साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है धीरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लोकप्रिय उपन्यासकार रीमा भारती जी के उपन्यास 'नर्क की छाया' का एक अंश-
नर्क की छाया - रीमा भारती
रीमा भारती अपने फ्लैट के बेडरूम में आराम कर आइने के सामने बैठी अपने मेकअप को अंतिम टच दे रही थी।
आजकल रीमा भारती एकदम फ्री थी।
और जब वह फ्री होती थी, उसके डिपार्टमेंट ने उसे कोई खतरनाक मिशन नहीं सौंपा होता था, तो वह मनोरंजन के मूड में होती थी। अपनी व्यस्त जिन्दगी से चन्द लम्हें चुराकर क्लब, पार्टियों और अपने दोस्तों के साथ घूमती थी। उसका रोज का यही शगल होता था।
और आजकल वह यही कर रही थी।
रीमा भारती मेकअप करके उठ खड़ी हुई और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई।
इस वक्त वह अपने पसंदीदा लिबास में थी।
उसने आसमानी रंग की साड़ी और उसी से मैच करता हुआ ब्लाउज पहना हुआ था। अपने बॉबकट बालों को पीछे ले जाकर आसमानी रंग के स्कार्फ से बांधा हुआ था। कानों में सोने के टॉप्स चमक रहे थे। इस लिबास में वह आसमान से उतरी अप्सरा लग रही थी।
रीमा भारती !
आई०एस०सी० अर्थात् भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था इण्डियन सीक्रेट कोर की नम्बर वन एजेन्ट । दीस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत, जो अपने जिस्म पर दो नहीं, बल्कि हजारों आंखें रखती है और एक जासूस होने के नाते मामूली-सी घटना पर संदेह करना उसका पेशा था। मां भारती की शरारती, उद्दण्ड किन्तु लाडली बेटी। वो बला, जिससे मौत भी पनाह मांगे।
रीमा भारती ने ड्राइंगरूम में पहुंचकर मेज पर रखा अपना वेनिटी बैग उठाया।
उसी पल !
फोन की घण्टी बज उठी।
रीमा भारती ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
"हेलो।"
"रीमा!"
दूसरी तरफ प्रेम प्यारे परदेसी था। रीमा भारती का दोस्त । रीमा भारती ने उसकी आवाज तुरन्त पहचान ली थी।
"बोलो, प्यारे।"
"आजकल क्या कर रही हो?"
"एकदम खाली हूं।"
"ऐसा लगता है कि आजकल तुम्हारे डिपार्टमेंट के पास तुम्हारे लिये कोई खतरनाक काम नहीं है।"
"फिलहाल तो कोई खतरनाक काम नहीं है, लेकिन काम आने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगेगा। न जाने कब चीफ का बुलावा आ जाये और मुझे मिशन पर रवाना होना पड़े।"
"वो तो मैं जानता हूं।"
"तुमने मुझे फोन किसलिये किया है?"
"इस वक्त बिजी हो क्या?"
"बिजी तो नहीं हूं।" रीमा भारती ने जवाब दिया- "क्लब जाने का मूड है, अगर एक मिनट बाद तुम्हारा फोन आया होता तो में क्लब के लिये रवाना हो चुकी होती।"
"क्लब का प्रोग्राम रद्द करो और मेरे रेस्टोरेन्ट में आ जाओ।"
"कोई खास बात है क्या?"
"खास बात तो कोई नहीं है। काफी दिनों से तुमसे मुलाकात नहीं हुई है। तुम्हारे साथ दो-दो जाम हो जायेंगे। इस बहाने तुमसे मुलाकात भी हो जायेगी और तुम्हारा मनोरंजन भी हो जायेगा।"
"पहुंचती हूं।"
"कितना वक्त लगेगा?"
"अभी निकल पडूंगी।"
"मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा।"
"ओ०के०।"
दूसरी तरफ से सम्बन्ध विच्छेद हो गया।
रीमा भारती ने रिसीवर वापस रखा और दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिये।
दो मिनट बाद वह अपनी कार में सवार होकर प्रेम प्यारे परदेसी के रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी जा रही थी।
प्यारे ने फोन पर उससे मिलने की रिक्वेस्ट की थी। भला दोस्त बुलाये और वह न जाये। ऐसा कैसे हो सकता है? प्यारे रीमा भारती का एक खास दोस्त था।
प्रेम प्यारे परदेसी !
वह भारत से भागा एक मुजरिम था और न जाने किस तरह भटकता हुआ डेथ लैण्ड पहुंच गया था। बाद में रीमा भारती उसे भारत ले आई, जहां उसने शराफत का धन्धा करने में उसकी मदद की। उसने मुम्बई के खार इलाके में प्रेम प्यारे परदेसी का एक रेस्टोरेन्ट खुलवा दिया था।
हालांकि आज प्रेम प्यारे परदेसी जुर्म से कोसों दूर था। किन्तु वो कहावत है ना कि चोर चोरी से जाये, मगर हेरा-फेरी से न जाये। अतः जुर्म से दूर रहने के बावजूद उसने चन्द दिनों में ही मुम्बई अण्डरवर्ल्ड में अपनी अच्छी-खासी घुसपैठ बना ली थी।
आज की तारीख में उसकी शातिर मुजरिमों से अच्छी-खासी यारी थी।
परन्तु !
रीमा भारती को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि इससे उसे कभी-कभी फायदा ही पहुंचता था। प्यारे की अण्डरवर्ल्ड से हासिल जानकारियां यदा-कदा उसके लिये काम की साबित होती थीं।
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन के भाव थे।
वह जानती थी कि प्यारे उसे अकारण कभी नहीं बुला सकता । हालांकि उसने उसे फोन पर कुछ नहीं बताया था।
परन्तु !
उसे समझते देर नहीं लगी कि उसके इस बुलावे की कोई खास वजह अवश्य होगी। रीमा भारती ने अपना दिमाग खपाना उचित नहीं समझा था। वह जानती थी कि जो कुछ भी होगा, जल्दी ही उसके सामने आ जायेगा।
अतः रीमा भारती ने अपना क्लब का प्रोग्राम रद्द कर दिया था।
तकरीबन चालीस मिनट बाद रीमा भारती ने अपनी कार प्यारे रेस्टोरेन्ट के सामने पार्क की और नीचे उतर गई।(पृष्ठ-7)
वह चौंकी।
वजह!
प्यारे के रेस्टोरेन्ट के सामने एक शानदार चमचमाती हुई मर्सडीज पहले से ही खड़ी हुई थी। उसका चौंकना स्वाभाविक ही धा, क्योंकि मर्सडीज का वहां होना उसके लिये कम दिलचस्पी की बात नहीं थी। उसका रेस्टोरेन्ट इतना शानदार नहीं था कि जिसमें किसी ऐसे शख्स की दिलचस्पी हो जो मर्सडीज रखता हो।
रीमा भारती प्यारे के रेस्टोरेन्ट में दाखिल हुई।
भीतर दाखिल होते ही उसकी सतर्क निगाहें चहुंओर घूम गईं, परन्तु वहां उसे ऐसा कोई शख्स नजर नहीं आया था, जो मर्सडीज रखता हो। वैसे इस वक्त रेस्टोरेन्ट में ज्यादा भीड़ नहीं थी। इक्का-दुक्का ग्राहक ही टेबल के पीछे नजर आ रहा था।
रेस्टोरेन्ट के काउण्टर के पीछे से प्यारे नदारद था। उसकी जगह अधेड़ उम्र वाला खांडेकर मौजूद था।
परन्तु वह भी रीमा भारती से अच्छी तरह से परिचित था।
रीमा भारती काउण्टर पर पहुंची।
"गुड इवनिंग मैडम!" खांडेकर ने मुस्कुराकर रीमा भारती का अभिवादन किया।
"कैसे हो खांडेकर?" रीमा भारती उसके अभिवादन का जवाब देकर बोली।
"आपकी मेहरबानी है मैडम!" वह बोला- "आज तो काफी दिनों बाद आपने इस तरफ का रुख किया है।"
"तुम तो जानते हो खांडेकर कि मुझे तो सांस लेने की फुरसत तक नहीं मिलती। गनीमत समझो कि आज इस तरफ निकल आई, क्योंकि आजकल मेरे हाथ में कोई काम नहीं है।"
खांडेकर मुस्कुराकर रह गया।
"तुम्हारे मालिक कहां हैं?"
रीमा भारती का मालिक से मतलब प्रेम प्यारे परदेसी से था। "मालिक अपने केविन में हैं।" उसने जवाब दिया- "वे आप ही का इन्तजार कर रहे हैं।"
रीमा भारती ने आगे कोई सबाल नहीं किया। वह काउण्टर की बगल से गुजरती हुई प्यारे के केबिन की तरफ बढ़ गई।
अगले मिनट वह प्यारे के केबिन के सामने थी। केबिन का दरवाजा बन्द था। उसने दरवाजा धकेलकर भीतर कदम रखा। उस वक्त प्यारे वहां अकेला नहीं था। उसके सामने कुर्सी पर एक भारी-भरकम जिस्म वाला व्यक्ति बैठा हुआ था। उसके जिस्म पर बादामी रंग का शानदार सूट था। सिर के बाल आधे से अधिक उड़े हुए थे। उसके हाथों की उंगलियों में विभिन्न कीमती पत्थरों की अंगूठियां फंसी हुई थीं। वह देखने से ही धनी व्यक्ति लगता था।
"आओ रीमा !” रीमा भारती को देखते ही प्यारे चहका- "मैं काफी देर से तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था।"
"इन्तजार क्यों कर रहे थे? मुझे आने में इतना वक्त तो लगना ही था। तुम्हारा फोन सुनते ही तुम्हारे रेस्टोरेन्ट की तरफ चल पड़ी थी।"
प्यारे खामोश हो गया।
उसकी निगाहें रीमा भारती पर सरसराती चली गई। उसे उस लिबास में देखकर ऐसा लगता था जैसे वह जासूस न होकर एक कुशल गृहिणी हो, अगर और कोई वक्त होता तो प्यारे जरूर चुटकी ले लेता।
"आओ बैठो।" वह बोला।
रीमा भारती उस अधेड़ की बगल में पड़ी खाली कुर्सी सम्भालती हुई बोली- "कैसे हो प्यारे?"
"ठीक हूं रीमा।"
"आज मेरी याद कैसे आ गई?"
"मैं तो तुम्हें याद कर ही लेता हूं, लेकिन तुम्हें ही मेरी याद नहीं आती। आज तुमसे मिलने का मन किया तो मैंने तुम्हें फोन कर दिया।"
"तुमने फोन किया और मैं हाजिर हो गई। वैसे तुम बेवजह तो फोन करने वाले नहीं हो। तुम मुझे उस वक्त फोन करते हो जब कोई खास बात होती है। सब खैरियत तो है।"
"घबराओ मत। सब खैरियत है।" वह पहलू बदलता हुआ बोला ।
रीमा भारती मुस्कुराई ।
"अब मुझे ये बताने की जरूरत नहीं होगी कि यही आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेन्ट रीमा भारती हैं।" वह अधेड़ की तरफ देखता हुआ बोला- "कुछ देर पहले मैं इन्हीं के बारे में बता रहा था।"
"आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई मिस रीमा।" अधेड़ बोला- "मेरा नाम रामजीलाल महापात्रे है। मुम्बई के चैम्बूर इलाके में रहता हूं। मेरा क्लॉथ का बहुत बड़ा बिजनेस है।"
"ये गलत कह रहे हैं मिस रीमा।" एकाएक प्यारे बीच में ही बोल पड़ा- "अगर मिस्टर महापात्रे को मुम्बई शहर के क्लाॅथ बिजनेस का किंग कहा जाये तो कम नहीं होगा। एक महीने में करोड़ों का टर्नओवर है इनका ।"
"हैलो।" रीमा भारती ने कहा।
अब रीमा भारती ने सहजता से अनुमान लगा लिया था कि रेस्टोरेन्ट के बाहर खड़ी मर्सडीज महापात्रे की ही है।
"ये तुम्हारा ही इन्तजार कर रहे थे रीमा।" प्यारे बोला।
"मेरा इन्तजार कर रहे थे।" रीमा भारती बोली।
"हां"
"क्यों?"
"एक काम में मिस्टर महापात्रे को तुम्हारी जरूरत पड़ गई है। इसलिये ये दौड़ते हुए मेरे पास चले आये। इन्होंने मुझे अपनी प्रॉब्लम बताई तो मुझे मजबूर होकर तुम्हें फोन करना पड़ा।"
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन और आश्चर्य के गहरे भाव उभरे। वह प्यारे को गौर से देखती हुई बोली "ल... लेकिन मिस्टर महापात्रे को मेरे बारे में किसने बताया ?"
"मैंने बताया।"
"यानि तुम पहले से ही मिस्टर महापात्रे की जानते हो!"
