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रविवार, 17 दिसंबर 2023
शनिवार, 23 सितंबर 2023
संघर्षकाल और जनप्रिय- सत्य व्यास
संघर्षकाल और जनप्रिय- सत्य व्यास
यह एक ऐसी जिंस है जिसके लिए इसके लिए न सिर्फ अच्छा लेखक होना बल्कि उम्दा इंसान होना भी मूलभूत गुण है।
जनप्रिय ओम प्रकाश शर्मा दोनों ही थे। बकौल "आबिद रिजवी" दोपहर में जनप्रिय के घर के सामने से गुजरते घोस्ट राइटर या संघर्षरत लेखकों में से कोई ऐसा नहीं होता था,जो उनकी नजर में आ जाए और बिना खाना खाए गुजर जाए।"
दरअसल,तब मेरठ पॉकेट बुक्स के प्रकाशकों का बड़ा बाजार था (मेरी समझ से यह भी जनप्रिय की ही देन थी, उन्होंने दिल्ली छोड़ कर मेरठ को अपने लेखन का शहर बनाने के प्रयास में व्यवसायियों को प्रकाशन की राह दिखाई।बाकी सब इतिहास है)
तब के प्रयत्नशील और संघर्षरत लेखक, मैनपुरी,इटावा, बरेली,हापुड़ जैसे शहरों से अपनी पांडुलिपि जमा करने प्रकाशकों के पास आते और पहुंचते न पहुंचते दोपहर तक भूखे रह जाते। जनप्रिय यह पीड़ा समझते थे। कोई लेखक यदि उनकी आंखों के आगे पद जाता तो वह साधिकार उन्हें घर ले आते।
जनप्रिय ने लेखकों की पांडुलिपि देखने की कोशिश नही की। कारण यह था कि वह जानते थे कि 90 फीसद लेखक उनके ही पात्रों पर रची पांडुलिपि लेकर आए हैं।जिन्हे बाद में प्रकाशक "ओम प्रकाश शर्मा" के जाली नाम से ही चिपका कर प्रकाशित कर देगा।वह युवा और संघर्षरत लेखकों को इसलिए दोषी भी नहीं मानते थे। द ट्रिब्यून(संभवतः) को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था वह जानते थे कि यह युवा लेखकों की रोजी रोटी का मसला है। असली दोषी तो प्रकाशक हैं। वह ट्रेड नामों के खिलाफ लामबंद होने के लिए स्थापित लेखकों से आग्रह करते रहे। मगर हासिल वह स्वयं भी जानते ही थे।
बहरहाल साथ लगी कतरन और कवर सामाजिक लेखक साधना प्रतापी की 1970 में प्रकाशित उपन्यास "अंधेरी रात के हमसफर से है" जहां उन्होंने ओम प्रकाश शर्मा की प्रतिष्ठा की बाबत जिक्र किया है। गौरतलब यह कि साधना प्रतापी, सत्तर के दशक में स्वयं ही एक अच्छे लेखक थे।उनकी दो एक किताबों का फिल्मीकरण भी हुआ है।
किताब के नाम और कवर पर न जाएं। यह भ्रामक ही हुआ करती थीं । कहानी एक संघर्षरत लेखक की है, जो अपना उपन्यास प्रकाशित करवाना चाहता है।
आलेख- सत्य व्यास
रविवार, 11 दिसंबर 2022
काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा - योगेश मित्तल
काम्बोजनामा :वेदप्रकाश काम्बोज की लेखन यात्रा
कुछ लोग अपनी जीवनी लिखते हैं - कुछ किसी अन्य की, लेकिन इमोशन के बादशाह राम पुजारी जब कुछ लिखते हैं, अपना सब कुछ उसमें इस तरह झोंक देते हैं, इस कदर झोंक देते हैं कि लिखी हुई पुस्तक खूबसूरत शब्दों की एक गंगा बन, आनन्दप्रद शीतल धारा की तरह मन-मस्तिष्क और आत्मा में मीठे-मीठे एहसास और प्रसंग, चित्र की भाँति उकेरती और चलचित्र की भाँति उभारती चली जाती है। काम्बोजनामा - जासूसी साहित्य में वर्षों शीर्ष पर रहने वाले दिग्गज उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज की सहज-सरल जीवनी नहीं है। यह उनका जन्म से अब तक का जिन्दगीनामा भी नहीं है। यह तो वेद प्रकाश काम्बोज के लेखकीय जीवन के अनन्त अच्छे-बुरे, सरल-कठिन, खट्टे-मीठे प्रसंगों की बेहद खूबसूरत झांकी है, जिसके लिए मैं आदरणीय वेद प्रकाश
बुधवार, 1 जून 2022
राजहंस उपन्यास साहित्य- महत्ता और प्रासंगिकता
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य- महत्ता और प्रासंगिकता
(राजहंस के विशेष संदर्भ में) डाॅ. ओकांरनारायण सिंहलोकप्रिय उपन्यास साहित्य में उपन्यासों की विशिष्टताओं पर कभी कुछ नहीं लिखा गया। किसी भी साहित्य की व्याख्या में उसकी रचनाओं के संदर्भ में जब तक कुछ वर्णन न हो तो उस साहित्य को समझना कुछ क्लिष्ट हो सकता है। इसी संदर्भ में डाॅ.ओंकार नारायण सिंह (सेवानिवृत्त सह-आचार्य, इतिहास) उपन्यासकार राजहंस उर्फ केवलकृष्ण कालिया जी के उपन्यासों की विशिष्टताओं पर यह विशेष आलेख लिखा है, मेरे विचार से यह लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में प्रथम प्रयास है।
साहित्य जगत के अन्तर्गत लोकप्रिय बनाम गम्भीर साहित्य विषयक विमर्श अनेकविध चर्चित होता रहा है। कथित बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा मान्य साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य को 'स्तरीय' तथा पॉकेट बुक्स रचनाओं को 'लुगदी साहित्य' की संज्ञा से विभूषित किया जाता रहा है। बिना इस तथ्य पर विचार किये कि तथाकथित स्तरीय साहित्य अपवादों के अतिरिक्त प्रायः पुस्तकालयों तक ही सीमित रहता है, जबकि लुगदी साहित्य की पहुँच घर-घर आबालवृद्ध-महिला तक रही है,जो उनके मनोरंजन का साधन बनने के समानान्तर चिंतन-विचार को भी प्रभावित करता रहा है। वस्तुत: यथार्थ साहित्य वह होता है जो सृजनात्मक मानदण्डों पर खरा उतरने के साथ जन-मन के शोध-बोध अथवा मनन-व्यवहार का भी आधार सिद्ध हो, यथा रामचरित मानस।
उपर्युक्त विचार दृष्टि से प्रस्तुत शोध-आलेख के अन्तर्गत उपन्यासकार 'राजहंस' उर्फ केवलकृष्ण कालिया के उपन्यासों की रचना शैली एवं सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के साथ-साथ साम्प्रतिक प्रासंगिकता को निरूपित करने का प्रयास हुआ है। इसी संदर्भ में उनके मार्च -1974 में प्रकाशित 'सुहागिन' उपन्यास से सितम्बर 1998 ई. में प्रकाशित 'वापसी' तक के उपन्यासों को समाविष्ट किया गया है।
'राजहंस' के उपन्यासों की विशिष्टता- अन्तर्गत तक छू लेने वाले संवाद, मर्मस्पर्शी भाव-संवेदन तथा प्रत्येक परिवेश-व्यवहार का यथार्थ चित्रण रही है जिस शिद्दत से उन्होने 'सुहागिन, उल्फल, प्यासे सपने, प्यासी आँखें, धुआँ, तमाशा, मेहरबान, भीगा आँचल, नन्हां मसीहा, प्यासी आग और अहसास' उपन्यासों में ग्राम्य-संस्कृति सहजता, सरलता, सरसता का निरुपण किया है और उसी प्रखरता से मानवता, सुनीता, दलदल, तीसरा, आग, आहट, झूठे रिश्ते, भटकन, नसीब, दरिंदा, सौतेला, सेवक, राजा साहब, दुखियारी, आवारा, कोहरा, चिराग, कैसे कैसे लोग, तिनके इत्यादि उपन्यासों में नगरीय जीवन की विसंगति-विद्रूपता, साम्बन्धिक जटिलता, स्वार्थ, वासनान्धता विषयक अपसंस्कृति का भी निदर्शन किया है।
ग्राम्य आचार-विचार के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद के कथा साहित्य में वर्णित आमोद-प्रमोद राजहंस के उपन्यास अहसास, छोटी बहू के वैवाहिक वृतांतों में जीवन्त होता प्रतीत होता है। वन्य जीवन की दुरुहताएं जहाँ जोगी, तीसरा, प्यारा दुश्मन, मन मंदिर उपन्यासों में प्रकट हुयी है वहीं अभ्यारण्य संस्कृति की विशिष्टताएं 'प्यार नहीं बिकता', 'वापसी' आदि में अभिव्यक्त हुयी हैं।
इसी क्रम में कृषि-फार्मों के संघर्ष-द्वंद्व 'बिरजू, आशियाना, अपना कोई नहीं, बेगाना, संगदिल' उपन्यासों में संपूर्ण मार्मिकता से निर्दिष्ट किये गये हैं। 'जन्मदाता, टूटती दीवारें, फरिश्ता, बसेरा, दर्द' इत्यादि में पार्वत्य जीवन की संघर्षशीलता के समानान्तर 'शिकवा, अधूरी सुहागिन, अधूरा पति, दूरियां, आँधी' उपन्यासों में समुद्रतटीय संस्कृति का वैविध्य निरुपित हुआ है।
एक ओर चाय बागान विषयक जानकारी 'उल्फत, जीवनसाथी, प्यारा दुश्मन' से उपलब्ध होती है तो दूसरी तरफ दस्यु जीवन का लोमहर्षक विवरण 'नजराना, योगी, तीसरा, सेवक' उपन्यासों में प्राप्त होता है। इसी प्रकार तस्कर प्रवृति की दुरभिसंधियों, अनाचार, विनाश का उल्फ़्त का वर्णन 'दलदल, मजबूर, तिनके, अधूरा पति, राजा साहब, आग' आदि उपन्यासों में अनुरेखन हुआ है।
