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रविवार, 17 दिसंबर 2023

उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा

उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा

वेद प्रकाश शर्मा मेरठ  की  शान हैं. उपन्यास साहित्य है या नहीं, यह साहित्य की मुख्य धारा से जुड़ी हस्तियों के बीच बहस का विषय हो सकता है लेकिन एक सफल उपन्यासकार इसकी परवाह न करते हुए अपने पाठकों से मिलने वाले प्यार को ही सबसे बड़ा ईनाम मानता है और उसकी नजर में यही है उसकी सफलता-असफलता का असली पैमाना। इस बहस से इतर एक उपन्यासकार उपन्यास की विधा को ही अपना सब कुछ मानता है। यही वह विधा है जो अपने पाठकों को तिलिस्म और फंतासी की दुनिया की सैर कराता है। इसके बावजूद समाज में मां-बाप बच्चों को आज भी उपन्यास पढ़ने से क्यों रोकते हैं? उपन्यास क्या है? इसे समाज अथवा साहित्य किस रूप में लेता है? इन बातों को लेकर उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा से की गई चर्चा से अपने पाठकों को रूबरू करा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार  संतराम पाण्डेय। 
        एक मुलाकात में श्री वेद प्रकाश शर्मा खुद ही बताना शुरू करते हैं। जब मैं हाई स्कूल में पढ़ रहा था तो स्कूल की मैग्जीन में मुझे भी कुछ लिखने का मौका मिला। मैंने जो कहानी लिखी उसका शीर्षक था ‘पैनों की जेल’। मेरी कहानी पढ़कर मेरे शिक्षक श्री उपेन्द्र नाथ अश्क बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे बुलाया और मेरी बड़ी तारीफ की और मुझे स्कूल की मैग्जीन का बाल संपादक बना दिया। वहीं से मेरा लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। वह कहते हैं कि मुझे बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का बेहद शौक था। पिताजी अक्सर डांटते भी थे कि पढ़ाई में मन नहीं लगाता और उपन्यास पढ़ता रहता है। यह तो बिगड़ जाएगा। इसके बावजूद छिपकर मैं उपन्यास पढ़ता रहता था। (बचपन की यादें उन्हें ताजी हो जाती हैं।) बताते हैं- पिताजी एक प्रेस में कंपोजीटर थे। स्कूल की छुट्टियां हो जाती थीं तो मुझे भी अपने साथ ही लगा लेते थे। इसलिए कि खाली रहेगा तो इधर-उधर घूमेगा। मैं भी प्रेस में जाता और कुछ करता रहता था। उस वक्त पे्रस में एक प्रकाशक आया करते थे। वह उपन्यास छापते थे।              एक दिन वह अपने मैटर का प्रूफ लेने आए। उसी दौरान मैंने एक उपन्यास लिखा था। जब तक उनका प्रूफ निकल रहा था, तब तक हाथ से लिखा मेरा उपन्यास उन्होंने पढ़ लिया। उन्होंने मेरे पिताजी से पूछा कि यह उपन्यास किसने लिखा तो पिता जी ने मेरी तरफ इशारा कर दिया। उन्होंने मेरी तारीफ की। उस समय तो वह चले गए लेकिन थोड़ी देर बाद आए और पिताजी से बोले कि यह उपन्यास मैं ले जाऊं? देखने के बाद वापस कर दूंगा। पिताजी ने कह दिया ले जाओ। अगले रोज उन्होंने मुझे बुलाया और सौ रुपए का नोट मेरी तरफ बढ़ा दिया। बोले यह उपन्यास मैं छापूंगा लेकिन तुम्हारे नाम से नहीं। मेरे नाम से क्यों नहीं? मैंने पूछा। बेटे, जिसका नाम बिकता है उसी के नाम से छापना पड़ेगा न। मैंने साफ कह दिया कि मेरे नाम से छापना हो तो छापो। इनकार करने पर मैं अपना उपन्यास वापस ले आया। वह उपन्यास तो नहीं छपा लेकिन इससे मेरा हौसला जरूर बढ़ गया कि मेरा लिखा भी छप सकता है। फिर तो मैं प्रकाशकों के चक्कर लगाने लगा। उस समय मेरी उम्र मात्र 15-16 साल ही थी। इसलिए प्रकाशक बच्चा समझकर मुझे वापस कर दिया करते थे। 1971 में मेरा पहला उपन्यास छपा लेकिन मेरे नाम से नहीं। मैंने भी समझौता कर लिया कि कोई बात नहीं। मेरा नाम न सही लेकिन लोग पढ़ तो रहे हैं, यही सही। यही सोचकर लिखता रहा। इसी तरह मेरे 24 उपन्यास छपे। मेरे नाम से मेरा पहला उपन्यास 1973 में छपा- दहकते शहर। पाठकों ने पसंद किया तो मेरा हौसला बढ़ता गया और जब मेरी बात हुई तब  तक उनके  167 उपन्यास छप चुके हैं।
