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गुरुवार, 16 जून 2022

एक शीर्षक- अनेक लेखक

 'एक शीर्षक- अनेक लेखक' स्तम्भ के अंतर्गत हम कुछ ऐसे शीर्षकों से आपका परिचय करवा रहे हैं, जहाँ एक ही शीर्षक से भिन्न- भिन्न लेखकों ने उपन्यास लेखन किया है। 
   यहाँ मात्र उपन्यास शीर्षक की ही सामानता दर्शायी गयी है उपन्यासों में कहानी अलग-अलग है।


एक शीर्षक- अनेक लेखक
  1. कानखजूरा-   विमल शर्मा, दिनेश ठाकुर
  2. रक्त मंदिर -    कुशवाहा कांत, राज भारती
  3. चाण्डाल चौकड़ी - प्रकाश भारती, सुरेन्द्र मोहन पाठक, नागपाल
  4. मायाजाल - राज भारती, अनिल मोहन
  5. सीक्रेट एजेंट-  सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, राहुल
  6. प्रेत सुंदरी-     परशुराम शर्मा, रजत राजवंशी
  7. बगावत -   गोविन्द सिंह, जयंत कुशवाहा
  8. कागज के फूल- गोविन्द सिंह,  राजहंस
  9. कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना- लाट साहब, अनिल मोहन
  10. जजमैंट - वेदप्रकाश शर्मा, अनिल सलूजा
  11. चकमा - वेदप्रकाश शर्मा, केशव पण्डित
  12. खतरनाक आदमी - गुप्तदूत, अनिल मोहन, अमित खान
  13. मुँह तोड़ जवाब-  केशव पण्डित, बादल (पवन पॉकेट बुक्स)
  14. देखो और मार दो- राजभारती, प्रेम कुमार शर्मा
  15. चोट पर चोट-  रीमा भारती, बिमल चटर्जी
  16. आदमखोर- परशुराम शर्मा, राहुल, अनिल सलूजा, जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
  17. चोरों की बारात- सुरेन्द्र मोहन पाठक, परशुराम शर्मा
  18. जीरोलैण्ड- परशुराम शर्मा, रीमा भारती
  19. जादूगरनी - जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक
  20. विश्वास की हत्या- राजहंस, सुरेन्द्र मोहन पाठक
  21. नागिन -  दिनेश ठाकुर, शैलेन्द्र तिवारी
  22. आहुति - प्रेम बाजपेयी, कुशवाहा कांत
  23. फिरंगी -  वेदप्रकाश शर्मा, रीमा भारती
  24. प्रतिशोध- जगदीशकृष्ण जोशी, सुरेश चौधरी
  25. सुनामी -  राकेश पाठक, मिस्टर
  26. सब मरेंगे बारी- बारी- बिमल चटर्जी, रजत राजवंशी
  27. दरिंदा- वेदप्रकाश शर्मा, राजभारती, राजहंस, शिवा पण्डित, अनिल मोहन, परशुराम शर्मा, विक्की आनंद, दिनेश ठाकुर
  28. सुअर का बाल- विनय प्रभाकर, शिवा पण्डित
  29. कर बुरा हो भला- अनिल सलूजा, शिवा पण्डित
  30. खलिफा- वेदप्रकाश शर्मा, शिवा पण्डित
  31. कत्ल की मशीन- राकेश पाठक, शिवा पण्डित
  32. राक्षस- नितिश सिन्हा, शिवा पण्डित
  33. उसके साजन- कुशवाहा कांत, राजहंस
  34. शतरंज-  दिनेश ठाकुर, शगुन शर्मा
  35. जल्लाद- अनिल मोहन, दिनेश ठाकुर(धीरज पॉकेट बुक्स)
  36. प्यासा सावन- गुलशन नंदा, राजहंस



