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रविवार, 25 फ़रवरी 2024

क्रमांक वाले कुछ रोचक शीर्षक

साहित्य देश के 'शीर्षक स्तम्भ' के अंतर्गत इस अंक में प्रस्तुत है कुछ ऐसे शीर्षक जो क्रमवार हैं। 
उपन्यास साहित्य में एक समय था जब इस तरह के उपन्यास चैलेंज रूप में भी लिखे जाते थे।
  जब बिमल चटर्जी जी ने धुंआ सीरीज लिखी तो चैलेंज स्वरूप कर्नल सुरेश (रितुराज जी) ने धुंध सीरीज लिखी थी।
यहाँ प्रस्तुत है कुछ ऐसे रोचक शीर्षक, जिनमें उपन्यास एक विशेष क्रम में हैं।
परशुराम शर्मा - पहली छाया, दूसरी छाया, तीसरी छाया, नर्क की छाया
परशुराम शर्मा- पहला चोर, दूसरा चोर, तीसरा चोर,पृथ्वी के चोर
परशुराम शर्मा- पहला बवण्डर, दूसरा बवण्डर, तीसरा बवण्डर, बवण्डर की ज्वाला
अनिल मोहन- पहली चोट, दूसरी चोट, तीसरी चोट, महामाया की माया
बिमल चटर्जी- पहली चोट, दूसरी चोट, तीसरी चोट, चोट पर चोट
बिमल चटर्जी- पहला शैतान, दूसरा शैतान, तीसरा शैतान, शैतानों का बादशाह
वेदप्रकाश शर्मा- पहली क्रांति, दूसरी क्रांति, तीसरी क्रांति, क्रांति का देवता
श्याम तिवारी - पहला तिलिस्म, दूसरा तिलिस्म, तीसरा तिलिस्म, तिलिस्म का बादशाह
कुमार मनेष- पहला हैवान, दूसरा हैवान, तीसरा हैवान, हैवानों का शहंशाह
एच.इकबाल(सोमदत्त शर्मा)- पहला कत्ल,दूसरा कत्ल, कत्ल की रात, कत्ल ही कत्ल (विनय प्रकशन)
अम्बरीश कश्यप- बाजीगर सीरीज

पहला धुंआ
पहली धुंध
- वेदप्रकाश शर्मा जी का सौवां उपन्यास- कैदी नम्बर 100
- कंवल शर्मा के क्रमशः उपन्यास- वन शाॅट, सैकण्ड चांस, टेक थ्री

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

धाँय- धाँय- धाँय और योगेश मित्तल

 साहित्य देश के 'रोचक किस्सा' स्तम्भ में प्रस्तुत है 
   योगेश मित्तल जी ने स्वयं के नाम के अतिरिक्त अन्य लेखकों के नाम से भी लेखन किया है। जैसे 'एच. इकबाल' नाम से 'धाँय- धाँय- धाँय' उपन्यास लेखन।
योगेश मित्तल जी के जीवन का एक रोचक किस्सा उन्हीं के शब्दों में। 

जब मैं पहली बार भारती पॉकेट बुक्स में गया, रजिस्टर में लिखी जा रही इमरान सीरीज की यही स्क्रिप्ट मेरे हाथ में थी, नाम पढ़कर भारती पॉकेट बुक्स के स्वामी लालाराम गुप्ता ने कहा, "धाँय-धाँय-धाँय" यह भी कोई नाम है। योगेश जी आपको तो नाम रखने भी नहीं आते।"

बुधवार, 30 जून 2021

उपन्यास साहित्य और मेरठ - प्रवीण जैन

उपन्यास साहित्य और मेरठ - प्रवीण जैन

       नो ड़ाऊट, मेरठ की  पहचान को जासूसी उपन्यासो, लुगदी लिटरेचर, पॉकेट बुक पब्लिशर्स ने नया आयाम  दिया। मगर मेरठ की अपनी अलग पहचान भी रही है, 1857 के स्वंत्रता संग्राम से भी पहले की । यह पहचान थी उस नौचंदी मेले से जो 1672 से पशुओं की खरीद फरोख्त के मेले से शुरु हुआ। जिसके नाम पर मेरठ से लखनऊ तक रेगुलर एक ट्रेन नौचंदी एक्सप्रेस चलती है और जैसा की किवदन्तियो मे कहा जाता है, देवी पार्वती के उस मन्दिर के सामने गढ़ रोड पर  लगने से है जिसे रावण की पटरानी मंदोदरी ने देवी भक्त होने के कारण बनवाया था। आपके कोई मित्र परिचित, रिश्तेदार मेरठ मे हो और नौचंदी मेला देखने के लिये आमन्त्रित न करे, यह तो हो ही नही सकता था, कम से कम 80 के दशक तो बिल्कुल नही। 

1672 से   अब तक मेला दो बार सिर्फ 1858 और 2020 मे  मुल्तवी हुआ है। 

          मेरठ के पॉकेट बुक बाज़ार मे आने से  पहले इलाहबाद ( अब प्रयागराज) जासूसी, सामाजिक, थ्रिलर, अपराध कथाओ के पब्लिकेशन का गढ़ था। निकहत पब्लिकेशंस, कुसुम प्रकाशन, मित्र प्रकाशन जैसे नामी ग्रामी प्रकाशक इलाहबाद मे ही थे। क्या खूब छापा इन्होने, जासूसी दुनिया, रहस्य , मनोरमा, मनोहर  कहानियाँ, माया, मनमोहन ( बाल पत्रिका) सत्य कथा जैसे मासिक  उपन्यास और रिसाले यहीं से  छपे। जिसे हम लुगदी पेपर पर छपा होने से लुगदी साहित्य कहते सुनते है उसकी शुरुआत न्यूज़ प्रिंट पेपर पर बुक साईज़ से हुई थी। 

सोमवार, 31 मई 2021

किस्सा प्रेम बाजपेयी का

किस्सा तब का है जब प्रेम बाजपेयी जी- 33 आराम पार्क,रामनगर,दिल्ली में रहते थे।

मनोज पॉकेट बुक्स और राज पॉकेट बुक्स (बाद में राजा पॉकेट बुक्स) के रास्ते अलग-अलग हो चुके थे।
अब तक,  13 साल से 'मनोज पॉकेट बुक्स' के लिए उपन्यास लिख रहे 'प्रेम' जी के लिए इस रिश्ते को अब और आगे खींचना मुश्किल हो गया था।
अंततः 'तन चुभी कीलों' के मुखड़े से शुरू होने वाला 'गीत'...'सौतन और सुहागन' के अंतरे से गुज़रता हुआ 'क्षमादान' पर जाकर द एण्ड हो गया।
'मनोज' जी ने अपनी 'पार्टी' से 'बाजपेयी' जी को निकाल दिया।
    उस उपन्यासकार को जिसके लिए तब 'ठण्डा मतलब कोकाकोला' के अंदाज़ में पंच लाइन हुआ करती थी। "मनोज पॉकेट बुक्स का अर्थ है 'प्रेम बाजपेयी' का नया उपन्यास।
डबडबाई आँखों से 'प्रेम' जी ने अंतिम बार 'मनोज' जी की तरफ़ देखा. मन-ही-मन सफ़र को याद किया और नियति मानते हुए विदा ली। 
बहू हो तो ऐसी- प्रेम बाजपेयी

