफ अपने अपने ट्रेड नामों को स्थापित कर रहे थे और दूसरी तरफ किसी भी लेखक को स्थापित नहीं होने दे रहे थे। इस करण होता यह था कि पाठक लेखक के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते थे।  वह लेखक को चिट्टियाँ तो लिखते थे लेकिन प्रकाशक चूँकि  ट्रेड नाम से प्रकाशित होने वाली कहानी और किरदारों से अनभिज्ञ रहता था तो वह जवाब भी नहीं देता था।  पाठकों को जवाब न मिलने के कारण वह ऐसे नामों से दूर होने लगे और ऐसे ट्रेड नाम से प्रकाशित उपन्यासों से दूरी बनाने लगे।
     - In that particular Era ,Publishers were exploiting the Writers by starting their own Trade Name not giving any Chance to establish a Writer.So readers could not make a Connect with their Favourite Writers... they write their letters to Publishers which did not know about the Story and Characters of his  Trade Name's TITLE...so readers didn't get their Replies and sooner or later they reject the Writer (trade name)


9. अगर समय मिला तो क्या आप पुनः जासूसी साहित्य के लिए लेखन करेंगे?
- बिल्कुल मैं यह कार्य जरूर करना चाहूँगा।
- Ofcourse and always...


10. 'साहित्य देश' के लिए कोई दो शब्द?
-    आप भुला चुके लेखकों और रचनाओं को पाठकों के समक्ष लाकर एक बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। मैं चाहूँगा कि आप आगे भी जारी रखें।
- You are doing a Great Job by making dead Alive...keep and keeping it up Gentle man


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- उक्त साक्षात्कार के लिए साहित्य देश नरेन्द्र नागपाल जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता है।

- विकास नैनवाल जी का हार्दिक धन्यवाद। जिन्होंने इस साक्षात्कार को अंग्रेजी से हिंदी में अनुदित किया।

नरेन्द्र नागपाल जी संबंधित अन्य जानकारी

उपन्यास सूची । ब्लॉग - नरेन्द्र नागपाल । उपन्यास समीक्षा 

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

साक्षात्कार- वेदप्रकाश कांबोज

 मैं मानसिक रूप से एक बेहद आवारा किस्म का आदमी हूँ- वेदप्रकाश कांबोज
साहित्य देश इस बार प्रस्तुत कर रहा है लोकप्रिय साहित्य के सितारे आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज जी का साक्षात्कार। सन् 1958 में अपने लेखन की शुरुआत करने वाले कांबोज जी आज भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
     साहित्य देश ब्लॉग के लिए यह  साक्षात्कार युवा उपन्यासकार राम पुजारी जी ने लिया है।

1. आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज जी आपका का नाम लोकप्रिय साहित्य में एक मील का पत्थर है। आपके पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग रहा है। यहाँ हम सर्वप्रथम जानना चाहेंगे आपके के जीवन के आरम्भिक पृष्ठों को जैसे बचपन, शिक्षा इत्यादि के बारे में।
- सबसे पहले तो इस बात को समझो कि जो तुम कह रहे हो नाम है। या ...मान लो कि नहीं है,  नाम का होना या न होना महत्त्वपूर्ण  नहीं है। महत्त्वपूर्ण होता है लेखन यात्रा पर इसका प्रभाव। समझदार वही  होता जो लगातार सीखता रहता है। फिर लेखन तो  एक सतत धारा है। इसमें मुझ से पहले भी बड़े लेखक रहे हैं और मेरे समकालीन भी रहे और बाद में भी रहेंगे। 
और जहां तक बचपन का सवाल है तो ये जान लो कि मेरा बचपन साधारण होते हुए भी विशेष था। असल में वो समय ही विशेष था। देश नया-नया आज़ाद हुआ था। संघर्ष के दिन थे। पढ़ने का शौक था स्कूली पुस्तकों से ज्यादा मैंने अन्य पुस्तकें ज्यादा पढ़ी।
अपने पुस्तकालय में कांबोज जी
अपने पुस्तकालय में कांबोज जी
2. कांबोज जी आपका झुकाव उपन्यास लेखन की तरफ कैसे हो गया, तब आपकी उम्र क्या रही होगी और आप क्या करते थे? 