मंगलवार, 9 जून 2020

सुमन पॉकेट बुक्स

सुमन पॉकेट बुक्स के प्रथम सेट का परिचय

  इसका प्रकाशन कब हुआ यह तो खैर पता नहीं, पर कुशवाहा कांत के उपन्यास 'हमारी गलियां' के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशन सेट की जानकारी उपलब्ध थी जो यहाँ प्रस्तुत है।
  एक जगह प्यारे लाल 'आवारा' का नाम अवश्य मिलता है, शायद वे इस प्रकाशन के संपादन रहे हैं।

प्रकाशक
सुमन पॉकेट बुक्स
दरिबा कलां- दिल्ली-6

प्रथम सेट में प्रकाशित उपन्यास
1. हमारी गलियां-         कुशवाहा कांत
2. अंधेरा और गुनाह-    आदिल रशीद
3. रेत के महल-           प्यारे लाल 'आवारा'
4. लाशों के व्यापारी-    ओमप्रकाश शर्मा
5. अधूरी प्यास-           दत्त भारती
6. कठपुतली-             साधना 'प्रतापी'
7. स्त्री, पुरुष और सैक्स-  आनंद


 



मंगलवार, 27 नवंबर 2018

राम-रहीम

कहानी राम रहीम की
कौन थे राम- रहीम?

जोड़ी 'राम-रहीम' की। उपन्यासकार जगत में कुछ लेखक द्वय संयुक्त रूप से भी उपन्यास लेखन करते रहे हैं। यह प्रयोग सफल भी रहा है। एक समय था जब 'धरम-राकेश' नामक लेखक की जोड़ी खूब चर्चित रही थी। ऐसा एक और नाम भी है,वह है 'राम-रहीम'। राम-रहीम की जोड़ी में राम नामक लेखक थे 'परशुराम शर्मा' और रहीम बने थे 'फारूख अर्गली'। यह जोड़ी भी काफी चर्चित रही। (यह जानकारी परशुराम शर्मा जी ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर की)

