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शनिवार, 4 दिसंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
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 दिल्ली में जो लोग रहते हैं, कहीं भी घूम फिर आयें, चैन की सांस, मानों दिल्ली में ही मिलती है। 
वैसे तो यह हर शहर में रहने वाले, अपने शहर के लिए महसूस करते हों, पर दिल्ली वालों की बात कुछ और ही है। 
दिल्ली के साथ बहुत सी बातें जुड़ जाती हैं। जैसे - 
दिल्ली है दिल वालों की। 
अब दिल्ली दूर नहीं। 
दिल्ली दिल है हिन्दुस्तान का। 
और
        दिल बड़ा है दिल्ली का, किसी भी गाँव, शहर, प्रान्त, देश का व्यक्ति दिल्ली आता है तो दिल्ली का होकर रह जाता है। 
बहुत से आक्रांता आये दिल्ली और बार-बार आये। कुछ दिल्ली को लूटकर चले गये तो कुछ यहीं के हो गये। 
हम जब कलकत्ता (आज का कोलकाता) रहते थे, दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर कलकत्ता ही लगता था। वहाँ बोटानिकल गार्डेन के विशाल बरगद की छांव में हवाओं के झोंके मन प्रसन्न कर देते थे तो धर्मतल्ला और उसके आस-पास फुटबॉल क्लबों के मैदान एक जुनून सा पैदा कर देते थे और दक्षिणेश्वर, ताड़केश्वर, काली मंदिर, हुगली नदी, डायमंड हार्बर तथा कलकत्ते का कोना-कोना दिल से नहीं, रोम-रोम से जुड़ा लगता था और हम कलकत्ते से बाहर के अपने रिश्तेदारों को 'कलकत्ते' के बारे में यह सब बताते हुए बड़ा गर्व महसूस करते थे कि कलकत्ते में 'कलकत्ता' नाम का तो कोई रेलवे स्टेशन ही नहीं है। एक रेलवे स्टेशन है 'हावड़ा' और दूसरा रेलवे स्टेशन है -'सियालदह' और हवाई अड्डा है - 'दमदम।' 

बुधवार, 16 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 07

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 6  ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

आप सौ परसेन्ट एक ईमानदार और सच्चे इन्सान हैं, वफ़ादार और अच्छे इन्सान हैं, लेकिन कभी कभी वक़्त आपके खिलाफ हो जाता है और जब वक़्त आपके खिलाफ हो, आपकी ईमानदारी में दूसरे को बेईमानी नज़र आती है। सच्चाई में झूठ नज़र आता है। ऐसे समय कोई सफाई देना या अपने अज़ीज़ को यह समझाना कि आप ईमानदार हैं, सच्चे हैं, शुभचिन्तक हैं, दोस्त हैं, सब बेकार होता है। ऐसे समय खामोश रह जाना ही सबसे उत्तम कदम होता है।
         यह सब मैं इसलिये बता रहा हूँ, क्योंकि जो-जो लोग, मेरी पीठ पीछे भी हमेशा मेरी तारीफ करते थे, सराहना करते थे - राजहंस और हिन्द - मनोज के विजय पाकेट बुक्स से विवाद में एकदम अकारण मुझे शक की निगाहों से देखने लगे थे। हालांकि बाद में, मैं उन सबके लिए भी वही पहले वाला प्यारा-दुलारा योगेश मित्तल बन गया था, लेकिन कुछ समय तक मुझे कड़वाहटें, जिल्लतें और उपेक्षा भी सहनी पड़ी थी। 
       विजय पाकेट बुक्स में वासुदेव और हरविन्दर से भारती साहब ने उन्हीं दिनों मेरा प्रथम परिचय कराया था। बाद में तो हम कई बार मिले, पर उस रोज भी वासुदेव और हरविन्दर बहुत मुहब्बत से मिले। हाथ पकड़ कर वासुदेव ने कई बार हाथ हिलाया।
 उसने यह भी कहा -"आपका नाम तो कई बार सुना था। मिलने का अवसर पहली बार मिला है।"
हरविन्दर ने भी हाथ मिलाया, पर सहज अन्दाज़ में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाकर छोड़ दिया। 
विजय कुमार मल्होत्रा उस समय एक साइड में खड़े, इन्देश्वर जोशी से पहले से, विजय पाकेट बुक्स में काम कर रहे पैकर को, वासुदेव, हरविन्दर, सावन और मीनू वालिया की पुरानी सभी किताबों के दो-दो बण्डल निकाल कर कार की डिकी में रखने का आदेश दे रहे थे। उस समय मुझे विजय कुमार मल्होत्रा के उस आदेश का मतलब समझ में नहीं आया था, पर बाद में सब पता चल गया था। 
     वे सारी किताबें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए निकलवाई जा रही थीं। दरअसल विजय कुमार मलहोत्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हमेशा राजहंस की किताबों की बिक्री पर ही ज्यादा जोर देते रहे थे, लेकिन अब उन्हें समझ आ गया था कि उन्हें अपने सभी लेखकों पर बराबर का जोर लगाना चाहिए था। 
उस समय विजय कुमार मल्होत्रा की पीठ मेरी तरफ थी। अपने वर्कर को सब कुछ समझाने के बाद जैसे ही वह पलटे, उनकी नज़र मुझपर पड़ी और छूटते ही वह बोले - "ये मनोज का जासूस कब आया?"
मुझे काटो तो खून नहीं। 