"हां।" वह बोला- "आज से तकरीबन एक महीने पहले मेरी मुलाकात महापात्रे साहव से अल्का बार में हुई थी। ये अकेले थे और मैं भी। दोंनों एक ही टेबल पर मौजूद थे। क्योंकि बार की सभी टेबलें भरी हुई थीं। बातों के सिलसिले के बीच में हमारा आपस में परिचय हो गया था।"
रीमा भारती मुस्कुराई।
"तुम मुस्कुरा क्यों रही हो?"
"तुम्हारी बात पर मुस्कुराना आ गया।"
"ए... ऐसा मैंने क्या कह दिया?"
"जब दो अपरिचित आमने-सामने बैठकर पी रहे हों तो उनके बीच दोस्ती बहुत जल्दी हो जाती है। इसमें तुम लोगों का कसूर नहीं है।"
प्यारे जी खोलकर हंसा।
रामजीलाल महापात्रे के होठों पर भी मुस्कान नाचकर रह गई।
"और पीने के दौरान तुमने मिस्टर महापात्रे के सामने मेरा जिक्र कर दिया होगा कि तुम्हारी एक दोस्त रीमा भारती है, जो आई०एस०सी० की सबसे काबिल एजेन्ट है। तुमने मेरी काबलियत के कसीदे पढ़ दिये होंगे और अन्त में कह दिया होगा कि अगर किसी काम में मेरी जरूरत पड़े तो तुम महापात्रे साहब का काम करा दोगे।" रीमा भारती पुनः बोल उठी।
"राइट।"
"कसूर तुम्हारा नहीं है प्यारे। कसूर उस शराब का है, जो उस चक्त तुम्हारे हलक से नीचे उतर चुकी होगी। उस वक्त ही इन्सान को ऐसी बातें सूझती हैं।" मैंने नसीहत देने वाले अंदाज में कहा।
प्यारे झेंपकर रह गया।
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"तो आपको किसी काम में मेरी जरूरत आ पड़ी है मिस्टर महापात्रे!" रीमा भारती उसे गहरी निगाहों से देखती हुई बोली।
"यस मैडम!"
"किस्सा क्या है?"
"किस्सा दौलत का है।"
"म... मतलब?"
"मतलब ये कि पिछले कुछ दिनों से मुझे फोन पर लगातार धमकियां दी जा रही हैं कि मैं दस करोड़ रुपया मनोठी बीच पर पहुंचा दूं, वरना मेरी हत्या कर दी जायेगी।" महापात्रे अपनी उम्र के बराबर लम्बी सांस छोड़ता हुआ बोला- "इस वक्त में भारी मुसीबत में फंस गया हूं। समझ नहीं पा रहा हूं, कि क्या करूं?"
"ब्लैकमेलिंग का मामला है!"
"हां।"
"जो आपको लगातार फोन पर धमकियां दे रहा है। आप उस शख्स से परिचित हैं मिस्टर महापात्रे ?"
"वो शख्स मेरे लिये अपरिचित है। जब से उसने मुझे फोन करने शुरू किये हैं। उससे पहले मैंने कभी उसकी आवाज तक नहीं सुनी। मैं उसकी बातों से इतना अंदाजा तो लगा ही चुका हूं कि वो शख्स कोई खतरनाक किस्म का इन्सान है।"
"ऐसे काम खतरनाक लोग ही किया करते हैं। शरीफ लोगों का तो ऐसे कामों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता।" रीमा भारती गौर से उसका चेहरा देखती हुई बोली- "क्या मैं ब्लैकमेलिंग की वजह जान सकती हूं?"
"इस बारे में मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।"
"क्यों नहीं बता सकते?"
"क्योंकि मुझे ब्लैकमेलिंग की वजह मालूम नहीं है।"
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन और आश्चर्य के गहरे भाव उभरे। वह अजीब निगाहों से रामजीलाल महापात्रे को देखती रह गई।
"आप अजीब बात कर रहे हैं मिस्टर महापात्रे ।" रीमा भारती उसकी आंखों में झांकती हुई बोली- "ब्लैकमेलिंग की कोई-न-कोई वजह होती है। भला वो ब्लैकमेलर आपको बिना किसी वजह के ब्लैकमेलिंग क्यों करेगा? उसे क्या पागल कुत्ते ने काटा है? आप जरूर मुझसे कुछ छुपा रहे हैं।"
"आप मेरी बात का यकीन कीजिये। मैं आपसे कुछ नहीं छुपा रहा हूं, अगर कोई वजह होती तो मैं आपको जरूर बताता । आखिर ये मेरी जिन्दगी का सवाल है।" वह गम्भीरता भरे स्वर में बोला ।
रीमा भारती ने गौर से उसके चेहरे का अध्ययन किया। वह उसे सच बोलता लगा था।
"एक वजह हो सकती है रीमा।" प्यारे बीच में ही बोल उठा। रीमा भारती की निगाहें रामजीलाल महापात्रे के चेहरे से हटकर प्यारे के चेहरे पर जा टिकीं।
"वो क्या वजह हो सकती है?"
"हो सकता है कि ब्लैकमेलर के दिमाग में एक बात रही हो कि मिस्टर महापात्रे के पास दौलत की कमी नहीं है, अगर वह इन्हें हत्या की धमकी दे दे तो ये अपनी हत्या के खौफ की वजह से उसकी डिमांड पूरी कर दें।"
"तुम्हारी बात में वजन है प्यारे।"
"इस वक्त मैं भारी मुसीबत में फंसा हुआ हूं मैडम, अगर मैंने उस ब्लैकमेलर को रुपया अदा नहीं किया तो वो शर्तिया मेरी हत्या कर देगा। इस मुसीबत से आप ही मुझे छुटकारा दिला सकती हैं।"
"सॉरी मिस्टर महापात्रे।" रीमा भारती बोली- "इस मामले में मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती ।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा लटक गया। उसने प्रश्नभरी निगाहों से प्यारे की तरफ देखा।
"मेरा जवाब सुनकर आपको बुरा तो लगा होगा, लेकिन मैं मजबूर हूं। मैं नहीं जानती कि इस बारे में प्यारे ने आपको क्या कहा होगा, लेकिन मैं आपको बता दूं कि मैं कोई प्राइवेट जासूस नहीं हूं। मेरा सम्बन्ध भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था आई०एस०सी० से है। मैं अपने चीफ के आदेश के बिना कोई काम नहीं कर सकती।" वह बोली- "सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि मेरी उस जासूसी संस्था का सम्बन्ध गृहमंत्रालय से है। कभी-कभी मेरे चीफ को गृहमंत्रालय से भी इजाजत लेनी पड़ती है। इसलिये मैं आपका काम अपने हाथ में नहीं ले सकती।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा और भी लटक गया।
"ल... लेकिन आपके दोस्त प्यारे ने तो मुझसे वायदा किया था कि आप इस काम में मेरी मदद करने के लिये तैयार हो जायेंगी।"
"प्यारे ने आपसे गलत वायदा किया था। मैं आपको अपनी मजबूरी बता चुकी हूं, अगर मैंने आपका काम अपने हाथ में ले लिया और मेरे चीफ को मालूम हो गया तो मेरी नौकरी चली जायेगी।"
रामजीलाल महापात्रे के होठों से बोल तक नहीं फूटा। "और फिर इस शहर में मैं अकेली जासूस नहीं हूं। इस शहर में न जाने कितने प्राइवेट जासूस मौजूद हैं। आप उनकी मदद ले सकते हैं।" रीमा भारती पुनः बोल उठी- "इस देश में कानून भी है और कानून के रखवाले भी हैं। आप इस काम में पुलिस की मदद ले सकते हैं।"
"ये मुमकिन नहीं है।"
"क्यों मुमकिन नहीं है?"
"उस ब्लैकमेलर ने मुझे फोन पर धमकी दी है कि अगर मैंने पुलिस को खबर की तो अंजाम बुरा होगा।"
पलक झपकते ही रीमा भारती का चेहरा पत्थर की तरह कठोर एवं खुरदरा होता चला गया। आंखें सुलग उठीं। उसके होठों से अल्फाज नहीं, मानो आग बरसी "उस हरामजादे के बाप का राज है, जो उसने इस तरह की बात कह दी। वो आपको डराने की कोशिश कर रहा है, ताकि आप कानून का सहारा न लें। हर ब्लैकमेलर ऐसा ही कहता है महापात्रे साहब।"
"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?"
"आप वही कीजिये, जो मैं कह रही हूं। पुलिस को सब कुछ सच-सच बता दीजिये। वो कमीना ब्लैकमेलर आपका कुछ नहीं कर पायेगा और आपकी प्रॉब्लम सॉल्व हो जायेगी।"
रामजीलाल महापात्रे का दिमाग ठस्स पड़ गया था। उसे सूझ कुछ नहीं रहा था। वह बड़ी उम्मीद लेकर आया था, लेकिन रीमा भारती ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।
रीमा भारती अपनी जगह पर ठीक थी।
वहां खामोशी छा गई।
तनावपूर्ण खामोशी ।
रामजीलाल महापात्रे बेहद तनाव में नजर आ रहा था। उसकी निगाहें प्यारे पर थीं। वह आशा भरी निगाहों से उसे देख रहा था।(पृष्ठ-13)
उसे अभी भी उम्मीद थी कि प्यारे उसकी समस्या का हल कर देगा।
"उस ब्लैकमेलर से छुटकोरा पाने का महापात्रे के पास एक ही रास्ता है रीमा।" प्यारे ने खामोशी को भंग किया।
"कौन-सा रास्ता है?" रीमा भारती ने प्रश्नभरी निगाहों से प्यारे की तरफ देखा।
"इन्हें ब्लैकमेलर की डिमांड पूरी कर देनी चाहिये।"
"तुम पागल हो। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?"
प्यारे हड़बड़ाया।
“तुम ब्लैकमेलरों को अच्छी तरह से नहीं जानते प्यारे ।” रीमा भारती गम्भीरता भरे स्वर में बोली- "उस ब्लैकमेलर को दस करोड़ की मोटी रकम नहीं सौंपी जा सकती। ऐसे लोगों के एक बार खून मुंह लग जाने के बाद वे जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ते। जोंक की तरह खून चूसते रहते हैं। उसे दस करोड़ रुपया सौंपना बहुत बड़ी बेवकूफी होगी।"
"फिर क्या किया जाये?"
"वही किया जाये, जो मैंने बताया है।"
"यानि महापात्रे साहब को पुलिस की मदद लेनी चाहिये!"
"मैं तो यही सलाह दूंगी।"
लेती ?" "लेकिन तुम महापात्रे साहब का काम हाथ में क्यों नहीं ले
"सब कुछ जानते हुए भी तुम मुझसे ऐता सवाल कर रहे हो? मेरी मजबूरी को समझने की कोशिश करो प्यारे।"
"मैं तुम्हारी मजबूरी समझता हूं रीमा ।"
"अगर तुम मेरी मजबूरी समझते होते तो हरगिज ऐसा सवाल नहीं करते। तुम जानते हो कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकती।"
"लेकिन मैं महापात्रे साहब को जुबान दे चुका हूं कि तुम इनका काम अपने हाथ में ले लोगी।"
"तुम कमाल के आदमी हो। महापात्रे साहब को जुबान देने से पहले तुम्हें मुझसे पूछ लेना चाहिये था।"
"मैंने तुमसे इसलिये नहीं पूछा कि तुम मेरी बात को नहीं टालोगी। आखिर मैं तुम्हारा दोस्त हूं। मेरा तुम पर अधिकार बनता है।"
"लेकिन उस स्थिति में बिल्कुल भी नहीं बनता, जो काम मेरे हाथ से बाहर का हो और ये काम मेरे हाथ से बाहर का है। बेहतर है कि तुम इस काम के लिये मुझ पर दबाव न डालो।" रीमा भारती बोली- "तुमने महापात्रे साहब को जुबान दी है तो मैं इतना तो कर सकती हूं कि किसी प्राइवेट जासूस का इस काम के लिये अरेंज कर दूं।"
"ये काम तुम्हें ही करना होगा रीमा।"
"तुम बेकार में जिद कर रहे हो।" वह झल्लाकर बोली ।
"अगर तुम इसे जिद समझती हो तो ऐसा ही समझो, लेकिन तुम्हें महापात्रे साहब का काम हर कीमत में अपने हाथ में लेना पड़ेगा। भले ही तुम्हें कितनी भी परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े?"