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

किस्सा ओमप्रकाश का

#नकली_उपन्यास_लेखन_कैसे?
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प्रिय पाठकों, लिटरेचर लाइफ गु्रप पर 12 नवम्बर, सन् 2018 ई. को दो मित्रजनों की पोस्टें पढ़ीं। उस पोस्ट पर उन्होंने ओम प्रकाश शर्मा (जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा पर भ्रामक टिप्पणियां कर, जासूसी उपन्यास जगत के 40-50 की वय के पाठकों को भ्रामक जानकारियां देकर दिवंगत लेखक पर आक्षेप लगाए। मैं उन्हें पूरी तरह नकारते हुए जानकारियां दुरुस्त कराने का प्रयास कर रहा हूं। ओम प्रकाश शर्मा (बाद में जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा) और वेद प्रकाश काम्बोज का मैं सन् 1958 ई. से पाठक रहा हूं। हो सकता कुछ महीने पूर्व से उनका लेखन पाठकों के बीच आ गया हो। ये लेखक द्वय, मासिक पत्रिकाओं में लिखा करते थे। (नाॅवल) लेखन की शर्त मासिक पत्रिका प्रकाशक की हर माह नाॅवल देने की होती थी। 112 पेजेज और 27 लाइनों में नाॅवल होते थे, (मूल्य 75 पैसे।) अतः सरलता से हफ्ता-दस में लिखे जा सकते थे।
ओम प्रकाश शर्मा के 450 के आसपास उपन्यास, और 900 के आसपास नकली उपन्यासों को मिलाकर संख्या बतायी गयी है। पाठक द्वय द्वारा। प्रश्न उठाया कि 450 उपन्यास कैसे लिखे जा सकते हैं? आक्षेपित किया कि ओम प्रकाश ने नकली उपन्यास ओम प्रकाश शर्मा के नाम से लिखे-लिखाए।
इस संदर्भ में जानकारी देता हूं कि मेरे सन् 1968-70 के बीच दिल्ली प्रवास के बीच, एक ऐसी घटना घटी जिसने जासूसी उपन्यासकारों के नाम पर भूचाल ला दिया, जो सन् 2000 तथा बाद तक अपना पूरे असर में रहा; जब तक कि जासूसी उपन्यासों की सेल, ढलान पर न आ गयी। हुआ यूं कि उक्त अवधि 1968-70 के बीच, कूचा चेलान, दरियागंज, दिल्ली-6, निवासी एक ओम प्रकाश शर्मा नामधारी सज्जन जो लिखने का शौक रखते थे, उनसे एक प्रकाशक ने, कानूनी सलाह लेकर राजेश, जयन्त, जगत, तारा आदि पात्रों सहित जासूसी उपन्यास लिखाया। ओम प्रकाश शर्मा के नाम से छपा। बेचा।
नोट-उस समय तक पिछले दस वर्षों से लिखते आ रहे ओम प्रकाश शर्मा के दस वर्षों में प्रतिमाह नावल, 10×12=120 मार्केट में आ चुके थे। पाठक उनकी शैली पहचानते थे। बाद में आये ओम प्रकाश शर्मा की शैली में अंतर पकड़कर शिकायतें लिखकर भेजी गयीं। पूर्व के ओम प्रकाश शर्मा ने प्रकाशक का साथ पाकर बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा पर मुकदमा किया। अदालती पेशियां पड़ीं। बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा मुकदमा चलने के दौरान कई उपन्यास मार्केट में उतार चुके थे। (नोट-मैं उन्हें नकली ओम प्रकाश शर्मा न लिखूंगा, क्योंकि अदालत में नहीं माना) बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा के वकील ने अदालत में साबित कर दिया कि उनके मुवक्किल का नाम ओम प्रकाश शर्मा हैं। उन्हें अपने नाम से लिखने-छपने का मौलिक अधिकार है। अदालत ने यह दलील स्वीकार की। पूर्व वाले ओम प्रकाश शर्मा ने उपन्यास के पात्रों को लेकर विरोध रखा, बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा के वकील ने अदालत को दलील देते हुए कहा कि राम, सीता, गीता, राजेश, जयन्त, तारा नाम देश के हजारों लोगों के हो सकते हैं, चूंकि पात्र समाज के नामों से ही उठाए जाते हैं, अतः इस अधिकार को भी नहीं छीना जा सकता।
बहरहाल बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा ने मुकदमा जीता। अदालत ने अपनी सलाह दी कि नाम के साथ कुछ और आगे-पीछे लगाकर नाम की भ्रामक स्थिति को लेखक स्वयं साफ करें। पूर्व वाले ओम प्रकाश शर्मा ने अपने लिए ‘जनप्रिय लेखक’ नाम रजिस्टर्ड कराया। जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के नाम से नावल, फोटोयुक्त आने लगे।
तो दोस्तों, इस तरह आगे, ओम प्रकाश शर्मा नाम के साथ नाॅवलों के छपने का सिलसिला शुरू हुआ तो महीने में दिल्ली-मेरठ से 50-60 उपन्यास आने लगे। जिनकी संख्या समीक्षक द्वय ने 900 लिखी वे कई हजार में है जिन्हीं अब नकली कहने में परहेज नहीं।
जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के 450 उपन्यास पर सवाल उठाने वालों को ध्यान में लाना आवश्यक है कि पूर्व में 120 उपन्यास की बात 10 वर्षों में मैंने लिखी, अगले 30 वर्षों को और जोड़ लीजिए 68 से 98 जबकि उपन्यास लेखन-पाठन का स्वर्णिम काल था तो 30×12=360़120=480 उपन्यास बनते हैं। कुछ अपवाद स्वरूप समय में न लिखा तो तीस की संख्या घटकर 450 रह जाती है। जो अक्षरशः सही है। जनप्रिय ओम प्रकाश ने कभी नकली नाॅवल नहीं लिखा। उन्हें जब एक उपन्यास के प्रथम एडिसन की रायल्टी दस हजार रुपये मिलते थे तब नकली ओम प्रकाश शर्मा पाण्डुलिपि लिखने वाले लेखक, 60-100 रुपये के बीच पारश्रमिक पाते थे। सहज में समझ में आने वाली बात है कि 10,000 रुपये एक प्रिण्ट के लेने वाला लेखक 60-100 रुपये में नाॅवल नकली क्यों लिखेगा? एक बालक बुद्धि की भी समझ में यह बात नहीं आने वाली।
ओम प्रकाश शर्मा नाम के जाली उपन्यासों की संख्या 900 में नहीं 9,000 से ऊपर हो सकती है।
जनप्रिय ओम प्रकाश के साथ मैंने वेद प्रकाश काम्बोज के नाम को भी खास मकसद से लिखा है। सन् 1974-75 में वेद प्रकाश शर्मा जी जब लेखन क्षेत्र में आये तो अदालती फैसले को निगाह में रखते हुए वेद प्रकाश काम्बोज के पात्रों विजय-रघुनाथ को लेकर लेखन की शुरूआत की। उन्होंने मेहनत की कामयाबी के झण्डे गाड़े। पर न भूलना चाहिए कि शुरूआती दिनों में वेद प्रकाश काम्बोज और विजय-रघुनाथ सीरीज के नाम की गुडविल शामिल थी।