सोमवार, 24 मई 2021

कहानी उपन्यासकरा राजहंस की-05

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 4   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
यूँ तो कोई भी लेखक प्रकाशकों द्वारा लेखक के नाम के ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन और ट्रेडमार्क नाम में किसी भी लेखक की कृति के प्रकाशन की परिपाटी का समर्थन शायद ही करे, पर उन दिनों पाकेट बुक्स ट्रेड में दो लेखक ऐसे थे - जो ट्रेडमार्क लेखकों के सिस्टम के  सख्त खिलाफ थे! 
एक वेद प्रकाश शर्मा और दूसरा मैं! मौका मिलने पर दोनों ही ट्रेडमार्क प्रचलन के विरुद्ध जी भरकर ज़हर उगल देते थे! 
जब हम दोनों आपस में बातचीत करते तो ऐसे प्रकाशकों के खिलाफ मन की भड़ास भी खूब निकालते थे! 
हमारी नज़र में एक ट्रेडमार्क नाम टाइटिल कवर पर देकर, अन्दर किसी भी उपन्यासकार का उपन्यास छापना, पाठकों से सरासर चीटिंग था! धोखा था! 
हमें इससे बेहतर पैटर्न तो वह लगता था, जब प्रकाशक कोई भी नाम एक पत्रिका के रूप में रजिस्टर्ड करवा लेते थे और उसमें किसी भी लेखक का उपन्यास छाप देते देते थे, किन्तु तब वह अन्दर के पहले या तीसरे पृष्ठ पर असली लेखक का नाम भी अवश्य छापते थे!
विजय पाकेट बुक्स बनाम राजहंस, हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के मुकदमे के समय ट्रेडमार्क पर अपने विचारों के मामले में, मैं कन्फ्यूज-सा हो गया था, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा तब तक अपने स्टैण्ड पर कायम रहे, जब तक कि उन्होंने और सुरेश चन्द जैन ने पार्टनरशिप में तुलसी पाकेट बुक्स की शुरुआत नहीं की!
मुझ में और वेद प्रकाश शर्मा में सबसे बड़ा फर्क यह था कि मैं प्रकाशकों के सामने ट्रेडमार्क विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार कभी नहीं रखता था, सिर्फ नजदीकी दोस्तों के सामने ही अपने विचार प्रकट करता था, जबकि वेद प्रकाश शर्मा प्रकाशकों के सामने भी बेहिचक अपने उद्गार प्रकट कर देते और ट्रेडमार्क सिस्टम और नकली उपन्यासों के लिए प्रकाशकों को ही सौ परसेन्ट दोषी करार देते थे।

शनिवार, 22 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-01

राजहंस...एक शाश्वत लेखक
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विजय पॉकेट बुक्स की स्थापना सन 1967 में हुई और उन्होंने  सन 1971 में राजहंस के ट्रेड नेम का रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में अर्जी दी। रजिस्ट्रेशन बहरहाल तब नहीं हुआ लेकिन उन्होंने इस नाम से विभिन्न घोस्ट लेखकों से 8 किताबें लिखवा लीं थी।

केवल कृष्ण कालिया, विजय पॉकेट बुक्स के उपन्यासों के कमीशन एजेंट थे। वह उपन्यास  की बुकिंग आर्डर लाते और अपना कमीशन प्रकाशन से कमा लेते।

सन 1974 के आसपास, कालिया ने भी उपन्यास लिखने की इच्छा जाहिर की और विजय पॉकेट बुक्स से राजहंस नाम से ही लिखने की अनुमति मांगी। 

विजय पॉकेट बुक्स ने एग्रीमेंट द्वारा लिखित कई प्रतिबंध लादते हुए केवल कृष्ण कालिया को यह अनुमति दे दी। जिसके अनुसार कालिया किसी भी अन्य पार्टी-प्रिंटर या प्रकाशक के लिए नही लिख सकते। वह इस नाम का प्रयोग लेखक के रूप में स्वयं के लिए भी नहीं कर सकते न ही किसी और को लिखने के लिए उधार दे सकते हैं। इत्यादि इत्यादि।