बुर्दाफरोशी (मानवतस्करी) का निर्मम, एवं यंत्रणामय निरुपण 'कसक, उसके पीछे, उल्फ़्त, मनमंदिर, आँधी, छोटी बहू, स्वामी' में करने के समानान्तर देह व्यापारगत, दारुणता, विवशता का चित्रण 'उल्फ़्त, दलदल, अंधेरा, उसके साजन, अंधविश्वास, बेवफा दोस्त, तिनके और कैसे-कैसे लोग' में किया गया है। स
समकालीन समाज में निर्देशित दबंगों के अत्याचार का मर्मान्तक दिग्दर्शन 'सुहागिन, धुँआ, सिसकता, सवेरा, छाव, नन्हां मसीहा, जलते आँसू, बिरजू, दूरियां' इत्यादि उपन्यासों में हुआ है।
इसी प्रकार धर्म के चोले में मूर्तिमान पाप का आशियाना, स्वामी, छाव, दरिंदा आदि में पर्दाफाश किया गया है। आॅनर किलिंग सरीखी सामाजिक बुराई अपने दुष्परिणामों सहित 'नजराना', 'नन्हां मसीहा' में अभिव्यक्त होने के समानान्तर घर-परिवार के अनैतिक संबंधों तथा ढकी-छुपी वेश्यावृत्ति का वास्तविक प्रकटीकरण एवं तत्जनित विभीषिकाओं का शिकवा, प्यासे सपनें, सुनीता, मेहरबान, प्यासी आँखें, मानवता, घायल, टूटती दीवारें, भटकन, पापी, आहट, दुखियारी, फैसला, तमाशा, अन्यायी, बड़ी माँ, हवेली की दुल्हन, कोहरा, सेवक, वापसी, अधूरा पति, इत्यादि उपन्यासों में सजीव चित्रण हुआ है।
सामाजिक विद्रूपता और दोहरे मापदण्ड 'तमाशा, अँधेरी राहें, अविश्वास, , भटकन, कड़वा सच, सौतेला, बुजदिल, अहसास, जीवन साथी, बेवफा दोस्त, अधूरा पति' इत्यादि में पूरी प्रबलता से निर्दिष्ट करते हुये उनके कारण अनेक जीवन प्रभावित होने का मार्मिक निरुपण किया गया है।
मन जीवन का कटु यथार्थ समूची भाव- संवेदना सहित 'शिकवा, प्यासी आँखें, बिरजू, सुनीता, नजराना, अंगारे, अपना कॊई नहीं, दीदी, प्यार नहीं बिकता, प्यासी आग, चिराग, जलते आंसू' में व्यक्त हुआ है।
नियतिगत विडम्बनाएं 'योगी, अविश्वास, तीसरा, अधूरी सुहागिन, सूना आँगन, बेवफा दोस्त' में जीवन को आमूल चूल परिवर्तन कर देने वाली सिद्ध हुयी हैं। विश्वस्त बनकर विश्वासघात के रूप में घर-घर की कहानी 'प्यासी आँखें, मानवता, दलदल, भटकन, जीवन साथी, आहट, प्यारा दुश्मन, धुँआ, तिनके, कैसे-कैसे लोग, प्यासी आग के अन्तर्गत शब्दित हुयी हैं।
बेवफाई की फितरत को उकेरते 'शिकवा, मेहरबान, आहट, टूटती दीवारें, बेगाना, दुखियारी, नसीब, संगदिल, मेहंदी रचे हाथ, अहसास' आदि उपन्यासों के समानान्तर प्रीति समर्पण की प्रकाष्ठा 'सुहागिन, प्यासे सपने, बिरजू, अधूरी सुहागिन, झूठे रिश्ते, टूटा सपना, नसीब, प्यार नहीं बिकता, दूरियां, बसेरा' आदि में मुखर हुयी है।
राजहंस के विविधरंगी रचना-संसार के अन्तर्गत जहाँ 'शिकवा, दलदल, पापी, जन्म दाता, आग' में उन्मुक्त महाविद्यालयीन परिवेश निर्दिष्ट होता वहीं 'मेहरबान, सूना आँगन, बसेरा' में फौजी जीवन की विशिष्टताएं निर्दिष्ट हुयी हैं। एक ओर राजनीतिज्ञों द्वारा युवावर्ग को स्वार्थ साधन बना दिग्भ्रमित तथा पतित करने का चित्रण 'आग, औरत, नासूर' आदि में हुआ है तो दूसरी ओर कौतुहल, लालसा भरे मासूमों को पथभ्रष्ट कर उनका जीवन नष्ट करने के ज्वलंत उदाहरण 'कसक, जीवन साथी, छोटी बहू, तिनके, दूरियां, मनमंदिर, स्वामी' आदि में उपलब्ध होते हैं। इसी क्रम में दहेज के दंश समानान्तर दहेज कानून के दुरुपयोग का मार्मिक विवरण 'मेंहदी रचे हाथ' उपन्यास में निरुपित हुआ है। जबकि 'कड़वा सच' में घर- समाज में परिव्याप्त दबी-ढकी सड़ांध समूर्त होती है।
समलैंगिकता की व्यथा 'झूठे रिश्ते', तथा 'दरिंदा' में वहाँ मर्मस्पर्शी रूप से अभिव्यक्त होती है वहीं ड्रग्स के दावानल में झुलसती नयी पीढी का यातनामय जीवन 'तीसरा, चिराग, प्यार नहीं बिकता, कैसे-कैसे लोग' में निरुपित हुआ है। अभिजात संस्कृति के वैभव का 'बड़ी माँ, हवेली की दुल्हन, टूटा सपना' उपन्यासों में निदर्शन उपन्यासों के समानान्तर दारिद्रय की वेदना एवं शोषण 'घायल, अँधेरी राहें, उसके पीछे, नन्हां मसीहा, दीदी, भीगा आँचल' आदि में मुखरित हुयी है। 'बेवफा दोस्त' में मित्रता जा चरम तथा 'आवारा' में प्रतिशोध की दारुणता निर्दिष्ट हुयी है।
'प्यासी आँखें' में वैवध्य तथा पुनर्विवाह की कारुणिकता का विपरीत पदन 'तमाशा' में विधुर के बेमेल पुनर्विवाह के दुष्परिणामों के रूप में प्रकट हुआ है। संदेह के दंश से त्रस्त जीवन 'अधूरा पति, अविश्वास, दर्द और बेवफा दोस्त' के अन्तर्गत एक ऐसी भूल की भेंट चढ जाते हैं, जो कभी हुयी ही नहीं थी। 'जन्मदाता' येनकेन प्रकातेण वासनापूर्ति के परिणामस्वरूप उत्पन्न जीवन की व्यथा तथा वैधानिकता को प्रश्नबद्ध करती है। 'तमाशा' मृगमरीचिका ग्रस्त साम्बन्धिक जटिलताओं का दस्तावेज है। 'भटकन' नारी मन जीवन की अधूरी लालसाओं का कथानक है। बचपन के प्यार की नियतिगत विडम्बना के निवारणार्थ सहारा देने के बावजूद सामाजिक प्रताड़ना से विचलित होकर बेसहारा कर दिये जाने की कापुरुषता का रेखांकन 'बुजदिल' में किया गया है, इसी प्रकार हर्षित नारी के बलात्कारी के साथ ही सामाजिक रीति नीति की विवशतावश विवाह कर दिये जाने के बाद की मन:स्थिति अथवा संत्रास का जीवंत वर्णन 'सुहागिन' तथा 'सौतेला' में निर्दिष्ट हुआ। पति द्वारा पत्नी के पतन का कारण भूत होने की लिप्सा, कुत्सितता 'अँधेरी राहें, दरिंदा, तमाशा, दूरियां' में पिता द्वारा पुत्री तथा भाई द्वारा बहन के प्रति ऐसी ही वंचना क्रमशः 'अन्यायी, घाव, मेहरबान, अधूरा पति' में निर्देषित करते हुये संबंधों का काला पक्ष उजागर किया गया है।
समकालिक लेखक-प्रकाशक द्वंद्व से सम्बद्ध विवादों का निरुपण 'अँधेरा' में हुआ है। पिता की भूलों का दुष्परिणाम पुत्र द्वारा और भाई की भूल का खामियाजा बहन द्वारा भुगतना क्रमशः 'फैसला, प्यास, दुश्मन, आवारा, मानवता, चिराग' में मार्मिक रूप से अभिव्यक्त हुआ है। इसी प्रकार हत्यारे द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर उससे जुड़े लोगों के जीवन एवं सपनों की भी उसके साथ ही हत्या हो जाने का चिरंतन यथार्थ, उसके पीछे में शिसात्मक दृष्टि से प्रदर्शित हुआ है।
सारांशत: लोकप्रिय साहित्य में परिगणित उपन्यासों के रचयिता राजहंस की भावप्रवण भाषा शैली, संवाद संवेदन, विषयचयन, मार्मिक व्यथा, अभिव्यंजना, प्रासंगिकता व यथार्थ प्रस्तुतीकरण उनके साहित्य को गंभीर साहित्य से किसी भी प्रकार कमत्तर नहीं रहने देता। प्रत्यत् स्तरीयता की कसौटी पर खरा सिद्ध होने के समानान्तर मात्र पुस्तकालयों की शोभा बढाने के स्थान पर जन-मन को आंदोलित करते हुये प्रचुर पाठक समुदाय अर्जित करता है।
प्रणय प्रतिगत वेदना, कसक के समानान्तर प्रेमिल भाव, संवेदनागत, उत्फुल्लता, हासविलास के हृदयस्पर्शी निदर्शन तो उनके अधिकांश उपन्यासों की विशेषता है। साथ ही परित्यकता, विधवा व अपहृत महिला के प्रति संकुचित दृष्टि-व्यवहार, पितृसत्तात्मक संस्कृति के अन्तर्गत नारी-पुरुष के विचलन के प्रति दोहरे मापदण्ड, धार्मिकता के कलेवर में पनपती कलुषता, संबंधों की ओट में बढते दुराचार और आसक्ति, शोषण, षड्यंत्रगत उभयपक्षीय प्रलोभन-पतन की अपसंस्कृति का भी प्रकटीकरण उनकी लेखनी द्वारा हुआ है। समकालीन 'आॅप्रेशन ब्लू स्टार' के संदर्भ में रचित उपन्यास 'स्वामी', सुपारी किलिंग को निदर्शित करते हुये 'आग, दलदल, छोटी बहू, प्यासी आग, बिरजू, सूना आंगन' इत्यादि युगीन प्रासंगिक विषयों को संस्पर्शित करते हैं। काॅलेज परिवेशगत प्रदूषण 'पापी, अधूरी सुहागिन, आग, नासूर' आदि उपन्यासों में तथा नाश के पर्याय नशे से उद्भूत दारुण गाथा 'तीसरा, चिराग, आवारा' में अभिव्यक्त हुयी है।
कतिपय संवाद सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक कोटि के प्रतीत होते हैं। यथा...