रविवार, 30 मई 2021

नौकरी डाॅट काॅम और वेदप्रकाश शर्मा

 जासूसी साहित्य में कुछ अलग हटकर लिखने का श्रेय 'सस्पेंश के बादशाह वेदप्रकाश शर्मा' को जाता है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और सत्य घटनाओं पर आधारित काल्पनिक उपन्यास लिखें हैं।

      उनकी यही विशेषता उन्हें बाकी लेखकों से एक अलग मुकाम पर स्थापित करने में सहायक है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है, जाना था जापान पहुँच गये चीन समझ गये ना।
     लेखक अपने उपन्यास के प्रकाशन से पूर्व उपन्यास की थीम कुछ और घोषित करता है और उपन्यास का कथानक कुछ और हो जाता है।
यह ऐसे ही नहीं हो जाता। यह तब की घटना है जब वेदप्रकाश शर्मा जी एक खतरनाक बीमारी से जूझ रहे थे। बस तभी राजा पॉकेट बुक्स से वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था।
थी
।करी डाॅट काॅम- ये नाम है मेरे आगामी नये उपन्यास का। हो सकता है आप कहें कि यह अम तो किसी भी एंगिल से जासूसी उपन्यास का नाम नहीं लगता। यहाँ मैं‌ कुछ अंश तक आपकी बात से सहमत हूँ, परंतु विश्वास दिलाता हूँ इसके थ्रिल, सस्पेंश, इन्वेस्टिगेशन और सेंटीमेंट्स को आप वर्षों तक नहीं भूला सकेंगे।

शनिवार, 22 मई 2021

फिल्म 'प्यासा' और उपन्यास 'चोट'- सत्य व्यास

 'प्यासा' फ़िल्म देख चुके हम सब जब दत्त भारती का सम्भवतः पहला उपन्यास 'चोट' पढ़ेंगे तो सोचेंगे कि आखिर इस लेखक ने क्या सोचकर 'गुरुदत्त फिल्म्स' पर कंटेंट चोरी का मुकदमा दायर किया होगा। फ़िल्म और उपन्यास में ऐसा कुछ भी सीधा साम्य ज़ाहिर तो नहीं होता। 
तो फिर ऐसी कौन सी बात थी जिसने दत्त भारती को यह विश्वास दिया होगा कि 'प्यासा' उनकी ही कहानी 'चोट' से प्रेरित है? 
लोकप्रियता की चाह?

रविवार, 16 मई 2021

मेरठ का बदमाश- पात्र चर्चा

मेरठ का बदमाश- गैरीसन
हम जब भी कोई कृति पढने हैं तो उस कृति में कोई न कोई संवाद, घटना या पात्र हमें ऐसा मिल ही जाता है जो पाठक को प्रभावित करता है।
   पाठक भी एक बार उपन्यास को पढना छोड़ कर उसके विषय में सोचने लगता है।
आदरणीय वेदप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'सिंगही और मर्डरलैण्ड' पढते वक्त भी एक ऐसा पात्र सामने आया जिसने कम भूमिका होते हुये भी अपना प्रभाव स्थापित किया। वह पात्र है गैरीसन। 
    यहाँ गैरीसन के विषय में चर्चा करने का एक और विशेष कारण है वह है -गैरीसन का मेरठ का बदमाश होना। वेदप्रकाश शर्मा जी स्वयं मेरठ के निवासी थे और उन्होंने यहां के एक पात्र का सर्जन किया।
     हालांकि गैरीसन नामक पात्र की भूमिका बहुत कम है, लेकिन विजय के साथ टकराते वक्त विजय भी उसकी ताकत को स्वीकारता है।
एक दृश्य देखें
विजय गुलफाम की ओर थोड़ा झुककर बोला-"गैरीसन नाम के किसी गुण्डे को जानते हो?"
"क्या? गैरीसन....।"- लगता था गुलफाम गैरूसन के नाम पर बुरी तरह से चौंका था।
" हाँ, क्या तुम गैरीसन से परिचित हो?"
"आप उसके विषय में क्यों पूछ रहे हो?"
"उस से काम है थोड़ा।"
"गैरीसन बहुत घाघ व्यक्ति है, बेहद खतरनाक लड़का है वो। आजकल उसकी खूब चल-पिल रही है। उसके इलाके में उस से टकराना आत्महत्या करना समझा जाता है। वास्तव में मास्टर, मैंने भी उसे कई बार देखा है, वह खतरनाक व्यक्ति है।"- गुलफाम एक ही साँस में कह गया।
" प्यारे गुलफाम‌ मियां।"- विजय बोला-"शायद भूल रहे हो तुम कि किस से बातें कर रहे हो। गैरीसन इससे ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकता, जितने अपने जमाने के तुम थे।"
"वो तो मैं जानता हूँ मास्टर, लेकिन मेरे ख्याल से उसके इलाके में जाकर उससे टकराना मौत के बस का रोग भी नहीं है। अगर आप कहें तो उसे यहाँ बुलवा दूँ?"