मंगलवार, 4 मई 2021

कहानियां ऐसे भी बनती हैं- योगेश मित्तल-2

रिवाल्वर का मिज़ाज : कहानियाँ ऐसे भी बनती हैं - 02
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तब मेरी सिक्स्थ सेंस बहुत तेज़ थी! मेरी तार्किक क्षमता भी जबरदस्त थी! 
मनोज पाकेट बुक्स के राजकुमार गुप्ता और गौरीशंकर गुप्ता जी से और कोई लेखक सही-गलत की बहस नहीं करता था, लेकिन मुझे उनकी बात सही नहीं लगती तो अड़ जाता था और उन्हें अपनी बात सही होने का कायल भी कर देता था! 
ऐसे ही एक अवसर पर जब मैं मनोज पाकेट बुक्स में भारत नाम से छपने वाले उपन्यास "माँ-बाप" में एडीटिंग और लेखन का काम कर रहा था, आरम्भिक एक सीन पर मेरी राज कुमार गुप्ता जी से बहस हो गई और तीस हजारी कोर्ट परिसर में जाने की नौबत आ गई थी! पर वह किस्सा फिर कभी... अभी हम "रिवाल्वर का मिज़ाज" लिखे जाने के किस्से पर थे! 
"रिवाल्वर का मिज़ाज" रजत राजवंशी नाम से छपने वाले उपन्यासों में मेरा पहला उपन्यास था! 
अपनी सिक्स्थ सेंस और तार्किक क्षमता का जिक्र मैंने इसलिये किया, क्योंकि जब भी ऐसी कोई बहस वाली घटना घटती थी, राज भारती अक्सर कहते, तुझे तो कोई वकील होना चाहिए था और इमेजिनेशन वाली घटना घटती तो वह कहते, तुझे तो कोई जासूस होना चाहिए था!
नीचे पहुँचकर मैंने सपना पाकेट बुक्स के स्वामी सुनील कुमार शर्मा उर्फ सुनील पंडित से पूछा - "आज सुबह ही सुबह गुरु जी के साथ कैसे...?"
"पटेल नगर गया था - गुरु जी को कुछ दिखाने तो गुरु जी ने कहा - चल, योगेश के पास चलते हैं!" सुनील ने जवाब दिया! 
मैंने राज भारती जी की ओर देखा तो वह बोले - "चल, कहीं चलकर बैठते हैं! वहीं बात करेंगे!"
"कहाँ...?" मैंने पूछा तो भारती साहब बोले - "तू बता, तू तो यहीं रहता है!"
"मोहनसिंह प्लेस चलते हैं!" मैंने कहा! 
जिन लोगों ने मोहनसिंह प्लेस का नाम नहीं सुना, उन्हें बता दूँ कि तब कनाट प्लेस के रिवोली सिनेमा हाल से ठीक पहले बंगला साहब गुरुद्वारे वाली सड़क पर जो बिल्डिंग थी, उसी का नाम मोहनसिंह प्लेस था! खास बात यह थी कि कनाट प्लेस में ही रीगल सिनेमा के पास स्थित दिल्ली के विख्यात इण्डियन काफी हाऊस को जब रीगल के पास से हटाया गया तो वह मोहनसिंह प्लेस की छत पर ही स्थानांतरित हुआ था, लेकर मोहनसिंह प्लेस के बैसमेन्ट और अपर फ्लोर्स में भी तब बहुत-सी दुकानें थीं! आज कनाट प्लेस कितना बदल गया है, मुझे नहीं मालूम! राज भारती जी के स्वर्गवास के बाद मैं आज तक कनाट प्लेस नहीं गया।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा, भाग- 01

नमस्ते पाठक मित्रो, 
साहित्य देश इस बार प्रस्तुत कर रहा है लोकप्रिय साहित्य के एक और सितारे अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा। पेशे से अध्यापक अशोक जी राजस्थान के सीकर जिले के निवासी हैं। इन्होने ट्रेड नेम से भी लिखा और स्वयं के नाम से भी उपन्यास प्रकाशित हुये हैं।

लेखक परिचय-
नाम-     अशोक कुमार शर्मा
मु. पो. -  रूपगढ़,
वाया   -  कौछोर,
जिला -   सीकर [ राज ]
मो. न. -  9928108646
                
    मैं आवारा, इक बंजारा- भाग-01
          मैं अत्यंत ही आभारी हूं हम सब लेखकों के अति प्रिय आदरणीय श्री गुरप्रीत सिंह जी का [लेक्चरर- माउंट आबू।। निवासी - बगीचा, जिला -  गंगानगर, राजस्थान ]
जिन्होंने मुझे अपने ब्लॉग  साहित्य देश पर अपने लेखकीय जीवन की यह छोटी सी एक आत्मकथा, जिसका कि शीर्षक है -
'मैं आवारा, इक बंजारा' लिखने का मौका दिया। शुक्रिया गुरप्रीत सिंह जी, आपका लाख - लाख शुक्रिया।

मेरी इस लेखकीय आत्मकथा को पढ़ने वाले पाठकों को मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि अपनी इस आत्मकथा में जो कुछ भी मैंने लिखा है, वो सब ऊपरवाले को हाजिर - नाजिर जानकर पूरा का पूरा सच लिखा है और सच के सिवा और कुछ भी नहीं लिखा है।  हां, पर स्मृति दोष के कारण इसकी कुछ घटनाओं के काल खंड में और कुछ व्यक्ति या स्थान के नामो में भूल हो सकती है, जिसके कारण मैं एडवांस में ही आप जैसे उदार हृदय बंधुओ से क्षमा मांग लेता हूं ।
तो अब चलिए दोस्तों !
मेरे साथ मेरे लेखन जीवन की शुरुआत के कुछ सुहाने और कुछ दर्द भरे सफर पर, जिसमें कुछ गम भी है, तो कुछ खुशियां भी। कुछ फूल भी है, तो कुछ कांटे भी। 
कुछ मुस्कुराहटें है, तो कुछ आंसू भी ।
अगर मेरी इस आत्मकथा में लिखे कुछ शब्दों और वाक्यों की वजह से किसी महानुभाव की भावनाओं को अगर जरा सी भी कोई ठेस पहुंचे, तो मेरी उनसे हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट है कि वे मुझे अपनी इस बेअदबी के लिए अपना छोटा भाई समझ कर तुरन्त मुझे माफ कर देना ।
तो आइए दोस्तो । अब चलते है मेरे जीवन की उन टेढ़ी - मेढ़ी, ऊंची - नीची, पथरीली, कंटीली और रेतीली राहों पर, जिनपर मैं कभी बिना थके और बिना किसी से शिकायत का एक लफ्ज़ भी कहे कभी रोता, तो कभी हंसता, तो कभी एक आवारा बंजारे की तरह मस्ती से बांसुरी या अलगोजे की धुन बजाता हुआ बिना अपने पैरो में चुभे हुए कांटो की परवाह किए, निरन्तर नंगे पांव आगे, और आगे, और फिर उससे भी और आगे चलता ही गया, बस । चलता ही गया..........।
बिना रुके !
बिना थके !
दर कूंचा $$$ !
दर मंजलां $$$!
उन अनजानी मंजिलों की ओर, जिनकी न तो मुझे दिशा ही
मालूम थी और न ही दूरी ।
इसीलिए मैंने अपनी इस लेखकीय आत्मकथा का नाम एक निष्पक्ष और एक तटस्थ दृष्टा बनकर दिया है -मैं आवारा, इक बंजारा। 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

