लेबल

सत्य व्यास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सत्य व्यास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 23 सितंबर 2023

संघर्षकाल और जनप्रिय- सत्य व्यास

 संघर्षकाल और जनप्रिय- सत्य व्यास

समकालीन और उसपर भी प्रतिस्पर्धी लेखकों से सराहना पाना दुर्लभ है। यह सराहना यदि लेखक के लेखकीय जीवन काल में मिले तो यह दुर्लभतम कही जानी चाहिए।
यह एक ऐसी जिंस है जिसके लिए इसके लिए न सिर्फ अच्छा लेखक होना बल्कि उम्दा इंसान होना भी मूलभूत गुण है। 
जनप्रिय ओम प्रकाश शर्मा दोनों ही थे। बकौल "आबिद रिजवी" दोपहर में जनप्रिय के घर के सामने से  गुजरते घोस्ट राइटर या संघर्षरत लेखकों में से कोई ऐसा नहीं होता था,जो उनकी नजर में आ जाए और बिना खाना खाए गुजर जाए।"
दरअसल,तब मेरठ पॉकेट बुक्स के प्रकाशकों का बड़ा बाजार था (मेरी समझ से यह भी जनप्रिय की ही देन थी,  उन्होंने दिल्ली छोड़ कर मेरठ को अपने लेखन का शहर बनाने के प्रयास में व्यवसायियों को प्रकाशन की राह दिखाई।बाकी सब इतिहास है)
तब के प्रयत्नशील और संघर्षरत लेखक, मैनपुरी,इटावा, बरेली,हापुड़ जैसे शहरों से अपनी पांडुलिपि जमा करने प्रकाशकों के पास आते और पहुंचते न पहुंचते दोपहर तक भूखे रह जाते।  जनप्रिय यह पीड़ा समझते थे। कोई लेखक यदि उनकी आंखों के आगे पद जाता तो वह  साधिकार उन्हें घर ले आते। 
जनप्रिय ने लेखकों की पांडुलिपि  देखने की कोशिश नही की। कारण यह था कि वह जानते थे कि 90 फीसद लेखक  उनके ही पात्रों पर रची पांडुलिपि लेकर आए हैं।जिन्हे बाद में प्रकाशक "ओम प्रकाश शर्मा" के जाली नाम से ही चिपका कर प्रकाशित कर देगा।वह युवा और संघर्षरत लेखकों को इसलिए दोषी भी नहीं मानते थे। द ट्रिब्यून(संभवतः) को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था वह जानते थे कि यह युवा लेखकों की रोजी रोटी का मसला है। असली दोषी तो प्रकाशक हैं। वह ट्रेड नामों के खिलाफ लामबंद होने के लिए स्थापित लेखकों से आग्रह करते रहे। मगर हासिल वह स्वयं भी जानते ही थे।
बहरहाल साथ लगी कतरन और कवर सामाजिक लेखक साधना प्रतापी की 1970 में प्रकाशित उपन्यास "अंधेरी रात के हमसफर से है" जहां उन्होंने ओम प्रकाश शर्मा की प्रतिष्ठा की बाबत जिक्र किया है। गौरतलब यह कि साधना प्रतापी, सत्तर के दशक में स्वयं ही एक अच्छे लेखक थे।उनकी दो एक किताबों का फिल्मीकरण भी हुआ है। 
किताब के नाम और कवर पर न  जाएं। यह भ्रामक ही हुआ करती थीं । कहानी एक संघर्षरत लेखक की है, जो अपना उपन्यास प्रकाशित करवाना चाहता है।
आलेख- सत्य व्यास


शनिवार, 22 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-01

राजहंस...एक शाश्वत लेखक
----------------------------------------
विजय पॉकेट बुक्स की स्थापना सन 1967 में हुई और उन्होंने  सन 1971 में राजहंस के ट्रेड नेम का रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में अर्जी दी। रजिस्ट्रेशन बहरहाल तब नहीं हुआ लेकिन उन्होंने इस नाम से विभिन्न घोस्ट लेखकों से 8 किताबें लिखवा लीं थी।

केवल कृष्ण कालिया, विजय पॉकेट बुक्स के उपन्यासों के कमीशन एजेंट थे। वह उपन्यास  की बुकिंग आर्डर लाते और अपना कमीशन प्रकाशन से कमा लेते।

सन 1974 के आसपास, कालिया ने भी उपन्यास लिखने की इच्छा जाहिर की और विजय पॉकेट बुक्स से राजहंस नाम से ही लिखने की अनुमति मांगी। 

विजय पॉकेट बुक्स ने एग्रीमेंट द्वारा लिखित कई प्रतिबंध लादते हुए केवल कृष्ण कालिया को यह अनुमति दे दी। जिसके अनुसार कालिया किसी भी अन्य पार्टी-प्रिंटर या प्रकाशक के लिए नही लिख सकते। वह इस नाम का प्रयोग लेखक के रूप में स्वयं के लिए भी नहीं कर सकते न ही किसी और को लिखने के लिए उधार दे सकते हैं। इत्यादि इत्यादि।

बर्फ के अंगारे और राम तेरी गंगा मैली- सत्य व्यास

 सन 70 के किसी साल में आई रानू की किताब 'बर्फ़ के अंगारे' का नायक कमल  एक लड़की 'रूपा'  द्वारा प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिए जाने पर उसका बलात्कार कर देता है।
और  पछतावा होने पर खुद से भागकर पहाड़ों पर चला जाता है। वहां उसे एक दिन एक पहाड़न लड़की 'नीली' मिलती है, जो सम्भवतः उसे खाई गिरने से बचाती है और जातः में एक पहाड़ी खुखरी भी रखती है।
दोनों में प्रेम होता है मगर पहाड़ी रीति के अनुसार नीली को जीतने के लिए कमल को उसके कबीले से तलवारबाजी जीतनी होती है।
वह तलवारबाजी जीत कर नीली से विवाह करता है मगर सुहागरात के दूसरे ही दिन उसे अपने पिता का एक तार मिलता है जिसके अनुसार उनकी तबीयत खराब है और वो अगर उन्हें आखिरी बार देखना चाहता है तो जल्दी लौटे।
घबराया कमल,नीली से कहता है कि पिताजी की तबियत खराब है,अगर वह उसे भी साथ लेकर जाएगा तो  पिताजी को धक्का लग सकता है। इसलिए वह  पिताजी को समझाकर एक हफ्ते में ही नीली को ले जाएगा।

फिल्म 'प्यासा' और उपन्यास 'चोट'- सत्य व्यास

 'प्यासा' फ़िल्म देख चुके हम सब जब दत्त भारती का सम्भवतः पहला उपन्यास 'चोट' पढ़ेंगे तो सोचेंगे कि आखिर इस लेखक ने क्या सोचकर 'गुरुदत्त फिल्म्स' पर कंटेंट चोरी का मुकदमा दायर किया होगा। फ़िल्म और उपन्यास में ऐसा कुछ भी सीधा साम्य ज़ाहिर तो नहीं होता। 
तो फिर ऐसी कौन सी बात थी जिसने दत्त भारती को यह विश्वास दिया होगा कि 'प्यासा' उनकी ही कहानी 'चोट' से प्रेरित है? 
लोकप्रियता की चाह?

Featured Post

मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...