"नहीं प्यारे, अब हम वहीं जाकर उससे मिलेंगे। तुम उसकी तारीफ के पुल बाँधना छोड़ दो और उसके विषय में क्या जानते हो वह बताओ।"
"उसके विषय में यह सुना गया है कि वह मेरठ का बदमाश है, वहाँ पहले बहुत शरीफ था, किंतु सामाजिक तत्वों ने उसे बदमाश बनने पर मजबूर कर दिया और देखते ही देखते उसकी बदमाशी इतनी बढ गयी कि समस्त मेरठ उससे काँपने लगा। मेरठ की बदमाशी नामी है, ये तो आप जानते ही हैं।" (पृष्ठ-56,57)
  गैरीसन और विजय के मध्य एक लड़ाई का दृश्य भी है। यहाँ विजय को यह महसूस होता है कि यह गैरीसन को हराना कोई आसान काम नहीं है।
पहला वार किया विजय ने।
उसने उछलकर एक फ्लाइंग किक जमानी चाही, किंतु तुरंत ही विजय की आँख खुल गयी। सिर्फ आँख ही न खुल गई बल्कि जनाब की नानी भी याद आ गयी। साथ ही यह पता लग गया कि गैरीसन भी वह रसगुल्ला नहीं है, जिसे बस तुरंत ही हजम कर जाओ।(पृष्ठ-65)
    यह तो तय था कि विजय और गैरीसन के मध्य हुयी लड़ाई में विजय की जय तय है। और होता भी यही है लेकिन‌ इस लडा़ई के दौरान जब विजय गैरीसन पर शारीरिक रूप से विजय प्राप्त कर उसे मानसिक रूप से भी मात देता है तभी एक नकाबपोश गैरीसन की हत्या कर देता है।      विजय जैसा व्यक्ति भी गैरीसन से प्रभावित था, तभी तो वह उसकी मृत्यु पर दुखी होता है।
गैरीसन को उठाया गया, तेजी से अस्पताल पहुँचाने का प्रयास किया गया किंतु व्यर्थ। रास्ते में ही गैरीसन ने प्राण त्याग दिये।
न जाने क्यों विजय को गैरीसन की मौत का गहरा अफसोस था। (पृष्ठ-68)
उपन्यास- सिहंगी और मर्डरलैण्ड
लेखक-    वेदप्रकाश शर्मा 
धन्यवाद।
उपन्यास पढते वक्त आपके सामने भी ऐसे पात्र आये होंगे जिनसे आप प्रभावित हुये हैं। अगर आप उन पात्रों पर अपने विचार लिख कर भेजते हैं तो 'साहित्य देश ब्लॉग' पर आपके नाम के साथ उनका प्रकाशन होगा।
संपर्क- sahityadesh@gmail.com

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

रीमा भारती ™

 नाम -रीमा भारती™
प्रकाशक- दुर्गा पॉकेट बुक्स, मेरठ

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में नये-नये करतब होते रहे हैं। कुछ अच्छे और कुछ बुरे भी। लेकिन यहाँ हम जिस पात्र की बात कर रहे हैं उसका किस्सा कुछ अलग ही है।
   लोकप्रिय साहित्य में दिनेश ठाकुर ने एक पात्र खड़ा किया था रीमा भारती। इस पात्र ने इतनी प्रसिद्धि प्राप्त की थी कि तात्कालिक लेखकों और प्रकाशकों ने रीमा भारती से मिलते-जुलते क ई पात्र पात्र मैदान में उतार दिये। यहाँ तक की स्वयं दिनेश ठाकुर की धर्मपत्नी की तस्वीर लगे उपन्यास लेखिका रीमा भारती नाम से प्रकाशित होने लगे।  
रीमा भारती™ दुर्गा पाॅकेट बुक्स
रीमा भारती™ दुर्गा पाॅकेट बुक्स
 जहाँ लेखक दिनेश ठाकुर के उपन्यासों में रीमा भारती नायिका होती थी और उपन्यासों में अश्लीलता होती थी, वहीं स्वयं रीमा भारती नामक लेखिका के उपन्यासों की नायिका चाहे रीमा भारती थी लेकिन वहाँ अश्लीलता नहीं थी।
    पर इन सब के विपरीत दुर्गा पॉकेट बुक्स ने भी लेखिका रीमा भारती मैदान में उतार दी। अब यहाँ समस्या पैदा हो गयी की। मैदान में दो-दो रीमा भारती उपस्थित थी, दोनों ही लेखिका।
तब इसका एक समाधान भी निकाला गया। समाधान कैसे और किन परिस्थितियों में निकला यह अलग विषय है पर यहाँ अपने चर्चा रीमा भारती लेखिका की है।
दिनेश ठाकुर की पत्नी की तस्वीर लगे उपन्यासों की लेखिका रीमा भारती थी, यह तस्वीर उनकी पहचान थी वहीं दुर्गा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित रीमा भारती ट्रेड नेम था और उस पर ट्रेडमार्क (™ )का निशान लगा होता था।
दुर्गा पॉकेट बुक्स से ट्रेडमार्क रीमा भारती के उपन्यास क्रम से
1. दफा 302
2. खतरा
3. केकड़ा
4. फायर
5. धमाका 
6. औरतखोर 

सोमवार, 6 जुलाई 2020

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत
 (लोकप्रिय साहित्य के सितारे कुशवाहा कांत जी के प्रकाशन से 'चिनगारी' मासिक पत्रिकाएं निकला करती थी। पत्रिका में 'श्री चमगादड़' नाम से वे कुछ हास्य- व्यंग्यात्मक स्तंभ भी लिखा करते थे। बाद में इन्हीं हास्य-व्यंग्य को एक पुस्तक रूप में 'उड़ते-उड़ते' शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य 'जनसेविका पुलिस' उसी पुस्तक से लिया गया है।- साहित्य देश