            “जासूस शब्द सुनते ही दो नाम मस्तिष्क की दीवारों पर उभरते हैं पहला शरलक होम्स और दूसरा इसके रचियता सर आर्थर कानन डॉयल । 221 B, बेकर स्ट्रीट में रहने वाला शरलक वह जासूस है जो अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर अनुमान लगाता है, तर्क करता है और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता है और अंत में अपराधियों का पता लगा लेता है ।”

            हिन्दी भाषा में जासूस के लिए ‘गुप्तचर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था बाद में इसकी जगह जासूस शब्द प्रचलित होता चला गया । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव और संचालन के लिए गुप्तचरों के एक ऐसे तंत्र की रचना की जोकि अभेद्य थी । उस काल खंड से लेकर आज के आधुनिक काल तक प्रशासन की सफलता गुप्तचरों अथवा जासूसों पर ही निर्भर रहती है । पुलिस विभाग में जब कोई व्यक्ति एक रकम के एवज में कोई सूचना या इन्फोर्मेशन देता है तो उसे ‘इन्फोर्मर’ कहा जाता है । 

वार्ष्णय टाइम्स, दिसंबर 2020
वार्ष्णय टाइम्स, दिसम्बर2020
           विश्व युद्ध के दौरान जासूसों की देशभक्ति और जांबाजी के कई किस्से अखबारों और पत्रिकाओं के द्वारा लोकप्रिय होते चले गए । ये वो दौर था जब युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक देश दूसरे देश में अपने जासूसों के जाल को बेहद गुप्त रूप से बुनता था और जरूरी सूचनाएँ हासिल करने में लगा रहता था । 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-43,44

 
आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 43
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रोडवेज पहुँचने पर हमें दिल्ली की एक बस तैयार दिखी।
बस के फ्रन्ट शीशे पर तथा ऊपर गन्तव्य के छोटे स्थान पर भी दिल्ली लिखा था, तो भी बस कंडक्टर बस से नीचे,बस में सवारियों के प्रवेश द्वार के निकट खड़ा जोर-जोर से "दिल्ली-दिल्ली" की आवाज लगा रहा था।
उन दिनों यूपी रोडवेज़ के अधिकांश बस अड्डों पर ऐसे दृश्य आम हुआ करते थे।
अब काफी सालों से यूपी में कहीं भी जाने के लिए बस का सफर करने की नौबत नहीं आई, इसलिए यूपी के बस अड्डों की शक्ल देखे, जमाना हो गया।
हम लोग बस में चढ़ गये!
बस में एक ओर दो लोगों के बैठने की सीटें थीं तो दूसरी तरफ तीन लोगों के बैठने की सीट थी!
बिमल ने दो लोगों वाली सीट चुनी! वह स्वयं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठे!

खैर, खरामा-खरामा कर बस चली!
"योगेश जी, डील सही रही?" बिमल ने पूछा!
"हाँ!" मैंने कहा!
"खुश तो हो..?"
"यह तो आदत है मेरी! डील न भी होती तो भी खुश रहता! आप जानते हो!"
बिमल हंसे! बहुत जोर से हंसे! 

