Hindi pulp fiction में पवन पॉकेट बुक्स के अंतर्गत प्रकाशित होने वाले उपन्यासकार 'पवन' का सामाजिक उपन्यास 'एक गुनाह और सही' प्रस्तुत है।
Sahityadesh के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में आपका स्वागत है।
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एक गुनाह और सही - पवन |
"आपको बास ने याद किया है मैडम !"
"अभी ?"
"जी हां - तुरन्त ।""ठीक है।" एक गहरी सांस लेकर वह बोली- "एक घण्टे तक पहुंच रही हूं।” कहकर उसने रिसीवर रख दिया, फिर होंठों ही होंठों में बड़बड़ाई - "पता नहीं कब पिड छूटेगा इस हरामजादे से ।" बड़बड़ाती हुई वह उठ खड़ी हुई, फिर अपने बेटे को पुकारा - "सुन्दर !"
"यस मम्मी ?" एक बीस वर्षीय युवक बैठक में आ गया।
"मैं एक जरूरी काम से जा रही हूं- घर का ध्यान रखना।"
"कहां जा रही हो ?"
"जहन्नुम में ज्यादा सवाल न किया करो।"
"अच्छा इतना तो बता दो कि कब तक लौटोगी ?"
"दो ढाई घण्टे तो लग ही जाएंगे।"
"आठ बजे रहे हैं- यानि..!"
"तुम बैठकर हिसाब लगाते रहो, मैं जा रही हूं।" कहकर वह बाहर आ गई और एक आटो को रोककर उसमें बैठते हुए बोली "शारदा नगर चलो।"
"कहां जा रही हो ?"
"जहन्नुम में ज्यादा सवाल न किया करो।"
"अच्छा इतना तो बता दो कि कब तक लौटोगी ?"
"दो ढाई घण्टे तो लग ही जाएंगे।"
"आठ बजे रहे हैं- यानि..!"
"तुम बैठकर हिसाब लगाते रहो, मैं जा रही हूं।" कहकर वह बाहर आ गई और एक आटो को रोककर उसमें बैठते हुए बोली "शारदा नगर चलो।"
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'गुजरात नाईट क्लब' की रिसेप्शनिस्ट ने रिसीवर उठा-कर कहा- "मैडम सरिता आई हैं बॉस ।"
"फौरन भेजो।"
"यस बॉस ।"
“और सुनो - जब तक मैडम मेरे कमरे में रहें, तब तक मुझसे मिलने कोई नहीं आएगा।”
दरवाजा खोलकर सरिता अन्दर दाखिल हुई ही थी कि जोशी चहककर बोला- "आओ आओ जानेमन ।" कहते हुए उसने उसे अपनी बांहों में भर लिया- "तुम्हारे तो दर्शन ही दुलभ हो गए हैं।"-
"क्या यही कहने के लिए बुलाया था मुझे ।" सरिता मुस्कराई।
"बातें तो और भी हैं लेकिन पहले प्यार- आओ।"
आज मैं जल्दी में हूं श्याम दरअसल आज सुन्दर घर पर ही है आते समय कई सवाल कर रहा था।"
"अरे जाने भी दो, बच्चा है।"
"बच्चे जवान हो गए हैं श्याम ।"
"तुम उन दोनों की माँ तो लगती नहीं। हां, बड़ी बहन जरूर लगती हो काफी संभालकर रखा है अपनी जवानी को।" कहकर उसके कन्धे पकड़कर बैंड परं बैठा दिया। फिर बैड साईड टेबल पर रखी बोतल की ओर इशारा करके बोला
"पैग बनाओ जान।"
सरिता पैग बनाने लगी ।
"कई लड़कियो को भोग चुका हूं- लेकिन जो आनन्द तुममें मिलता है, वह उन छोकरियों से नहीं मिल पाता।"
"करने लगे मक्खनबाजी।"
“सच सरिता अपनी जान की कसम- सच कह रहा हूं ।"
'गुजरात नाईट क्लब' की रिसेप्शनिस्ट ने रिसीवर उठा-कर कहा- "मैडम सरिता आई हैं बॉस ।"
"फौरन भेजो।"
"यस बॉस ।"
“और सुनो - जब तक मैडम मेरे कमरे में रहें, तब तक मुझसे मिलने कोई नहीं आएगा।”
दरवाजा खोलकर सरिता अन्दर दाखिल हुई ही थी कि जोशी चहककर बोला- "आओ आओ जानेमन ।" कहते हुए उसने उसे अपनी बांहों में भर लिया- "तुम्हारे तो दर्शन ही दुलभ हो गए हैं।"-
"क्या यही कहने के लिए बुलाया था मुझे ।" सरिता मुस्कराई।
"बातें तो और भी हैं लेकिन पहले प्यार- आओ।"
आज मैं जल्दी में हूं श्याम दरअसल आज सुन्दर घर पर ही है आते समय कई सवाल कर रहा था।"
