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शनिवार, 2 जनवरी 2021

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

            “जासूस शब्द सुनते ही दो नाम मस्तिष्क की दीवारों पर उभरते हैं पहला शरलक होम्स और दूसरा इसके रचियता सर आर्थर कानन डॉयल । 221 B, बेकर स्ट्रीट में रहने वाला शरलक वह जासूस है जो अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर अनुमान लगाता है, तर्क करता है और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता है और अंत में अपराधियों का पता लगा लेता है ।”

            हिन्दी भाषा में जासूस के लिए गुप्तचर शब्द का इस्तेमाल किया जाता था बाद में इसकी जगह जासूस शब्द प्रचलित होता चला गया । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव और संचालन के लिए गुप्तचरों के एक ऐसे तंत्र की रचना की जोकि अभेद्य थी । उस काल खंड से लेकर आज के आधुनिक काल तक प्रशासन की सफलता गुप्तचरों अथवा जासूसों पर ही निर्भर रहती है । पुलिस विभाग में जब कोई व्यक्ति एक रकम के एवज में कोई सूचना या इन्फोर्मेशन देता है तो उसे इन्फोर्मर कहा जाता है । 

वार्ष्णय टाइम्स, दिसंबर 2020
वार्ष्णय टाइम्स, दिसम्बर2020
           विश्व युद्ध के दौरान जासूसों की देशभक्ति और जांबाजी के कई किस्से अखबारों और पत्रिकाओं के द्वारा लोकप्रिय होते चले गए । ये वो दौर था जब युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक देश दूसरे देश में अपने जासूसों के जाल को बेहद गुप्त रूप से बुनता था और जरूरी सूचनाएँ हासिल करने में लगा रहता था । 

            भारत देश भी इनसे अछूता नहीं रहा था । इस तरह के किस्से-कहानियाँ यहाँ पर भी आम जनमानस के बीच बेहद लोकप्रिय थे । राजा-रजवाड़े ब्रिटिश राज के समक्ष कमजोर हो चुके थे । जनता में देशभक्ति सर्वोपरि थी । ऐसे समय में बाबू देवकी नन्दन खत्री जी (1861-1913) के तिलिस्म-एयारी और घटना-प्रधान उपन्यास चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ और काजर की कोठरी आदि के प्रकाशन से हिन्दी प्रकाशन जगत में खलबली सी मच गई ।

            जिस घटना-प्रधान उपन्यास क्षेत्र का निर्माण हिन्दी जगत में खत्री जी ने किया था उसमें सुंदर जासूसी उपन्यासों — अदभुत लाश, गुप्तचर, बेकसूर की फाँसी, केतकी की शादी, मारे हुए की मौत आदि की रचना करके श्री गोपाल राम गहमरी जी (1866-1946) ने अपनी रचनाओं से लोगों को हिंदी पढ़ने को उत्साहित किया । यदि देवकीनंदन खत्री के बाद किसी दूसरे लेखक की रचनाओं को पढ़ने के लिए गैरहिंदी भाषियों ने हिंदी सीखी तो वे श्री गोपालराम गहमरी ही थे । इनके उपन्यास कल्पना-क्षेत्र के बजाय वास्तविकता के करीब थे ।

            उस दौर में अँग्रेजी उपन्यास भी खूब पढ़े जाते थे जिनका सीधा प्रभाव बंगला साहित्य पर पड़ा और बाद में बंगला साहित्य ने अपनी एक अलग पहचान बनाई । बंगला साहित्य के प्रभाव से हिन्दी साहित्य भी अछूता न रहा सका । हिन्दी भाषा में अनूदित बंगला-साहित्य पाठकों में बेहद लोकप्रिय हुआ । इन अनुवादों में बराबर घटना प्रधानता का लोप और सामाजिक चित्रणों की प्रधानता दिखाई दे रही थी । प. किशोरीलाल जी गोस्वामी जी (1865-1932) ने सर्वप्रथम हिन्दी में सामाजिक उपन्यासों की नींव डाली । त्रिवेणी, कुसुम कुमारी, मस्तानी, प्रेममयी आदि प्रमुख रचनाओं को मिला कर इन्होंने कुल 65 उपन्यासों की रचना की ।

            अब तक जासूसी और सामाजिक दोनों ही तरह के लेखन में उर्दू के समान्तर हिन्दी में भी एक बड़ा पाठकवर्ग तैयार हो चुका था । पाठकों में, लेकिन जासूसी की अपनी एक विशेष जगह थी । इस दौर में एक बहुत चर्चित लेखक हुए श्री इब्ने सफ़ी जी (1928-1980), जोकि उर्दू और हिन्दी में समान रूप से लोकप्रिय थे ।