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-41,42

 आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 41

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मेरठ में हम बस अड्डे पर ही उतरे। उसके बाद जब हम ठठेरवाड़ा के लिए रिक्शा ढूँढने लगे तो जल्दी ही कोई रिक्शा नहीं मिला।
पांचवें या छठे रिक्शेवाले ने ठठेरवाड़ा चलने के लिए हामी भरी तो हमारी जान में जान आई।
"बैठो योगेश जी !" बिमल ने मुझसे कहा।
बिमल की यह खास आदत थी, जब कोई साथ होता था तो अधिकांशतः खुद बाद में ही बैठते थे, दूसरे शख्स को पहले बैठाते थे।
दोनों के बैठने के बाद रिक्शेवाले ने रिक्शा दौड़ाया तो बिमल ने मुझसे कहा-"चलो, रिक्शा तो मिला।"
" बाबूजी, पहले आप जिन लोगों से बातें किये थे, सब पुलबेगम की तरफ रिक्शा चलाते हैं। उनमें शहर का कोई नहीं था।" बिमल की बात सुन रिक्शेवाला अचानक बोल उठा।
"ओह...अच्छा...!" बिमल ने कहा।
तभी रिक्शेवाले ने सवाल किया-"बाबूजी आप दिल्ली से आ रहे हैं...?"
"हाँ...!" बिमल ने कहा।
"फिर आपको दिल्ली चुंगी पर उतरना चाहिए था। दिल्ली से आने वाली बस दिल्ली चुंगी और डी.एन. कालेज पर भी रुकती है। उधर से ठठेरवाड़ा पास पड़ता।"
"अच्छा... !" बिमल मुस्कुराये और रिक्शेवाले से बोले-"पर अगर हम वहाँ उतर जाते तो आपके रिक्शे में कैसे बैठते बाबा। "
"हाँ, यह तो है।" रिक्शेवाला भी हंसा-"आज सुबह से मेरी भी बोहनी नहीं हुई थी । ऊपरवाला बड़ा कारसाज है। सबका ख्याल रखता है।"
रिक्शेवाला बड़ा बातूनी था। रास्ते भर कोई न कोई बात करता रहा।
          बहुत से रिक्शेवाले बातूनी होते हैं, किन्तु बैठने वाली सवारी को उनसे सड़क, रास्तों, फिल्मों से ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए।
      यह बात मुझे बिमल चटर्जी ने बाद में कभी समझाई थी।
और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक बातों के अलावा राजनैतिक बातें भी हर किसी नये राह चलते मिलने वाले से नहीं करनी चाहिए।
आज के राजनैतिक उथल-पुथल वाले वातावरण में अक्सर मैं सीमा से बाहर निकल जाता हूँ, तब हमेशा बिमल की बातें याद आ जाती हैं।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-39,40

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार,भाग -39,40
योगेश मित्तल जी के स्मृति कोष से

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 39
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अगले कुछ दिनों में बस एक विशेष बात हुई ! पिताजी कलकत्ते से हमेशा के लिए दिल्ली आ गये ! कलकत्ते में हमारे घर में जो-जो सामान था, अधिकांश वहीं बेच दिया या मुफ्त में किसी पड़ोसी को दे दिया ! सिर्फ कपड़े और कुछ एक हल्की-फुल्की चीजें साथ ले आये थे, जिनमें शार्प झंकार का वह रेडियो भी था, जो बचपन के दिनों में हमारी सबसे प्रिय वस्तु हुआ करता था !

घर में रेडियो आ गया था, हम सब रेडियो पर फिल्मी गाने व हवामहल जैसे प्रोग्राम सुनना चाहते थे, लेकिन यह सम्भव न हुआ !
मकानमालिक जगदीश गुप्ता ने कहा -"रेडियो चलाओगे तो दस रुपये महीना देने होंगे !"
और दस रुपये उन दिनों बहुत होते थे ! 
पास ही के एक जाट रणवीर सिंह की गाय-भैंस के दूध की डेयरी से घर की चाय के लिए दूध लाया जाता था और सबके सामने रणवीर सिंह दूध दुह कर बेचा करता था, वह दूध उन दिनों पचास पैसे किलो होता था !

पिताजी डाॅक्टर थे ! बहुत भाग-दौड़ करने पर शीला सिनेमा टाकीज, पहाड़गंज, नई दिल्ली स्टेशन के पीछे जा रही एक सड़क पर उन्हें एक छोटी-सी दुकान किराए पर मिल गयी, जहाँ उन्होंने अपना क्लिनिक खोल लिया !
वे दिन हमारी आर्थिक परेशानियों के बड़े भारी दिन थे ! 
हम जगदीश गुप्ता के जिस मकान में किराए पर रह रहे थे, उससे पहले हम वहीं आगे की एक गली में सरदार जीतसिंह के मकान में रह चुके थे ! तब सरदार जीतसिंह के बच्चों बिमला, कान्ता और काले को मैं पढ़ाया भी करता था !
सरदार जीतसिंह के मकान के बिल्कुल साथ वाला मकान एक मुल्तानी विधवा का था, जिनके चार बच्चे थे ! सबसे बड़ी इन्दिरा दीदी, उनसे छोटा राम, उससे छोटा किशोर और सबसे छोटी बेबी ! 

रविवार, 30 जून 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-37,38

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-37

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 37
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अगले दिन कोई प्रकाशक नहीं आया ! मैं और बिमल चटर्जी दोनों इन्तजार करते रहे ! उसके अगले दिन भी कोई नहीं आया !
तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह तैयार होकर बिमल चटर्जी के घर की ओर निकलने वाला ही था कि द्वार पर भारी-भरकम स्याह-सा चेहरा प्रकट हुआ !
वह उत्तमचन्द थे ! बुक बाइन्डर !
"बाबे दी मेहर है ! चिन्ता नहीं करनी !" दोनों हाथ ऊपर उठा, उत्तमचन्द ने चिर-परिचित अन्दाज़ में अभिवादन किया !
"बाबे दी मेहर है !" मैंने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया-"आज सुबह-सुबह कैसे ?"
"चिन्ता नहीं करनी ! इधर से गुज़र रहा था ! सोचा - बड़े-बड़े लोगों से मिलते चलें !"
मैं ठहाका मारकर हँसा -"बड़े-बड़े लोगों से मिलने के लिए आप चारफुटिये से मिलने आये हैं ! मैं कहाँ से बड़ा नज़र आ रहा हूँ आपको ?"
उत्तमचन्द गम्भीर हो गये -"हमें तो जो रोटी दे, वही हमारे लिए बड़ा है !"
"अरे तो मैंने कौन-सी रोटी खिला दी आपको ? खिलाने-पिलाने वाला तो भगवान है ! मेरे यहाँ आने की जगह किसी मन्दिर चले गये होते !"
"वहाँ भी जाऊँगा, पर अभी नहाया नहीं हूँ !"
"तो आप बिना नहाये-धोये सिर उठाकर सीधे मेरे यहाँ चले आये हैं ! कुछ तो बात है ! क्या बात हैं ?" मैंने मुस्कुराते हुए भवें नीचे से ऊपर करते हुए पूछा !
"लड़के खाली बैठे हैं ! मैंने सोचा - योगेश जी से ही पूछ लेते हैं - पंकज पाॅकेट बुक्स का नया सैट कब आ रहा है ?" उत्तमचन्द के मुखमण्डल की मुस्कान का स्थान गम्भीरता ने ले लिया !
"इस बारे में तो कुमार साहब ही कुछ बता सकते हैं !" मैंने कहा !
"तो चलें...कुमार साहब के घर ?" उत्तमचन्द ने पूछा !
"चलिए !"
हम दोनों जब कुमारप्रिय के यहाँ पहुँचे ! कुमारप्रिय घर पर ताला लगा रहे थे ! स्पष्ट था - कहीं जाने को तत्पर हैं !