    साहबों! अगर अपने राम सच न बोल, तो पुलिस के समान जनसेवक कर्मचारी भूत-भविष्य-वर्तमान कभी भी नहीं मिलेंगे। हमारे प्रांत की पुलिस तो सेवा भाव में सबसे 'फ्रण्ट' पर है। ट्रेनिंग पीरियड में इन्हें जबानी अभ्यास भी कराया जाता है, ताकि आगे चलकर ये सेवक जनता की माँ-बहनों को धड़ाके के साथ याद रख सकें।
भारत में सुराज होने पर इन जनसेवकों का रोजगार कुछ ठ-ठ-ठप्प पड़ गया है, वर्ना अंग्रेजी पीरियड में आँखों के एक ही इशारे पर इनकी जेबें भर जाती थी। आजकल तो इन बेचारों को कोई ठोस कार्य ही नहीं रह गया है, अत: हम जनता का कर्तव्य है कि इन्हें कोई नवीन कार्य सौंपें।
         एक दिन की बात सुना दूँ। बीच बाजार में अपने एक मित्र जी मिल गये, गोद में चारसालीय 'प्रोडक्शन' लादे। बच्चा बड़ा प्यारा लग रहा था, सो अपनेराम ने बड़े लाड़-प्यार-दुलार से उसे चूमा-चाटा, फिर बातचीत का सिलसिला जो चला तो अन्त में सिनेमा देखने के निश्चय पर आकर रूका। अब मित्रजी बड़े फेर में पड़े। सिनेमा देखने का निश्चय हो चुका, समय भी दस-बारह मिनट ही रह गये, सामने सिनेमा भवन का लाउडस्पीकर रेंक रहा था...मगर गोद का बच्चा वे किसे दें? घर दूर था, पहुँच कर लौटने में काफी देर हो जाती।
"रहने दो कल देख लेंगे..."- अपनेराम‌ ने तसल्ली दी।
       वे बोले-"नहीं यार! आज ही देखेंगे। इतने दिन के बाद तो घोंसले से निकले हो...इस बच्चे को मैं लाया ही क्यों? इसे लेकर सिनेमा में बैठे भी नहीं सकता। शैतान रो-रो दूसरों से गाली सुनवायेगा। इसे खड़े-खड़े लिये रहो तो चुप, जरा भी बैठे कि रोनाध्याय प्रारंभ... "
       तभी अपनेराम की नजर सामने जा पड़ी-थाना! ...बस उपाय दिमाग में आ गया। चट बोला-"मित्र! बच्चा मुझे दो..."
"क्या करोगे?"-कहते हुए मित्र जी ने बच्चे को दे दिया। मैं तूफानमेलीय रफ्तार से बच्चे को लेकर थाने की ओर भागा। अगर वे मेरे अन्तरंग मित्र न होते तो 'उचक्का मेरा बच्चा ले भागा' था, अत: चुपचाप वही मूर्ति बनकर खड़े रहे।
थाने में आया। थानेदार साहब कुर्सी पर बैठे हुए मेज पर टाँग पसार रहे थे।
" क्या है?.."
"सा-साहब! यह ब-ब-बच्चा खो गया है।"- अपनेराम ने कहा।
" खो गया है?..कैसे?..."
"ऐसे ही...हमें उस मोड़ पर रोता हुआ मिला..."
"आपको मिला?...".
" जी हाँ...यों समझ लीजिए, हमने इसे प-प-पाया...आप इसे सम्हालिये...मैं चला..."
"सुनिये...अपना नाम-पता तो बता दीजिये.."
"जरूर-जरूर! लिखिये श्री-श्री...जरा जल्दी कीजिए मुझे सिनेमा जाना है..?"
थानेदार साहब ने मेरी हुलिया लिख ली।
         अपनेराम की सूझ पर मित्रजी दंग रह गये। ठाट से हम लोगों ने साथ-साथ सिनेमा देखा। फिर लौट कर दोनों आदमी थाने गये तो देखा मित्रजी का बच्चा ठाट से जलेबी तोड़ रहा था।
थानेदार साहब बोले-"यह बच्चा तो साहब बड़ा रोता है...पुलिस दौड़ रही है, मगर इसके बाप का पता नहीं"
"मैं खोज लाया साहब !... ये हैं..."- अपनेराम ने कहा।
" आप इसके बाप हैं?"
" जी हाँ"- मित्रजी ने कहा।
"जी हाँ- सेंट-पर-सेंट असली बाप साहब! बड़ी मुश्किल से इनका पता लगा सि-सि-सिनेमा के अन्दर..." मैं बोला।
"सिनेमा के अन्दर?"
"जी-जी नहीं, सिनेमा के बा-बाहर ...ये बिचारे रोते हुए इसे खोज रहे थे।"
"लीजिये साहब। आप अपना लड़का सम्हालिये..बड़े लापरवाह हैं आप लोग...इन्होंने आपके बच्चे को यहाँ पहुँचाया है और आपको यहाँ तक लाये भी हैं, इसलिये इन्हें कुछ इनाम..."
"अवश्य..."-मित्रजी ने पाँच का नोट मेरी ओर बढाया।
हम लोग हँसते हुए वापस हुए।
पुलिस के लिये यह नया काम कैसा रहा साहब? इति श्री इलस्ट्रेटेड-वीकलीयो नम:।
पुस्तक - उड़ते-उड़ते
लेखक-  कुशवाहा कांत

बुधवार, 1 जुलाई 2020

एक थी तुरन

           एक थी तुरन....
किस्सा कुशवाहा कांत जी के प्रेम जीवन का।

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में रोमांटिक उपन्यासकार के रूप में 'कुशवाहा कांत जी' का नाम खूब चर्चित रहा है। प्रेम रंग में रंगे इनके उपन्यास युवा हृदय की धड़कन होते थे। प्रेम का मार्मिक, स्वच्छंद और हृदय की गहराइयों को छू लेने वाला चित्रण इनके उपन्यासों में खूब होता था, इसलिए इन्हें रोमांटिक उपन्यासकार कहा जाता था।
        कुशवाहा कांत जी के नाम के साथ एक और नाम चर्चित रहा है, वह नाम है 'तुरन'। जिन्होंने ने कुशवाहा कांत के उपन्यास पढे हैं, उनके लिए यह नाम हमेशा रहस्य रहा है।
क्या आपने यह नाम पहले कभी सुना है?
क्या आप तुरन को जानते हैं?

       अगर आपने तुरन का नाम नहीं सुना तो यह आलेख पढें, आपको जान जायेंगे आखिर कौन थी तुरन।
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण ही रोमांटिक उपन्यासकार कहलाने लगे थे?
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण रोमांटिक उपन्यास लिखते थे?
- क्या एक लेखक की जान तुरन के लिए ही चली गयी? या फिर कोई और कारण था?

अतीत की गर्द के नीचे छिपे किए ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आज मिलना असंभव है।
काश आज तुरन‌ मिल जाती तो हम पूछते- बताओ तुरन सच क्या है? 

रविवार, 14 जून 2020

लोकप्रिय साहित्य में आत्मकथा और जीवनी

किसी चर्चित व्यक्ति जो जानने का अच्छा माध्यम है उसकी आत्मकथा या जीवनी। इन दोनों के माध्यम से हम उस व्यक्ति के व्यवहार, मित्र, उसके परिवेश और व्यक्तित्व को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इन दोनों के अतिरिक्त डायरी भी एक अच्छा माध्यम है। वैसे बहुत से चर्चित व्यक्तियों की डायरियों ने भी 'आत्मकथा और जीवनी' की नींव का काम किया है।
           पहले हम जान लें की आत्मकथा (Autobiography) और जीवनी (Biography) में अंतर क्या होता है।
सबसे बड़ा और विशेष अंतर दोनों में यही है की आत्मकथा (Autobiography) लेखक द्वारा स्वयं लिखी जाती है अर्थात् स्वयं के जीवन की कथा स्वयं द्वारा लिखना ही आत्मकथा है।
        वहीं जीवनी (Biography) में किसी के जीवन की कथा अन्य व्यक्ति द्वारा लिखी जाती है।
       जीवनी का अंग्रेजी अर्थ “बायोग्राफी” है। जीवनी में व्यक्ति विशेष के जीवन में घटित घटनाओं का कलात्मक और सौन्दर्यता के साथ चित्रण होता है।  जीवनी इतिहास, साहित्य और नायक की त्रिवेणी होती है। जीवनी में लेखक व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन और यथेष्ट जीवन की जानकारी प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करता है।
         साहित्य में आत्मकथा किसी लेखक द्वारा अपने ही जीवन का वर्णन करने वाली कथा को कहते हैं। यह संस्मरण से मिलती-जुलती लेकिन भिन्न है। जहाँ संस्मरण में लेखक अपने आसपास के समाज, परिस्थितियों व अन्य घटनाओं के बारे में लिखता हैं वहाँ आत्मकथा में केन्द्र लेखक स्वयं होता है।