    जब उनसे पूछा गया कि बच्चों को उपन्यास पढ़ने से क्यों रोका जाता है तो श्री शर्मा ने बताया कि उपन्यासों में प्रायः सेक्स और लड़ाई झगडे की बातें रहती है। इसलिए मां-बाप रोकते हैं कि कहीं उनका बच्चा भी न बिगड़ जाए। उन्होंने बताया कि इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने जो भी उपन्यास लिखे, उनमें सेक्स के बारे में नहीं लिखा, सिवाय एक उपन्यास के, जहां इसकी जरूरत थी।
   अपने उपन्यासों की लोकप्रियता का पता आपको कैसे चलता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के बजाए उन्होंने दो संस्मरण सुनाए। वह बताते हैं- एक बार मैं अपने परिवार के साथ ट्रेन से सिलीगुड़ी जा रहा था। जिस एसी कोच में मैं था उसमें एक आदमी को मेरा उपन्यास पढ़ते देख मेरी बेटी ने कहा- पापा, वह देखो, वह आदमी आपका उपन्यास पढ़ रहा है। मैंने उसे चुप करा दिया कि जब लोगों को पता चलेगा कि इस उपन्यास का लेखक इसी कोच में सफर कर रहा है तो लोग आ घेरेंगे और सबकी नींद खराब होगी। बाद में पता चला कि उस कोच में 55 यात्री सफर कर रहे थे और 55 में से 32 लोग मेरा उपन्यास पढ़ रहे थे। दूसरी बात- मेरे उपन्यासों के सर्वाधिक पाठक बिहार में हैं।  दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश, तीसरे पर राजस्थान फिर उत्तर प्रदेश और हरियाणा आते हैं। बिहार से तो पाठकों के पत्र और फोन अब भी आते हैं कि आप हमारे यहां से चुनाव लड़ लो लेकिन मैं उनकी इस मोहब्बत का आभार व्यक्त करते हुए उनसे हाथ जोड़ लेता हूं कि कहां मैं और कहां राजनीति। 
  अब तक वेद प्रकाश शर्मा के चार उपन्यासों पर फिल्म बन चुकी है। बहू की आवाज, अनाम, सबसे बड़ा खिलाड़ी और इंटर नेशनल खिलाड़ी। वह कहते हैं कि फिल्मों से लेखक के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता चलता। एक बार पर्दे पर नाम आया और बाद में तीन घंटे तो केवल कलाकार ही पर्दे पर छाए रहते हैं, लेखक गायब ही रहता है। 
   उपन्यास लिखने की प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर श्री शर्मा बताते हैं कि ढेरों उपन्यास पढ़ते रहने से मुझे लिखने का प्रोत्साहन मिला। वह कहते हैं कि जब मैं बचपन में कोई उपन्यास पढ़ता था तो मेरे मन में एक बात जरूर आती थी कि इससे अच्छा तो मैं लिख सकता हूं और आज जैसा लिख रहा हूं आपके सामने है। जैसा कि आपने कहा- लिखने के लिए पढ़ना जरूरी है और इसमें समय लगता है तो परिवार के साथ कैसे मैनेज करते हैं? शर्मा जी कहते हैं-परिवार का बड़ा सहयोग रहा है और अब भी है। परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और एक बेटा है। बेटियों की शादी हो चुकी है। बेटा अब मेरे साथ काम संभाल रहा है। किसी भी सख्श की कामयाबी और नाकामयाबी में पत्नी का बड़ा अहम रोल होता है। अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए वह कहते हैं कि एक बार मैं कोई उपन्यास लिख रहा था और वह समाप्त होने को था। रात को नौ बज रहे थे। पत्नी जी आईं और बोलीं- खाना खा लो। 
       मैंने भी कहा कि खाना लगा दो, बस अभी आया। फिर लिखने में व्यस्त हो गया और मेरा ध्यान तब टूटा जब कान में पक्षियों के चहचहाने की आवाज आई। जब बेड रूम में जाकर देखा तो पत्नी जी वहीं टेबल पर खाना लगाए मेज से सिर टिकाकर सो रही थीं। फिर मैंने उन्हें जगाना ठीक नहीं समझा और अपने लिखने के कमरे में चला गया, फिर वहां से घर के बाहर आकर घूमने लगा। इसी बीच उनकी नींद खुल गई। वह मुझे ढ़ूंढ़ते हुए मेरे लिखने के कमरे में आईं। वहां मुझे न देखकर बेचैन हुईं। फिर बाहर घूमते देख उन्हें राहत मिली। उनकी इस मूक सहमति और सहयोग ने मुझे लेखन में आगे बढ़ाया। शर्मा जी कहते हैं कि जब कभी कहीं मेरा सम्मान होता है तो मन में यह बात जरूर आती है कि सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे जिन लोगों की भूमिका होती है, असल में उनका सम्मान होना चाहिए। यह लोग उसके जीवन में पत्नी, बेटा, बेटी, दोस्त भी हो सकते हैं और वही हैं असली सम्मान के हकदार।