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

7. साक्षात्कार- विजय कुमार बोहरा

साहित्य देश साक्षात्कार की इस शृंखला में इस बार लेकर आया है युवा उपन्यासकार विजय कुमार बोहरा जी का साक्षात्कार। यह विजय कुमार जी का प्रथम साक्षात्कार है।

   विजय जी अपने प्रथम उपन्यास मर्डर ऑन वैलेंटाइन नाईट के कारण काफी चर्चा में रहे हैं।

विजय कुमार बोहरा जी अपने प्रथम उपन्यास के साथ
विजय कुमार बोहरा जी अपने प्रथम उपन्यास के साथ

 1. विजय जी, सर्वप्रथम हम आपका परिचय जानना चाहेंगे।- जन्म, शिक्षा, वर्तमान स्थिति आदि।

- मेरा जन्म 31 जनवरी , 1988 को राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित बेगूं कस्बे में हुआ। स्नातक तक की शिक्षा यहीं हुई। 

2. आपका साहित्य की तरफ झुकाव कैसे हुआ?

-  बचपन में चम्पक पत्रिका पढ़ने को मिली। कहानियों में मेरी रुचि इस पत्रिका में छपने वाले रंग - बिरंगे चित्रों को देखकर जाग्रत हुई। इसके बाद तो बस हर तरह की किताबें पढ़ने लगा। हालाँकि अपने पारिवारिक वातावरण की वजह से कॉमिक्स और उपन्यासों तक पहुंच मेरे लिए काफी मुश्किल थी। फिर बचा गंभीर साहित्य, ...तो 15 - 16 की आयु में गंभीर साहित्य की ओर रुचि होने का मेरे पास कोई कारण नहीं था। इसी बीच  रामचरितमानस और कुछ पुराण हाथ लगे। जल्द ही मैं समझ गया कि इनमें बहुत ही रोचक कहानियां हैं। इस तरह बाल साहित्य के बाद मेरी रुचि आध्यात्मिक साहित्य में हुई। फिर जब कॉलेज पहुँचा और वहाँ की लाइब्रेरी देखी तो जैसे खज़ाना हाथ लग गया, बाल साहित्य तो वहाँ था नहीं, किन्तु बाकी बहुत तरह की किताबें थी। गंभीर साहित्य, विश्व की श्रेष्ठ कृतियों के साथ ही संस्कृत के कुछ नाटकों के हिन्दी अनुवाद, सेल्फ- हेल्प बुक्स - इन सबसे न केवल पहली बार परिचित हुआ, बल्कि इनमें कभी खत्म न होने वाली रूचि भी जागृत हुई। इन किताबों में न केवल कहानियां थी, बल्कि वे भावनाएं भी कूट कूटकर भरी हुई थी, जिनको महसूस करने के लिए मैं कठिन से कठिन पुस्तक भी पढ़ने के लिए तैयार हो जाता।

3. आप अध्यापक हैं, गंभीर साहित्य में रुचि आपकी, फिर लेखन में आपने लोकप्रिय जासूसी साहित्य कैसे चुना? 

शनिवार, 23 जनवरी 2021

6. साक्षात्कार- अनिल सलूजा

 सौ उपन्यासों का लेखक- अनिल सलूजा

ब्लॉग साहित्य देश साक्षात्कार की शृंखला में प्रसिद्ध उपन्यासकार अनिल सलूजा जी का साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहा है। अनिल सलूजा जी ने अपने पात्र बलराज गोगिया, रीमा राठौर, भेड़िया और अजय जोगी जैसे विशेष ख्याति अर्जित की है। 