         हालांकि दोनों जी अपनी-अपनी विशेषताएं और कमियां है।   'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' महात्मा गांधी जी की आत्मकथा है और 'आवारा मसीहा' विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित 'शरतचन्द्र' जी की जीवनी है। 

रविवार, 16 दिसंबर 2018

जासूसी उपन्यासों के रोचक शीर्षक

   नाम‌ किसी भी प्राणी, वस्तु और स्थान के लिए आवश्यक है। नाम से ही पहचान होती है। कहने को कोई कहे की नाम महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन नाम के बिना पहचान भी मुश्किल हो जाती है।

           नाम/ टाइटल या शीर्षक कुछ भी कह लो। जब अपने बात करते हैं जासूसी उपन्यास साहित्य की तो इस क्षेत्र में उपन्यासों के जो शीर्षक दिये गये वह बहुत रोचक रहे हैं। हालांकि हिंदी का गंभीर साहित्य भी इस क्षेत्र में पीछे नहीं है, लेकिन जासूसी उपन्यास साहित्य तो अपने रोचक और नये अजीबोगरीब शीर्षक के लिए प्रसिद्ध रहा है।

           हिंदी गंभीर साहित्य में 'मुर्दों का टीला', 'बंद गली का आखिरी मकान', 'पहाड़ पर लालटेन' जैसे कुछ शीर्षक मिलेंगे। 

            जासूसी उपन्यास साहित्य में भी ऐसे असंख्य शीर्षक हैं जो काफी रोचक और दिलचस्प हैं।  जैसे- अधूरा सुहाग, कुंवारी सुहागिन, मुर्दे की जान खतरे में, विधवा का पति,  देखो और मार दो' जैसे अनेक अजब-गजब शीर्षक देखने को मिल जाते हैं। 

इस विषय पर आबिद रिजवी जी कहते हैं- जासूसी उपन्यासों में शीर्षक की भी अपनी महती भूमिका हैं । छोटे शीर्षक कैरेक्टर से सम्बन्धित और बड़े व अटपटे शीर्षक कथानक की उत्सुकता साथ लिए होते हैं ।   

            कर्नल रंजीत के उपन्यासों की कहानियां जितनी रोचक होती थी वैसे रोचक उनके नाम भी होते थे। 'उङती मौत',   'खामोश! मौत आती है।'

              कर्नल रंजीत का एक पात्र था मेजर बलवंत। कुछ समय बाद मेजर बलवंत के नाम से भी उपन्यास बाजार में आये। 'थाने में डकैती',  'लाश का प्रतिशोध' जैसे रोचक शीर्षक उनके कुछ उपन्यासों के देखने को मिलते हैं। 


               यह चर्चा वेदप्रकाश शर्मा जी के बिना तो अधूरी है, क्योंकि वेद जी अपने उपन्यासों के शीर्षक बहुत सोच समझकर रखते थे। क्योंकि सबसे पहले शीर्षक ही पाठक को प्रभावित करता है। 

             वेदप्रकाश शर्मा जी अपने उपन्यासों का शीर्षक बहुत गजब देते थे। उनका उपन्यास 'लल्लू' जब बाजार में आया तो शीर्षक कुछ अजीब सा लगा लेकिन इस उपन्यास की लोकप्रियता के बाद वेद जी ने कुछ ऐसे और शीर्षक से उपन्यास लिखे। जैसे 'पंगा', 'पैंतरा', 'शाकाहारी खंजर'। एक बहुत ही गजब शीर्षक था 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे'। जिस भी पाठक ने यह शीर्षक पढा उसकी एक बार इच्छा तो अवश्य हुयी होगी की यह उपन्यास पढे। सच भी है जितना रोचक यह शीर्षक था उतना रोचक यह उपन्यास भी था। अगर वेद जी 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे' लिखते हैं तो विनय प्रभाकर भी कम नहीं, वो 'चार बीवियों का पति' लिखते हैं।


               'मर्डर मिस्ट्री' लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने अप‌ने एक उपन्यास में लिखा है की वे किसी उपन्यास का शीर्षक देने में सक्षम नहीं है। लेकिन ऐसी बात नहीं है, उनके कुछ उपन्यासों के नाम इतने रोचक हैं की पाठक उनकी तरफ आकृष्ट होता है।  'छह सिर वाला रावण',  'छह करोड का मुर्दा' जैसे शीर्षक स्वयं में आकर्षक का केन्द्र हैं। 

             यह करोड़ो का खेल यही खत्म नहीं होता। सामाजिक उपन्यासकार  सुरेश साहिल लिखते हैं‌-   'एक करोड़ की दुल्हन' तो धरम राकेश जी 'तीन करोड़ का आदमी' पेश करते हैं। 

     'तीन करोड़ का आदमी' ही क्यों, विनय प्रभाकर तो 'दस करोड़ की विधवा' और 'पाँच करोड़ का कैदी 'नब्बे करोड़ की लाश' और 'सात करोड़ का मुर्गा'  जैसे उपन्यास ले आये थे। 

     अब पता नहीं विनय प्रभाकर को लाश और करोड़ो की सख्या से इतना प्रेम क्यों था। इसलिए तो ये 'दस करोड़ की हत्या' भी करवा देते हैं। इतनी महंगी हत्या कौन करेगा भाई, तो तुंरत उत्तर मिला वेद प्रकाश वर्मा जी की ओर से 'कत्ल करेगा कानून'। अब कातिल को भी तो ढूंढना है तब सुनील प्रभाकर बोले  'घूंघट में छिपा है कातिल' तो केशव पण्डित ने कहा -'कातिल मिलेगा माचिस में‌'