एक उपन्यासकार के रूप में आप अपना सबसे अच्छा उपन्यास कौन सा मानते हैं? इस सवाल के जवाब में वह बड़ी बेबाकी से जवाब देते हैं। कहते हैं- बिकने में सर्वश्रेष्ठ उपन्यास- ‘वर्दी वाला गुंडा’ (1992), पाठकों की पसंद की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है ‘केशव पंडित’ (1986) और कथानक की दृष्टि से मेरी सर्वश्रेष्ठ पसंद है ‘सभी दीवाने दौलत के’ (1984)। 
         उन्होंने बताया कि मेरा अभी हाल में ही प्रकाशित उपन्यास है खेल गया खेल और अब जो मैं लिख रहा हूं, वह है छठी इन्द्री। मेरठ ने हर क्षेत्र में लाल दिए हैं। अपने इस उपन्यासकार को वह किस रूप में देखता है। वह कहते हैं- मेरठ से मुझे बड़ा प्यार मिला है। मेरा जन्म भले ही जनपद बुलंदशहर में हुआ लेकिन मेरी शिक्षा-दीक्षा यहीं मेरठ में हुई। मेरठ से बाहर मुझे बहुत सम्मान मिला लेकिन जब मेरठ ने मुझको उस नजर से देखा तो बड़ी खुशी हुई। अपनों का सम्मान ही सर्वश्रेष्ठ है और यह भी सच है कि अपने बड़ी देर से पहचानते हैं। 
       इस बात पर बहस हो सकती है कि लेखक जन्मजात होते हैं या नहीं पर इतना तय है कि कुछ लोग लिखने के लिए ही पैदा होते हैं और पाठकों का मिजाज जानने की वजह से वे मकबूल हो जाते हैं. जिस टारगेट ऑडिएंस को पहचानने में  पत्रकार और संपादक हार गए, जिस कॉपी को लिखने में धांसू लिक्खाड़  हांफ गए, उस पाठक को पहचानने की गुत्थी मेरठ में बैठे एक शख्स की मुट्ठी में पिछले चार दशकों से बंद है. शास्त्रीनगर स्थित अपनी कोठी के एक शांत कमरे में बैठकर अधमुंदी आंखों से जब वे स्टोरी का प्लॉट जमाते हैं और कहानी के तार जोड़ते  हैं तो किसी साधक से कम नहीं लगते. कैरेक्टर और वेद प्रकाश शर्मा के बीच कोई खटपट, जरा-सी आहट और यहां तक कि चाय का कप लिए बीवी मधु शर्मा को भी आने की इजाजत नहीं होती.
उपन्यासों की झड़ी
वेद प्रकाश शर्मा हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार है। इन्होंने सस्ते और लोकप्रिय उपन्यासों की रचना की है।
       वर्दी वाला गुंडा वेद प्रकाश शर्मा का सफलतम थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की आजतक लगभग 8 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। भारत में जनसाधारण में लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में यह उपन्यास ष्क्लासिक का दर्जा रखता है।
       6 जून, 1955 को मेरठ में जन्मे वेद प्रकाश शर्मा के पिता पं. मिश्रीलाल शर्मा मूल रूप से  मुजफ्फरनगर जिले के बिहरा गांव के रहने वाले थे। वेद प्रकाश एक बहन और सात भाइयों में सबसे छोटे हैं। एक भाई और बहन को छोड़कर सबकी प्राकृतिक-अप्राकृतिक मौत हो गई। 1962 में बड़े भाई की मौत हुई और उसी साल इतनी बारिश हुई कि किराए का मकान टूट-टाट गया। फिर गैंगरीन की वजह से पिता की एक टांग काटनी पड़ी। घर में कोई कमाने वाला नहीं था, सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई।
जीवन और समाज को करीब से देखने वाले वेद प्रकाश की तीन बेटियां (करिश्मा, गरिमा और खुशबू) और उपन्यासकार बेटा शगुन शादीशुदा हैं।
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प्रस्तुत आलेख मेरठ की शख्सियत फेसबुक से उनकी अनुमति के साथ यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है।
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उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेदप्रकाश शर्मा
23.12.2015

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