1. अनिल जी साहित्य देश और पाठकवर्ग सबसे पहले आपका परिचय जानना चाहेगा, हालांकि पाठक आपको लेखक तौर पर जानते हैं लेकिन अपने प्रिय लेखक के जीवन से भी परिचय होना चाहते है।
अनिल सलूजा जी- मेरा जन्म 15 अप्रैल 1957 को हरियाणा के पानीपत में हुआ। मेरी शिक्षा भी यहीं हुयी है।
2. अपनी शिक्षा के बारे में कुछ बतायेंगे।

अनिल सलूजा जी- मैंने हायर सेकेंडरी के पश्चात ITI में रेडियो और टीवी मैकेनिक में डिप्लोमा किया है। और मेरी वर्तमान में शहर में रिपेरिंग की दुकान है।
3. आपका लेखन की तरफ रूझान कैसे हुआ?
अनिल सलूजा जी- मैं आठवी कक्षा में था। तब एक बार कहीं से वेदप्रकाश कांबोज जी का उपन्यास पढने को मिला, वह मुझे बहुत रोचक लगा। उसके बाद इधर-उधर से, किराये पर उपन्यास पढने आरम्भ कर दिया। फिर तात्कालिक लेखकों को पढा जैसे- ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश कांबोज जी, राजभारती है।

4. लेखन की तरफ कैसे आना हुआ?
अनिल सलूजा जी- पढने के साथ-साथ यह इच्छा भी बलवती होती गयी की इन लेखकों की तरह मेरी भी तस्वीर छपनी चाहिए।
कक्षा नौ वीं से ही लिखना आरंभ कर दिया था। मेरा पहला उपन्यास 'बेकसूर हत्यारा' मनोज पॉकेट बुक्स में ट्रेड नेम से प्रकाशित हुआ। यह सन् 1990 के लगभग की बात है।

5. आपके वास्तविक नाम से कब प्रकाशित हुआ?
अनिल सलूजा जी- सन् 1994-95 में मेरा प्रथम उपन्यास 'फंदा' प्रकाशित हुआ, यह बलराज गोगिया सीरीज का उपन्यास था। उसके बाद तो वास्तविक नाम से और ट्रेड नाम से यह सफर निरंतर चलता रहा।
6. आपने अब तक कितने उपन्यास लिखे हैं?
अनिल सलूजा जी- मेरे नाम अनिल सलूजा से सौ उपन्यास प्रकाशित हुये हैं और ट्रेड नेम से लगभग सवा दो सौ उपन्यास प्रकाशित हुये हैं।
7. आपने किस -किस नाम से और किस -किस प्रकाशन के‌ लिए ट्रेड नेम से लिखा है?
उपन्यासकार अनिल सलूजा जी
उपन्यासकार अनिल सलूजा जी
अनिल सलूजा जी- मेरी शुरुआत ही ट्रेड लेखन से हुयी है। उसके बाद तो मनोज पॉकेट बुक्स में, अर्जुन पण्डित, रवि और महेश नाम से लिखा, तुलसी पॉकेट बुक्स में प्रकाश पारासर नाम से लिखा है, रवि पॉकेट बुक्स में कबीर कोहली नाम से, शिवा पॉकेट बुक्स में शिवा पण्डित, धीरज पॉकेट बुक्स में केशव पण्डित और भी बहुत से नाम जैसे आशीर्वाद आदि से भी लिखा है।
8. आपके स्वयं के पात्र कौन-कौन से रहे हैं?
अनिल सलूजा जी- मेरे नाम से मेरा पात्र बलराज गोगिया सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ है। इसके अतिरिक्त रीमा राठौर, अजय जोगी, भेड़िया।
  अजय जोगी के तीन-चार उपन्यास हैं। भेडिया के सात-आठ उपन्यास हैं।
9. अजय जोगी काफी चर्चित पात्र रहा लेकिन आपने उस आगे नहीं बढाया, इसकी कोई विशेष वजह?
अनिल सलूजा जी- मैं‌ शिवा पॉकेट बुक्स के लिए शिवा पण्डित भी लिखता था जिसका पात्र अर्जुन त्यागी काफी चर्चित था। वहीं से कुछ मित्रों ने सलाह दी की आपका पात्र तो खूब चर्चित है लेकिन आपका नाम कहीं भी नहीं। तब मैंने अपने नाम अनिल सलूजा के नाम से अजय जोगी आरम्भ किया, जो की एक स्मैकिया और धोखेबाज किस्म का व्यक्ति था।
   जब शिवा पण्डित ट्रेड नेम रवि पॉकेट बुक्स वालों‌ के पास आया तो मनेष जी (रवि पॉकेट बुक्स के मालिक) की सलाह पर मैंने अजय जोगी को छोड़ कर अर्जुन त्यागी पर ही ध्यान केन्द्रित किया।
10. तात्कालिक किन लेखकों से आपका संपर्क रहा है?
अनिल सलूजा जी- मैं रिजर्व किस्म का व्यक्ति रहा हूँ। मेरा बाहरी संपर्क कम रहा है। फिर भी प्रकाशक के यहाँ या अन्य कार्यक्रमों में अक्सर लेखक मित्रों से मुलाकात हो जाती थी। इनमें से राज भारती जी, अनिल मोहन जी और योगेश मित्तल जी से मेरा विशेष संपर्क रहा है।
अनिल सलूजा जी इस विशेष साक्षात्कार के लिए साहित्य देश टीम आपका हार्दिक आभार व्यक्त करती है।