     विनय प्रभाकर के कुछ और रोचक शीर्षक देखें-  'चूहा लड़ेगा शेर से', 'कानून का बाप'।

 विनय प्रभाकर 'कानून का बाप' लिखते हैं तो केशव पण्डित इसका जबरदस्त उत्तर देते नजर आते हैं। केशव पण्डित लिखते हैं 'कानून किसी का बाप नहीं'। तो फिर बाप कौन है, आप भी गौर कीजिएगा- 'मेरा बेटा सबका बाप' है।(वेदप्रकाश शर्मा)

        अगर सबसे रोचक नाम की बात करें तो मेरे विचार से वे केशव पण्डित सीरीज के उपन्यासों के होते थे। केशव पण्डित के कुछ रोचक शीर्षक थे जैसे-   'कानून किसी का बाप नहीं, सोलह साल का हिटलर, टुकड़े कर दो कानून के, चींटी लड़ेगी हाथी से,  अंधा वकील गूंगा गवाह, डकैती एक रूपये की, श्मशान में लूंगी सात फेरे,  हड्डियों से बनेगा ताजमहल'

          इतने रोचक शीर्षक पाठक को जबरदस्त अपनी तरफ खीच लेते हैं। कहानी चाहे इनमें कैसी भी हो लेकिन शीर्षक एक दम नया होता था।

             शीर्षक 'डकैती एक रूपये की' (केशव पण्डित) देखकर पाठक एक बार अवश्य सोचेगा की आखिरी एक रुपये की डकैती क्यों?

             ऐसे ही मिलते-जुलते शीर्षक 'एक रुपये की डकैती'  से अनिल मोहन जी का भी उपन्यास आया था। तो अमित खान को भी कहना पड़ा 'एक डकैती ऐसी भी'

             यहाँ तो  अनिल मोहन जी के राज में  'एक दिन का हिटलर', भी मिलता है जो कहता है 'आग लगे दौलत को', और  'आ बैल मुझे मार'। 

             वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से एक नकली उपन्यास मनोज पॉकेट से आया था जिसका नाम 'नाम का हिटलर' था। वेद जी ने 'आग लगे दौलत को' और 'आ बैल मुझे मार' शीर्षक से भी लिखा। इनका एक और उपन्यास था 'लाश कहां छुपाऊं'

             आखिर लाश छुपाने की जरुरत क्यों पड़ गयी। क्योंकि एक बार सुनील प्रभाकर ने बता दिया की 'मुर्दे भी बोलते हैं'।  जब इंस्पेक्टर गिरीश को इस बात का पता चला की 'बोलती हुयी लाशें' भी पायी जाती हैं तो वो भी लाश के पास जा पहुंचे जिसे देखकर  राज भी चिल्लाये की 'लाश बोल उठी'। इसी लाश के चक्कर में तो उलझकर  नवोदित लेखक अनुराग कुमार जीनियस  'एक लाश का चक्कर' लिख गये।

                 नये लेखक कंवल शर्मा तो इसी लिये जाने जाते हैं की उनके उपन्यासों के शीर्षक में एक अंक अवश्य होता हैं। वन शाॅट, सैकण्ड चांस, टेक थ्री, कैच फाॅर आदि।

             इस मामले में राकेश पाठक भी अग्रणी रहे। इनके शीर्षक इतने गजब होते थे कसम से उपन्यास छोड़ कर बंदा शीर्षक ही पढता रहे। आप भी वाह! वाह करे बिना न रहेंगे। 'थाना देगा दहेज, चूहा लङेगा शेर से, मुर्दा कत्ल करेगा, कौन है मेरा कातिल, इच्छाधारी नेता'। सब एक से बढकर एक नाम हैं।

     राजा पॉकेट बुक्स के लेखक हरियाणा निवासी J.K. शर्मा जिन्होंने टाइगर के छद्म नाम से उपन्यास लिखे उनका उपन्यास था  'इच्छाधारी अम्मा'। वेदप्रकाश शर्मा के दो और गजब शीर्षक है। 'वो साला खद्दर वाला', 'अपने कत्ल की सुपारी'। 

        गौरी पण्डित कहती है 'पगली मांगे पाकिस्तान', अब पाकिस्तान तो मांगने से मिलेगा नहीं तो केशव पण्डित 'बारात जायेगी पाकिस्तान' ले चले। अब ऐसी बारात में जायेगा कौन तो सुरेन्द्र मोहन पाठक बोले यह तो 'चोरों की बारात' होगी लेकिन इसमें 'एक थप्पड़ हिंदुस्तानी'(VPS) भी होगा।

            रवि पॉकेट बुक्स से गौरी पण्डित के उपन्यासों‌ के शीर्षक भी गजब थे-  मुर्दा बोले कफन फाड़ के  सब साले चोर हैं, आओ सजना खेले खुन-खून,  गोली मारो आशिक को।

             यह गोली सिर्फ आशिक तक सीमित नहीं रहती प्रेम‌ कुमार शर्मा तो कहते हैं 'देखो और मार दो'। 

         सुरेश साहिल 'किराये का पति' का पति पेश करते हैं, जिसे रेणू 'दो टके का सिंदूर' कहती है,  आखिर  यह किराये का पति कितने दिन चलेगा। इसका उत्तर गोपाल शर्मा 'सात दिन का पति' में देते हैं। यहाँ पति ही सात दिन का नहीं बल्कि 'तीन दिन की दुल्हन'(विनय प्रभाकर) भी उपस्थिति है।

       कोई तो चिल्ला -चिल्ला कर कह रहा है- 'मैं विधवा हूँ'(विनय प्रभाकर) तो सुनील प्रभाकर और भी जबरदस्त बात कहते हैं, वे तो इसे 'बिन ब्याही विधवा' कहते हैं, इनका साथ धरम राकेश 'अनब्याही विधवा' कहकर देते हैं। रानू कहते हैं यह तो 'कुंवारी विधवा' है। लेकिन इसका प्रतिवाद सत्यपाल 'कुंवारी दुल्हन' कह कर करते हैं। राजहंस तो इसे 'अधूरी सुहागिन' कह कर पीछे हट जाते हैं, किसी ने पूछा 'अधूरी सुहागिन' कैसे तो अशोक दत्त ने 'दुल्हन एक रात की' कहकर उत्तर दिया। लेकिन मनोज इसे 'दो सौ साल की सुहागिन' कह कर मान बढाते हैं।