रीमा भारती के चेहरे पर सोच के गहरे भाव उभरे। प्यारे ने उसे अजीब मुसीबत में फंसा दिया था। वह टेंशन में नजर आ रही थी। इस वक्त उसकी हालत उस सांप जैसी थी, जो भूल से छछूदर पकड़ लेता है। उस पर न निगलते ही बनता है और न उगलते।
प्यारे ने उसे अजीब मुसीबत में फंसा दिया था। रीमा भारती पर कुछ कहते नहीं बन पा रहा था।
थीं। "अब क्या सोचा तुमने रीमा?" एकाएक प्यारे बोल उठा। रीमा भारती मानो सपने से जागी। उसकी सोचें बिखर गई
"सोचना क्या है?" वह बेचैनी भरे अंदाज में पहलू बदलते हुए बोली- "तुमने महापात्रे साहब को जुबान दे दी है तो तुम्हारी वात तो माननी ही होगी, वरना तुम्हारी नाक कट जायेगी। मेरे साथ जो कुछ होगा, उसे तो मुझे भुगतना ही पड़ेगा।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा तेजी से चमक उठा।
"थैंक्यू मिस रीमा।" वह हर्षित स्वर में बोला- "मैं आपका ये अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा।"
"मैंने आप पर कोई अहसान नहीं किया। मैंने अपनी दोस्ती का फर्ज अदा किया है, अगर प्यारे ने आपको जुबान न दी होती तो मैं किसी भी कीमत पर आपका काम अपने हाथ में लेने के लिये तैयार नहीं होती।"
आजकल रीमा भारती एकदम फ्री थी।
और जब वह फ्री होती थी, उसके डिपार्टमेंट ने उसे कोई खतरनाक मिशन नहीं सौंपा होता था, तो वह मनोरंजन के मूड में होती थी। अपनी व्यस्त जिन्दगी से चन्द लम्हें चुराकर क्लब, पार्टियों और अपने दोस्तों के साथ घूमती थी। उसका रोज का यही शगल होता था।
और आजकल वह यही कर रही थी।
रीमा भारती मेकअप करके उठ खड़ी हुई और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई।
इस वक्त वह अपने पसंदीदा लिबास में थी।
उसने आसमानी रंग की साड़ी और उसी से मैच करता हुआ ब्लाउज पहना हुआ था। अपने बॉबकट बालों को पीछे ले जाकर आसमानी रंग के स्कार्फ से बांधा हुआ था। कानों में सोने के टॉप्स चमक रहे थे। इस लिबास में वह आसमान से उतरी अप्सरा लग रही थी।
रीमा भारती !
आई०एस०सी० अर्थात् भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था इण्डियन सीक्रेट कोर की नम्बर वन एजेन्ट । दीस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत, जो अपने जिस्म पर दो नहीं, बल्कि हजारों आंखें रखती है और एक जासूस होने के नाते मामूली-सी घटना पर संदेह करना उसका पेशा था। मां भारती की शरारती, उद्दण्ड किन्तु लाडली बेटी। वो बला, जिससे मौत भी पनाह मांगे।
रीमा भारती ने ड्राइंगरूम में पहुंचकर मेज पर रखा अपना वेनिटी बैग उठाया।
उसी पल !
फोन की घण्टी बज उठी।
रीमा भारती ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
"हेलो।"
"रीमा!"
दूसरी तरफ प्रेम प्यारे परदेसी था। रीमा भारती का दोस्त । रीमा भारती ने उसकी आवाज तुरन्त पहचान ली थी।
"बोलो, प्यारे।"
"आजकल क्या कर रही हो?"
"एकदम खाली हूं।"
"ऐसा लगता है कि आजकल तुम्हारे डिपार्टमेंट के पास तुम्हारे लिये कोई खतरनाक काम नहीं है।"
"फिलहाल तो कोई खतरनाक काम नहीं है, लेकिन काम आने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगेगा। न जाने कब चीफ का बुलावा आ जाये और मुझे मिशन पर रवाना होना पड़े।"
"वो तो मैं जानता हूं।"
"तुमने मुझे फोन किसलिये किया है?"
"इस वक्त बिजी हो क्या?"
"बिजी तो नहीं हूं।" रीमा भारती ने जवाब दिया- "क्लब जाने का मूड है, अगर एक मिनट बाद तुम्हारा फोन आया होता तो में क्लब के लिये रवाना हो चुकी होती।"
"क्लब का प्रोग्राम रद्द करो और मेरे रेस्टोरेन्ट में आ जाओ।"
"कोई खास बात है क्या?"
"खास बात तो कोई नहीं है। काफी दिनों से तुमसे मुलाकात नहीं हुई है। तुम्हारे साथ दो-दो जाम हो जायेंगे। इस बहाने तुमसे मुलाकात भी हो जायेगी और तुम्हारा मनोरंजन भी हो जायेगा।"
"पहुंचती हूं।"
"कितना वक्त लगेगा?"
"अभी निकल पडूंगी।"
"मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा।"
"ओ०के०।"
दूसरी तरफ से सम्बन्ध विच्छेद हो गया।
रीमा भारती ने रिसीवर वापस रखा और दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिये।
दो मिनट बाद वह अपनी कार में सवार होकर प्रेम प्यारे परदेसी के रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी जा रही थी।
प्यारे ने फोन पर उससे मिलने की रिक्वेस्ट की थी। भला दोस्त बुलाये और वह न जाये। ऐसा कैसे हो सकता है? प्यारे रीमा भारती का एक खास दोस्त था।
प्रेम प्यारे परदेसी !
वह भारत से भागा एक मुजरिम था और न जाने किस तरह भटकता हुआ डेथ लैण्ड पहुंच गया था। बाद में रीमा भारती उसे भारत ले आई, जहां उसने शराफत का धन्धा करने में उसकी मदद की। उसने मुम्बई के खार इलाके में प्रेम प्यारे परदेसी का एक रेस्टोरेन्ट खुलवा दिया था।
हालांकि आज प्रेम प्यारे परदेसी जुर्म से कोसों दूर था। किन्तु वो कहावत है ना कि चोर चोरी से जाये, मगर हेरा-फेरी से न जाये। अतः जुर्म से दूर रहने के बावजूद उसने चन्द दिनों में ही मुम्बई अण्डरवर्ल्ड में अपनी अच्छी-खासी घुसपैठ बना ली थी।
आज की तारीख में उसकी शातिर मुजरिमों से अच्छी-खासी यारी थी।
परन्तु !
रीमा भारती को इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि इससे उसे कभी-कभी फायदा ही पहुंचता था। प्यारे की अण्डरवर्ल्ड से हासिल जानकारियां यदा-कदा उसके लिये काम की साबित होती थीं।
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन के भाव थे।
वह जानती थी कि प्यारे उसे अकारण कभी नहीं बुला सकता । हालांकि उसने उसे फोन पर कुछ नहीं बताया था।
परन्तु !
उसे समझते देर नहीं लगी कि उसके इस बुलावे की कोई खास वजह अवश्य होगी। रीमा भारती ने अपना दिमाग खपाना उचित नहीं समझा था। वह जानती थी कि जो कुछ भी होगा, जल्दी ही उसके सामने आ जायेगा।
अतः रीमा भारती ने अपना क्लब का प्रोग्राम रद्द कर दिया था।
तकरीबन चालीस मिनट बाद रीमा भारती ने अपनी कार प्यारे रेस्टोरेन्ट के सामने पार्क की और नीचे उतर गई।(पृष्ठ-7)
वह चौंकी।
वजह!
प्यारे के रेस्टोरेन्ट के सामने एक शानदार चमचमाती हुई मर्सडीज पहले से ही खड़ी हुई थी। उसका चौंकना स्वाभाविक ही धा, क्योंकि मर्सडीज का वहां होना उसके लिये कम दिलचस्पी की बात नहीं थी। उसका रेस्टोरेन्ट इतना शानदार नहीं था कि जिसमें किसी ऐसे शख्स की दिलचस्पी हो जो मर्सडीज रखता हो।
रीमा भारती प्यारे के रेस्टोरेन्ट में दाखिल हुई।
भीतर दाखिल होते ही उसकी सतर्क निगाहें चहुंओर घूम गईं, परन्तु वहां उसे ऐसा कोई शख्स नजर नहीं आया था, जो मर्सडीज रखता हो। वैसे इस वक्त रेस्टोरेन्ट में ज्यादा भीड़ नहीं थी। इक्का-दुक्का ग्राहक ही टेबल के पीछे नजर आ रहा था।
रेस्टोरेन्ट के काउण्टर के पीछे से प्यारे नदारद था। उसकी जगह अधेड़ उम्र वाला खांडेकर मौजूद था।
परन्तु वह भी रीमा भारती से अच्छी तरह से परिचित था।
रीमा भारती काउण्टर पर पहुंची।
"गुड इवनिंग मैडम!" खांडेकर ने मुस्कुराकर रीमा भारती का अभिवादन किया।
"कैसे हो खांडेकर?" रीमा भारती उसके अभिवादन का जवाब देकर बोली।
"आपकी मेहरबानी है मैडम!" वह बोला- "आज तो काफी दिनों बाद आपने इस तरफ का रुख किया है।"
"तुम तो जानते हो खांडेकर कि मुझे तो सांस लेने की फुरसत तक नहीं मिलती। गनीमत समझो कि आज इस तरफ निकल आई, क्योंकि आजकल मेरे हाथ में कोई काम नहीं है।"
खांडेकर मुस्कुराकर रह गया।
"तुम्हारे मालिक कहां हैं?"
रीमा भारती का मालिक से मतलब प्रेम प्यारे परदेसी से था। "मालिक अपने केविन में हैं।" उसने जवाब दिया- "वे आप ही का इन्तजार कर रहे हैं।"
रीमा भारती ने आगे कोई सबाल नहीं किया। वह काउण्टर की बगल से गुजरती हुई प्यारे के केबिन की तरफ बढ़ गई।
अगले मिनट वह प्यारे के केबिन के सामने थी। केबिन का दरवाजा बन्द था। उसने दरवाजा धकेलकर भीतर कदम रखा। उस वक्त प्यारे वहां अकेला नहीं था। उसके सामने कुर्सी पर एक भारी-भरकम जिस्म वाला व्यक्ति बैठा हुआ था। उसके जिस्म पर बादामी रंग का शानदार सूट था। सिर के बाल आधे से अधिक उड़े हुए थे। उसके हाथों की उंगलियों में विभिन्न कीमती पत्थरों की अंगूठियां फंसी हुई थीं। वह देखने से ही धनी व्यक्ति लगता था।
"आओ रीमा !” रीमा भारती को देखते ही प्यारे चहका- "मैं काफी देर से तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था।"
"इन्तजार क्यों कर रहे थे? मुझे आने में इतना वक्त तो लगना ही था। तुम्हारा फोन सुनते ही तुम्हारे रेस्टोरेन्ट की तरफ चल पड़ी थी।"
प्यारे खामोश हो गया।
उसकी निगाहें रीमा भारती पर सरसराती चली गई। उसे उस लिबास में देखकर ऐसा लगता था जैसे वह जासूस न होकर एक कुशल गृहिणी हो, अगर और कोई वक्त होता तो प्यारे जरूर चुटकी ले लेता।
"आओ बैठो।" वह बोला।
रीमा भारती उस अधेड़ की बगल में पड़ी खाली कुर्सी सम्भालती हुई बोली- "कैसे हो प्यारे?"
"ठीक हूं रीमा।"
"आज मेरी याद कैसे आ गई?"
"मैं तो तुम्हें याद कर ही लेता हूं, लेकिन तुम्हें ही मेरी याद नहीं आती। आज तुमसे मिलने का मन किया तो मैंने तुम्हें फोन कर दिया।"
"तुमने फोन किया और मैं हाजिर हो गई। वैसे तुम बेवजह तो फोन करने वाले नहीं हो। तुम मुझे उस वक्त फोन करते हो जब कोई खास बात होती है। सब खैरियत तो है।"
"घबराओ मत। सब खैरियत है।" वह पहलू बदलता हुआ बोला ।
रीमा भारती मुस्कुराई ।
"अब मुझे ये बताने की जरूरत नहीं होगी कि यही आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेन्ट रीमा भारती हैं।" वह अधेड़ की तरफ देखता हुआ बोला- "कुछ देर पहले मैं इन्हीं के बारे में बता रहा था।"
"आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई मिस रीमा।" अधेड़ बोला- "मेरा नाम रामजीलाल महापात्रे है। मुम्बई के चैम्बूर इलाके में रहता हूं। मेरा क्लॉथ का बहुत बड़ा बिजनेस है।"
"ये गलत कह रहे हैं मिस रीमा।" एकाएक प्यारे बीच में ही बोल पड़ा- "अगर मिस्टर महापात्रे को मुम्बई शहर के क्लाॅथ बिजनेस का किंग कहा जाये तो कम नहीं होगा। एक महीने में करोड़ों का टर्नओवर है इनका ।"
"हैलो।" रीमा भारती ने कहा।
अब रीमा भारती ने सहजता से अनुमान लगा लिया था कि रेस्टोरेन्ट के बाहर खड़ी मर्सडीज महापात्रे की ही है।
"ये तुम्हारा ही इन्तजार कर रहे थे रीमा।" प्यारे बोला।
"मेरा इन्तजार कर रहे थे।" रीमा भारती बोली।
"हां"
"क्यों?"
"एक काम में मिस्टर महापात्रे को तुम्हारी जरूरत पड़ गई है। इसलिये ये दौड़ते हुए मेरे पास चले आये। इन्होंने मुझे अपनी प्रॉब्लम बताई तो मुझे मजबूर होकर तुम्हें फोन करना पड़ा।"
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन और आश्चर्य के गहरे भाव उभरे। वह प्यारे को गौर से देखती हुई बोली "ल... लेकिन मिस्टर महापात्रे को मेरे बारे में किसने बताया ?"