- तो मेरे साथ जी नहीं तो मेरे भी क्यों? (शिकवा)
- जो प्यार करते हैं वे नफरत नहीं कर पाता करते, जो नफरत कर सकते हैं, उन्हे प्यार कभी था ही नहीं। (प्यासे सपने)
- जो सह नहीं सकता, वह लिख भी नहीं सकता। वह केवल शब्दों का जाल बुन सकता है। (अँधेरा)
- जब भी दर्द सहने की सीमा से आगे निकलने लगता है, उसे पन्नों पर बिखेर कर देखता रहता हूँ। (मेहरबान)
- जिस खून की गर्मी में आज तुम स्वयं को गलाती चली जा रही हो, उसी का रंग चुराकर पन्नें रंगती चली जाओ। (भटकन)
- जिंदगी बेवफा हो सकती है,....पीड़ा बहुत वफादार होती है। (दीदी)
- उपन्यासकार कोई भी हो, यदि अनुभव के आधार पर लिखता है तो वह मनुष्य होकर मनुष्यों की बात ही करता है। (दुखियारी)
प्रस्तुति-
डाॅ.ओंकार नारायण सिंह, सेवानिवृत्त सह-आचार्य, इतिहास,
पुरोहितों का वास,
समदड़ी रेलवे स्टेशन(जिला बाड़मेर)राजस्थान
शनिवार, 20 नवंबर 2021
कैसे बना मैं उपन्यासकार- तरुण इंजिनियर
'मैं उपन्यासकार कैसे बना' शृंखला के इस अंक में आप पढेंगे उपन्यासकार तरुण इंजिनियर के उपन्यासकार जीवन के आरम्भिक अंश कैसे बन उपन्यासकार बने।
कैसे बना मैं उपन्यासकार
दोस्तो,
मैं आपको बता दू कि मेरा जन्म बिजनौर के एक छोटे से कस्बे किरतपुर के रस्तोगी परिवार में सन् 1960 में हुआ था,मेरा पूरा नाम तरुण कुमार रस्तोगी है
बचपन से ही मैं नटखट व लेखक प्रवृत्ति क रहा हूँ। जिसकी वजह से मेरे पिता श्री रामनाथ रस्तोगी ने मुझे घर से दूर, नैनीताल पढने के भेज दिया था। उनका मानना था कि घर से दूर रहकर शायद मेरे जहन से लेखक रूपी कीड़ा एकदम मर जायेगा, पर ऐसा हुआ नहीं।
नैनिताल की वादियों में पहुंचकर, मेरे दिमाग ने शब्दरूपी झील में, कलम की परवार चलानी फिर शुरु कर दी क्योंकि नैनिताल का वातावरण ही कुछ ऐसा है, यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर ना कुछ लिखने वाला भी लिखना शुरु कर देता है।
यही मेरे साथ हुआ। पढाई के साथ-साथ मेरी लघु कहानियाँ, कवितायें व गजलें देश की नामी-गिरामी पत्रिकाओं 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी' व 'नंदन' में प्रकाशित होने लगी। प्रशंसकों के पत्र आते रहे। मैं एक के बाद एक कहानियाँ लिखता गया। कुछ हास्य लेख मेरे 'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स' व 'पंजाब केसरी' में भी छपे। दिन कटते रहे...साल कटते रहे, अचानक एक दिन मेरी मुलाकात हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार रानू से हो गयी। जो उस समय नैनिताल की एक सत्य घटना पर आधारित 'पूजा' उपन्यास लिखने के लिये आये हुये थे। मेरी उनसे मुलाकातें होती रही, फिर मुलाकातें दोस्ती में बदल गयी और कुछ ही दिनों में रानू जी मेरे अच्छे दोस्तों में से एक बन गये। जितना मैं उनके सम्पर्क में आता गया, मेरे अंदर भी उपन्यासकार बनने की ललक जागने लगी। मैं उनके साथ बैठकर छोटे-छोटे शाॅट लिखने लगा। उन्हें पसंद आये और उन्होंने मेरी प्रशंसा की, मेरा हौसला बढ गया।
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की पुण्यतिथि पर
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021
हिंदी साहित्य और जासूसी उपन्यास – गोविंद सिंह
हिंदी साहित्य और जासूसी उपन्यास – गोविंद सिंह
शनिवार, 31 जुलाई 2021
कलाकार और मौत- पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'
कलाकार और मौत - पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। 'जंजीर'(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था।
गत फरवरी के प्रथम सप्ताह में संवाद पढने को मिला कि एक अमरीकी उपन्यासकार और सुलेखक तथा उसकी परम सुंदर पत्नी की हत्या किसी ने रातो रात कर डाली। हत्या के पूर्व उन्हें निर्दयता से पीटा गया, फिर छुरे घुसेड़े गये और फिर गोली मारी गयी। जरा हिंसा का शृंगार, 'फिनिश' तो देखिये। 'वीभत्स' का कैसा विस्तार ! चित्रकार जैसे रंग-रंग से चित्र रगे, गवैया जैसे ढंग-ढंग तान पलेट लेकर संगीत सँवारे, कवि जैसे अक्षर, छंद, ध्वनि और रस से काव्य करे वैसी ही शांति, व्यवस्था और मनोयोग से हत्यारा हत्या भी करे! समाचार पढने के बाद मेरे मन में आया कि उस अमरीकी कलाकार की मृतात्मा से कभी भेंट होती तो मैं उससे पूछता कि जीवन में अधिक मजा था या मृत्यु में? यश में अधिक आनंद था या हंटरों से निर्दय पीटे जाने में? स्वार्थ और छुरे में से छाती की छलनी अधिक उन्माद से कौन करता है? खूबसूरत औरत और पिस्तौल की गोली में कितना फर्क है? उस अभागिनी सुंदरी से भी मैं जरूर पूछता कि रूप और मृत्यु में (ओ आर्या रूपवती शत्रु!) कोई भेद है भी?
कुशवाहा कांत
हिंदी कथा साहित्य से अगर आपका जरा भी संबंध है, तो आपने कुशवाहा कांत का नाम जरूर सुना होगा। यह दूसरी बात है कि आपने उक्त नाम अप्रसन्नता से सुना हो या प्रसन्नता से। 'उग्र गुरुड़म' में नहीं विश्वास करते बला से- यह लोग कुशवाहा कांत की 'उग्र स्कूल' का कलाकार मानते थे। हिंदी में फिलहाल मेरी नजरों में कमोबेश `उग्र स्कूल` का ही बोलबाला है। यद्यपि `उग्र` बीसियों बरसों से नहीं के बराबर लिखते हैं। पर स्वयं मैं उसे अपने स्कूल के महज एक शाखा का विद्यार्थी मानता था। उस शाखा का नाम रख लीजिये `यौन सनसनी`। वर्तमान विश्व का बौद्धिक बाजार- खासकर दूसरे महायुद्ध के बाद- इसी सनसनी से सनक रहा है। मगर पहले मुझे कुशवाहा कांत की खबर लेने दीजिये।
कल और कलदार
मेर बातों का आप विश्वास करे तो मैंने अपनी रचनाओं में समाज को `ज्यो का त्यों` दर्शाने के फेर में `यौन सनसनी` को सजाया था, कलदार कमाने के लिये नहीं, पर दुर्याग्य से, `यौन सनसनी` चित्रण में-अपना सा मुहँ देखकर-बाजार के खरीददार चकाचक रस लेते हैं। रचनाओं की बिक्री तब ही होती है। पैसों की तो बरसात हो जाती है। एक बार मैंने ही कितने रुपये कमाये थे और कितने वक्त में। श्री ॠषभ जैन का उत्थान पर्व भी आपको भूला न होगा। वैसे ही कुशवाहा कांत ने खूब रुपये कमाये। कहने वाले तो सैकड़ों हजार की कहानियां सुनाते हैं। मुझे इतना मालूम है कि एक दिन एक टाइप के पाठक काशी से कन्याकुमारी तक कुशवाहा कांत को हिंदी का श्रेष्ठ उपन्यासकार मानते थे? जब हिंदी के बिगड़े साहित्यिक और कलाकार उसको असफल, अश्लील कह रहे थे, तब वह बनारस में अपना बड़ा सा प्रेस खोलकर चौथाई मासिक पत्र और सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित कर,कलाकारों को हैरान और रोजगारों को परेशान कर रहा था।
हत्या