            इनकी रचनाओं को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: पहला रहस्य-रोमांच से भरे उपन्यास और दूसरा हास्य और उपहास की लघु कथाएँ और लेख । इनके एक आत्मकथात्मक निबंध के अनुसार, एक साहित्यिक बैठक में किसी ने दावा किया कि उर्दू साहित्य में यौन विषयों के अलावा अन्य विषयों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी । इस धारणा को चुनौती देने के लिए, श्री इब्ने सफ़ी जी ने जनवरी 1952 में मासिक नकहत में जासूसी दुनिया सीरीज़ में जासूसी कहानियाँ लिखना शुरू किया ।

            1955 में, श्री इब्ने सफ़ी जी ने इमरानसीरीज़ की शुरुआत की, जोकि जासूसी दुनिया की तरह ही बहुत प्रसिद्ध होने के साथ-साथ सफल भी हुई । इनकी जासूसी दुनियाऔर इमरानसीरीज़ — जिसमें रोमांच, रहस्य, हिंसा, रोमांस और कॉमेडी का मिश्रण होता था, भारत में और बँटवारे के बाद — पाकिस्तान और भारत — दोनों में ही बेहद लोकप्रिय हुई, इतनी कि कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी इनके अनुवाद हुए ।

            लेखन में अकरम इलाहाबादी, इजहार असगर, आदिल रशीद, दत्तभारती, प्यारेलाल 'आवारा', गोविंद सिंह, एम एल पाण्डेय आदि लेखकों ने बहुत नाम कमाया । लोकप्रिय साहित्य पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा था । देखा जाए तो पढ़ने का शौक जो पाठकों में आज तक जिंदा है उसकी एक बड़ी वजह लोकप्रिय साहित्य के जासूसी कथानकों वाले उपन्यासों का भी है ।

            समय करवट ले रहा था । सरल, सीधी कही जाने वाली आम भाषा में लोगों के दिलोदिमाग पर जिन उपन्यासों ने अपनी छाप छोड़ी वे अधिकतर लोकप्रिय साहित्य की रचनाएँ ही थीं । फिर लेखन जगत में जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा (1924–1998) जी का पदार्पण हुआ । इनकी लेखन शैली ऐसी थी कि बात सीधा दिल में उतरती जाती थी । सामाजिक और जासूसी दोनों ही तरह के उपन्यास इन्होंने लिखे । इनके पात्र राजेश, जगत, बंदूक सिंह, जगन, गोपाली आदि बहुत लोकप्रिय हुए । इनके कुछ उपन्यासों साँझ का सूरज, लखनवी जासूस, खून की दस बूंदें, नूरबाई, नीली घोड़ी का सवार, पापी धर्मात्मा और दूसरा ताजमहल आदि को अब क्लासिक का दर्जा प्राप्त हो चुका है ।

            कुछ समय बाद श्री वेद प्रकाश काम्बोज जी ने अपनी शुरुआती रचनाओं से ही एक ऐसे जासूसी संसार की रचना की जिससे पाठक अचंभित हो गया । अमर पात्र विजय के रचनाकार श्री काम्बोज जी की विजय-रघुनाथ, अलफाँसे, सिंगही और गिल्बर्ट सीरीज़ ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए । विजय की झकझकियाँ स्कूल-कालेज के छात्रों की जबान पर रहती थी । इनके लेखन से प्रभावित हो कर कई युवाओं ने लेखन क्षेत्र में हाथ आजमाए । लोकप्रिय साहित्य जगत के मेरठ और दिल्ली के अधिकतर प्रकाशकों ने इनकी रचनाओं को छापा । इनके नाम और कामयाबी को भुनाने के लिए कई प्रकाशकों ने कम समय में ज्यादा लाभ कमाने के लिए अंजान लेखकों से इनके पात्रों को लेकर नकली उपन्यास लिखवा कर बाजार में उतारे । मगर फिर भी वे इनके पासंग भी न पहुँच सके । ऐतिहासिक उपन्यासों की शृंखला में बुद्ध, सिकंदर, चाणक्य और चन्द्रगुप्त, अशोक, विवेकानंद और बाबा फरीद पर लिखे गए इनके उपन्यास बहुत चर्चित रहे हैं ।

            फिर श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी उर्दू-हिन्दी-पंजाबी और अंग्रेजी मिश्रित जबान की ऐसी चाशनी लेकर आए जिसकी मिठास अभी तक पाठकों के मुँह में घुली है । इनके विमल और सुनील आदि पात्रों ने पाठकों का भरपूर मनोरंजन किया । हाल ही में प्रकाशित विमल सीरीज का कहर और जाके बैरी सन्मुख जिये भी पसंद किए गए ।