"मैंने बताया।"
"यानि तुम पहले से ही मिस्टर महापात्रे की जानते हो!"
"हां।" वह बोला- "आज से तकरीबन एक महीने पहले मेरी मुलाकात महापात्रे साहव से अल्का बार में हुई थी। ये अकेले थे और मैं भी। दोंनों एक ही टेबल पर मौजूद थे। क्योंकि बार की सभी टेबलें भरी हुई थीं। बातों के सिलसिले के बीच में हमारा आपस में परिचय हो गया था।"
रीमा भारती मुस्कुराई।
"तुम मुस्कुरा क्यों रही हो?"
"तुम्हारी बात पर मुस्कुराना आ गया।"
"ए... ऐसा मैंने क्या कह दिया?"
"जब दो अपरिचित आमने-सामने बैठकर पी रहे हों तो उनके बीच दोस्ती बहुत जल्दी हो जाती है। इसमें तुम लोगों का कसूर नहीं है।"
प्यारे जी खोलकर हंसा।
रामजीलाल महापात्रे के होठों पर भी मुस्कान नाचकर रह गई।
"और पीने के दौरान तुमने मिस्टर महापात्रे के सामने मेरा जिक्र कर दिया होगा कि तुम्हारी एक दोस्त रीमा भारती है, जो आई०एस०सी० की सबसे काबिल एजेन्ट है। तुमने मेरी काबलियत के कसीदे पढ़ दिये होंगे और अन्त में कह दिया होगा कि अगर किसी काम में मेरी जरूरत पड़े तो तुम महापात्रे साहब का काम करा दोगे।" रीमा भारती पुनः बोल उठी।
"राइट।"
"कसूर तुम्हारा नहीं है प्यारे। कसूर उस शराब का है, जो उस चक्त तुम्हारे हलक से नीचे उतर चुकी होगी। उस वक्त ही इन्सान को ऐसी बातें सूझती हैं।" मैंने नसीहत देने वाले अंदाज में कहा।
प्यारे झेंपकर रह गया।
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"तो आपको किसी काम में मेरी जरूरत आ पड़ी है मिस्टर महापात्रे!" रीमा भारती उसे गहरी निगाहों से देखती हुई बोली।
"यस मैडम!"
"किस्सा क्या है?"
"किस्सा दौलत का है।"
"म... मतलब?"
"मतलब ये कि पिछले कुछ दिनों से मुझे फोन पर लगातार धमकियां दी जा रही हैं कि मैं दस करोड़ रुपया मनोठी बीच पर पहुंचा दूं, वरना मेरी हत्या कर दी जायेगी।" महापात्रे अपनी उम्र के बराबर लम्बी सांस छोड़ता हुआ बोला- "इस वक्त में भारी मुसीबत में फंस गया हूं। समझ नहीं पा रहा हूं, कि क्या करूं?"
"ब्लैकमेलिंग का मामला है!"
"हां।"
"जो आपको लगातार फोन पर धमकियां दे रहा है। आप उस शख्स से परिचित हैं मिस्टर महापात्रे ?"
"वो शख्स मेरे लिये अपरिचित है। जब से उसने मुझे फोन करने शुरू किये हैं। उससे पहले मैंने कभी उसकी आवाज तक नहीं सुनी। मैं उसकी बातों से इतना अंदाजा तो लगा ही चुका हूं कि वो शख्स कोई खतरनाक किस्म का इन्सान है।"
"ऐसे काम खतरनाक लोग ही किया करते हैं। शरीफ लोगों का तो ऐसे कामों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता।" रीमा भारती गौर से उसका चेहरा देखती हुई बोली- "क्या मैं ब्लैकमेलिंग की वजह जान सकती हूं?"
"इस बारे में मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।"
"क्यों नहीं बता सकते?"
"क्योंकि मुझे ब्लैकमेलिंग की वजह मालूम नहीं है।"
रीमा भारती के चेहरे पर उलझन और आश्चर्य के गहरे भाव उभरे। वह अजीब निगाहों से रामजीलाल महापात्रे को देखती रह गई।
"आप अजीब बात कर रहे हैं मिस्टर महापात्रे ।" रीमा भारती उसकी आंखों में झांकती हुई बोली- "ब्लैकमेलिंग की कोई-न-कोई वजह होती है। भला वो ब्लैकमेलर आपको बिना किसी वजह के ब्लैकमेलिंग क्यों करेगा? उसे क्या पागल कुत्ते ने काटा है? आप जरूर मुझसे कुछ छुपा रहे हैं।"
"आप मेरी बात का यकीन कीजिये। मैं आपसे कुछ नहीं छुपा रहा हूं, अगर कोई वजह होती तो मैं आपको जरूर बताता । आखिर ये मेरी जिन्दगी का सवाल है।" वह गम्भीरता भरे स्वर में बोला ।
रीमा भारती ने गौर से उसके चेहरे का अध्ययन किया। वह उसे सच बोलता लगा था।
"एक वजह हो सकती है रीमा।" प्यारे बीच में ही बोल उठा। रीमा भारती की निगाहें रामजीलाल महापात्रे के चेहरे से हटकर प्यारे के चेहरे पर जा टिकीं।
"वो क्या वजह हो सकती है?"
"हो सकता है कि ब्लैकमेलर के दिमाग में एक बात रही हो कि मिस्टर महापात्रे के पास दौलत की कमी नहीं है, अगर वह इन्हें हत्या की धमकी दे दे तो ये अपनी हत्या के खौफ की वजह से उसकी डिमांड पूरी कर दें।"
"तुम्हारी बात में वजन है प्यारे।"
"इस वक्त मैं भारी मुसीबत में फंसा हुआ हूं मैडम, अगर मैंने उस ब्लैकमेलर को रुपया अदा नहीं किया तो वो शर्तिया मेरी हत्या कर देगा। इस मुसीबत से आप ही मुझे छुटकारा दिला सकती हैं।"
"सॉरी मिस्टर महापात्रे।" रीमा भारती बोली- "इस मामले में मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती ।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा लटक गया। उसने प्रश्नभरी निगाहों से प्यारे की तरफ देखा।
"मेरा जवाब सुनकर आपको बुरा तो लगा होगा, लेकिन मैं मजबूर हूं। मैं नहीं जानती कि इस बारे में प्यारे ने आपको क्या कहा होगा, लेकिन मैं आपको बता दूं कि मैं कोई प्राइवेट जासूस नहीं हूं। मेरा सम्बन्ध भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था आई०एस०सी० से है। मैं अपने चीफ के आदेश के बिना कोई काम नहीं कर सकती।" वह बोली- "सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि मेरी उस जासूसी संस्था का सम्बन्ध गृहमंत्रालय से है। कभी-कभी मेरे चीफ को गृहमंत्रालय से भी इजाजत लेनी पड़ती है। इसलिये मैं आपका काम अपने हाथ में नहीं ले सकती।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा और भी लटक गया।
"ल... लेकिन आपके दोस्त प्यारे ने तो मुझसे वायदा किया था कि आप इस काम में मेरी मदद करने के लिये तैयार हो जायेंगी।"
"प्यारे ने आपसे गलत वायदा किया था। मैं आपको अपनी मजबूरी बता चुकी हूं, अगर मैंने आपका काम अपने हाथ में ले लिया और मेरे चीफ को मालूम हो गया तो मेरी नौकरी चली जायेगी।"
रामजीलाल महापात्रे के होठों से बोल तक नहीं फूटा। "और फिर इस शहर में मैं अकेली जासूस नहीं हूं। इस शहर में न जाने कितने प्राइवेट जासूस मौजूद हैं। आप उनकी मदद ले सकते हैं।" रीमा भारती पुनः बोल उठी- "इस देश में कानून भी है और कानून के रखवाले भी हैं। आप इस काम में पुलिस की मदद ले सकते हैं।"
"ये मुमकिन नहीं है।"
"क्यों मुमकिन नहीं है?"
"उस ब्लैकमेलर ने मुझे फोन पर धमकी दी है कि अगर मैंने पुलिस को खबर की तो अंजाम बुरा होगा।"
पलक झपकते ही रीमा भारती का चेहरा पत्थर की तरह कठोर एवं खुरदरा होता चला गया। आंखें सुलग उठीं। उसके होठों से अल्फाज नहीं, मानो आग बरसी "उस हरामजादे के बाप का राज है, जो उसने इस तरह की बात कह दी। वो आपको डराने की कोशिश कर रहा है, ताकि आप कानून का सहारा न लें। हर ब्लैकमेलर ऐसा ही कहता है महापात्रे साहब।"
"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?"
"आप वही कीजिये, जो मैं कह रही हूं। पुलिस को सब कुछ सच-सच बता दीजिये। वो कमीना ब्लैकमेलर आपका कुछ नहीं कर पायेगा और आपकी प्रॉब्लम सॉल्व हो जायेगी।"
रामजीलाल महापात्रे का दिमाग ठस्स पड़ गया था। उसे सूझ कुछ नहीं रहा था। वह बड़ी उम्मीद लेकर आया था, लेकिन रीमा भारती ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।
रीमा भारती अपनी जगह पर ठीक थी।
वहां खामोशी छा गई।
तनावपूर्ण खामोशी ।
रामजीलाल महापात्रे बेहद तनाव में नजर आ रहा था। उसकी निगाहें प्यारे पर थीं। वह आशा भरी निगाहों से उसे देख रहा था।(पृष्ठ-13)
उसे अभी भी उम्मीद थी कि प्यारे उसकी समस्या का हल कर देगा।
"उस ब्लैकमेलर से छुटकोरा पाने का महापात्रे के पास एक ही रास्ता है रीमा।" प्यारे ने खामोशी को भंग किया।
"कौन-सा रास्ता है?" रीमा भारती ने प्रश्नभरी निगाहों से प्यारे की तरफ देखा।
"इन्हें ब्लैकमेलर की डिमांड पूरी कर देनी चाहिये।"
"तुम पागल हो। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?"
प्यारे हड़बड़ाया।
“तुम ब्लैकमेलरों को अच्छी तरह से नहीं जानते प्यारे ।” रीमा भारती गम्भीरता भरे स्वर में बोली- "उस ब्लैकमेलर को दस करोड़ की मोटी रकम नहीं सौंपी जा सकती। ऐसे लोगों के एक बार खून मुंह लग जाने के बाद वे जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ते। जोंक की तरह खून चूसते रहते हैं। उसे दस करोड़ रुपया सौंपना बहुत बड़ी बेवकूफी होगी।"
"फिर क्या किया जाये?"
"वही किया जाये, जो मैंने बताया है।"
"यानि महापात्रे साहब को पुलिस की मदद लेनी चाहिये!"
"मैं तो यही सलाह दूंगी।"
लेती ?" "लेकिन तुम महापात्रे साहब का काम हाथ में क्यों नहीं ले
"सब कुछ जानते हुए भी तुम मुझसे ऐता सवाल कर रहे हो? मेरी मजबूरी को समझने की कोशिश करो प्यारे।"
"मैं तुम्हारी मजबूरी समझता हूं रीमा ।"
"अगर तुम मेरी मजबूरी समझते होते तो हरगिज ऐसा सवाल नहीं करते। तुम जानते हो कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकती।"
"लेकिन मैं महापात्रे साहब को जुबान दे चुका हूं कि तुम इनका काम अपने हाथ में ले लोगी।"
"तुम कमाल के आदमी हो। महापात्रे साहब को जुबान देने से पहले तुम्हें मुझसे पूछ लेना चाहिये था।"
"मैंने तुमसे इसलिये नहीं पूछा कि तुम मेरी बात को नहीं टालोगी। आखिर मैं तुम्हारा दोस्त हूं। मेरा तुम पर अधिकार बनता है।"
"लेकिन उस स्थिति में बिल्कुल भी नहीं बनता, जो काम मेरे हाथ से बाहर का हो और ये काम मेरे हाथ से बाहर का है। बेहतर है कि तुम इस काम के लिये मुझ पर दबाव न डालो।" रीमा भारती बोली- "तुमने महापात्रे साहब को जुबान दी है तो मैं इतना तो कर सकती हूं कि किसी प्राइवेट जासूस का इस काम के लिये अरेंज कर दूं।"
"ये काम तुम्हें ही करना होगा रीमा।"
"तुम बेकार में जिद कर रहे हो।" वह झल्लाकर बोली ।
"अगर तुम इसे जिद समझती हो तो ऐसा ही समझो, लेकिन तुम्हें महापात्रे साहब का काम हर कीमत में अपने हाथ में लेना पड़ेगा। भले ही तुम्हें कितनी भी परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े?"