-आबिद रिजवी
8218846970
दिनांक-13 नवम्बर, 2018

शनिवार, 9 जून 2018

सुरेन्द्र मोहन पाठक की एक स्क्रिप्ट

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के उपन्यास 'ओवरडाॅज' की हस्तलिखित स्क्रिप्ट।
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     आज के समय के प्रसिद्ध मर्डर मिस्ट्री लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के  एक उपन्यास 'ओवरडाॅज' की हम पाण्डुलिपि यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।
      ओवरडाॅज उपन्यास की मूल स्क्रिप्ट के कुछ पृष्ठ यहाँ प्रकाश्य हैं ताकी पाठक देख सके की एक लेखक कितनी मेहनत से एक उपन्यास तैयार करता है।
पाठक साहब तो स्वयं एक -एक बिंदु पर बहुत मेहनत करते थे, यह उनकी स्क्रिप्ट देख कर जाना जा सकता है।
    अपने उपन्यास का टाइटल डिजाइन तक भी स्वयं तैयार करते थे।
       रवि पॉकेट बुक्स के मालिक मनेष जैन जी ने पाठक जी की‌ मेहनत की बहुत सराहना की है।
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उपन्यास- ओवरडाॅज
लेखक-   ‌‌सुरेन्द्र मोहन पाठक


धन्यवाद- मनेष जैन जी (रवि पॉकेट बुक्स)







अनिल मोहन जी की एक स्क्रिप्ट

अनिल मोहन जी के उपन्यास की स्क्रिप्ट।
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             अनिल मोहन जी के उपन्यास की स्क्रिप्ट।
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      पाठक के मन में एक जिज्ञासा होती है की लेखक कैसे लिखता है। क्या वह कम्प्यूटर पर टाइप करता है या कागज पर लिखता है।
            पाण्डुलिपि वह हस्तलिखित/टाइप की गयी प्रथम कृति होती है जो मूलत: लेखक तैयार करता है और उसी पाण्डुलिपि को फिर प्रकाशक अच्छी तरह से टाइप कर एक किताब की शक्ल प्रदान करता है।
            हम अपने पाठकों के लिए लेकर आये हैं अनिल मोहन जी के उपन्यास 'नफरत की दीवार' की पाण्डुलिपि। जो की अनिल मोहन के स्वयं द्वारा कागज पर लिखी गयी है।
  - इसमें आप देख सकते हैं एक लेखक कैसे लिखता है।
  -  फिर प्रकाशक उसे कैसे किताब का रूप देता है।

उपन्यास- नफरत की दीवार
लेखक-    ‌अनिल‌ मोहन

             




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