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

5. साक्षात्कार- सुरेश चौधरी

अभी मंजिल छूना शेष है- सुरेश चौधरी
साक्षात्कार शृंखला-05
    साक्षात्कार की पांचवी किस्त में प्रस्तुत है सामाजिक उपन्यास सुरेश चौधरी से हुयी बातचीत
           सुरेश चौधरी जी उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। पेशे से वकील हैं लेकिन साहित्य प्रेमी भी हैं। इनके अब तक तीन सामाजिक उपन्यास 'खाली आँचल-2005, 'अहसास'-2015 और 'प्रतिशोध'-2019 प्रकाशित हो चुके हैं।
     साक्षात्कार की इस शृंखला में हम सुरेश चौधरी जी से हुयी चर्चा को यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. सुरेश जी, सर्वप्रथम पाठकवर्ग के लिए आप अपना परिचय दीजिएगा, फिर साक्षात्कार आगे बढाते हैं।
- मेरा नाम सुरेश वर्मा है, लेकिन लेखन का नाम सुरेश चौधरी है। मैं उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ।
पहले मैं सरकारी जाॅब करता था, लेकिन सन् 2005 में रिटायरमेंट लेकर वकालत में आ गया, और लेखन कार्य भी करने लगा।
2. आप किस तरह का साहित्य पढना ज्यादा पसंद करते हैं? आपकी पसंद के लेखक या रचनाएँ?
     - मैं सामाजिक साहित्य पढ्ना पसंद करता हूँ। मेरी पसंद के लेखक है, मुन्शी प्रेमचंद जी व मुल्कराज आनन्द। मुल्कराज आनन्द का उपन्यास 'अनटचेबल' मुझे बहुत अच्छा लगा।
मुन्शी प्रेमचंद जी की सभी रचनाएँ बहुत ही सुन्दर है।

3. आपका लेखन क्षेत्र में आने का मानस कैसे बना?
- लेखन का कार्य शोध के समय से ही मेरे मन में था।
4. शोध किस तरह का?
     - मित्र मेरे द्वारा political science में संविधान में दियें गये अधिकार टाॅपिक पर शोध किया गया था।

5. आपके अब तक तीन उपन्यास आये हैं और इनके विषय में कम शब्दों में कुछ कहना चाहेंगे?
     - अब तक प्रकाशित मेरे तीनों उपन्यास प्रेम प्यार व समाज में आम आदमी के लिए आने वाली विपदाओं पर आधारित है।
6. वर्तमान सोशल मीडिया के दौर में आप किताबों की दुनियां को कैसा देखते हैं? 