मनचले, रंगीले लेखक `उग्र` की साहित्यिक हत्या कर डाली गयी, इसे `उग्र` न भी माने, तो दुनिया मानती है। श्री ॠषभ चरण के दुःखद दर्शन सामने है। और कुशवाहा कांत की तो सचमुच हत्या ही की गयी थी। आने वाली होली के दिन उसकी तीसरी या चौथी मरण-तिथि पड़ेगी। वह `सफल बाजारू` किस तरह से मारा गया था, किस बुरी तरह मरा कि स्मरण पत्र से मेंरे तो रोंगेट खड़े हो जाते हैं। उस वर्ष की होली के आठ-दस दिन पूर्व, रात के वक्त कुशवाहा कांत के साथ आधे भड़ैत की तरह में बैठकर किसी ने उस पर अनेक घातक आक्रमण किये। सर में छुरा, सीने में छुरा, पेट में छुरा। फिर जख्म सोजन के बाद अस्पताल में डेढ हफ्ते तक पीड़ा और प्यास से तड़फता। फिर ऐन होली के दिन मरण।
अरे ओ जाने वाले,
रुख से आँचल को हटा देना,
तुझे अपनी जवानी कि कसम।
औरत
आर्टिस्ट को धन जितना नहीं मारता, यश जितना नहीं, नशा भी नहीं, उसे बहुत आसानी से है औरत! इसलिये खूबसूरत स्त्री के कारण प्राण होने वाले कलाकारों की चर्चा में कुशवाहा कांत की याद आ गई। मालूम नहीं उसके मुकदमें में क्या प्रकाशित हुआ, क्या नहीं, पर जब उसकी हत्या हुई मैं कलकते में था तब यही अफवाह जोरों पर थी। धन, यश, नशा, औरत प्रतिभाशाली को वैसे ही सुलभ जैसे भूत साधनेवाले को भौतिक सुख। पर, आपने सुना होगा, भूत साधन प्रेत से प्राप्त चीजों का स्वयं उपयोग करते हुये मारे भय के काँपते हैं। प्रेत की कमाई खाने वाला प्रेत से मारा भी जाता है। फिर प्रतिभा बाजार में या विश्वविद्यालयों में तो बिकती-मिलती नहीं। यह तो ईश्वर की कृपा से मुफ्त मिलती है। और बाइबिल में लिखा है कि `अनायास मिली वस्तु का वितरण अमूल्य होना चाहिये।` किसी रंग का प्रतिभाशाली जब अपनी प्रतिभा से बाजारू लाभ उठाने लगता है तब नष्ट भी होने लग जाता है। प्रतिभा से नाजायज फायदा उठाना ही नहीं चाहिये। प्रतिभा की चाँदी बनाने वाले डाक्टरों का वश नहीं चलता, साधुओं का स्वर्ग नष्ट हो जाता है और कलाकार प्रतिभाहत ही नहीं पागल तक हो जाते हैं। `फ्लोबा`-फ्रांस के महान् लेखक ने जीवन से ऊबकर आत्महत्या को खूब माना था। यही गति श्रेष्ठ फ्रांसीसी कलाकार मोपासा की हुयी थी। अद्भुत इंग्लिश लेखक आस्कर वाइल्ड ने घोर अपमानजनक जेल जीवन भी भोगा सो तो दरकिनार, फ्रांस में जब वह मरा तो उसकी काया सड़ कर गल गयी थी। आस्कर वाइल्ड का शव कंधे पर उठाकर कब्रगाह ले जाने वाले चंद चार नजदीकी यार मात्र थे और वर्षा हो रही थी धुँआधार, दुर्दिन, चारों तरफ अँधकार...अँधकार।
ताव और भाव
वह मेरे ही बिहड़ मिर्जापुर जिले का अल्हड़ लेखक था-वही खुशवाहा कांत। वह अभी नौजवान था। गधापचीसी से महज चंद जूते आगे। भले मानसों की राय में वह बुरा लेखक था इसलिये नहीं कि वह यौवन सनसनी लिखता था बल्कि इसलिये कि वह बाजार में सफल था। कुशवाहा कांत के आगे-पीछे `यौन सनसनी` लेखक अनेक पर उन नामधारी भले आदमियों की नजर नहीं। सबकी आँखों का कांटा था वह। उसके मारे जाने से बहुतों को खुशी भी हुयी हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। उसे अगर आदर देकर बढावा दिया गया होता तो संभव था वह `यौन सनसनी` से हटकर और भी उत्तम साहित्यिक मार्ग ग्रहण करता। पर, हमारे यहाँ ऐसी चाल नहीं।
कुशवाहा कांत ने क्या बुरा किया था। किसकी गाय मारी थी उसने? वह उत्तेजक साहित्य लिखता था- यही न, हिंदी में कितने पाठक हैं, सारे भारत को बतलाइये। पहले यही बतलाइये कि सारे भारत में पढे-लिखे लोग ही कितने हैं? 15 प्रतिशत, उसमें कितने हिंदी जानते हैं? उनमें खरीदकर कितने पढने वाले हैं? मैं दावे से कहता हूँ, आज का सत्ताधारी स्वदेशी राजनीतिक अपने दुष्ठ कर्मों से सारे भारत की जनता का जितना नुकसान कर रहा है, हिंदी का कोई भी साहित्यिक उसका पासंग भी नहीं कर सकता, फिर भी कुशवाहा कांत को बुरा करने वाले भले मानस ऐसे अनैतिक अधिकारियों से घृणा कर नहीं सकते। उलटे पापियों, जनलूटकों, भ्रष्टाचारियों को महिमान्, श्रीमान्, क्या-क्या नहीं करते हैं। फोटो छापते हैं, जीवनी छापते हैं, अभिनंदन ग्रंथ और मानपत्र समर्पित करते हैं।
मैं कहता हूँ आज के अनेक मिनिस्टर या डिप्लामेंट यदि मरने के पहले ही मार* न डाले गये तो मरते ही युग के स्मृति-पट से यूँ मिट जायेंगे जैसे जानवर विशेष के सिर से सींग गायब-कोई उसका नामलेवा न रह जायेगा। पर कुशवाहा कांत के पाठक उसके मर जाने पर भी कम होने वाले नहीं। भले ही आप उसे किसी दर्जे का लेखक कहें और उन्हें किसी दर्जे का पाठक।
फागुन के दिन चार
उस दिन रंग नहीं था तो कुशवाहा कांत उपन्यासकार के कफन पर बाकी सारी विलासी रंग-रंगीली लाल रही-नीली पीली थी। उन्माद नहीं था तो उस मैखार की काया में बाकी सारा शहर उन्मत्त था। अस्सी से वरुणा तक, करुणा केवल कुशवाहा कांत की अर्थी के निकट, बाकी चारों ओर उल्लास, हास, विलास, रास। शहर में इतना जीवन था कि उस मुर्दे की सुधि जिगरी दोस्तों को भी न आई हो, तो आश्चर्य क्या। होली के रंगीन विशेषांकों में उसके लिये अखबार वाले ब्लैक बार्डर लगाते भी तो क्योंकर। सो, जब उसकी उम्र वाले तरुण अपने प्रिय और प्रियतमों से गले लग रहे थे तब कुशवाहा कांत को चिंता पर सुलाकर जलाया जा रहा था।
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| कुशवाहा कांत |
बाजार जीतते वक्त औ जीत लेने के बाद भी अनेक बार पत्र लिख और पुस्तकें भेजकर उसने मुझे गुरु माना पर मेरा मुहँ सहज सीधा होने वाला कहाँ। कभी मैंने न तो उसके पत्रों का उत्तर दिया और न आशीर्वाद ही। मिर्जापुर का वह भी, मैं भी। मैं `मतवाला` निकालता था, वह `चिनगारी`। पर हमने न तो कभी एक दूसरे को देखा न बातें की। इतनी बातें आज मैं लिख रहा हूँ उसके मर जाने के तीन या चार साल बाद।
`समाज`
पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र`
*भावुकता की बहस में कही पाठकगण गोड़से पंथ के अनुगामी न बन जाये।
पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र` का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। `जंजीर`(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था।
मंगलवार, 27 जुलाई 2021
वह विनय प्रभाकर है और रामनारायण पासी भी- विजयशंकर चतुर्वेदी
काफी सयाना है तु। आज से दुश्मनी नहीं दोस्ती बनाना मांगता है। क्योंकि अपन भी तेरा भाई बंद है। फरक है तो दोनों के काम करने के स्टाइल में। तू तो खूब माथा-पच्ची करके प्लान बनाता है। लोगों के अपनी मिठी बातों के जाल में फसाकर ऐसा बेवकूफ बनाता है कारण तू आज तक पुलिस के हाथ नहीं लगा, बरोबर? जबकि अपन का स्टाइल एकदम शार्टकट है, चापर या तलवार या तमंचा दिखाया कि तुरंत सामने वाले का सारा माल अपन के पास, क्या?