"अरे जाने भी दो, बच्चा है।"
"बच्चे जवान हो गए हैं श्याम ।"
"तुम उन दोनों की माँ तो लगती नहीं। हां, बड़ी बहन जरूर लगती हो काफी संभालकर रखा है अपनी जवानी को।" कहकर उसके कन्धे पकड़कर बैंड परं बैठा दिया। फिर बैड साईड टेबल पर रखी बोतल की ओर इशारा करके बोला
"पैग बनाओ जान।"
सरिता पैग बनाने लगी ।
"कई लड़कियो को भोग चुका हूं- लेकिन जो आनन्द तुममें मिलता है, वह उन छोकरियों से नहीं मिल पाता।"
"करने लगे मक्खनबाजी।"
“सच सरिता अपनी जान की कसम- सच कह रहा हूं ।"
"अच्छा-अच्छा, गिलास उठाओ मैं सिर्फ एक ही पैग लूंगी ।"
"खूबसूरत औरत के जिस्म पर जब मैं कपड़े देखता हूं तो
मेरा मूड खराब हो जाता है।" गिलास उठाते हुए वह बोला ।
"खूबसूरत औरत के जिस्म पर जब मैं कपड़े देखता हूं तो
मेरा मूड खराब हो जाता है।" गिलास उठाते हुए वह बोला ।
सरिता मुस्कराकर खड़ी हो गई और चंद पलों बाद हो उसने अपने शरीर को कपड़ों से पूरी तरह आजाद कर दिया ।
"अब खुश हो ?"
"बिल्कुल।" श्यामनाथ जोशी ने उसे अपनी गोद में खींच लिया- "तुम्हारा बदन अभी भी लाजवाब है डार्लिंग।"
और फिर कमरे में वासन। का घिनौना खेल शुरू हो गया ।
"तुम तो शरीर को तोड़कर रख देते हो।" सरिता ने दूसरा पैग बनाते हुए बोला "इसलिए अच्छे भी लगते हो । इस उम्र में भी तुम्हारे पास वह सब कुछ है, जिसकी दीवानी एक औरत होती है।"
"छोड़ो इन बातों को- अब कुछ काम की बातें हो जानी चाहिए।" सिगरेट सुलगाकर जोशी ने कहा ।
"कहो- क्या बातें करना चाहते हो ?"
"सतीश कब आ रहा है.?"
"वो महीने में दो-तीन बार तो आता ही है।"
"मैं पूछ रहा हूं कि वह हमेशा के लिए कब आ रहा है ?"
"अभी सात-आठ महीने बाकी हैं।"
"क्या सोचा है उसके बारे में तुमने ?"
"मैं समझी नहीं।" तनिक चौककर उलझनपूर्ण लहजे में
उसने पूछा- 'क्या सोचना चाहिए मुझे ?"
"मेरा इशारा सेठ दीनदयाल की तरफ है।"
"ओह ! अब समझी।” सरिता मुस्कराई "गिलास उठायो।"
"पहले मेरी बात का जवाब दो।"
"सतीश वकालत पास कर ले, उस बाबत तब सोचेंगे।"
"अब मैं और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकता ।"
"तो क्या उसकी पढ़ाई छुड़वा दूं।"
"क्या करेगा इतना पढ कर- अब तो वह करोड़पति बनने जा रहा है।"
"उम्मीद है हमें, अभी बन नहीं गया और फिर जरूरी नहीं कि दयाल उसे अपना बेटा मान ही ले।"
"उसका बाप भी मानेगा।" आवेश में आ गया जोशी- "जब तुम कोशिश करोगी तो।"
"मैं पूरी कोशिश करूंगी श्याम - सतीश को उसके अधिकार दिलाने के लिए मैं जमीन-आसमान एक कर दूंगी।"
"तभी तो कह रहा हूं कि उसे बुला लो, छोड़ो यह पढ़ाई-लिखाई का चक्कर।"
"नहीं- वह वकालत पास करने के बाद ही आएगा।" सरिता वे स्वर में दृढ़ता थी ।
"मेरी बात न मानने का नतीजा जानती हो ?" एकाएक ही जोशी का स्वर कठोर हो गया।
सरिता घबरा सी गई। बोली "तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते श्याम - मैं..।"
"एक बातें समझ लो - अगर मेरी जुबान खुल गई तो तुम्हारा बेड़ा गर्क हो जाएगा।"
सरिता का चेहरा सफेद पड़ गया। अटकते स्वर में वह बोली- "अगर जुबान खुली तो बचोगे तुम भी नहीं।"
"मेरी चिन्ता मत करो - मेरी पहुंच कहां तक है, इसे तुम जैसी औरत नहीं समझ सकती ।”
"समझने की कोशिश करो श्याम, दयाल की दो मिलों में से एक को सतीश ही संभालेगा- इसके लिए उसके। वकालत पास करना जरूरी है- हां, तुम कहो तो वह काम मैं कल से ही शुरू कर देती हूं।”
"क्या मतलब ?".