रीमा भारती के चेहरे पर सोच के गहरे भाव उभरे। प्यारे ने उसे अजीब मुसीबत में फंसा दिया था। वह टेंशन में नजर आ रही थी। इस वक्त उसकी हालत उस सांप जैसी थी, जो भूल से छछूदर पकड़ लेता है। उस पर न निगलते ही बनता है और न उगलते।
प्यारे ने उसे अजीब मुसीबत में फंसा दिया था। रीमा भारती पर कुछ कहते नहीं बन पा रहा था।
थीं। "अब क्या सोचा तुमने रीमा?" एकाएक प्यारे बोल उठा। रीमा भारती मानो सपने से जागी। उसकी सोचें बिखर गई
"सोचना क्या है?" वह बेचैनी भरे अंदाज में पहलू बदलते हुए बोली- "तुमने महापात्रे साहब को जुबान दे दी है तो तुम्हारी वात तो माननी ही होगी, वरना तुम्हारी नाक कट जायेगी। मेरे साथ जो कुछ होगा, उसे तो मुझे भुगतना ही पड़ेगा।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा तेजी से चमक उठा।
"थैंक्यू मिस रीमा।" वह हर्षित स्वर में बोला- "मैं आपका ये अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा।"
"मैंने आप पर कोई अहसान नहीं किया। मैंने अपनी दोस्ती का फर्ज अदा किया है, अगर प्यारे ने आपको जुबान न दी होती तो मैं किसी भी कीमत पर आपका काम अपने हाथ में लेने के लिये तैयार नहीं होती।"
"मुझे तुमसे यही उम्मीद थी रीमा।" प्यारे खुश होता हुआ पूछा। "आप कब से काम शुरू करेंगी?" रामजीलाल महापात्रे ने बोला ।
"ये मेरी सिरदर्दी है। आप आराम से पैर फैलाकर सो जाइये।" रीमा भारती ने जवाब दिया- "आपका बाल भी बांका नहीं होगा, उल्टे वो ब्लैकमेलर सलाखों के पीछे नजर आयेगा।"
उसकै चेहरे पर तसल्ली के भाव उभरे।(पृष्ठ-15)
तभी !
रीमा भारती के हाथ में दबा मोबाइल बज उठा।
"उसने मोबाइल ऑन करके कान से लगाया।
"हेलो।"
"रीमा!"
दूसरी तरफ खुराना था।
रीमा भारती के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उसके चेहरे पर गम्भीरता के भाव उभरते चले गये। वह जानती थी कि खुराना का फोन करना अकारण नहीं हो सकता। वह जानती थी कि उसका चीफ उसे उस वक्त ही फोन करता था, जब कोई महत्वपूर्ण वजह होती थी।
खुराना की आवाज सुनकर रीमा भारती ने यूं मुंह बनाया जैसे किसी ने उसके मुंह में जबरदस्ती कुनैन की गोली डाल दी हो। खुराना का फोन आना उसे बेहद नागंवार गुजरा था।
"गुड इवनिंग सर!" न चाहते हुए भी उसके होठों से निकल गया।
"इस वक्त कहां हो रीमा?" दूसरी तरफ से खुराना उसके अभिवादन का जवाब देकर बोला।
"मैं प्यारे के रेस्टोरेन्ट में हूं।" रीमा भारती ने जयाब दिया- "प्यारे से मिलने के बाद में सीधे क्लब जाऊंगी।"
"क्लव जाने का प्रोग्राम रद्द कर दो।"
रीमा भारती को जोरों का झटका लगा।
"क्लब जाने का प्रोग्राम रद्द कर दूँ?" वह उलझन भरे स्वर में बोली- "लेकिन क्यों सर?"
"क्योंकि तुम्हें अभी और इसी वक्त एक महत्वपूर्ण मिशन पर रवाना होना है। जितनी जल्दी हो सके, तुरन्त आफिस पहुंचो ।"
रीमा भारती जो सोचे बैठी थी, वही हुआ।
उसके साथ ऐसा पहले भी न जाने कितनी बार हुआ था।
वह बुरी तरह से झुंझला उठी, मगर बोली कुछ नहीं। वह बड़ी मुश्किल से अपनी झुंझलाहट पर काबू करने में कामयाच हुई थी।
"सुन रही हो रीमा।"
"सुन रही हूं सर।"
"कितनी देर में पहुंच रही हो?"
"क्या ऐसा नहीं हो सकता सर कि ये मिशन आप किसी दूसरे एजेन्ट को सौंप दें?"
"नामुमकिन!" दूसरी तरफ से खुराना का कठोर स्वर उभरा - "वो मिशन इतना महत्वपूर्ण है कि वो तुम्हारे अलावा किसी दूसरे एजेन्ट को नहीं सौंपा जा सकता। सबसे बड़ी बात तो ये है कि गृहमंत्रालय ने इस मिशन के लिये तुम्हारा नाम सलेक्ट किया है। अतः किसी अन्य एजेन्ट को सौंपे जाने का सवाल ही नहीं उठता। तुम एक पल भी गंवाये बिना आफिस के लिये रवाना हो जाओ। मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूं।"
"ये मेरी सिरदर्दी है। आप आराम से पैर फैलाकर सो जाइये।" रीमा भारती ने जवाब दिया- "आपका बाल भी बांका नहीं होगा, उल्टे वो ब्लैकमेलर सलाखों के पीछे नजर आयेगा।"
उसकै चेहरे पर तसल्ली के भाव उभरे।(पृष्ठ-15)
तभी !
रीमा भारती के हाथ में दबा मोबाइल बज उठा।
"उसने मोबाइल ऑन करके कान से लगाया।
"हेलो।"
"रीमा!"
दूसरी तरफ खुराना था।
रीमा भारती के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उसके चेहरे पर गम्भीरता के भाव उभरते चले गये। वह जानती थी कि खुराना का फोन करना अकारण नहीं हो सकता। वह जानती थी कि उसका चीफ उसे उस वक्त ही फोन करता था, जब कोई महत्वपूर्ण वजह होती थी।
खुराना की आवाज सुनकर रीमा भारती ने यूं मुंह बनाया जैसे किसी ने उसके मुंह में जबरदस्ती कुनैन की गोली डाल दी हो। खुराना का फोन आना उसे बेहद नागंवार गुजरा था।
"गुड इवनिंग सर!" न चाहते हुए भी उसके होठों से निकल गया।
"इस वक्त कहां हो रीमा?" दूसरी तरफ से खुराना उसके अभिवादन का जवाब देकर बोला।
"मैं प्यारे के रेस्टोरेन्ट में हूं।" रीमा भारती ने जयाब दिया- "प्यारे से मिलने के बाद में सीधे क्लब जाऊंगी।"
"क्लव जाने का प्रोग्राम रद्द कर दो।"
रीमा भारती को जोरों का झटका लगा।
"क्लब जाने का प्रोग्राम रद्द कर दूँ?" वह उलझन भरे स्वर में बोली- "लेकिन क्यों सर?"
"क्योंकि तुम्हें अभी और इसी वक्त एक महत्वपूर्ण मिशन पर रवाना होना है। जितनी जल्दी हो सके, तुरन्त आफिस पहुंचो ।"
रीमा भारती जो सोचे बैठी थी, वही हुआ।
उसके साथ ऐसा पहले भी न जाने कितनी बार हुआ था।
वह बुरी तरह से झुंझला उठी, मगर बोली कुछ नहीं। वह बड़ी मुश्किल से अपनी झुंझलाहट पर काबू करने में कामयाच हुई थी।
"सुन रही हो रीमा।"
"सुन रही हूं सर।"
"कितनी देर में पहुंच रही हो?"
"क्या ऐसा नहीं हो सकता सर कि ये मिशन आप किसी दूसरे एजेन्ट को सौंप दें?"
"नामुमकिन!" दूसरी तरफ से खुराना का कठोर स्वर उभरा - "वो मिशन इतना महत्वपूर्ण है कि वो तुम्हारे अलावा किसी दूसरे एजेन्ट को नहीं सौंपा जा सकता। सबसे बड़ी बात तो ये है कि गृहमंत्रालय ने इस मिशन के लिये तुम्हारा नाम सलेक्ट किया है। अतः किसी अन्य एजेन्ट को सौंपे जाने का सवाल ही नहीं उठता। तुम एक पल भी गंवाये बिना आफिस के लिये रवाना हो जाओ। मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूं।"
"ल... लेकिन सर! आप मेरी बात...।"
रीमा भारती का वाक्य अधूरा रह गया। क्योंकि दूसरी तरफ से सम्बन्ध विच्छेद हो गया था।
रीमा भारती के चेहरे पर झुंझलाहट के गहरे भाव उभरे। उसका झुंझला उठना स्वाभाविक ही था। उसने मोबाइल कान से हटाकर ऑफ किया और प्यारे की तरफ देखा।
प्यारे पहले से ही रीमा भारती की तरफ देख रहा था।
रामजीलाल महापात्रे और प्यारे ने रीमा भारती का मोबाइल पर कहा गया एक-एक शब्द सुना था। रामजीलाल महापात्रे का चेहरा जिस तेजी से चमका था, उसी तेजी से बुझ भी गया था। उसका चेहरा यूं लटका हुआ था जैसे उसका कोई सगे वाला भगवान को प्यारा हो गया हो।
"खुराना का फोन था।" प्यारे ने पूछा।
"हां।"
"क्या कह रहा था?"
"तुमने सुना तो है। मेरे बताने की क्या जरूरत रह गई है?"
"वो तुम्हें कोई महत्वपूर्ण मिशन सौंपने जा रहा है, जिसे तुम्हारे अलावा दूसरा कोई एजेन्ट पूरा नहीं कर सकता। इसीलिये उसने तुम्हें तुरन्त आफिस बुलाया है।" प्यारे बोला।
रीमा भारती ने सहमति से गर्दन हिला दी।
"अब महापात्रे साहब के काम का क्या होगा?"
"जाहिर है कि मैं महापात्रे साहब का काम अपने हाथ में नहीं ले सकूंगी, क्योंकि मुझे चीफ से मिशन का आदेश मिल चुका है और सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस मिशन के लिये गृहमंत्रालय ने खासतौर पर मुझे अप्वाइंट किया है। अतः मुझे उस मिशन पर तुरन्त रवाना होना होगा।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा धुआं-धुआं नजर आने लगा । "और जब तक मैं उस मिशन में कामयाबी हासिल नहीं कर लेती, तब तक मेरा ध्यान किसी दूसरी बात की तरफ नहीं जायेगा।"
"व... वो तो ठीक है मिस रीमा कि आपको अपने चीफ का आदेश मानना पड़ेगा। इस बीच में आप कोई दूसरा काम अपने हाथ में नहीं ले सकतीं, लेकिन मुझे ये तो बताइये कि मैं क्या करूं? मैं तो भारी मुसीबत में फंसा हुआ हूं।" वह घबराया-सा बोला।
"अपना मिशन पूरा करने के बाद ही मैं आपके काम के बारे में कुछ सोच सकती हूं और वो भी उस स्थिति में अगर मेरे हाथ में दूसरा कोई मिशन न आया तो।" वह दो टूक शब्दों में बोली।
"लेकिन आप मुझे कोई सलाह तो दे सकती हैं।"
"फिलहाल तो मैं आपको इतनी ही सलाह दे सकती हूं कि आप उस वक्त तक उस ब्लैकमेलर को टरकाते रहिये, जब तक मेरा मिशन पूरा नहीं हो जाता।"
"आपके उस मिशन में कितना वक्त लगेगा?"
"इस बारे में मैं निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकती। ये सब उस मिशन पर आधारित करेगा कि वो मिशन कैसा है? उस मिशन में एक सप्ताह भी लग सकता है और एक महीना भी।"
रामजीलाल महापात्रे के चेहरे का रंग साफ-साफ उड़ गया।
"अ... अगर इस बीच उस ब्लैकमेलर ने मेरी हत्या कर दी तो...?"
"हत्या करना इतना आसान नहीं है। उस ब्लैकमेलर की पूरी कोशिश रहेगी कि वो तुमसे दस करोड़ रुपये की मोटी रकम हासिल करे।"
"रकम न देने की सूरत में वह मेरी जान भी ले सकता है।"
"होने को तो ये भी हो सकता है कि वो आपसे दस करोड़ भी हासिल कर ले और उसके बाद आपकी हत्या भी कर दे।"
रामजीलाल महापात्रे खौफजदा नजर आने लगा।
"क... क्या ये मुमकिन है?"
"मुमकिन क्यों नहीं है?"