ये लाइनें हैं विनय प्रभाकर के जंगी उपन्यास `मौत आयेगी सात तालों में` की। रेल्वे स्टालों में देश भर के यात्रियों के मनोरंजन का साधन होते थे विनय प्रभाकर के ऐसे उपन्यास। जलजलाते संवाद, रहस्य-रोमांच से भरी कहानी और शब्दों के जादू में बांध लेने वाली पठनीयता विनय प्रभाकर की पूंजी है। विनय प्रभाकर चर्चगेट में एमटीएनएल यानि महानगर टेलिफोन निगम लिमिटेड के कर्मचारी हैं। रेल्वे की इमारत में लाइनमैन का पद संभाल रहे हैं। लोअर परेल की सीबी गुलवाली चाल में रहते हैं। दस बाई बारह के कमरे में। पानी खोली के अंदर आता है, टेलिफोन पड़ोसी के सांझे में और संडास पूरी चाल के।सस्पेंस लिखने वाले विनय प्रभाकर के नाम के लेकर भी कुछ कम सस्पेंस नहीं है। उनका असली नाम है रामनारायण पासी और वह देख चुके हैं उमर के अड़तीस वसंत। रामनारायण तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े हैं। वैसे तो उनका मुलुक उत्तर प्रदेश है। प्रतापगढ़ जिले का संगीपुल उनका गाँव है। लेकिन पढाई लिखाई मुंबई में होने और बचपन से लेकर जवानी यहीं बिताने के कारण यही अपना मुलुक लगने लगता है। छोटा भाई जगदीश तो अब गाँव लौट गया है, वरना वह भी पिता रामेश्वर के साथ इसी खोली में रहता और सायन के एक म्युनिसिपल स्कूल में पढता। खुद रामनारयण ने हाईस्कूल पास किया परेल की तुलसी मानस स्कूल से। पिता चिंचपोकली की अपोलो मिल में मुलाजिम थे। दस-बारह साल पहले रियायर होकर गाँव चले गये अपने पिता की सेवा करने। रामनारायण की दादी तो अभी-अभी गुजरी है, छह-सात माह पहले।
रविवार, 18 जुलाई 2021
लौटेंगें वे दिन- अजिंक्य शर्मा
बने रहे ये पढ़ने वाले, बनी रहे ये पाठशाला
जी हांँ, हिन्दी पाठकों की मस्ती की पाठशाला, जिसमें पाठकों ने बहुत मजे किए। एक वक्त था जब बुकस्टालों पर जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, इब्ने सफी, वेद प्रकाश काम्बोज, कर्नल रंजीत, सुरेंद्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, वेद प्रकाश शर्मा, अमित खान आदि लेखकों के उपन्यासों का इंतजार उतनी ही शिद्दत से किया जाता था, जितनी शिद्दत से आज दर्शक क्रिस्टोफर नोलन या मार्वल सिनेमेटिक यूनिवर्स की नई फिल्म का इंतजार करते हैं। इन लेखकों की लोकप्रियता का आलम ये था कि किताबें बुकस्टाल पर आते ही हाथों-हाथ बिक जातीं थीं। आज भी इनके दीवानों की कमी नहीं है और इनके उपन्यास रिप्रिंट होकर भी बिक रहे हैं। उपन्यासकार अजिंक्य शर्मा
शनिवार, 3 जुलाई 2021
एक थे गुलशन नंदा- एस. डी. ओझा
उपन्यास लेखन में जो नाम गुलशन नंदा ने कमाया वह अन्यत्र दुर्लभ है। एक ज़माना था जब हम कोर्स की किताबों में गुलशन नंदा के उपन्यास रख कर पढ़ा करते थे। रेलवे स्टेशन व बस स्टॉप के बुक स्टालों पर गुलशन नंदा के उपन्यासों की भरमार रहती थी।
गुलशन नंदा के उपन्यासों की जो धूम भारत में मची कि उसके आगे इब्ने सफी बी ए के जासूसी उपन्यास फीके पड़ने लगे। इनके उपन्यासों पर धड़ाधड़ फ़िल्में बनने लगीं। उस समय के गुलशन नंदा कीर्तिमान के पर्याय व प्रतीक हो गए थे। कटी पतंग, दाग, झील के उस पार और नया जमाना आदि सुपर डुपर हिट फिल्मों के अतिरिक्त कुल 20 सिल्वर जुबली फिल्में इनके उपन्यासों पर बन चुकी हैं। इनके मरणोपरांत फ़िल्म 'पाले खां' भी हिट रही थी।
गुरुवार, 10 जून 2021
लोकप्रिय साहित्य पर चर्चा- शरद कुमार दूबे
लुगदी साहित्य को सस्ता, फुटपाथी और घासलेटी साहित्य जैसे नामों से भी अलंकृत किया जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे पल्प फिक्शन (Pulp fiction) कहा जाता है। मैंने गूगल पर pulp fiction meaning in hindi टाइप किया तो जवाब आया 'उत्तेजित करने वाला सस्ता उपन्यास'।
वैसे लुगदी साहित्य का सबसे इज्जतदार नाम है, 'लोकप्रिय साहित्य'। यानी कम गुणवत्ता वाले सस्ते कागज पर छपने वाला वो साहित्य जो आम लोगों की जेब पर भारी नहीं पड़ता और वो रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड की दुकानों पर आम बिकते इस साहित्य को खरीदकर अपने पढ़ने की तलब को पूरी कर पाता है। सही मायनों में यही वो साहित्य है जो पाठकों के मन में रोचकता पैदा करता है और उन्हें इससे जोड़े रखता है। लोकप्रिय साहित्य लिखा नहीं जाता बल्कि लिखा जाकर लोकप्रिय होता है।
हिंदी उपन्यास के संसार में उपन्यास को दो श्रेणियों में बाँटा गया, 'सामाजिक उपन्यास और जासूसी उपन्यास'। यहाँ हम बात कर रहे हैं जासूसी उपन्यासों और उनके लेखकों की। 100 साल से भी अधिक पुराने, हिन्दी जासूसी उपन्यासों के इतिहास में, 200 से भी अधिक जासूसी उपन्यासों के लेखक, गोपाल राम गहमरी का योगदान अविस्मरणीय है। सन 1900 में उन्होंने जासूस नामक पत्रिका भी प्रारम्भ की थी जो अगले चार दशकों तक प्रकाशित होती रही। ऐंसे ही देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' का योगदान भी अतुलनीय है।
किसी भी उपन्यास को पढ़ने का मुख्य उद्देश्य होता है पाठक का मनोरंजन। लेकिन ये भी सत्य है कि, पढ़ने से ढेरों उपलब्धियाँ भी हासिल होती हैं। जैसे, ज्ञान प्राप्त होना, शब्द भंडार में वृद्धि होना आदि।
पिछले 50-60 बरस के कामयाब जासूसी उपन्यास लेखकों की बात करें तो उनमें, इब्ने शफी, कर्नल रंजीत, जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश काम्बोज, परशुराम शर्मा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक आदि के नाम स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।
पुराने समय में जब मनोरंजन के साधन कम थे तब लोगों में पढ़ने का बड़ा चाव था और जासूसी उपन्यास भी खूब पढ़े जाते थे। मनोरंजन के साधन बढ़े तो लोगों का वक्त दूसरे साधनों पर खर्च होने लगा और पढ़ने में रुचि कम होती गई। फिर हुआ ये कि, लोकप्रिय लेखक भी कम छपने लगे और बिकने और भी कम हो गए।
यहाँ मैं तारीफ करना चाहूँगा वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक की कि, पाठकों में इनकी लोकप्रियता कम न हुई। दोनों खूब छपते और बिकते रहे। 17 फरवरी 2017 को वेद प्रकाश शर्मा का देहांत हो गया। लोकप्रिय साहित्य में वेद प्रकाश शर्मा का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।
लुगदी साहित्य का पहला लेखक जो लुगदी अथवा सस्ते कागज से ऊपर उठकर बेहतरीन वाइट पेपर पर छपा, वो है सुरेन्द्र मोहन पाठक। अपनी मेहनत, लगन और लेखन की वजह से पाठक जी ने यह मुकाम हासिल किया और अब तो उनका हर उपन्यास वाइट, उम्दा पेपर पर ही छपता है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक विशाल पाठक वर्ग है जो उनके हर नए उपन्यास का बेताबी से इंतजार करता है। 81 बरस के पाठक जी आज भी लेखन में सक्रिय हैं और उसी शिद्दत से लिख रहे हैं जैसे पहले लिखते थे। लेकिन ऐंसा लगता है मानो पाठक जी, लोकप्रिय लेखन के आखरी हस्ताक्षर हैं और नहीं लगता कि, सस्ते साहित्य का कोई और लेखक अब इस मुकाम तक पहुँच पाएगा क्योंकि वर्तमान में जो भी नए लेखक लिख रहे हैं वो पाठकों की पसंद पर खरा उतरने लायक नहीं है।।
प्रस्तुति-
शनिवार, 2 जनवरी 2021
उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी
उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी
“जासूस शब्द सुनते ही दो नाम मस्तिष्क
की दीवारों पर उभरते हैं पहला शरलक होम्स और दूसरा इसके रचियता सर आर्थर कानन डॉयल
। 221 B, बेकर
स्ट्रीट में रहने वाला शरलक वह जासूस है जो अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर अनुमान लगाता
है, तर्क
करता है और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता है और अंत में अपराधियों का पता लगा लेता है ।”
हिन्दी भाषा में जासूस के लिए ‘गुप्तचर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था बाद में इसकी जगह जासूस शब्द प्रचलित होता चला गया । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव और संचालन के लिए गुप्तचरों के एक ऐसे तंत्र की रचना की जोकि अभेद्य थी । उस काल खंड से लेकर आज के आधुनिक काल तक प्रशासन की सफलता गुप्तचरों अथवा जासूसों पर ही निर्भर रहती है । पुलिस विभाग में जब कोई व्यक्ति एक रकम के एवज में कोई सूचना या इन्फोर्मेशन देता है तो उसे ‘इन्फोर्मर’ कहा जाता है ।
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| वार्ष्णय टाइम्स, दिसम्बर2020 |
बुधवार, 1 जुलाई 2020
एक थी तुरन
किस्सा कुशवाहा कांत जी के प्रेम जीवन का।
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में रोमांटिक उपन्यासकार के रूप में 'कुशवाहा कांत जी' का नाम खूब चर्चित रहा है। प्रेम रंग में रंगे इनके उपन्यास युवा हृदय की धड़कन होते थे। प्रेम का मार्मिक, स्वच्छंद और हृदय की गहराइयों को छू लेने वाला चित्रण इनके उपन्यासों में खूब होता था, इसलिए इन्हें रोमांटिक उपन्यासकार कहा जाता था।
कुशवाहा कांत जी के नाम के साथ एक और नाम चर्चित रहा है, वह नाम है 'तुरन'। जिन्होंने ने कुशवाहा कांत के उपन्यास पढे हैं, उनके लिए यह नाम हमेशा रहस्य रहा है।
क्या आपने यह नाम पहले कभी सुना है?
क्या आप तुरन को जानते हैं?
अगर आपने तुरन का नाम नहीं सुना तो यह आलेख पढें, आपको जान जायेंगे आखिर कौन थी तुरन।
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण ही रोमांटिक उपन्यासकार कहलाने लगे थे?
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण रोमांटिक उपन्यास लिखते थे?
- क्या एक लेखक की जान तुरन के लिए ही चली गयी? या फिर कोई और कारण था?
अतीत की गर्द के नीचे छिपे किए ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आज मिलना असंभव है।
काश आज तुरन मिल जाती तो हम पूछते- बताओ तुरन सच क्या है?