         यह आवश्यक नहीं की ये शीर्षक सभी को आकृष्ट करें। पाठक विकास नैनवाल जी कहते हैं- अतरंगी शीर्षक ध्यान आकृष्ट करने में सफल होते हैं लेकिन ये एक वजह भी है जिससे हिन्दी अपराध साहित्य को हेेय दृष्टि से देखा जाता है। हो सकता है 90 के दशक में ये चलन रहा हो लेकिन मेरा मानना रहा है कि शीर्षक कहानी के अनुरूप होना चाहिए। अब शॉक वैल्यू का जमाना गया। मैंने अनुभव किया है कि कई मर्तबा लोग इन शीर्षकों के वजह से ही ये धारणा मन में बना लेते हैं कि किताब का स्तर कम होगा।

                 अरे यार अभी एक नाम तो रह ही गया। सबसे अलग, सबसे जुदा, सबसे रोचक और सबसे हास्य अगर शीर्षक हैं तो वह है माया पॉकेट बुक्स की लेखिका 'माया मैम साब' के उपन्यासों के। 

     इनके उपन्यासों के शीर्षक जैसे शायद ही किसी और लेखक ने दिये हों। 'बिल्ली बोली म्याऊँ, मैं मौत बन जाऊं', 'मुर्गा बोला कुक्कडू कूं, मुर्दा जी उठा क्यूं', और 'कौआ बोला काऊं-काऊं, मैं करोड़पति बन जाऊं'

     

       क्यों जनाब अब तो आप मानते हैं ना हिंदी जासूसी साहित्य के उपन्यासों के शीर्षक कितने रोचक और दिलचस्प रहे हैं। 

   अगर आपको कुछ ऐसे ही रोचक शीर्षकों की जानकारी है तो  देर किसी बात की कमेंट बाॅक्स आपके लिए ही है। आप भी लिख दीजिएगा कुछ रोचक उपन्यासों के शीर्षक।

     आया कुछ समझ में, अगर समझ में नहीं आया तो 'अभिमन्यु पण्डित' से आशीर्वाद लीजिए और बोलिए 'रावण शरणम् गच्छामि'।

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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

राम-रहीम

कहानी राम रहीम की
कौन थे राम- रहीम?

जोड़ी 'राम-रहीम' की। उपन्यासकार जगत में कुछ लेखक द्वय संयुक्त रूप से भी उपन्यास लेखन करते रहे हैं। यह प्रयोग सफल भी रहा है। एक समय था जब 'धरम-राकेश' नामक लेखक की जोड़ी खूब चर्चित रही थी। ऐसा एक और नाम भी है,वह है 'राम-रहीम'। राम-रहीम की जोड़ी में राम नामक लेखक थे 'परशुराम शर्मा' और रहीम बने थे 'फारूख अर्गली'। यह जोड़ी भी काफी चर्चित रही। (यह जानकारी परशुराम शर्मा जी ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर की)

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

किस्सा ओमप्रकाश का

#नकली_उपन्यास_लेखन_कैसे?
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प्रिय पाठकों, लिटरेचर लाइफ गु्रप पर 12 नवम्बर, सन् 2018 ई. को दो मित्रजनों की पोस्टें पढ़ीं। उस पोस्ट पर उन्होंने ओम प्रकाश शर्मा (जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा पर भ्रामक टिप्पणियां कर, जासूसी उपन्यास जगत के 40-50 की वय के पाठकों को भ्रामक जानकारियां देकर दिवंगत लेखक पर आक्षेप लगाए। मैं उन्हें पूरी तरह नकारते हुए जानकारियां दुरुस्त कराने का प्रयास कर रहा हूं। ओम प्रकाश शर्मा (बाद में जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा) और वेद प्रकाश काम्बोज का मैं सन् 1958 ई. से पाठक रहा हूं। हो सकता कुछ महीने पूर्व से उनका लेखन पाठकों के बीच आ गया हो। ये लेखक द्वय, मासिक पत्रिकाओं में लिखा करते थे। (नाॅवल) लेखन की शर्त मासिक पत्रिका प्रकाशक की हर माह नाॅवल देने की होती थी। 112 पेजेज और 27 लाइनों में नाॅवल होते थे, (मूल्य 75 पैसे।) अतः सरलता से हफ्ता-दस में लिखे जा सकते थे।
ओम प्रकाश शर्मा के 450 के आसपास उपन्यास, और 900 के आसपास नकली उपन्यासों को मिलाकर संख्या बतायी गयी है। पाठक द्वय द्वारा। प्रश्न उठाया कि 450 उपन्यास कैसे लिखे जा सकते हैं? आक्षेपित किया कि ओम प्रकाश ने नकली उपन्यास ओम प्रकाश शर्मा के नाम से लिखे-लिखाए।
इस संदर्भ में जानकारी देता हूं कि मेरे सन् 1968-70 के बीच दिल्ली प्रवास के बीच, एक ऐसी घटना घटी जिसने जासूसी उपन्यासकारों के नाम पर भूचाल ला दिया, जो सन् 2000 तथा बाद तक अपना पूरे असर में रहा; जब तक कि जासूसी उपन्यासों की सेल, ढलान पर न आ गयी। हुआ यूं कि उक्त अवधि 1968-70 के बीच, कूचा चेलान, दरियागंज, दिल्ली-6, निवासी एक ओम प्रकाश शर्मा नामधारी सज्जन जो लिखने का शौक रखते थे, उनसे एक प्रकाशक ने, कानूनी सलाह लेकर राजेश, जयन्त, जगत, तारा आदि पात्रों सहित जासूसी उपन्यास लिखाया। ओम प्रकाश शर्मा के नाम से छपा। बेचा।
नोट-उस समय तक पिछले दस वर्षों से लिखते आ रहे ओम प्रकाश शर्मा के दस वर्षों में प्रतिमाह नावल, 10×12=120 मार्केट में आ चुके थे। पाठक उनकी शैली पहचानते थे। बाद में आये ओम प्रकाश शर्मा की शैली में अंतर पकड़कर शिकायतें लिखकर भेजी गयीं। पूर्व के ओम प्रकाश शर्मा ने प्रकाशक का साथ पाकर बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा पर मुकदमा किया। अदालती पेशियां पड़ीं। बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा मुकदमा चलने के दौरान कई उपन्यास मार्केट में उतार चुके थे। (नोट-मैं उन्हें नकली ओम प्रकाश शर्मा न लिखूंगा, क्योंकि अदालत में नहीं माना) बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा के वकील ने अदालत में साबित कर दिया कि उनके मुवक्किल का नाम ओम प्रकाश शर्मा हैं। उन्हें अपने नाम से लिखने-छपने का मौलिक अधिकार है। अदालत ने यह दलील स्वीकार की। पूर्व वाले ओम प्रकाश शर्मा ने उपन्यास के पात्रों को लेकर विरोध रखा, बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा के वकील ने अदालत को दलील देते हुए कहा कि राम, सीता, गीता, राजेश, जयन्त, तारा नाम देश के हजारों लोगों के हो सकते हैं, चूंकि पात्र समाज के नामों से ही उठाए जाते हैं, अतः इस अधिकार को भी नहीं छीना जा सकता।
बहरहाल बाद वाले ओम प्रकाश शर्मा ने मुकदमा जीता। अदालत ने अपनी सलाह दी कि नाम के साथ कुछ और आगे-पीछे लगाकर नाम की भ्रामक स्थिति को लेखक स्वयं साफ करें। पूर्व वाले ओम प्रकाश शर्मा ने अपने लिए ‘जनप्रिय लेखक’ नाम रजिस्टर्ड कराया। जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के नाम से नावल, फोटोयुक्त आने लगे।
तो दोस्तों, इस तरह आगे, ओम प्रकाश शर्मा नाम के साथ नाॅवलों के छपने का सिलसिला शुरू हुआ तो महीने में दिल्ली-मेरठ से 50-60 उपन्यास आने लगे। जिनकी संख्या समीक्षक द्वय ने 900 लिखी वे कई हजार में है जिन्हीं अब नकली कहने में परहेज नहीं।
जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के 450 उपन्यास पर सवाल उठाने वालों को ध्यान में लाना आवश्यक है कि पूर्व में 120 उपन्यास की बात 10 वर्षों में मैंने लिखी, अगले 30 वर्षों को और जोड़ लीजिए 68 से 98 जबकि उपन्यास लेखन-पाठन का स्वर्णिम काल था तो 30×12=360़120=480 उपन्यास बनते हैं। कुछ अपवाद स्वरूप समय में न लिखा तो तीस की संख्या घटकर 450 रह जाती है। जो अक्षरशः सही है। जनप्रिय ओम प्रकाश ने कभी नकली नाॅवल नहीं लिखा। उन्हें जब एक उपन्यास के प्रथम एडिसन की रायल्टी दस हजार रुपये मिलते थे तब नकली ओम प्रकाश शर्मा पाण्डुलिपि लिखने वाले लेखक, 60-100 रुपये के बीच पारश्रमिक पाते थे। सहज में समझ में आने वाली बात है कि 10,000 रुपये एक प्रिण्ट के लेने वाला लेखक 60-100 रुपये में नाॅवल नकली क्यों लिखेगा? एक बालक बुद्धि की भी समझ में यह बात नहीं आने वाली।
ओम प्रकाश शर्मा नाम के जाली उपन्यासों की संख्या 900 में नहीं 9,000 से ऊपर हो सकती है।
जनप्रिय ओम प्रकाश के साथ मैंने वेद प्रकाश काम्बोज के नाम को भी खास मकसद से लिखा है। सन् 1974-75 में वेद प्रकाश शर्मा जी जब लेखन क्षेत्र में आये तो अदालती फैसले को निगाह में रखते हुए वेद प्रकाश काम्बोज के पात्रों विजय-रघुनाथ को लेकर लेखन की शुरूआत की। उन्होंने मेहनत की कामयाबी के झण्डे गाड़े। पर न भूलना चाहिए कि शुरूआती दिनों में वेद प्रकाश काम्बोज और विजय-रघुनाथ सीरीज के नाम की गुडविल शामिल थी।