उसने जोरों से थूक निगली ।
"आप अपने दिमाग से अपनी हत्त्या की बात निकाल दीजिये। ब्लैकमेलर की दिलचस्पी आपकी हत्या में नहीं, बल्कि दस करोड़ की रकम में है। वह हत्या करने की धमकी दे रहा है, ताकि आप भयभीत होकर उसे रकम दे दें। इस वक्त आपको हिम्मत और हौंसले से काम लेना होगा। जैसा कि मैंने आपको बताया है कि आप उसे उस वक्त तक उलझाये रखिये जब तक मैं खाली नहीं हो जाती। उसके बाद मैं जानूंगा और मेरा काम जानेगा।"
उसने राहत की सांस ली।
"मैं अपना मिशन पूरा होते ही प्यारे से सम्पर्क स्थापित कर लूंगी। उसके बाद मैं आपके काम को सम्भाल लूंगी ।”
"थैंक्यू।"
"ऐनी प्रॉब्लम ।"
"यही एक प्रॉब्लम है, जो मैंने आपको बताई है।"
"उस प्रॉब्लम को खत्म करने की जिम्मेदारी मेरी है।"
रामजीलाल महापात्रे ने पुनः उसका शुक्रिया अदा किया।
रीमा भारती का वाक्य अधूरा रह गया। क्योंकि दूसरी तरफ से सम्बन्ध विच्छेद हो गया था।
रीमा भारती के चेहरे पर झुंझलाहट के गहरे भाव उभरे। उसका झुंझला उठना स्वाभाविक ही था। उसने मोबाइल कान से हटाकर ऑफ किया और प्यारे की तरफ देखा।
प्यारे पहले से ही रीमा भारती की तरफ देख रहा था।
रामजीलाल महापात्रे और प्यारे ने रीमा भारती का मोबाइल पर कहा गया एक-एक शब्द सुना था। रामजीलाल महापात्रे का चेहरा जिस तेजी से चमका था, उसी तेजी से बुझ भी गया था। उसका चेहरा यूं लटका हुआ था जैसे उसका कोई सगे वाला भगवान को प्यारा हो गया हो।
"खुराना का फोन था।" प्यारे ने पूछा।
"हां।"
"क्या कह रहा था?"
"तुमने सुना तो है। मेरे बताने की क्या जरूरत रह गई है?"
"वो तुम्हें कोई महत्वपूर्ण मिशन सौंपने जा रहा है, जिसे तुम्हारे अलावा दूसरा कोई एजेन्ट पूरा नहीं कर सकता। इसीलिये उसने तुम्हें तुरन्त आफिस बुलाया है।" प्यारे बोला।
रीमा भारती ने सहमति से गर्दन हिला दी।
"अब महापात्रे साहब के काम का क्या होगा?"
"जाहिर है कि मैं महापात्रे साहब का काम अपने हाथ में नहीं ले सकूंगी, क्योंकि मुझे चीफ से मिशन का आदेश मिल चुका है और सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस मिशन के लिये गृहमंत्रालय ने खासतौर पर मुझे अप्वाइंट किया है। अतः मुझे उस मिशन पर तुरन्त रवाना होना होगा।"
रामजीलाल महापात्रे का चेहरा धुआं-धुआं नजर आने लगा । "और जब तक मैं उस मिशन में कामयाबी हासिल नहीं कर लेती, तब तक मेरा ध्यान किसी दूसरी बात की तरफ नहीं जायेगा।"
"व... वो तो ठीक है मिस रीमा कि आपको अपने चीफ का आदेश मानना पड़ेगा। इस बीच में आप कोई दूसरा काम अपने हाथ में नहीं ले सकतीं, लेकिन मुझे ये तो बताइये कि मैं क्या करूं? मैं तो भारी मुसीबत में फंसा हुआ हूं।" वह घबराया-सा बोला।
"अपना मिशन पूरा करने के बाद ही मैं आपके काम के बारे में कुछ सोच सकती हूं और वो भी उस स्थिति में अगर मेरे हाथ में दूसरा कोई मिशन न आया तो।" वह दो टूक शब्दों में बोली।
"लेकिन आप मुझे कोई सलाह तो दे सकती हैं।"
"फिलहाल तो मैं आपको इतनी ही सलाह दे सकती हूं कि आप उस वक्त तक उस ब्लैकमेलर को टरकाते रहिये, जब तक मेरा मिशन पूरा नहीं हो जाता।"
"आपके उस मिशन में कितना वक्त लगेगा?"
"इस बारे में मैं निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकती। ये सब उस मिशन पर आधारित करेगा कि वो मिशन कैसा है? उस मिशन में एक सप्ताह भी लग सकता है और एक महीना भी।"
रामजीलाल महापात्रे के चेहरे का रंग साफ-साफ उड़ गया।
"अ... अगर इस बीच उस ब्लैकमेलर ने मेरी हत्या कर दी तो...?"
"हत्या करना इतना आसान नहीं है। उस ब्लैकमेलर की पूरी कोशिश रहेगी कि वो तुमसे दस करोड़ रुपये की मोटी रकम हासिल करे।"
"रकम न देने की सूरत में वह मेरी जान भी ले सकता है।"
"होने को तो ये भी हो सकता है कि वो आपसे दस करोड़ भी हासिल कर ले और उसके बाद आपकी हत्या भी कर दे।"
रामजीलाल महापात्रे खौफजदा नजर आने लगा।
"क... क्या ये मुमकिन है?"
"मुमकिन क्यों नहीं है?"
उसने जोरों से थूक निगली ।
"आप अपने दिमाग से अपनी हत्त्या की बात निकाल दीजिये। ब्लैकमेलर की दिलचस्पी आपकी हत्या में नहीं, बल्कि दस करोड़ की रकम में है। वह हत्या करने की धमकी दे रहा है, ताकि आप भयभीत होकर उसे रकम दे दें। इस वक्त आपको हिम्मत और हौंसले से काम लेना होगा। जैसा कि मैंने आपको बताया है कि आप उसे उस वक्त तक उलझाये रखिये जब तक मैं खाली नहीं हो जाती। उसके बाद मैं जानूंगा और मेरा काम जानेगा।"
उसने राहत की सांस ली।
"मैं अपना मिशन पूरा होते ही प्यारे से सम्पर्क स्थापित कर लूंगी। उसके बाद मैं आपके काम को सम्भाल लूंगी ।”
"थैंक्यू।"
"ऐनी प्रॉब्लम ।"
"यही एक प्रॉब्लम है, जो मैंने आपको बताई है।"
"उस प्रॉब्लम को खत्म करने की जिम्मेदारी मेरी है।"
रामजीलाल महापात्रे ने पुनः उसका शुक्रिया अदा किया।
“अब मैं चलती हूं प्यारे ।” रीमा भारती एक झटके से कुर्सी छोड़ती हुई बोली - "खुराना बेचैनी से मेरा इन्तजार कर रहा होगा।"
"इस वक्त तुम मजबूर हो। भला मैं तुम्हें कैसे रोक सकता हूं?" वह उठता हुआ बोला "चलो, मैं तुम्हें बाहर तक छोड़ आता हूं।"
"इसकी जरूरत नहीं है। मैं खुद चली जाऊंगी। तुम महापात्रे साहब से बातें करो।" वह बोली ।
कहने के साथ ही रीमा भारती घूमकर दरवाजे की तरफ बढ़ गई।
रीमा भारती को अपनी मौजूदा जिन्दगी से बहुत शिकायत थी। वह अपनी जिन्दगी अपनी इच्छानुसार जी भी नहीं सकती थी। बस उसकी जिन्दगी का एक ही मकसद रह गया था। एक-से-एक खतरनाक मुजरिमों से टकराना। न उसका अपना कोई घर था और न ही कोई परिवार का सदस्य।
वह अकेली थी।
निपट अकेली ।
इन्सान की जिन्दगी में कितनी विषमतायें थीं। उसने बड़े ही विस्तृष्णा पूर्ण भाव से सोचा-फिर भी कहा जाता था कि उस ऊपर वाले ने तमाम बन्दे एक समान बनाये थे।
कहां थी समानता ?
अपने ही ख्यालों में उलझी वह अपनी कार के करीब पहुंच गई थी। उसने एक लम्बी सर्द सांस छोड़ी और ड्राइविंग सीट सम्भालकर कार आगे बढ़ा दी। अगले क्षण कार तोप से छूटे गोले की तरह भाग निकली।
कार का रुख आई०एस०सी० के हैडक्वार्टर की तरफ था।
□□
##
वे संख्या में चार थे।
उनमें से एक पच्चीस साल के आसपास पहुंची बेहद खूबसूरत युवती थी। गोरा-चिट्टा रंग। तीखे नाक-नक्श। बॉबकट बाल। उसके जिस्म पर आसमानी रंग की शर्ट और उसी की घिसी हुई जीन्स थी।
युवती के चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता और खुरदरापन नजर आ रहा था।
उन तीनों व्यक्तियों की उम्र में लम्बा-चौड़ा फासला नहीं था। एक साल ज्यादा अथवा एक साल कम। उनकी उम्र पैंतीस साल के आसपास थी। वे तीनों ही देखने से खतरनाक किस्म के इन्सान लगते थे।
चेहरों पर खूंखारता ! और आंखों में कहर।
इस वक्त वे चारों मुम्बई इलाके चैम्बूर में सम्राट नाम के फाइव स्टार होटल के एक सुईट में एक मेज के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर बैठे थे।
चारों एक-दूसरे से अपरिचित थे।
वे दस-दस मिनट के अन्तराल से होटल के उस सुईट में पहुंचे थे। चारों की तीक्ष्ण निगाहें एक-दूसरे के चेहरे पर घूम रही थीं। चारों खामोश थे।
अभी तक उनका आपस में परिचय तक नहीं हुआ था। हर कोई इस बारे में सोचकर आश्चर्य और उलझन में था कि उसे तो किसी अज्ञात व्यक्ति ने यहां बुलाया था, लेकिन बाकी के तीन जने कौन थे और उस सुईट में क्यों आये थे?
"तुम यहां किसलिये आये हो?" सबसे पहले उस युवती के सब्र का बांध टूटा। वह अपने सामने बैठे शख्स को गहरी निगाहों से देखते हुए बोली।
"मुझे एक अज्ञात व्यक्ति ने एक जरूरी काम सौंपने के लिये बुलाया है।" उसने जवाब दिया- "उस व्यक्ति ने मुझे इस होटल के इसी सुईट का नम्बर दिया था। इसलिये मैं यहां पहुंचा हूं।"
युवती के चेहरे पर उलझन के गहरे भाव उभरे।
"लेकिन तुम इस सुईट में क्या करने आई हो?" उस व्यक्ति ने पूछा।
युवती से उस व्यक्ति ने अपने दायें-वायें बैठे व्यक्तियों को बारी-बारी से देखते हुए पूछा।
उन दोनों व्यक्तियों का भी वही जवाब था।
चारों हैरान!
अब सब कुछ आइने की तरफ साफ था।
"यानि हम चारों को एक ही अज्ञात व्र्व्याक्त ने कोई काम सौंपने के लिये इस होटल के सुईट में बुलाया है।'है।'(पृष्ठ-20)
तीनों व्यक्तियों की गर्दनें एक ही साथ सहमति से हिलीं।
"तुम तीनों में से किसी को उस व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी है?" युवती ने अपना अगला सवाल किया।
"नहीं।" तीनों के होठों से एक साथ निकला।
"तुम्हें जानकारी है।" युवती के दायीं तरफ बैठा व्यक्ति उस युवती को देखता हुआ बोला ।
"मुझे भी नहीं है।"
"कमाल है।" वह चकराया-सा बोला- "हम चारों उस व्यक्ति के बुलावे पर यहां पहुंच गये हैं, लेकिन हममें से किसी को भी इस बारे में जानकारी नहीं है कि वो शख्स कौन है?"
तीनों खामोश हो गये।
"तुम्हें मालूम है।" युवती ने सवाल करने वाले से पूछा।
"मुझे भी नहीं मालूम।"
"तुम लोगों में से किसी ने भी उस व्यक्ति से नहीं पूछा।"
"मैंने पूछा था।" युवती के सामने बैठा व्यक्ति बोल उठा- "लेकिन उसने अपने बारे में कुछ भी बताने से मना कर दिया था।"
"तुम लोग परेशान क्यों होते हो और क्यों बेकार में अपने दिमागों में उलझन बढ़ा रहे हो?" युवती के बायीं तरफ बैठा व्यक्ति बोल उठा- "जब हम चारों को उस शख्स ने यहां बुलाया है तो देर-सवेर उसके बारे में हमें मालूम हो ही जायेगा, लेकिन सबसे ज्यादा अहम् सवाल तो यह है कि उस शख्स का हमें यहां बुलाने का मकसद क्या है?"
तीनों पर कुछ कहते नहीं बना।
"हमें उसका इन्तजार करते हुए एक घंटे से ऊपर का वक्त हो गया है। आखिर वो कब यहां आयेगा?"