            1959 में जनप्रिय श्री ओमप्रकाश शर्मा और श्री वेद प्रकाश काम्बोज दोनों उपन्यास एक साथ नीलम जासूस कार्यालय, दिल्ली से प्रकाशित हुए और बेहद पापुलर हुए । मशहूर क्राइम लेखक श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का पहला उपन्यास “पुराने गुनाह नए गुनहागार” 1963 में नीलम जासूस कार्यालय से प्रकाशित हुआ । लेखक श्री कुमार कश्यप जी की पहली रचना नीलम जासूस से ही प्रकाशित हुई ।

             नीलम जासूस कार्यालय के संस्थापक लाला श्री सत्यपाल वार्ष्णेय जी अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाले व्यक्ति थे । इन्होंने फिल्मी अप्सरा नाम की एक पत्रिका भी निकाली जोकि बहुत बहुत चली । उपन्यास जगत के साथी प्रकाशक श्री वार्ष्णेय जी की कर्मठता और ईमानदारी के लिए आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लेते हैं ।

            श्री परशुराम शर्मा जी की इंका, आग, क्रांति और बाज़ सीरीज़ को लोग आज भी ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ते हैं । श्री वेद प्रकाश शर्मा जी (1955-2017) के वर्दी वाला गुंडा की बिक्री करोड़ों में हुई । श्री अनिल मोहन जी की देवराज चौहान  सीरीज भी हिट रही है । ट्रेड नाम के कुछ लेखकों को भी हम कभी भुला नहीं सकते । जासूसी लेखन में कर्नल रंजीत, मेजर बलवंत और सामाजिक में राजवंश, मनोज व समीर के उपन्यास बहुत लोकप्रिय हुए । श्री योगेश मित्तल, श्री फारुख अर्गली, श्री हादी हसन और श्री आरिफ़ माहरवीं जी ने ट्रेड नामों से कई सौ उपन्यासों का लेखन किया । ट्रेड नामों से लिखने के बावजूद आज इन सभी बड़ी हस्तियों के बारे में पाठक जानते हैं और सम्मान करते हैं ।

            वैसे, सामाजिक लेखन में श्री गुलशन नन्दा जी ने जो मुकाम हासिल किया, कोई भी उनके करीब नहीं सका था । सामाजिक लेखन में राजहंस, रानु, रितुराज, धरम-राकेश और प्रेम वाजपाई के मर्मस्पर्शी कथानकों की भी अपनी ही धूम थी । पुरुषों के अलावा युवतियों, किशोरियों और कामकाजी महिलाओं से लेकर गृहणियों तक में ये खूब पढ़े जाते थे ।

            मेरठ के वरिष्ठ लेखक और उपन्यासकर श्री आबिद रिजवी जी के कहते हैं — “लेखक सिर्फ लेखक होता है । अपने भावों और विचारों को जब वह कागज पर उतारता है तब वह पाठकों को अपना बेस्ट देने की कोशिश करता है । कागज लुगदी हो सकता है किन्तु लेखक नहीं ।”

             आज भी वे पूरे जोश के साथ लेखन में लगे हुए है ।

            आजकल के दौर में जिन युवा लेखकों को पसंद किया जा रहा है उनमें श्री इकराम फरीदी, श्री संतोष पाठक, श्री शुभानन्द, श्री मिथलेश, श्री ओमप्रकाश यायावर, सुश्री सबा खान, श्री रमाकांत मिश्र, श्री देवेंद्र पाण्डेय, श्री निखिल सचान और श्री सत्य व्यास प्रमुख हैं ।

            तो, दोस्तों ये थी एक झलकी उस बीते हुए युग की जिससे होते हुए आज हम ईबुक, पीडीएफ़ और किंडल तक पहुँचे हैं । फिर मुलाकात होने पर अन्य बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे ।

            हिन्दी पल्प फिक्शन से संबन्धित इस लेख में और बहुत कुछ लिखना चाहता था किन्तु शब्दों की सीमा और समयाभाव के चलते ये संभव नहीं हो पाया । फिर उस दौर की जानकारियाँ भी तो प्राप्त नहीं हो पाती । हो सकता है इसमें बहुत से लेखकों के नाम छूट गए हों । उसके लिए मैं करबद्द क्षमाप्रार्थी  हूँ ।

            (सामाजिक जनचेतना के लेखक राम ‘पुजारी’ एक युवा लेखक हैं । अब तक उनके चार उपन्यास अधूरा इंसाफ, लव जिहाद, अन्नु और स्वामी विवेकानंद और देवभक्ति प्रकाशित हो चुके हैं ।)

Publish For Magazine: Varshney Times December 2020 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार लेख। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा जी का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। उनके उपन्यास जादुई प्रभाव वाले होते हैं। चाहे वो अपने देश का अजनबी हो, नयनतारा हो या नीली घोड़ी का सवार। उनकी राजेश-जयन्त, जगत, जगन-बन्दूकसिंह सीरीज भी बेमिसाल हैं।

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  2. समस्त पाठक मित्रों का धन्यवाद।

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