"दयाल शुरू से ही बड़ा आदमी है और आज तो वह शहर की बहुत बड़ी हस्ती है - वह आसानी से नहीं मानेगा - जब तक सतीश की परीक्षाएं नहीं हो जातीं, तब तक मैं दयाल को समझाने-मनाने की कोशिश करती रहूंगी।"
"तुम्हें उसे मनाना ही होगा सरिता और वह मानेगा-अगर नहीं माना तो हम उसकी इतनी फजीहत कर देंगे कि वह किसी को मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रहेगा- बहुत इन्तजार कर लिया - अब और नहीं होता- सतीश को उसके हक मिलने ही चाहिए, तभी हमारा कुछ भला होगा।'
"मिलेगा श्याम जरूर मिलेगा - लेकिन ईश्वर के लिए सतीश को परीक्षाएं दे लेने दो इस बीच में दयाल से मिलती रहूंगी - विश्वास रखो, हम अपने मिशन में. अवश्य ही कामयाब होंगे - लेकिन जल्दबाजी में काम बिगड़ भी सकता है।"
"मैं जल्दी से जल्दी इस नाईट क्लब का इकलौता मालिक बन जाना चाहता हूं और इसके लिए मुझे पैतालीस लाख की जरूरत है।"
"इस कल्ब का पार्टनर बनने के लिए भी तो तुम्हें रुपया मैंने ही दिया था।"
"हम दोनों के बीच एहसान नहीं किया था मुझ पर एक सौदा हुआ था- वह उसी की कीमत थी।"
"मानती हूं कि सौदा हुआ था - इस बार मैं तुम्हें पचास लाख भी दूंगी - लेकिन जैसा मैं कहती हूं वैसा ही करो।”
"ठीक है- कर लूंगा इन्तजार - लेकिन इन्तजार इतना लम्बा नहीं होना चाहिए कि मेरी सहनशक्ति ही जवाब दे जाए।"
"अब खुश हो ?"
"बिल्कुल।" श्यामनाथ जोशी ने उसे अपनी गोद में खींच लिया- "तुम्हारा बदन अभी भी लाजवाब है डार्लिंग।"
और फिर कमरे में वासन। का घिनौना खेल शुरू हो गया ।
"तुम तो शरीर को तोड़कर रख देते हो।" सरिता ने दूसरा पैग बनाते हुए बोला "इसलिए अच्छे भी लगते हो । इस उम्र में भी तुम्हारे पास वह सब कुछ है, जिसकी दीवानी एक औरत होती है।"
"छोड़ो इन बातों को- अब कुछ काम की बातें हो जानी चाहिए।" सिगरेट सुलगाकर जोशी ने कहा ।
"कहो- क्या बातें करना चाहते हो ?"
"सतीश कब आ रहा है.?"
"वो महीने में दो-तीन बार तो आता ही है।"
"मैं पूछ रहा हूं कि वह हमेशा के लिए कब आ रहा है ?"
"अभी सात-आठ महीने बाकी हैं।"
"क्या सोचा है उसके बारे में तुमने ?"
"मैं समझी नहीं।" तनिक चौककर उलझनपूर्ण लहजे में
उसने पूछा- 'क्या सोचना चाहिए मुझे ?"