"जब उसने हम चारों को यहां बुलाया है तो वो जरूर आयेगा।" युवती बोली- "उसने तो मुझे कहा था कि हवाई जहाज के टिकट के अलावा जब तक मैं मुम्बई में रहूंगी, वो मेरा सारा खर्चा वहन करेगा।"
वे तीनों झटका खाकर रह गये।
"क्या तुम तीनों को भी ऐसा ही कहा गया था?" वह पुनः बोल उठी।
तीनों के सिर एक साथ सहमति से हिले।
अजीब स्थिति थी।
उत्त चारों में से किसी को भी कोई जानकारी नहीं थी। इतना जरूर था कि मामला दिलचस्प था। चारों के चेहरों पर उलझन के भाव थे। उन चारों के बीच अब तक जो वार्तालाप हुआ था। उसने उन चारों की दिलचस्पी और बढ़ा दी थी।
वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था।
"वो जब आयेगा, आता रहेगा।" युवती बोली- "ये बात तो साफ हो चुकी है कि हम चारों को एक ही शख्स ने यहां बुलाया है और ये भी जाहिर है कि हमें एक ही मकसद से बुलाया गया है। ये भी हो सकता है कि हम चारों की एक ही साथ काम करना पड़े। इसलिये हम चारों को एक-दूसरे के बारे में परिचित होना जरूरी है। कम से कम हमें एक-दूसरे के बारे में जानकारी तो मिल जायेगी।"
"ये ठीक कहती है।" उनमें से एक बोला- "अब हमें बारी-बारी से अपना परिचय दे देना चाहिये।"
"शुरुआत तुम ही करो तो बेहतर होगा।" युवती मुस्कुराकर बोली।
"मैं परिचय की शुरुआत करूं?"
"हां।"
"तुम क्यों नहीं करती?"
"मैं भी अपना परिचय बता दूंगी। में कहीं भागी नहीं जा रही। जब उस शख्स के बुलावे पर यहां आई हूं तो यहीं रहूंगी। उस वक्त तक जब तक वो अपरिचित मेरे सामने नहीं आ जाता।"
"उसके बाद क्या करोगी?"
"इसका फैसला उस व्यक्ति से मिलने के वाद करूंगी।" वह वोली- "ये बहस की बात है। इस चक्कर में मत पड़ो। अपना परिचय दो।"
"मेरा नाम जार्ज विलियम है। मैं अमेरिका के वाशिंगटन शहर का रहने वाला हूं।" वह अपना परिचय देता हुआ बोला- "वाशिगटन अण्डरवर्ल्ड में मुझे बेहरम हत्यारे का दर्जा हासिल है। किसी की भी हत्या कर देना मेरे दायें हाथ का काम है। बड़े-से-बड़े दादा मेरे नाम से घबराते हैं। अब तक मैं एक दर्जन हत्याएं कर चुका हूं। लेकिन आज तक पुलिस मेरे खिलाफ कोई सबूत हासिल नहीं कर पाई है।"
जार्ज विलियम के दायीं तरफ बैठा व्यक्ति व्यंग्य से मुस्कुराया। "तुम एक दर्जन हत्याएं कर चुके हो विलियम, लेकिन मैं अब तक चालीस हत्याएं कर चुका हू। बीस आदमियों की हत्या तो मैंने सामुहिक रूप से की थी।" वह खतरनाक स्वर में बोला- "मेरा नाम सियांग-फूं है और मैं चीन की राजधानी वैजिंग का रहने वाला हूं। बड़े-बड़े दादाओं, जुर्म के पण्डितों, अण्डरवर्ल्ड के खलीफाओं को मैंने बेहरमी की मौत मारा है। सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र अरब अमीरात में भी मेरे नाम का डंका बजता है, अगर कभी किसी राजनीतिक नेता की हत्या करनी होती है तो मुझे याद किया जाया जाता है।"
"तुम तो बड़े खतरनाक किस्म के हत्यारे हो मिस्टर सियांग-फूं।" चकरायी-सी वह युवती बोली।
"मैं कितना खतरनाक हत्यारा हूं। अभी तुमने देखा ही कहां है?"
"वक्त आने पर देख भी लूंगी।"
"देख लेना।"
"तुम भी अपने बारे में बताओ मिस्टर।" युवती ने तीसरे व्यक्ति की तरफ देखते हुए कहा।
"मेरा नाम माइकल जानसन है। में कनाडा का रहने वाला हूं।" वह बोला- "मैं किसी एक शहर में टिककर नहीं बैठता। मेरा एक शहर ने दूसरे शहर आना-जाना लगा रहता था। मैं एक पेशेवर हत्यारा हूं। बड़े-बड़े धनी लोग, गैंगस्टर और राजनेता मुझसे हत्या करवाने के लिये अपने मुल्कों में बुलाते रहते हैं। ठीक याद नहीं कि आज तक कितनी हत्याओं के पीछे मेरा हाथ है। वैसे मैंने हत्या के मामले में अपनी हाफ सेंचुरी तो पूरी कर ही ली होगी। एक खास बात और है कि आज तक मैंने जितनी भी हत्याएं की हैं। उनमें नेता, अभिनेता, पूंजीपति, माफिया डॉन जैसे लोग शामिल हैं।"
उन तीनों की निगाहें माइकल जानसन पर थीं।
सियांग-फूं और जार्ज विलियम दोनों उसे गहरी निगाहों से देख रहे थे।
युवती का चेहरा स्लेट की तरह सपाट था। उसके चेहरे पर किसी तरह के भाव तक नहीं थे।
"यानि तुम तीनों पेशेवर हत्यारे हो और दर्जनों हत्याएं कर चुके हो।"
"वो तो हम तुम्हें बता चुके हैं, लेकिन तुम कौन हो?" माइकल जानसन बोला- "तुम भी हमें अपना परिचय दो।"
"में एक मामूली लड़की हूं, जो तुम तीनों बेरहम हत्यारों के बीच आ फंसी हूं।" वह बोली।
वे तीनों मुस्कुराये।
"तुम मामूली लड़की कैसे हो सकती हो?" जार्ज विलियम बोला- "जब उस शख्स ने विश्व के तीन चुनींदा खतरनाक पेशेवर हत्यारे मुम्बई बुलाये हैं तो जाहिर है कि तुम जरूर कोई ऊंची शै हो। हमें तुम्हारे बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता है। तुमने अपने आपको एक मामूली लड़की बताकर हमारी उत्सुकता और ज्यादा बढ़ा दी है। देखने में तो तुम इंगलिश युवती लगती हो।”
"तुमने ठीक पहचाना।"
"अब लगे हाथों अपना परिचय भी दे दो।" सियांग-फूं बोला ।
"मेरा नाम जूलिया है। मैं इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन में रहती हूं। लन्दन में एनस्ले स्ट्रीट में मेरा आवास है।" एक पल ठहरकर वह बोली- "मेरे जुर्मों की फहरिश्त इतनी लम्बी है कि पुलिस के पास उनका रिकॉर्ड नहीं है। जब मैं बारह साल की थी, तब से मैंने हत्याओं का सिलसिला शुरू किया। अब मेरी उम्र पच्चीस साल के आसपास है। तेरह साल में मैंने कितनी हत्याएं की हैं, मुझे ठीक से याद नहीं है। उनमें मासूम बच्चों से लेकर औरतें और बूढ़े भी शामिल हैं। हत्याओं के अलावा डकैतियां, अपहरण जैसी वारदातों में भी मेरा काफी हाथ है। पूरे इंग्लैंड की पुलिस मुझे गिरफ्तार करने के लिये मेरे पीछे पड़ी हुई है, लेकिन वो मेरी परछाई तक को भी नहीं छू पाई है। पुलिस के लिये मैं वांटेड हूं। इंग्लैण्ड सरकार ने मेरे सिर पर दो लाख डॉलर का इनाम रखा हुआ है। एक बार मैंने फ्रांस के एक चर्चित नेता की हत्या कर दी थी। मुझे गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया तो मैं जेल से भाग निकली थी।"
उन तीनों को बिजली जैसा शॉक लगा।
"अब तुम लोग मेरे बारे में अंदाजा लगा सकते हो कि मैं कोई साधारण लड़की हूं अथवा कोई ऊंची शै।"
"यानि हम चारों एक ही डाल के पंछी हैं।" माइकल जानसन बोला।
"जाहिर है।" जवाब जार्ज विलियम ने दिया।
"एक बात तो है दोस्तों।" जूलिया बोली ।
तीनों की निगाहें जूलिया के चेहरे पर टिक गईं।
"वो क्या बात है?" सियांग-फूं बोला ।
"ये बात तो हम लोगों के परिचय के बाद साबित हो गई कि उस शख्स ने हमें किसी की हत्या करने के लिये बुलाया है।"
"ये जरूरी तो नहीं है।"
"जरूरी है।"
"कोई दूसरा काम भी तो हो सकता है।"
"दूसरा काम क्या हो सकता है?"
सियांग-फूं को जवाब नहीं सूझा।
"इस काम के अलावा दूसरा कोई काम नहीं हो सकता।(24)
सियांग-फूं अगर कोई दूसरा काम होता तो उसे हम लोगों को बुलाने की जरूरत क्यों पड़ती ? ऐसा-वैसा काम तो वो किसी से भी करवा सकता था।"
"बहस करके तुम लोग अपना दिमाग क्यों खराब कर रहे हो?" माइकल जानसन बीच में ही बोल उठा- "जो कुछ भी होगा। वो जल्दी ही हमारे सामने आ जायेगा। बस कुछ ही देर की तो बात है।"
वर्तालाप आगे नहीं बढ़ा।
"इस मसले को छोड़ो। दूसरी कोई बात करो।"
"और क्या बात करें?" जार्ज विलियम ने पूछा।
"कुछ भी बात करो।"
"जब तक वो शख्स नहीं आता, तब तक हम लोग पीने का प्रोग्राम बना लेते हैं।"
"विचार अच्छा है।"
"तुम लोग क्या पीना पसंन्द करोगे?"
"जो तुम मंगवा लो।"
"व्हिस्की चलेगी।"
"चलेगी।" वह जूलिया और सियांग-फूं की तरफ देखता हुआ बोला- "क्यों साथियों?"
"ओ०के०।"
□□□□
"इस वक्त तुम मजबूर हो। भला मैं तुम्हें कैसे रोक सकता हूं?" वह उठता हुआ बोला "चलो, मैं तुम्हें बाहर तक छोड़ आता हूं।"
"इसकी जरूरत नहीं है। मैं खुद चली जाऊंगी। तुम महापात्रे साहब से बातें करो।" वह बोली ।
कहने के साथ ही रीमा भारती घूमकर दरवाजे की तरफ बढ़ गई।
रीमा भारती को अपनी मौजूदा जिन्दगी से बहुत शिकायत थी। वह अपनी जिन्दगी अपनी इच्छानुसार जी भी नहीं सकती थी। बस उसकी जिन्दगी का एक ही मकसद रह गया था। एक-से-एक खतरनाक मुजरिमों से टकराना। न उसका अपना कोई घर था और न ही कोई परिवार का सदस्य।
वह अकेली थी।
निपट अकेली ।
इन्सान की जिन्दगी में कितनी विषमतायें थीं। उसने बड़े ही विस्तृष्णा पूर्ण भाव से सोचा-फिर भी कहा जाता था कि उस ऊपर वाले ने तमाम बन्दे एक समान बनाये थे।
कहां थी समानता ?
अपने ही ख्यालों में उलझी वह अपनी कार के करीब पहुंच गई थी। उसने एक लम्बी सर्द सांस छोड़ी और ड्राइविंग सीट सम्भालकर कार आगे बढ़ा दी। अगले क्षण कार तोप से छूटे गोले की तरह भाग निकली।
कार का रुख आई०एस०सी० के हैडक्वार्टर की तरफ था।
□□
##
वे संख्या में चार थे।
उनमें से एक पच्चीस साल के आसपास पहुंची बेहद खूबसूरत युवती थी। गोरा-चिट्टा रंग। तीखे नाक-नक्श। बॉबकट बाल। उसके जिस्म पर आसमानी रंग की शर्ट और उसी की घिसी हुई जीन्स थी।
युवती के चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता और खुरदरापन नजर आ रहा था।
उन तीनों व्यक्तियों की उम्र में लम्बा-चौड़ा फासला नहीं था। एक साल ज्यादा अथवा एक साल कम। उनकी उम्र पैंतीस साल के आसपास थी। वे तीनों ही देखने से खतरनाक किस्म के इन्सान लगते थे।
चेहरों पर खूंखारता ! और आंखों में कहर।
इस वक्त वे चारों मुम्बई इलाके चैम्बूर में सम्राट नाम के फाइव स्टार होटल के एक सुईट में एक मेज के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर बैठे थे।
चारों एक-दूसरे से अपरिचित थे।
वे दस-दस मिनट के अन्तराल से होटल के उस सुईट में पहुंचे थे। चारों की तीक्ष्ण निगाहें एक-दूसरे के चेहरे पर घूम रही थीं। चारों खामोश थे।
अभी तक उनका आपस में परिचय तक नहीं हुआ था। हर कोई इस बारे में सोचकर आश्चर्य और उलझन में था कि उसे तो किसी अज्ञात व्यक्ति ने यहां बुलाया था, लेकिन बाकी के तीन जने कौन थे और उस सुईट में क्यों आये थे?