सोमवार, 29 जून 2020
मैं और मेरी छोटी सी साहित्यिक दुनिया- अजिंक्य शर्मा
(उपन्यास जगत के सुनहरी दौर को रेखांकित करता अंजिक्य शर्मा जी का यह आलेख आपको उस समय में ले जायेगा जब मनोरंजन का माध्यम पुस्तकें होती थी।)
उपन्यास! चार अक्षरों और एक अर्धाक्षर का ये शब्द कुछ लोगों के लिये बिल्कुल नया होता है तो कुछ की इसे सुनकर भृकुटि चढ़ जाती है लेकिन हम जैसे बहुत से पुस्तकप्रेमी ऐसे भी हैं, जिनके दिलों के लिये ये शब्द ऐसा है, जैसे तपती गर्मी में सावन की बौछार।
अगर आप उपन्यास प्रेमी नहीं हैं तो शायद इसे महसूस न कर सकें लेकिन एक उपन्यास प्रेमी इसे अच्छी तरह समझ सकता है। बहुत से पाठकों ने किशोरावस्था से, तो बहुत से ने तो बचपन में ही ये रोग दिल से लगा लिया था। कॉमिक्सों से तरक्की कर हमने उपन्यास पढ़ना शुरू किया और कब ये जीवन का अभिन्न अंग बनती चली गईं, पता भी न चला। वो समय भी कितना सुनहरा था, जब किसी काम से या घूमने कहीं भी जाओ तो चाहे बाजार हो, रेलवे स्टेशन हो, बस स्टैंड हो या गांव-शहर का कोई गली-मोहल्ला ही हो, नजरें किसी ऐसी दुकान या गुमटी को ढूंढतीं थीं, जिन पर एक पतली रस्सी पर कॉमिक्सें लटकी हुईं और सीधे कतार में या आड़े रखे हुए उपन्यास दिख जायें। खरीदने के लिये या किराये पर पढ़ने के लिए ही मिल जायें। शहरों में उम्मीद ज्यादा होती थी क्योंकि शहरों में लाइब्रेरियाँ अधिक हुआ करतीं थी।
लेकिन टीवी पर लगातार बढ़ते चैनलों और फिर इंटरनेट ने इन पुस्तकों के व्यवसाय पर करारा प्रहार किया। फिर बहुउपयोगी विलक्षण यंत्र मोबाइल और उसका स्मार्ट और स्मार्ट से भी ज्यादा स्मार्टफोन के रूप में विकसित हो जाना तो जैसे ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका था।
शुक्रवार, 26 जून 2020
पल्प फिक्शन का सुनहरा दौर और आज
- गौरव की कलम
आज सुबह सुबह पल्प फिक्शन पर कुछ लिख रहा था तो अचानक 90s की पुरानी यादें ताज़ा हो गयी जब कर्नल रंजीत, वेद प्रकाश शर्मा,ओम प्रकाश शर्मा,सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश काम्बोज, परशुराम शर्मा, इब्ने सफी, देवकी नंदन खत्री, गुलशन नंदा आदि जैसे पल्प फिक्शन राइटर्स का पाठकों में भयंकर चस्का था, एक दौर था जब गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा ने नॉवेल आते ही स्टॉक आउट हो जाते थे, शायद आपको जानकार ताज्जुब हो की नीचे दिए वेद प्रकाश शर्मा की इस नॉवेल की 15 लाख कॉपी रिलीज़ से पहले ही सोल्ड आउट (प्री-बुकिंग) हो गयी थी, और एक समय में इस नॉवेल को बैन करने की मांग उठने लगी और इसका मुख पृष्ठ काला कर दिया गया और आजतक आठ करोड़ से भी ज्यादा प्रतियां बिक चुकी है, या गुलशन नंदा जी जिनके नॉवेल के होर्डिंग्स फिल्मो के होर्डिंग्स की तरह लगाए जाते थे या अय्यारी लेखन के उस्ताद देवकी नंदन खत्री जिनकी अनगिनत कॉपी उस काल में सेल आउट हुई जब इंडियन पल्प फिक्शन अपने शैशव काल में था या इब्ने सफी जिन्होंने जासूसी दुनिया के लेखन में एक कीर्तिमान स्थापित किया।
दरअसल केबल TV के उद्गम ने भारत में पाठको की संख्या कम कर दी थी...फिल्म्स और नाटकों का TV पर इतना सुलभ हो जाना लोगो को मनोरंजन की नयी खुराक थी, जिस से नयी पीढ़ी इस सुख से दूर होती चली गयी, भाग्यवश मैं किताबों हमेशा पास रहा पर छोटा होने के कारण मैं 90s में ज्यादातर कॉमिक्स का ही दीवाना था पर नॉवेल पर भी चोरी छुपे हाथ साफ़ कर लिया करते थे और जैसे जैसे उम्र बढ़ी घर में और नॉवेल पढ़ने की इज़ाजत मिलने लगी तो समझा गुरु की लेखन द्वारा विसुअल ट्रीट किसे कहते है,ये लोग भले ही आज की तरह PR और मार्केटिंग से वंचित रहे हो, फिर भी माउथ पब्लिसिटी और लेखन की बदौलत लाखों करोड़ों पाठको के दिल में राज़ करते थे और शायद आज के दौर में कोई ही नया भारतीय लेखक कितना भी PR यूज़ करके उस ऊँचे मुकाम तक पंहुचा हो जहाँ उपर्लिखित राइटर आसीन है ऐसा दूर दूर तक दिखाई नहीं देता।
ये आलम था की मैंने ऐसे लोग भी देखे है जो 2-2 km चलते चलते भी भी नॉवेल से पढ़ते रहते थे, बच्चे कॉमिक्स के लिए दीवाने थे पर उसी भारतीय पल्प में आज रोचकता का बेहद आभाव है तभी शायद विदेशी राइटर के हिंदी अनुवादित या मूल प्रति नावेल हमारे आज के मौजूदा नए हिंदी राइटर्स से ज्यादा बिकते है, किसी इक्का दुक्का राइटर को छोड़ कर जो आज भी वो सुनहरी मशाल पकडे हुए है।
भले ही पाठकवर्ग आज बहुत ही सिमट गया हो पर हमारे प्रकाशनों को और आगे आना पड़ेगा और लेखकों को अपने ऊपर जिम्मेदारी लेनी होगी ताकि ये मशाल जलती रहे, ये दौर फिर वापस आये।
लेखक- गौरव
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| गौरव |
बुधवार, 24 जून 2020
हिन्दी उपन्यास जगत के 'स्टीवन स्पीलबर्ग'.... - अजिंक्य शर्मा
अजिंक्य शर्मा जी की कलम से
हिन्दी उपन्यास जगत में कई महान हस्तियां हुईं हैं, जिन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा के बल पर जासूसी साहित्य को समृद्ध बनाया। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी भी ऐसे ही लेखकों में से थे, जिनकी गिनती सर्वश्रेष्ठ लेखकों में होती है। सहज सरल भाषा और मन को छू लेने वाली कहानियां उनकी लेखनी की विशेषता थीं। उनकी रचनाएं वास्तविकता के इतनी करीब होतीं हैं कि उन्हें पढ़ते वक्त पाठकों को लगने लगता है, जैसे वे स्वयं उन घटनाओं के साक्षी हों।
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी को लेखन में विविधता के कारण भारत में हिन्दी उपन्यास जगत का 'स्टीवन स्पीलबर्ग' कहा जा सकता है। जिस तरह स्टीवन स्पीलबर्ग ने 'सेविंग प्राइवेट रायन', 'ई.टी.', 'शिण्डलर्स लिस्ट' से लेकर 'जुरासिक पार्क' तक अलग अलग जॉनर की एक से बढ़कर एक फिल्में बनाईं, उसी तरह ओमप्रकाश शर्मा जी ने भी ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, व्यंग्य से लेकर हॉरर आदि विभिन्न विधाओं में एक से बढ़कर एक उपन्यास लिखे। उस समय की डाकुओं की समस्या का चित्रण करते हुए उन्होंने कई शानदार उपन्यास लिखे। राष्ट्रों के हथियारों के प्रति बढ़ते मोह और न्यूक्लियर बम जैसी समस्याओं की ओर भी 'कटे हुए सिर' जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने पाठकों को जागरूक किया। उनके द्वारा रचित 'सांझ का सूरज' जहां एक महान ऐतिहासिक रचना है, वहीं अपने देश का अजनबी बेहद मर्मस्पर्शी उपन्यास है, जो विदेशों में बसे भारतीयों को उनके देश से जोड़ने का सन्देश देता है। 'छुपे चेहरे' भारत के 'अवेंजर्स' की तरह है, वहीं 'पिशाच सुन्दरी' 'ड्रैक्यूला' के भारतीय रूप की तरह। 'भूतनाथ की संसार यात्रा' पढ़कर आप हंसते हंसते लोटपोट हो जायेंगें, वहीं 'सबसे बड़ा पाप' जैसे उपन्यास देह व्यापार जैसे घृणित कारोबार की सच्चाई आपकी आंखों के आगे बेनकाब करते हैं।
ये सचमुच एक आश्चर्य का विषय रहा कि आखिर जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी अलग अलग विधाओं में इतना शानदार कैसे लिख लेते थे? उन पर मां सरस्वती की विशेष कृपा थी। उनकी अपार लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बुकस्टाल्स पर लोग सीधे पूछते थे-"शर्मा जी का नया उपन्यास आया क्या?" उनकी बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उठाने कुछ अन्य लेखकों ने भी उनके नाम से लिखना शुरू कर दिया, जिसके चलते उनके असली नॉवल्स ढूंढने के लिये उनके नाम के साथ 'जनप्रिय लेखक' ही उनकी पहचान बन गया।
उनके उपन्यासों की तरह ही उनके पात्र भी विविधता से परिपूर्ण हैं। राजेश जहां एक आदर्श चरित्र वाले मानवतावादी जासूस हैं, वहीं जगत एक मस्तमौला अंतर्राष्ट्रीय ठग है, जो जिन्दगी को खुलकर जीने में विश्वास रखता है। गोपाली राजस्थान के जाने माने जासूस हैं, जिनके साहस और काबिलियत की लोग मिसालें देते हैं। 'पिशाच सुन्दरी' के नायक भी गोपाली ही हैं। चक्रम थोड़े सनकी किस्म के जासूस हैं, जिनका पालतू कुत्ता...ओह सॉरी...हवाबाज अपनी आश्चर्यजनक हरकतों से मंत्रमुग्ध कर देता है। राजेश का साथी जयन्त की हरकतों से आप हंसने के लिये विवश हो जायेगें, वहीं आधुनिक जासूसों जगन-बन्दूकसिंह की जोड़ी भी लाजवाब है।