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

4. अजिंक्य शर्मा- साक्षात्कार

मेरी कोशिश है कि मैं पाठकों के लिये मौलिक और बेहतरीन लिखूं -अजिंक्य शर्मा
साक्षात्कार शृंखला-04

साहित्य देश ब्लॉग के साक्षात्कार स्तम्भ के अन्तर्गत लोकप्रिय जासूसी साहित्य की श्रेणी में छतीसगढ के युवा उपन्यासकार अजिक्य शर्मा जी का साक्षात्कार प्रस्तुत है।‌
अजिंक्य शर्मा जी का मूल नाम ब्रजेश शर्मा है और इनके अब तक तीन उपन्यास क्रमशः 'मौत अब दूर नहीं', 'पार्टी स्टार्टेड नाओ' और 'काला साया' किंडल पर प्रकाशित हो चुके हैं। इनके उपन्यास शीघ्र ही हाॅर्डकाॅपी के रूप में पाठकों को उपलब्ध होंगे।
अपने तीन उपन्यासों के दम पर इन्होंने पाठकवर्ग में एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। 

अजिंक्य शर्मा
1. सबसे पहले आप अपना परिचय दीजिएगा।
-    मेरा नाम ब्रजेश कुमार शर्मा है। वर्तमान में मैंने अजिंक्य शर्मा के पैन नेम से उपन्यास लिखना आरम्भ किया है और मुझे कहते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है कि मेरे इस प्रयास को पाठकों की भरपूर सराहना भी मिल रही है। मैं छतीसगढ़ के महासमुन्द नामक एक छोटे से नगर में रहता हूं और वर्तमान में यहां के एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्र में कार्यरत हूं। उपन्यास लेखन मैंने एक शौक के रूप में आरम्भ किया लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि पाठकों का इतना प्यार और विश्वास मिलेगा। पाठकों के इसी प्यार और विश्वास से प्रेरित होकर मैं आगे भी और भी अच्छा लिखने का प्रयास करूंगा।

2. आपने अपने वास्तविक नाम 'ब्रजेश शर्मा' के स्थान पर पैन नेम 'अजिंक्य शर्मा' के नाम से क्यों लिखना पसन्द किया?
- ये प्रश्न मुझसे मेरे सभी मित्र एवं पाठकगण पूछते हैं। दरअसल पैन नेम के रूप में दूसरे नाम से लिखने का कारण ये है कि मेरी दिलचस्पी विभिन्न विधाओं में लिखने की है। जासूसी थ्रिलर तो लिख ही रहा हूँ लेकिन साइंस फिक्शन में भी मेरी गहन रुचि है। हिन्दी में साइंस फिक्शन उतने लोकप्रिय भी नहीं हैं तो सम्भवतः इंग्लिश में लिखूं। इसी विचार से मैंने 'अजिंक्य शर्मा' के पैन नेम से लिखना शुरू किया। साइंस फिक्शन ब्रजेश कुमार शर्मा के नाम से ही आएगा लेकिन उसमें अभी काफी समय है। वैसे भी पाठकों की ही राय के अनुसार मेरा पैन नेम ही काफी पसन्द किया जा रहा है। इस स्नेह के लिये मैं सभी पाठकों का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूं।

3. उपन्यास लेखक की तरफ झुकाव कैसे हुआ?
-     इस बारे में मैंने अपने पहले उपन्यास 'मौत अब दूर नहीं' के लेखकीय में थोड़ी चर्चा की थी। दरअसल मैं बचपन से ही उपन्यास पढ़ने में मेरी काफी रुचि रही है और इस रुचि के कारण ही मैं कब लेखन की ओर आकृष्ट हो गया, इसका पता ही नहीं चला। अब माँ सरस्वती की कृपा से हिंदी लोकप्रिय साहित्य की सेवा करने का अवसर मिला है तो मैं अपनी पूरी क्षमता से इस कार्य में जुट गया हूं। पाठकों का भरपूर प्यार और प्रोत्साहन तो मिल ही रहा है। एक लेखक को और क्या चाहिये?