-आबिद रिजवी
8218846970
दिनांक-13 नवम्बर, 2018

ओमप्रकाश शर्मा- एक रोचक किस्सा

ओमप्रकाश शर्मा से जनप्रिय लेखक बनने की कहानी
उपन्यास जगत के चर्चित लेखक ओमप्रकाश को कौन नहीं जानता।
अरे! मैं भी भूल गया भाई। ओमप्रकाश भी तो दो हैं ना अब आप कहां भटक गये।
जगन, जगत, पचिया, बंदूक सिंह जैसे पात्रों को लिखने वाले ओमप्रकाश शर्मा।
अब भी नहीं पहचाने तो अब हम बोल देते हैं जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा।
अच्छा अब पहचाना है।
   तो मित्रों कोई लेखक अपने पहले उपन्यास से तो जनप्रिय होता नहीं इसलिए उसे जनप्रिय बनने के लिए कुछ ऐसा लिखना होगा की वह वास्तव में जनप्रिय बन सके।
   और इन्होंने ऐसा ही लिखा की पाठक इनके उपन्यास का इंतजार करते रहते थे।
   इनकी लोकप्रियता इस कदर थी की उपन्यास जगत में एक और ओमप्रकाश शर्मा आ गये।
अब दो ओमप्रकाश शर्मा।
अब पाठक किसे पढे।
कौन असली- कौन नकली।
इस असली- नकली की लङाई में पाठक भटकता रहता है।
हालांकि नकली किसी को भी नहीं कहा जा सकता।
अब दोनों ओमप्रकाश शर्मा।
  तो मित्रों प्रथम ओमप्रकाश शर्मा इस बात को लेकर अदालत पहुंच गये की मेरे नाम से कोई और लेखन कर रहा है जिसके कारण पाठक से धोखा हो रहा है।
अदालत में द्वितीय ओमप्रकाश शर्मा को बुलाया गया।
तो द्वितीय ओमप्रकाश शर्मा ने कहा, -" महोदय मेरा वास्तविक नाम ओमप्रकाश शर्मा है और में भी एक लेखक हूँ । क्या एक नाम से दो लेखक नहीं हो सकते।"
अब जज महोदय ने प्रथम ओमप्रकाश शर्मा जी से कहा , " आप दोनों ही ओमप्रकाश शर्मा हो। इसलिए किसी को लेखन से मना तो नहर किया जा सकता। अतः आप अपने उपन्यास पर अपना चित्र प्रकाशित कीजिएगा।"
ओमप्रकाश शर्मा की तरफ से फिर आपत्ति आयी, कि जब द्वितीय ओमप्रकाश शर्मा भी अपना चित्र लगाना आरम्भ कर देंगे तो पाठक फिर भ्रमित होगा।"
न्यायाधीश ने कहा, -" चलो, फिर आप अपने नाम के आगे- पीछे कोई उपाधि या उपनाम लगा लो।"
यहाँ मामला कुछ जचा।
काफी सोच-विचार के बाद ओमप्रकाश शर्मा जी ने अपने नाम के आगे जनप्रिय लेखक लगाना आरम्भ किया।
इस प्रकार जनता के प्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा से जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा बन गये।
- आबिद रिजवी जी के स्मृति कोश से।
 

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...