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की लेखनशैली की एक खास बात ये भी है कि उनमें अनावश्यक हिंसा का प्रदर्शन नहीं होता। उनके कई उपन्यासों में आप देखेंगे कि पूरा उपन्यास खत्म हो जायेगा लेकिन किसी का खून नहीं होगा। इसके बावजूद उनके उपन्यासों की रोचकता में कोई कमी नहीं आती थी। इसी प्रकार जनप्रिय लेखक अश्लीलता से भी हमेशा कोसों दूर रहे। उनके उपन्यास इस तरह के होते हैं कि एक पिता अपनी पुत्री को, एक भाई अपनी बहन को पढ़ने के लिये दे सकता है।
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी के उपन्यासों की एक खास बात ये भी है कि उनसे हमें हिम्मत और मानवता की सीख मिलती है। राजेश, जगत जैसे साहस के शिखर पुरुषों से सीखने को मिलता है कि कभी भी किन्हीं भी परिस्थितियों में हार नहीं माननी चाहिये। राजेश, जगत बिना किसी हथियार के केवल अपने बुद्धिकौशल के बल पर पूरी की पूरी फौज को धूल चटा देने की क्षमता रखते हैं। जगत तो 'फैंटम' के भारतीय रूप की तरह है। अविजित और अडिग।
बेहद दुख की बात है कि ऐसे महान लेखक आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी कालजयी रचनाएँ आज भी हमारे साथ हैं। रीप्रिंट नहीं होने से उनके उपन्यास आज पाठकों को उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।मैं शर्मा जी के सुपुत्र श्री वीरेन्द्र शर्मा जी एवं 'महासमर' व 'सत्यमेव जयते नानृतं' के रचयिता श्री रमाकान्त मिश्रा जी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिनके प्रयासों से जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी की वेबसाइट http://omprakashsharma.com के माध्यम से ओमप्रकाश शर्मा जी के बहुत से अनमोल उपन्यास पाठकों को पढ़ने के लिये उपलब्ध हो पा रहे हैं। इन पंक्तियों के लेखक को स्वयं भी ओमप्रकाश शर्मा जी के अनेक उपन्यास इस वेबसाइट के माध्यम से ही पढ़ने को मिल सके। वहीं ईबुक के आदि नहीं होने के कारण बहुत से पाठक अब भी पुराने उपन्यासों के रीप्रिंट होने की बेसब्री के साथ प्रतीक्षा कर रहे हैं। उम्मीद है ओमप्रकाश शर्मा जी के अनगिनत प्रशंसकों का ये सपना शीघ्र पूरा हो और उनके उपन्यास रीप्रिंट होकर हमें पढ़ने को मिल सकें।
हिन्दी उपन्यास जगत के महान लेखक जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
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रविवार, 14 जून 2020
लोकप्रिय साहित्य में आत्मकथा और जीवनी
पहले हम जान लें की आत्मकथा (Autobiography) और जीवनी (Biography) में अंतर क्या होता है।
सबसे बड़ा और विशेष अंतर दोनों में यही है की आत्मकथा (Autobiography) लेखक द्वारा स्वयं लिखी जाती है अर्थात् स्वयं के जीवन की कथा स्वयं द्वारा लिखना ही आत्मकथा है।
वहीं जीवनी (Biography) में किसी के जीवन की कथा अन्य व्यक्ति द्वारा लिखी जाती है।
जीवनी का अंग्रेजी अर्थ “बायोग्राफी” है। जीवनी में व्यक्ति विशेष के जीवन में घटित घटनाओं का कलात्मक और सौन्दर्यता के साथ चित्रण होता है। जीवनी इतिहास, साहित्य और नायक की त्रिवेणी होती है। जीवनी में लेखक व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन और यथेष्ट जीवन की जानकारी प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करता है।
साहित्य में आत्मकथा किसी लेखक द्वारा अपने ही जीवन का वर्णन करने वाली कथा को कहते हैं। यह संस्मरण से मिलती-जुलती लेकिन भिन्न है। जहाँ संस्मरण में लेखक अपने आसपास के समाज, परिस्थितियों व अन्य घटनाओं के बारे में लिखता हैं वहाँ आत्मकथा में केन्द्र लेखक स्वयं होता है।
हालांकि दोनों जी अपनी-अपनी विशेषताएं और कमियां है। 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' महात्मा गांधी जी की आत्मकथा है और 'आवारा मसीहा' विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित 'शरतचन्द्र' जी की जीवनी है।
शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019
क्या लोकप्रिय साहित्य का दौर लौट रहा है?- गुरप्रीत सिंह
एम. इकराम फरीदी के उपन्यास 'चैलेंज होटल' में प्रकाशित आलेख।
समय गतिशील और परिवर्तनशील है। इसी परिवर्तन में बहुत कुछ नया आता है तो बहुत कुछ पुराना पीछे छूट जाता है। समय के साथ मनोरंजन के साधन बदल गये। कभी मनोरंजन का माध्यम खेल..आदि थे, कभी मनोरंजन का माध्यम किताबें थी और अब इलैक्ट्रॉनिक साधन मनोरंजन के माध्यम हैं।
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| उपन्यास पृष्ठ |
देवकीनन्दन खत्री के तिलिस्मी उपन्यासों से चला यह दौर सामाजिक और जासूसी उपन्यासों से होता हुआ एक लंबे समय तक चला।
सामाजिक उपन्यासों में प्यारे लाल आवारा, गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत, रितुराज, राजहंस, राजवंश जैसे असंख्य सामाजिक लेखक घर -घर में पढे जाते थे। तब गृहणियां भी अवकाश के समय सामाजिक उपन्यासों को पढती थी।
लेकिन बदलते समय के साथ सामाजिक उपन्यासों का प्रभाव कम हुआ और जासूसी उपन्यासों का दौर आ गया। जिसमें इब्ने सफी, निरंजन चौधरी, ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश कांबोज, कुमार कश्यप, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और अनिल मोहन आदि बहुसंख्यक लेखकों ने जनता का भरपूर मनोरंजन किया।
लेकिन बदलते मनोरंजन के साधनों ने उपन्यास जगत को गहरी क्षति पहुंचायी। सन् 2000 के बाद उपन्यास जगत से प्रकाशक मुँह मोड़ने लगे और एक ऐसा समय आया की कभी स्वर्णिम समय देखने वाला लोकप्रिय उपन्यास साहित्य किसी गहरे अंधेरे में खो गया। हालांकि इसके पीछे बहुत से कारण रहे जैसे घोस्ट राइटिंग, लेखकों को रायल्टी न देना, अश्लीलता, कहानियों का निम्नस्तर लेकिन मूल में बदलते मनोरंजन के साधन ही हैं।
इस दौर में मात्र तीन लेखक वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और अनिल मोहन ही सक्रिय रहे और प्रकाशकों में दिल्ली से राजा पॉकेट बुक्स और मेरठ से रवि पॉकेट बुक्स। रवि पॉकेट बुक्स एकमात्र वह संस्था रही जिसने अपनी लाभ-हानि की बजाय उपन्यास जगत को जीवित रखने में यथासंभव कोशिश की।
वेदप्रकाश शर्मा जी के निधन और अनिल मोहन जी के परिस्थितिवश लेखन से दूरी बना लेने के कारण इस क्षेत्र में एक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ही वह लेखक रहे जिन्होंने इस परम्परा को जीवित रखा। मात्र जीवित ही नहीं बल्कि उन्होंने इस विधा को नये स्तर तक भी पहुंचाया।
उपन्यास जगत में एक लंबे समय पश्चात इस क्षेत्र में हलचल महसूस हुयी। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहाँ एक बार उपन्यास जगत को खत्म कर दिया वहीं सोशल मीडिया ने इसे पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एम. इकराम फरीदी जी आदरणीय वेदप्रकाश शर्मा जी की बात को माध्यम बना कर कहते है की "समयानुसार मनोरंजन के साधन बदलते रहते हैं। एक समय उपन्यास मनोरंजन का माध्यम था फिर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और अब पुनः लोग किताबों की तरफ लौट रहे हैं।"
सोशल मीडिया के समय में रवि पॉकेट बुक्स के माध्यम से दो लेखक सामने आये। एक कंवल शर्मा और दूसरे एम. इकराम फरीदी। हालांकि कंवल शर्मा रवि पॉकेट बुक्स के लिए पहले अनुवाद का काम कर रहे थे, वहीं एम. इकराम फरीदी जी के दो उपन्यास अन्य संस्थानों से प्रकाशित हो चुके थे। लेकिन जो प्रसिद्ध इन्हें रवि पॉकेट के बैनर तले मिली वह अन्यत्र दुर्लभ थी।