शुक्रवार, 14 जून 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-35,36

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 35
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राज भारती जी और यशपाल वालिया ने मेरा और बिमल का सहज स्वागत किया !
फोल्डिंग कुर्सी बिछाकर हम दोनों जम गये तो राज भारती जी ने बिमल से पूछा -"स्क्रिप्ट तैयार है तेरी ?"
"हाँ, लेकर आया हूँ !" बिमल ने कहा ! किन्तु सवाल मुझसे तो किया ही नहीं गया था ! मैं खुद टपक पड़ा जवाब देने को, बोला - "मैं भी लाया हूँ !"
"अच्छा...!" जवाबी आवाज यशपाल वालिया की थी, जो नाटकीय अन्दाज़ में कुर्सी से उठकर खड़े हुए और ऊपर से नीचे मुझे देख, भारती साहब से पंजाबी में बोले -"आपने इधर तो देखा ही नहीं ! इधर भी देख लो ! योगेश जी भी आये हैं ! स्क्रिप्ट भी लाये हैं !"
फिर वालिया साहब बिमल से बोले -"ये क्या मोटे ? तूने अपनी कुर्सी तो भारती साहब के पास रख ली, योगेश जी को पीछे छिपा दिया !"

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-33,34

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 33
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अचानक अपना ही घर मेरे लिए कारागार बन गया !

लेखकों-प्रकाशकों तथा बिमल चटर्जी की विशाल लाइब्रेरी में आनेवाले लोगों से जो रिश्ता बना था, उसकी वजह से घर में मेरा समय कम ही बीतता था !
बहुत बार तो केवल रात का खाना ही घर पर होता था, दिन का भोजन कहीं न कहीं यारों के साथ होता था !

लेकिन...
सब दिन होत न एक समाना !

वह दिन भी अन्य दिनों से अलग था !

सुबह-सुबह की पहली चाय कुमारप्रिय के साथ एक टी स्टाॅल में पीने के बाद अलग हुआ तो बिमल चटर्जी के यहाँ पहुँच गया ! वहाँ से हम साथ-साथ विशाल लाइब्रेरी पहुँचे !

"योगेश जी, भारती पाॅकेट बुक्स का मेरा नाॅवल तो कम्प्लीट होनेवाला है ! आपका 'जगत के दुश्मन' कहाँ तक पहुँचा ?" बिमल ने पूछा तो मैंने बताया - "आखिरी ढलान पर है, जरा-सा धक्का लगाना है, पूरा हो जायेगा !"
बिमल हँस पड़े -"मुझे तो आज और कल, दो दिन लगेंगे ! आप भी पूरा कर लो ! फिर साथ में ही चलेंगे ! ठीक !"
"ठीक !" मैंने कहा !

रविवार, 14 अप्रैल 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-31,32

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 31
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          उस दिन फूलचन्द सुबह-सुबह घर आ गया ! वह अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान था और उसके माता-पिता उसकी इतनी ज्यादा चिन्ता करते थे, जितनी कोई माँ-बाप अपनी जवान बेटी की भी नहीं करते।

           फूलचन्द गाँधीनगर में रहने पर शुरुआती दौर में बने मेरे दोस्तों नरेश कुमार गोयल और अरुण कुमार शर्मा का सहपाठी रह चुका था और उन दोनों का ही अच्छा दोस्त था, लेकिन मेरी उससे सिर्फ पहचान ही थी।

           फूलचन्द कद में मुझसे खास बड़ा नहीं था, सिर्फ इंच-दो इंच का रहा होगा, लेकिन उसका शारीरिक गठन बहुत अच्छा था और सबसे खास बात यह थी कि उसका रंग एकदम गोरा-चिट्टा था ! चेहरे पर हमेशा मासूमियत छाई रहती थी ! किन्तु उसके चेहरे पर मूँछ-दाढ़ी का अभाव था।

         वह इतना खूबसूरत था कि यदि साड़ी-ब्लाऊज में सामने आ जाये तो गली-मोहल्ले के दिलफेंक लड़के 'अश्-अश्' कर उठें और उस पर लाइन मारने के अवसर ढूँढने लगें।