4. आपके अब तक तीन उपन्यास आये हैं और सभी में साइको पात्र हैं, इसकी कोई वजह? 

सोमवार, 1 जुलाई 2019

3. साक्षात्कार- राम पुजारी

 आने वाला वक्त अच्छा होगा- राम पुजारी
साक्षात्कार शृंखला-03

'लव जिहाद..एक चिड़िया' और 'अधूरा इंसाफ...एक और दामिनी' जैसे सामाजिक उपन्यास लिख कर कम समय में ज्यादा चर्चित रहने वाले राम पुजारी जी की कलम में समाज की विकृतियों के प्रति एक स्वाभाविक आक्रोश दृष्टिगत होता है। 
     हमने राम पुजारी जी से विभिन्न विषयों पर साक्षात्कार रूप में चर्चा की जो यहाँ प्रस्तुत है। राम पुजारी जी वर्तमान में बठिण्डा (पंजाब) में एक  कम्पनी में कार्यरत हैं।


1. आप अपने बारे जरा बताइये?

     अपने बारे में..., मैं एक नवरतन कंपनी में इंजीनियर हूँ और पढ़ने का बहुत शौक है।
कॉमिक्स से लेकर लोकप्रिय साहित्य सभी पढ़ लेता हूँ। वैसे बता दूं लोकप्रिय साहित्य अभी पढ़ना शुरू किया।

2. किन लेखकों को पढा आपने?

     कॉमिक्स में फैंटम, ध्रुव, नागराज और चाचा चौधरी....और उपन्यास में शरतचंद्र बाबू, विमल मित्र जी, कम्बोज जी, शर्मा जी, पाठक जी, मंटो साहब, कृष्ण चन्दर जी, धर्मवीर भारती और अमृता प्रीतम जी...और भी हैं। पर...इनके सारे नहीं...कुछ-कुछ पढ़ें है।

डैन ब्राउन, चेतन भगत, सर आर्थर कॉनन डॉयल और मारियो पूजो इनके भी कुछ-कुछ पढ़ें हैं।

3.आपको सबसे ज्यादा कौन सी पुस्तक पसंद आयी।

     English में The God Father और हिंदी में गुनाहों का देवता।

4.  दोनों अलग है एक क्राइम फिक्शन है तो दूसरी लव स्टोरी।

      जी।  क्या करें पसंद-पसंद की बात है, जैसे ...कम्बोज जी के विजय ने बहुत प्रभावित किया... और गुनाहों के देवता की सुधा ने।

5. आपके मन में  लेखक बनने की इच्छा कब और कैसे उठी?

     लेखक होना या बनना... मैं मानता हूं कि अपने विचारों को अभिव्यक्त करना है। लिखता था...मैं शुरू से ही, लेकिन ऐसे नहीं कि बुक बन जाये। छोटी कहानियाँ-किस्से लिखता था, बाद कैरियर की दौड़ में समय ही नहीं मिला। फिर जब मेरे एक्सीडेंट हुआ तो मैं 4 महीनें बेड पर रहा, उसी दौरान समय बहुत था मेरे पास, जब लिखना शुरू किया तो बड़े भैया ने उसमें काफी सुधार किया और कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। फिर पुरानी आदत फॉर्म में आ गई, इस तरह से लेखक बन गया।

6. आपने किन लेखकों से प्रेरणा ली है? 