सन् 2011 में मुंबई से एक और प्रकाशन संस्था 'सूरज पॉकेट बुक्स' ने बाजार में दस्तक दी। सूरज पॉकेट बुक्स के संस्थापक शुभानंद जी ने 'राजन-इकबाल रिबोर्न सीरिज' से लेखन आरम्भ किया। पाठकों ने इसे हाथो-हाथ लिया। कुछ समय बाद इन्होंने 'राजन-इकबाल' के जन्मदाता एस.सी.बेदी के नये उपन्यास प्रकाशित किये। एस. सी. बेदी एक लंबे समय से उपन्यास क्षेत्र से बाहर थे।
सूरज पॉकेट बुक्स से नये लेखक अमित श्रीवास्तव, मोहन मौर्य, मिथिलेश गुप्ता, देवेन पाण्डेय जी आदि सामने आये तो वहीं पाठकों की मांग को देखते हुए उन्होंने पुराने लेखकों भी प्रकाशित किया।
सूरज पॉकेट बुक्स के सहयोगी मिथिलेश गुप्ता जी कहते हैं की "सोशल मीडिया ने उपन्यास संसार को नये पाठक दिये और पाठकों की मांग पर ही हमने परशुराम शर्मा, वेदप्रकाश कांबोज और अनिल मोहन आदि को पुन: प्रकाशित किया।"
यह सब बदलते समय और बढते उपन्यास पाठकों का ही प्रभाव था की एक के बाद एक नये लेखक सामने आते गये और पुराने लेखकों के उपन्यास भी पुन: प्रकाशित होने लगे।
इसी समय उपन्यास जगत के वीकीपिड़िया कहे जाने वाले आबिद रिजवी साहब का उपन्यास 'मेरी मदहोशी के दुश्मन' (रिप्रिंट) रवि पॉकेट बुक्स से आया और लगभग दस वर्ष पश्चात एक्शन लेखिका गजाला करीम ने भी अपने उपन्यास 'वन्स एगेन' उपन्यास जगत में पुन: पदार्पण किया।
उपन्यास बाजार को पुन: पलवित होते हुए देखकर राजा पॉकेट बुक्स ने भी लगभग दस वर्ष पश्चात टाइगर का एक पूर्व घोषित उपन्यास 'मिशन आश्रम वाला बाबा' प्रकाशित किया और आगे एक उपन्यास 'मिशन सफेद कोट' की घोषणा भी की।
पाठकों के प्रेम को देखते हुए प्रतिष्ठित लेखक वेदप्रकाश कांबोज जी ने भी अपने उपन्यासों को पुन: बाजार में उतारा। जिसे पाठकों ने हाथो-हाथ लिया। वेदप्रकाश कांबोज जी चाहे नये जासूसी उपन्यास नहीं लिखे लेकिन पुराने उपन्यासों का पुन: प्रकाशन एक नये आरम्भ का सुखद संकेत तो है। कांबोज जी का सूरज पॉकेट बुक्स और गुल्ली बाबा पब्लिकेशन से प्रकाशित होना और विश्व पुस्तक मेले में उपन्यास का विमोचन होना इस बात को प्रमाणित करता है की जासूसी उपन्यासों का सुनहरा समय लौट रहा है। लेखक अनुराग कुमार जीनियस कहते हैं -"वास्तव में पाठकवर्ग पुनः सक्रिय हुआ है। उपन्यास का दौर लौट रहा है। लेकिन इसकी रफ्तार अभी धीमी है।"
समय के साथ पाठकवर्ग पुन: उपन्यासों की तरफ आकृष्ट हुआ, यह रूझान चाहे लेखक और प्रकाशक को लाभ देने वाला तो नहीं था लेकिन संतोषजनक अवश्य था। जहां पाठक को नये उपन्यास मिल जाते हैं वहीं लेखक को इतनी संतुष्टि है की वह अपने लेखन को जीवित रख रहा है। मात्र जीवित ही नहीं ईबुक के माध्यम से कुछ हद तक आमदनी भी करता है।
अगर आने वाले समय में कुछ और लेखकों के जासूसी उपन्यास बाजार में आ जाये तो कोई अचरज नहीं होगा। यह एक अच्छी पहल है और उम्मीद है यह पहल एक सार्थक मुकाम तक पहुंचे।
उपन्यास साहित्य का दौर वापस लौट रहा है तो इसके कई कारण रहे हैं। अब लेखक अपने नाम के साथ सैल्फ पब्लिकेशन कर सकता है। ईबुक ने तो इस साहित्य की धारा को एक नया रास्ता दिया है। जहाँ लेखक अपनी किताब का स्वयं प्रकाशक है। संतोष पाठक, चन्द्रप्रकाश पाण्डेय और राजीव कुलश्रेष्ठ और विपिन तिवारी जैसे कई लेखकों का आरम्भ ही ईबुक से हुआ है। यह ईबुक की लोकप्रियता थी, जिसे देखकर सूरज पॉकेट बुक्स ने चन्द्रप्रकाश पाण्डेय और संतोष पाठक को हार्डकाॅपी में प्रकाशित किया वहीं राजीव कुलश्रेष्ठ अपनी ईबुक से ही प्रसन्न हैं। वे कहते है की मुझे नये पाठक और आमदनी इसी से हो जाती है।
अनिल गर्ग, विकास भंटी, विजय सरकार, साग्नि पाठक, कमल कांत और के. सिंह आदि ऐसे नाम है जो ईबुक के क्षेत्र में काफी चर्चित रहे हैं।
संतोष पाठक जी कहते हैं- "जासूसी उपन्यासों का दौर लौट रहा है इसलिए लौट रहा है क्योंकि आज सैल्फ पब्लिशिंग जैसी सुविधाएं सहज ही उपलब्ध हैं। लिहाजा किसी लेखक के लिए अपने लिखे को प्रकाशित करा पाना बेहद आसान काम साबित हो रहा है। "
यह तो तय है की बदलते ट्रेड ने नये पाठक पैदा किये हैं। ईबुक से भी आगे एक नये ट्रेड आडियो बुक्स का भी आ रहा है। मिथिलेश गुप्ता जी कहते हैं की -"मेरे उपन्यास को पढने से ज्यादा सुना गया है।"
जासूसी उपन्यास के पाठक अवश्य लौट रहे हैं लेकिन वे हाॅर्डकाॅपी के साथ-साथ अन्य माध्यमों से लौट रहे हैं।
इसी समय एक और ट्रेड चला वह है उपन्यास संग्रहण का। उपन्यास जगत में सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जी को छोड़ कर किसी भी लेखक के पास स्वयं के उपन्यास तक न थे। लेकिन इस बदलते दौर में कुछ लेखक सक्रिय हुए और अपने उपन्यासों को एकत्र करना आरम्भ किया, वही पाठकवर्ग तो पहले से ही उपन्यास संग्रह कर्ता था लेकिन अब इनमें कुछ और वृद्धि हुयी है।
संतोष पाठक जी का कथन सत्य ही साबित हो रहा है कि अब लेखक स्वयं प्रकाशक बन कर उपन्यास साहित्य के स्तम्भ को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। जहां शुभानंद जी ने अपने लेखन का आरम्भ अपनी प्रकाशन संस्था का के आरम्भ से किया तो वहीं लंबे समय तक उपन्यास साहित्य पटल से गायब रहने के पश्चात अमित खान जी ने भी 'बुक कैफे' नाम से अपना प्रकाशन संस्थान आरम्भ कर दिया। विभिन्न प्रकाशन संस्थाओं से प्रकाशित होने के बाद संतोष पाठक जी और इकराम फरीदी जी ने भी 'थ्रिल वर्ल्ड' नाम से एक प्रकाशन संस्थान की नींव रखी।
राजस्थान के जैसलमेर से 'फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन' ने सन् 2018 में उपन्यास साहित्य में हाॅरर उपन्यासों की कमी को पूरा किया अपने तीसरे सेट तक इनसे अपने पाठकों पर अच्छी पकड़ बना ली।
नये लेखकों और प्रकाशक संस्थानों का आना यह सुनिश्चित तो करता है की जासूसी उपन्यास जगत का समय पुन: लौट रहा है। अब यह समय कैसा होगा यह लेखकों पर निर्भर करता है की वे पाठकों को क्या देते हैं।
इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक है लेखक वर्ग नये प्रयोग, भाषाशैली और नयी कहानियों के साथ पाठकों को अच्छा मनोरंजन प्रदान करें।
अभी प्रकाशकों को भी थोड़ा सक्रिय होना होगा। उपन्यास सम्पादन सही ढंग से हो और इसके अलावा यह सुनिश्चित करें कि किताबों की बिक्री ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों जगह हो और पुराने उपन्यास भी आसानी से मिले। ईबुक एक अच्छा माध्यम है जहाँ लेखक और प्रकाशक अपने पुराने उपन्यास उपलब्ध करवा सकते हैं।
आदरणीय रमाकांत मिश्र जी, सबा खान, रुनझुन सक्सेना और चन्द्रप्रकाश पाण्डेय जी को पढने के बाद एक नयी उम्मीद कायम होती है की उपन्यास साहित्य में नयी भाषा शैली और प्रयोगशील लेखक भी हैं। प्रयोग आवश्यक हैं, यही प्रयोग इस साहित्य को नया रूप देंगे।
वर्तमान समय लेखक और पाठकवर्ग के लिए एक अच्छा अवसर लेकर आया है। इस समय चाहे उपन्यास का बाजार सीमित हुआ है लेकिन यह भी तय है जो सार्थक और मौलिक लेखनकर्ता होगा वह पाठकों को प्रभावित करेगा। हार्डकाॅपी के अतिरिक्त बहुत से पाठक ईबुक और आॅडियो के माध्यम से उपन्यास को पढना- सुनना पसंद करते हैं।
अपने समय के चर्चित लेखक द्वय 'धरम-राकेश' जी के उपन्यास भी में पुनः प्रकाशित होकर आ सकते हैं। चर्चित 'हिमालय सीरिज' लिखने वाले बसंत कश्यप जी ने भी आश्वासन दिया की वे अपनी 'हिमालय सीरिज' का पुनः प्रकाशन करवा रहे हैं।
यह तो तय है की लोकप्रिय उपन्यास साहित्य का समय वापस लौट रहा है। चाहे इसकी गति धीमी हो। वह मात्र हार्डकाॅपी के रूप में ही नहीं बल्कि ईबुक और आॅडियो के माध्यम से भी वापसी कर रहा है। अब जरूरत है तो उपन्यास साहित्य के बाजार को मजबूती प्रदान करने की ताकी यह भविष्य में नये आयाम स्थापित कर सके।
गुरप्रीत सिंह (व्याख्याता)
श्री गंगानगर, राजस्थान
ब्लॉग- www.sahityadesh.blogspot.in
ईमेल- sahityadesh@gmail.com
(यह आलेख एम. इकराम फरीदी जी के उपन्यास 'चैलेंज होटल' में प्रकाशित हुआ था)
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