       नवीं-दसवीं में तीन साल फेल होने के कारण वह नरेश और अरुण से पिछड़ अवश्य गया था, किन्तु बचपन से साथ-साथ पढ़ने के कारण बनी दोस्ती बरकरार थी।

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-29,30

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 29
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"मैं तो गर्ग एण्ड कम्पनी में पैसे लेने आया था ! मनोज में भी गया था।  उन्हें बाल पाॅकेट बुक्स देनी थीं ?" मैंने राज भारती जी से कहा।  फिर पूछा -"पर आप यहाँ कहाँ ?"
"क्यों ? तू ही यहाँ माल कमाने आ सकता है ? राज भारती को कोई नहीं जानता।" राज भारती हँसते हुए बोले तो मैं हड़बड़ाया -"नहीं-नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था !"
"मतलब-वतलब छोड़ ये बता ज्ञान ने पैसे दिये ?"
"हाँ, दिये !" मैंने कहा।

उन दिनों मेरे मुँह से किसी भी पारिश्रमिक अथवा पेमेन्ट के लिए अधिकांशतः 'पैसे' शब्द ही मुँह से निकलता था ! राज भारती जी के संसर्ग ने ही मुझे 'पेमेन्ट' या 'पारिश्रमिक' बोलना सिखाया।

"आज तो लगता है - मनोज से भी पेमेन्ट मिल गई है ?" भारती साहब मेरा चेहरा गौर से देखते हुए चुटकी लेकर बोले !
"हाँ !" मैं हँसा।
"तब तो पार्टी हो जाये !"
"हाँ-हाँ, जरूर ! बताइये कहाँ चलना है ?"
"सब्र कर...सब्र कर ! तूने तो अपनी जेब भर ली ! अब मैं भी जरा कुछ नाश्ते-पानी का जुगाड़ कर लूँ !" राज भारती  बदस्तूर मुस्कुराते हुए बोले।

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-27,28

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 27
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बैठने के लिए उन दिनों चन्दर की दुकान में छोटे-छोटे स्टूल थे।

एक पर वो बैठा, दूसरे के शीर्ष पर हाथ से थपकी दे, मुझसे बोला -"बैठ।"
मैं यन्त्रवत् बैठ गया।

"यार, मैं तुझसे बहुत दिन से बात करने की सोच रहा था। पर कभी कस्टमर्स की भीड़, कभी तेरे साथ बिमल चटर्जी या अरुण शर्मा होते थे, इसलिए कभी चांस नहीं मिला, पर आज तू पकड़ में आ गया और अभी कस्टमर भी नहीं हैं !"
मैं मुस्कुरा दिया, बोला कुछ नहीं।

"तुझे जल्दी तो नहीं है ना ?" चन्दर ने फिर पूछा।
मैंने "नहीं" में सिर हिला दिया।

"पानी पियेगा ?" पूछने के साथ-साथ चन्दर ने स्टूल से उठ, वहीं कहीं से काँच का एक गिलास उठाया और कुछ पीछे नीचे जमीन पर रखी एक बेहद खूबसूरत सुराही उठाई और सुराही से पानी काँच के गिलास में उड़ेलकर, मेरी ओर बढ़ा दिया।

प्यास तो नहीं थी, फिर भी मैंने गट-गट पानी पीकर गिलास खाली कर दिया और वापस चन्दर को थमा दिया।

चन्दर गिलास वहीं कहीं नीचे रखने के बाद फिर से स्टूल पर बैठ गया।

"अच्छा बता, किस-किसके लिए लिख रहा है ?" स्टूल पर जमकर बैठने के बाद उसने पूछा।
मैंने पहले तो बगल की दुकान की ओर इशारा किया और बोला -"मनोज में लिख रहा हूँ।"
फिर एक क्षण रुककर बोला -"गर्ग एण्ड कम्पनी और भारती पाॅकेट बुक्स में भी लिख रहा हूँ।"
"बेकार है, यह सब बनिये लोग बड़े चालू होते हैं ! इनमें कोई भी तुझे तेरे नाम से नहीं छापेगा । तू जिन्दगी भर लिखता रहेगा। कोई फायदा नहीं होगा।" चन्दर ने कहा !

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-25,26

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 25
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"आप भी लीजिए ना...।" कुमारप्रिय ने बिमल जैन को केवल चाय की चुस्की भरते देखकर, बिस्कुट और नमकीन की ओर संकेत करते हुए कहा तो बिमल जैन बोले -"नहीं, ठीक है। आप लीजिए।"

     कुछ पल सन्नाटा रहा।  जब हमारे कपों में चाय लगभग अन्तिम घूँट भर थी, तभी बिमल जैन फट पड़े -"मुझे तो आप लोगों ने बरबाद कर दिया। आगे नहीं करना है - मुझे पब्लिकेशन। अब और एक पैसा नहीं लगाऊँगा !"
"अरे ! क्या हुआ ? ऐसे क्यों नाराज हो रहे हैं जैन साहब ?" कुमारप्रिय चौंकते हुए बोले।
"क्या हुआ ? चाय पी लीजिये। फिर दिखाता हूँ - क्या हुआ ?" बिमल जैन तल्ख स्वर में बोले।

कुमारप्रिय ने चाय का आखिरी घूँट भर कप टेबल पर रख दिया। मैं पहले ही अपना कप खाली कर चुका था।

बिमल जैन खड़े हो गये और दूसरे कमरे की ओर बढ़ते हुए बोले -"इधर आइये !"