"मेरा इशारा सेठ दीनदयाल की तरफ है।"
"ओह ! अब समझी।” सरिता मुस्कराई "गिलास उठायो।"
"पहले मेरी बात का जवाब दो।"
"सतीश वकालत पास कर ले, उस बाबत तब सोचेंगे।"
"अब मैं और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकता ।"
"तो क्या उसकी पढ़ाई छुड़वा दूं।"
"क्या करेगा इतना पढ कर- अब तो वह करोड़पति बनने जा रहा है।"
"उम्मीद है हमें, अभी बन नहीं गया और फिर जरूरी नहीं कि दयाल उसे अपना बेटा मान ही ले।"
"उसका बाप भी मानेगा।" आवेश में आ गया जोशी- "जब तुम कोशिश करोगी तो।"
"मैं पूरी कोशिश करूंगी श्याम - सतीश को उसके अधिकार दिलाने के लिए मैं जमीन-आसमान एक कर दूंगी।"
"तभी तो कह रहा हूं कि उसे बुला लो, छोड़ो यह पढ़ाई-लिखाई का चक्कर।"
"नहीं- वह वकालत पास करने के बाद ही आएगा।" सरिता वे स्वर में दृढ़ता थी ।
"मेरी बात न मानने का नतीजा जानती हो ?" एकाएक ही जोशी का स्वर कठोर हो गया।
सरिता घबरा सी गई। बोली "तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते श्याम - मैं..।"
"एक बातें समझ लो - अगर मेरी जुबान खुल गई तो तुम्हारा बेड़ा गर्क हो जाएगा।"
सरिता का चेहरा सफेद पड़ गया। अटकते स्वर में वह बोली- "अगर जुबान खुली तो बचोगे तुम भी नहीं।"
"मेरी चिन्ता मत करो - मेरी पहुंच कहां तक है, इसे तुम जैसी औरत नहीं समझ सकती ।”
"समझने की कोशिश करो श्याम, दयाल की दो मिलों में से एक को सतीश ही संभालेगा- इसके लिए उसके। वकालत पास करना जरूरी है- हां, तुम कहो तो वह काम मैं कल से ही शुरू कर देती हूं।”
"क्या मतलब ?".
"दयाल शुरू से ही बड़ा आदमी है और आज तो वह शहर की बहुत बड़ी हस्ती है - वह आसानी से नहीं मानेगा - जब तक सतीश की परीक्षाएं नहीं हो जातीं, तब तक मैं दयाल को समझाने-मनाने की कोशिश करती रहूंगी।"
"तुम्हें उसे मनाना ही होगा सरिता और वह मानेगा-अगर नहीं माना तो हम उसकी इतनी फजीहत कर देंगे कि वह किसी को मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रहेगा- बहुत इन्तजार कर लिया - अब और नहीं होता- सतीश को उसके हक मिलने ही चाहिए, तभी हमारा कुछ भला होगा।'
"मिलेगा श्याम जरूर मिलेगा - लेकिन ईश्वर के लिए सतीश को परीक्षाएं दे लेने दो इस बीच में दयाल से मिलती रहूंगी - विश्वास रखो, हम अपने मिशन में. अवश्य ही कामयाब होंगे - लेकिन जल्दबाजी में काम बिगड़ भी सकता है।"
"मैं जल्दी से जल्दी इस नाईट क्लब का इकलौता मालिक बन जाना चाहता हूं और इसके लिए मुझे पैतालीस लाख की जरूरत है।"
"इस कल्ब का पार्टनर बनने के लिए भी तो तुम्हें रुपया मैंने ही दिया था।"
"हम दोनों के बीच एहसान नहीं किया था मुझ पर एक सौदा हुआ था- वह उसी की कीमत थी।"
"मानती हूं कि सौदा हुआ था - इस बार मैं तुम्हें पचास लाख भी दूंगी - लेकिन जैसा मैं कहती हूं वैसा ही करो।”
"ठीक है- कर लूंगा इन्तजार - लेकिन इन्तजार इतना लम्बा नहीं होना चाहिए कि मेरी सहनशक्ति ही जवाब दे जाए।"
कौन है यह सरिता ?
सेठ दीनदयाल से उसका क्या सम्बन्ध है ?
यह श्यामनाथ जोशी कौन है और सरिता से इसका क्या सम्बन्ध है ? क्या सतीश सबमूच दीनदयाल का बेटा है या सरिता और जोशी कोई साजिश रख रहे हैं ?
क्या सेठ दीनदयाल उनकी साजिश में फंस सके ?
आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसके कारण सरिता श्यामनाथ से नफरत करते हुए भी उसकी हर बात मानने को मजबूर है?
वास्तव में सतीश किसका बेटा है?
क्या सुन्दर और सतीश कभी जान सके कि उनकी मां का चरित्र कैसा है?
और ऐसे ही ढेरों सवाल यह झलक पढ़कर आप मस्तिष्क में कौंधने लगे होंगे । यदि इन सभी सवालों के जवाब आप विस्तार से जानना चाहते हैं तो 'पवन पाकेट बुक्स' के अगले सैट में प्रकाशित होने वाला 'पवन' का थ्रिल, हॉरर, सस्पेंस और भावनाओं से लबरेज सोशल काईम पर लिखा उपन्यास 'एक गुनाह और सही' अवश्य पढ़ें !

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