शनिवार, 24 नवंबर 2018

2. साक्षात्कार- इकराम फरीदी

कहानियाँ समाज से मिलती हैं- एम. इकराम फरीदी
साक्षात्कार शृंखला-02
 दिल्ली यात्रा (4.11.2018)  के दौरान जासूसी उपन्यासकार इकराम फरीदी से मिलना हुआ। उस दौरान इनका एक साक्षात्कार लिया जो आप के समक्ष प्रस्तुत है।
       -इकराम फरीदी जी के 'द आॅल्ड फाॅर्ट' से लेकर 'रिवेंज' तक पांच उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और सभी कहानी के स्तर पर विविधता लिए हुए हैं। 
 - फरीदी जी, सर्वप्रथम आपका धन्यवाद जो आपने उपन्यास जगत को बेहतरीन उपन्यास दिये।
 - जी, धन्यवाद। 
- मेरा पहला प्रश्न है,आपको लिखने की प्रेरणा कहां से मिली। 
- बचपन से ही कहानियाँ पढने का शौक रहा, बाल मैगजीन पढी, धीरे-धीरे यह शौक उपन्यास की तरफ चला गया। और पढना फिर लेखन में बदल गया। 
- अपनी उपन्यास यात्रा के बारे में बतायें? 
- मेरा प्रथम उपन्यास 'द ओल्ड फोर्ट' जनवरी 2015 में  साहित्य सदन दिल्ली से आया। दूसरा उपन्यास 'ट्रेजड़ी गर्ल' धीरज पॉकेट बुक्स मेरठ से आया उसके बाद मेरे सभी उपन्यास 'रवि पॉकेट बुक्स' मेरठ से ही आ रहे हैं। 
 - उपन्यास जगत में आपके प्रेरणास्रोत लेखक कौन रहे हैं ?
 - मैंने सर्वाधिक आदरणीय वेदप्रकाश शर्मा जी को पढा है, मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ। इसके अलावा वेदप्रकाश कंबोज जी, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल जी, इब्ने सफी आदि को भी पढा है। इन्हीं की बदौलत में आज इस मुकाम पर हूँ। 
- बहुत से पाठक यह भी कहते हैं आपकी लेखनी में वेद जी की झलक मिलती है? 