"तुम यहां किसलिये आये हो?" सबसे पहले उस युवती के सब्र का बांध टूटा। वह अपने सामने बैठे शख्स को गहरी निगाहों से देखते हुए बोली।
"मुझे एक अज्ञात व्यक्ति ने एक जरूरी काम सौंपने के लिये बुलाया है।" उसने जवाब दिया- "उस व्यक्ति ने मुझे इस होटल के इसी सुईट का नम्बर दिया था। इसलिये मैं यहां पहुंचा हूं।"
युवती के चेहरे पर उलझन के गहरे भाव उभरे।
"लेकिन तुम इस सुईट में क्या करने आई हो?" उस व्यक्ति ने पूछा।
युवती से उस व्यक्ति ने अपने दायें-वायें बैठे व्यक्तियों को बारी-बारी से देखते हुए पूछा।
उन दोनों व्यक्तियों का भी वही जवाब था।
चारों हैरान!
अब सब कुछ आइने की तरफ साफ था।
"यानि हम चारों को एक ही अज्ञात व्र्व्याक्त ने कोई काम सौंपने के लिये इस होटल के सुईट में बुलाया है।'है।'(पृष्ठ-20)
तीनों व्यक्तियों की गर्दनें एक ही साथ सहमति से हिलीं।
"तुम तीनों में से किसी को उस व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी है?" युवती ने अपना अगला सवाल किया।
"नहीं।" तीनों के होठों से एक साथ निकला।
"तुम्हें जानकारी है।" युवती के दायीं तरफ बैठा व्यक्ति उस युवती को देखता हुआ बोला ।
"मुझे भी नहीं है।"
"कमाल है।" वह चकराया-सा बोला- "हम चारों उस व्यक्ति के बुलावे पर यहां पहुंच गये हैं, लेकिन हममें से किसी को भी इस बारे में जानकारी नहीं है कि वो शख्स कौन है?"
तीनों खामोश हो गये।
"तुम्हें मालूम है।" युवती ने सवाल करने वाले से पूछा।
"मुझे भी नहीं मालूम।"
"तुम लोगों में से किसी ने भी उस व्यक्ति से नहीं पूछा।"
"मैंने पूछा था।" युवती के सामने बैठा व्यक्ति बोल उठा- "लेकिन उसने अपने बारे में कुछ भी बताने से मना कर दिया था।"
"तुम लोग परेशान क्यों होते हो और क्यों बेकार में अपने दिमागों में उलझन बढ़ा रहे हो?" युवती के बायीं तरफ बैठा व्यक्ति बोल उठा- "जब हम चारों को उस शख्स ने यहां बुलाया है तो देर-सवेर उसके बारे में हमें मालूम हो ही जायेगा, लेकिन सबसे ज्यादा अहम् सवाल तो यह है कि उस शख्स का हमें यहां बुलाने का मकसद क्या है?"
तीनों पर कुछ कहते नहीं बना।
"हमें उसका इन्तजार करते हुए एक घंटे से ऊपर का वक्त हो गया है। आखिर वो कब यहां आयेगा?"
"जब उसने हम चारों को यहां बुलाया है तो वो जरूर आयेगा।" युवती बोली- "उसने तो मुझे कहा था कि हवाई जहाज के टिकट के अलावा जब तक मैं मुम्बई में रहूंगी, वो मेरा सारा खर्चा वहन करेगा।"
वे तीनों झटका खाकर रह गये।
"क्या तुम तीनों को भी ऐसा ही कहा गया था?" वह पुनः बोल उठी।
तीनों के सिर एक साथ सहमति से हिले।
अजीब स्थिति थी।
उत्त चारों में से किसी को भी कोई जानकारी नहीं थी। इतना जरूर था कि मामला दिलचस्प था। चारों के चेहरों पर उलझन के भाव थे। उन चारों के बीच अब तक जो वार्तालाप हुआ था। उसने उन चारों की दिलचस्पी और बढ़ा दी थी।
वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था।
"वो जब आयेगा, आता रहेगा।" युवती बोली- "ये बात तो साफ हो चुकी है कि हम चारों को एक ही शख्स ने यहां बुलाया है और ये भी जाहिर है कि हमें एक ही मकसद से बुलाया गया है। ये भी हो सकता है कि हम चारों की एक ही साथ काम करना पड़े। इसलिये हम चारों को एक-दूसरे के बारे में परिचित होना जरूरी है। कम से कम हमें एक-दूसरे के बारे में जानकारी तो मिल जायेगी।"
"ये ठीक कहती है।" उनमें से एक बोला- "अब हमें बारी-बारी से अपना परिचय दे देना चाहिये।"
"शुरुआत तुम ही करो तो बेहतर होगा।" युवती मुस्कुराकर बोली।
"मैं परिचय की शुरुआत करूं?"
"हां।"
"तुम क्यों नहीं करती?"
"मैं भी अपना परिचय बता दूंगी। में कहीं भागी नहीं जा रही। जब उस शख्स के बुलावे पर यहां आई हूं तो यहीं रहूंगी। उस वक्त तक जब तक वो अपरिचित मेरे सामने नहीं आ जाता।"
"उसके बाद क्या करोगी?"
"इसका फैसला उस व्यक्ति से मिलने के वाद करूंगी।" वह वोली- "ये बहस की बात है। इस चक्कर में मत पड़ो। अपना परिचय दो।"
"मेरा नाम जार्ज विलियम है। मैं अमेरिका के वाशिंगटन शहर का रहने वाला हूं।" वह अपना परिचय देता हुआ बोला- "वाशिगटन अण्डरवर्ल्ड में मुझे बेहरम हत्यारे का दर्जा हासिल है। किसी की भी हत्या कर देना मेरे दायें हाथ का काम है। बड़े-से-बड़े दादा मेरे नाम से घबराते हैं। अब तक मैं एक दर्जन हत्याएं कर चुका हूं। लेकिन आज तक पुलिस मेरे खिलाफ कोई सबूत हासिल नहीं कर पाई है।"
जार्ज विलियम के दायीं तरफ बैठा व्यक्ति व्यंग्य से मुस्कुराया। "तुम एक दर्जन हत्याएं कर चुके हो विलियम, लेकिन मैं अब तक चालीस हत्याएं कर चुका हू। बीस आदमियों की हत्या तो मैंने सामुहिक रूप से की थी।" वह खतरनाक स्वर में बोला- "मेरा नाम सियांग-फूं है और मैं चीन की राजधानी वैजिंग का रहने वाला हूं। बड़े-बड़े दादाओं, जुर्म के पण्डितों, अण्डरवर्ल्ड के खलीफाओं को मैंने बेहरमी की मौत मारा है। सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र अरब अमीरात में भी मेरे नाम का डंका बजता है, अगर कभी किसी राजनीतिक नेता की हत्या करनी होती है तो मुझे याद किया जाया जाता है।"
"तुम तो बड़े खतरनाक किस्म के हत्यारे हो मिस्टर सियांग-फूं।" चकरायी-सी वह युवती बोली।
"मैं कितना खतरनाक हत्यारा हूं। अभी तुमने देखा ही कहां है?"
"वक्त आने पर देख भी लूंगी।"
"देख लेना।"
"तुम भी अपने बारे में बताओ मिस्टर।" युवती ने तीसरे व्यक्ति की तरफ देखते हुए कहा।
"मेरा नाम माइकल जानसन है। में कनाडा का रहने वाला हूं।" वह बोला- "मैं किसी एक शहर में टिककर नहीं बैठता। मेरा एक शहर ने दूसरे शहर आना-जाना लगा रहता था। मैं एक पेशेवर हत्यारा हूं। बड़े-बड़े धनी लोग, गैंगस्टर और राजनेता मुझसे हत्या करवाने के लिये अपने मुल्कों में बुलाते रहते हैं। ठीक याद नहीं कि आज तक कितनी हत्याओं के पीछे मेरा हाथ है। वैसे मैंने हत्या के मामले में अपनी हाफ सेंचुरी तो पूरी कर ही ली होगी। एक खास बात और है कि आज तक मैंने जितनी भी हत्याएं की हैं। उनमें नेता, अभिनेता, पूंजीपति, माफिया डॉन जैसे लोग शामिल हैं।"
उन तीनों की निगाहें माइकल जानसन पर थीं।
सियांग-फूं और जार्ज विलियम दोनों उसे गहरी निगाहों से देख रहे थे।
युवती का चेहरा स्लेट की तरह सपाट था। उसके चेहरे पर किसी तरह के भाव तक नहीं थे।
"यानि तुम तीनों पेशेवर हत्यारे हो और दर्जनों हत्याएं कर चुके हो।"
"वो तो हम तुम्हें बता चुके हैं, लेकिन तुम कौन हो?" माइकल जानसन बोला- "तुम भी हमें अपना परिचय दो।"
"में एक मामूली लड़की हूं, जो तुम तीनों बेरहम हत्यारों के बीच आ फंसी हूं।" वह बोली।
वे तीनों मुस्कुराये।
"तुम मामूली लड़की कैसे हो सकती हो?" जार्ज विलियम बोला- "जब उस शख्स ने विश्व के तीन चुनींदा खतरनाक पेशेवर हत्यारे मुम्बई बुलाये हैं तो जाहिर है कि तुम जरूर कोई ऊंची शै हो। हमें तुम्हारे बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता है। तुमने अपने आपको एक मामूली लड़की बताकर हमारी उत्सुकता और ज्यादा बढ़ा दी है। देखने में तो तुम इंगलिश युवती लगती हो।”
"तुमने ठीक पहचाना।"
"अब लगे हाथों अपना परिचय भी दे दो।" सियांग-फूं बोला ।
"मेरा नाम जूलिया है। मैं इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन में रहती हूं। लन्दन में एनस्ले स्ट्रीट में मेरा आवास है।" एक पल ठहरकर वह बोली- "मेरे जुर्मों की फहरिश्त इतनी लम्बी है कि पुलिस के पास उनका रिकॉर्ड नहीं है। जब मैं बारह साल की थी, तब से मैंने हत्याओं का सिलसिला शुरू किया। अब मेरी उम्र पच्चीस साल के आसपास है। तेरह साल में मैंने कितनी हत्याएं की हैं, मुझे ठीक से याद नहीं है। उनमें मासूम बच्चों से लेकर औरतें और बूढ़े भी शामिल हैं। हत्याओं के अलावा डकैतियां, अपहरण जैसी वारदातों में भी मेरा काफी हाथ है। पूरे इंग्लैंड की पुलिस मुझे गिरफ्तार करने के लिये मेरे पीछे पड़ी हुई है, लेकिन वो मेरी परछाई तक को भी नहीं छू पाई है। पुलिस के लिये मैं वांटेड हूं। इंग्लैण्ड सरकार ने मेरे सिर पर दो लाख डॉलर का इनाम रखा हुआ है। एक बार मैंने फ्रांस के एक चर्चित नेता की हत्या कर दी थी। मुझे गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया तो मैं जेल से भाग निकली थी।"
उन तीनों को बिजली जैसा शॉक लगा।
"अब तुम लोग मेरे बारे में अंदाजा लगा सकते हो कि मैं कोई साधारण लड़की हूं अथवा कोई ऊंची शै।"
"यानि हम चारों एक ही डाल के पंछी हैं।" माइकल जानसन बोला।
"जाहिर है।" जवाब जार्ज विलियम ने दिया।
"एक बात तो है दोस्तों।" जूलिया बोली ।
तीनों की निगाहें जूलिया के चेहरे पर टिक गईं।
"वो क्या बात है?" सियांग-फूं बोला ।
"ये बात तो हम लोगों के परिचय के बाद साबित हो गई कि उस शख्स ने हमें किसी की हत्या करने के लिये बुलाया है।"
"ये जरूरी तो नहीं है।"
"जरूरी है।"
"कोई दूसरा काम भी तो हो सकता है।"
"दूसरा काम क्या हो सकता है?"
सियांग-फूं को जवाब नहीं सूझा।
"इस काम के अलावा दूसरा कोई काम नहीं हो सकता।(24)
सियांग-फूं अगर कोई दूसरा काम होता तो उसे हम लोगों को बुलाने की जरूरत क्यों पड़ती ? ऐसा-वैसा काम तो वो किसी से भी करवा सकता था।"
"बहस करके तुम लोग अपना दिमाग क्यों खराब कर रहे हो?" माइकल जानसन बीच में ही बोल उठा- "जो कुछ भी होगा। वो जल्दी ही हमारे सामने आ जायेगा। बस कुछ ही देर की तो बात है।"
वर्तालाप आगे नहीं बढ़ा।
"इस मसले को छोड़ो। दूसरी कोई बात करो।"
"और क्या बात करें?" जार्ज विलियम ने पूछा।
"कुछ भी बात करो।"
"जब तक वो शख्स नहीं आता, तब तक हम लोग पीने का प्रोग्राम बना लेते हैं।"
"विचार अच्छा है।"
"तुम लोग क्या पीना पसंन्द करोगे?"
"जो तुम मंगवा लो।"
"व्हिस्की चलेगी।"
"चलेगी।" वह जूलिया और सियांग-फूं की तरफ देखता हुआ बोला- "क्यों साथियों?"
"ओ०के०।"
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