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-23,24

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 23
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आबिद रिजवी मेरे और बिमल चटर्जी के लिए उस दिन से पहले महज़ एक नाम था, जिसकी हमने बहुत बार विभिन्न सन्दर्भों में चर्चा सुनी थी ! न केवल लालाराम गुप्ता और राज भारती जी से, बल्कि प्रकाशन जगत के कई अन्य दिग्गजों से ! एक बार जनाब फारुक अर्गली ने भी आबिद रिजवी का नाम लिया था, तब वह बिमल चटर्जी से एक विशेष चर्चा कर रहे थे !

मजे की बात यह कि तब तक फारुक अर्गली कभी भी आबिद रिजवी से मिले नहीं थे !

फारुक साहब ने बिमल से कहा था -"बिमल, मेरे विचार से जासूसी साहित्य और पाॅकेट बुक्स में हिन्दी में लिखनेवाले बंगाली लेखक अभी तक तो अकेले तुम्हीं हो !"
बिमल की मुस्कान बड़ी ही दिलफरेब थी ! वह मुस्कान बिखेरते हुए बोले -"हाँ, वरना जासूसी में तो आपके मुसलमान लेखकों ने हिन्दी पर पूरा कब्जा कर रखा था !"

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-21,22

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 21


हम जिस मकान में रहते थे, उसमें हमारे अलावा भी कई किरायेदार थे।
एक - हरीश चन्द्र श्रीवास्तव, जो कनाट प्लेस स्थित जीवनदीप बिल्डिंग में हिन्दुस्तान स्टील के आफिस में काम करते थे।
एक देशराज थे, जिनकी परचून की दुकान थी।
एक अन्य हरिओम कश्यप, जो किसी पोस्ट आॅफिस में पोस्टमैन थे, बाद में मलकागंज के किसी पोस्ट आॅफिस में उन्होंने काफी समय तक ड्यूटी की।
एक भूरेलाल थे, जो शायद किसी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करते थे।

          सभी परिवार काफी हिल-मिल कर रहते थे ! हरिओम कश्यप अविवाहित थे और अकेले ही रहते थे ! वह रोज सुबह आठ बजे अपने कमरे को ताला लगाकर निकल जाते और शाम साढ़े सात बजे आते।
बाकी परिवारों के पुरुष भी नौ बजे ये पहले काम पर निकल जाते थे ! फिर भी स्त्रियाँ और परिवार के अन्य लोग घर पर ही होते थे।

       सुमेरचन्द जैन साढ़े दस बजे के बाद आये ! मुख्य द्वार से मकान की गैलरी में कदम रखते ही उन्होंने आवाज दी -"योगेश...!"
और योगेश के दिल में आया - भागकर कहीं छिप जाये ! पर ऐसा सम्भव नहीं था, मकान में बहुत लोग थे और अपने घर में भी मम्मी, बड़ी बहन मधु, छोटी बहन सरिता और छोटा भाई राकेश थे।
पिताजी तब कलकत्ता में थे।

योगेश जी सुमेरचन्द जैन के सामने पहुँचे !
चेहरे पर मीठी मुस्कान लाकर कहा -"नमस्ते जैन साहब !"
"नमस्ते !" सुमेरचन्द ने नमस्ते का जवाब कुछ रूखेपन के साथ दिया और तुरन्त अगली लाइन सुना दी -"फटाफट पैसे ले आओ ! मुझे अभी कई जगह जाना है ! टाइम नहीं है मेरे पास !"
"आइये, बैठिये तो सही ! कुमार साहब भी अभी आनेवाले हैं !" मैंने कहा।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-19,20

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 19
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ज्ञान ने मुझे देखते ही कुछ तेज़ आवाज़ में कहा था -"बेईमान, धोखेबाज, गद्दार !"
और मैं एकदम सन्नाटे में डूब गया था ! 
ऐसा क्या कर दिया मैंने ? मन ही मन मैंने सोचा था !

पर ज्ञान की आवाज़ की एक विशेषता यह थी कि वह गुस्से में भी बोलता तो आवाज़ में कड़कपन या कठोरता नहीं महसूस होती थी ! 
पता नहीं क्यों...उस दिन मुझे ज्ञान के शब्दों से आघात-सा अवश्य लगा, पर तुरंत ही शब्द होठों से निकले -"क्या हुआ ? इतने गर्म क्यों हो रहे हो ?"

अक्सर ज्ञान के होठों से गालियों के फूल भी बरसते थे ! गुस्से में ही नहीं सामान्य सी बात-चीत में भी ! मेरे सवाल का जवाब उसने मुंह से एक भद्दी गाली निकालने के बाद दिया -"तू भरोसे के काबिल ही नहीं है ! क्या प्रॉमिस किया था तूने ? दरीबे में कदम तब रखेगा, जब मेरे लिए स्क्रिप्ट लेकर आएगा ?"     
"तो यह क्या है ?" मैंने बाल पॉकेट बुक्स की स्क्रिप्ट ज्ञान के सामने रख दी -"तुम्हारे लिए स्क्रिप्ट लेकर ही आया हूँ !"
"बहुत एहसान कर दिया ! हमें नहीं चाहिए तेरी स्क्रिप्ट ! ले जा, यह भी उन्हीं को दे आ, जो तेरे सगे हैं !" ज्ञान स्क्रिप्ट उठाकर पीछे रखते हुए बोला !

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