गुरुवार, 8 जून 2017

आबिद रिजवी - साक्षात्कार श्रृंखला-01

मैं राही की तरह चलता रहा, पीछे का निशान मिटता रहा।- आबिद रिजवी
साक्षात्कार शृंखला-01
    साहित्य देश ब्लॉग साक्षात्कार की इस प्रथम प्रस्तुति में आपके समक्ष लेकर आया है लोकप्रिय साहित्य के इन्साक्लोपीडिया आबिद रिजवी से हुयी बातचीत का साक्षात्कार रूप
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मेरठ निवासी आबिद रिजवी जी लोकप्रिय उपन्यास जगत के एक ऐसे शख्स हैं जिनके पास उपन्यास जगत की यादों का विशाल खजाना है। अगर आप एक बात पूछोगे तो वे उससे संबंधित कई आख्यान आपको सुनाते चलेंगे।
रिजवी साहब के पास जितना यादों का विशाल खजाना है उतने ही वे सहृदय और सरल व्यक्तित्व के स्वामी भी हैं।
  मेरी उनसे कुछ दिन पूर्व उपन्यास साहित्य को लेकर चर्चा हुयी, हालांकि यह चर्चा मुख्य तौर पर उनके जीवन से संबंधित ही थी।
  आबिद रिजवी जी की छात्रावस्था में ही लेखन की ओर रूचि थी और वे कक्षा 12 के दौरान ही विभिन्‍न पत्र- पत्रिकाओं के लिए अपने आलेख व कहानियाँ भेजने लग गये थे। उसके बाद लेखन का चला यह दौर आज तक यथावत जारी है।
मूल रूप से इलाहाबाद के निवासी आबिद रिजवी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद से ही पूर्ण की और वहीं से ही अपनी लेखन यात्रा की शुरुआत की।
उन्होंने बताया की तब के प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यासकार प्यारे लाल आवारा से मेरा संपर्क हुआ। प्यारे लाल आवारा तब अधेङावस्था की ओर थे और मैं युवा अवस्था की ओर। मैं सुबह आठ बजे ही उनकी सेवा में हाजिर हो जाता और उन्होंने ही मुझे लेखन की विभिन्‍न बारीकियों से परिचित करवाया।
    मैं तब विद्यार्थी ही था और मेरी आर्थिक स्थिति को देखते हुए प्यारे लाल आवारा ने मुझे तात्कालिक प्रसिद्ध पत्रिका ' जासूसी दुनिया' के कार्यालय भेज दिया। जहाँ मेरा संपर्क उर्दू के प्रसिद्ध लेखक इब्ने सफी और इब्ने सईद से हुआ। ये दोनों प्यारे लाल जी के मित्र थे।
    रिजवी साहब की प्रतिभा को देखते हुए इन्होंने प्यारे लाल आवारा जी को कहा था ये लङका तो " .... ना ए तराश है।" अर्थात यह तो एक ऐसा हीरा है जिसे तराशा नहीं गया।
  और इस हीरे ने इस कथन को सत्य भी साबित कर दिया। आप स्वयं देखिए जो शख्स इब्ने सफी से लेकर सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा से होते हुए कंवल शर्मा, सबा खान और नये लेखक अनुराग कुमार जीनियस के समय में भी उतनी ही ऊर्जा से कार्यरत है। वहीं रिजवी साहब के जमाने के असंख्य लेखक आज गुमनामी के अंधेर में खो गये। खैर.......
सन् 1963-64 के समय में रिजवी जी को जासूसी दुनिया के कार्यालय से 60 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।
  स्नातक स्तरीय शिक्षा इन्होंने गोरखपुर के .....काॅलेज से पूर्ण की जहां इनका परिचय हिंदी के विद्वान डाॅ. रामकुमार वर्मा पद्मविभूष, जगदीश गुप्त और डाॅ. रघुवंश से हुआ। रिजवी साहब अपने समय के युनिवर्सिटी में एक मात्र मुस्लिम युवक थे जो हिंदी के छात्र थे।
इस विषय पर उन्होंने बङी ही शांति से कहा, -" मुझे आत्मसंतोष है की मुझे साहित्य जगत का सानिध्य मिला।"
यही सानिध्य आबिद रिजवी को बहुप्रतिभा वाला लेखक बनाता है।
इन्होंने युवावस्था में ही चार उपन्यास लिखे।
अजजाही-अनजानी राह, धुंधला चेहरा-धुंधला रूप, अतीत की परछाईयां, सरिता।
- "आप के ये उपन्यास आज कहां से उपलब्ध हो सकते हैं।"- मैंने पूछा।
-रिजवी जी ने उत्तर दिया,-" मैं राही की तरह चलता रहा, पीछे का निशान मिटता रहा। अब आप इसे शौक, स्वभाव या अक्ल मानिए मैंने कभी अपना लिखा संग्रह करने का उस वक्त सोचा तक भी नहीं। यही मेरी जिंदगी का पहलू है। खैर.....।"
    उस दौर के लेखक इतने डिग्रधारी नहीं थे लेकिन रिजवी साहब ने उच्चस्तरीय डिग्री भी ली और स्कूल- काॅलेज में पढाया भी, लेकिन साथ-साथ अपने लेखक को जिंदा रखा।
      बुंदेलखंड के एक इंटर काॅलेज में 120₹ माहवार पर पढाने लगे और वहाँ के अध्यापकों  की प्रेरणा से इन्होंने B.Ed.भी किया। हजारी लाल इंटर काॅलेज ...... से B.ed के पश्चात वहीं पर नौकरी भी लग गयी लेकिन इनके अंदर का लेखक ज्यादा दिन तक एक बंद जिंदगी जैसी नौकरी से खुश न था। काॅलेज के अत्यधिक आग्रह के पश्चात ये ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के दौरान काॅलेज से त्यागपत्र दे आये।
सन् 1967 में शादी हो गयी। इन्होंने अपने समय की प्रसिद्ध पत्रिका 'पेरेमेशन और खान वाले सीरीज' के लिए लिखना आरम्भ कर दिया।
"जिंदगी गुजरती रही और मैं लिखता रहा। आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व इलाहाबाद से मेरठ आ गया। उस समय मेरठ में तीस से उपर प्रकाशन थे और ये मेरा सौभाग्य है की मैंने लगभग प्रकाशन के लिए लिखा। शायद ही ऐसा कोई विषय हो जिस पर मैंने नहीं लिखा।" 

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...