मैं गुनहगार हूँ- मोहन मौर्य
उपन्यास अंश
सुबह के या फिर देखा जाए तो रात के 4 बज रहे थे। यह वह वक़्त होता है, जब लोग अपने-अपने बिस्तरों में चैन की नींद सोये हुए रहते हैं। रात की शिफ्ट में काम करने वाले लोग, खासतौर पर सरकारी विभाग के अधिकारी वर्ग भी इस समय सोने से नहीं बच पाते। यह वह वक़्त भी होता है जब लैला-मजनू बनकर देर रात तक एक-दूसरे से चैट करने नौजवान लोग या सोशल मीडिया पर नौजवान बनकर रहने वाले रसिक वृद्ध लोग भी अपनी चैट से थक-हारकर सो जाते हैं। आखिर उन्हें सुबह उठकर अपना-अपना काम भी करना होता है।

