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शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

योगेश मित्तल जी को 'साहित्य देश सम्मान पत्र'

योगेश मित्तल जी को साहित्य देश सम्मान पत्र से किया सम्मानित ।
विश्व पुस्तक मेला- 2025, नई दिल्ली 03 फरवरी, प्रगति मैदान 

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के सितारे और छद्म लेखन के लिए चर्चित दिल्ली निवासी योगेश मित्तल जी को साहित्य देश सम्मान से सम्मानित करता गया ।
योगेश मित्तल जी को सम्मान पत्र भेंट करते हुये 

  साहित्य देश ब्लॉग लोकप्रिय साहित्य संरक्षण के लिए प्रयासरत एक ब्लॉग है। साहित्य देश ने उपन्यास साहित्य संरक्षण के लिए लेखकों के साक्षात्कार, उपन्यास परिचय, विभिन्न शृंखला समय-समय पर ब्लॉग पर प्रकाशित की हैं । इसी क्रम में‌ इस क्षेत्र के साहित्यकारों को सम्मानित करने का यह प्रथम अवसर है।
दिल्ली निवासी योगेश मित्तल जी लोकप्रिय साहित्य में जो सराहनीय कार्य किया है, इनकी उन्हीं सेवाओं को देखते हुये साहित्य देश ब्लॉग ने अपना प्रथम सम्मान पत्र योगेश मित्तल जी भेंट किया है।

विश्व पुस्तक मेला- 2025 के अवसर पर दिनांक 02.02.2025 को हाॅल नम्बर 2&3 में नीलम जासूस कार्यालय की बुक स्टाॅल पर कार्यक्रम आयोजित किया गया ।
        इस संक्षिप्त कार्यक्रम का संचालन नीलम जासूस के प्रबंधन श्री सुबोध भारतीय जी ने किया । उन्होंने योगेश मित्तल जी का परिचय करवाते हुये कहा- आज हम विश्व पुस्तक मेला 2025 नई दिल्ली में मौजूद हैं। यह नीलम‌ जासूस कार्यालय का स्टाॅल है और हमारे बीच हैं देश के सबसे बड़े Ghost writer (प्रेत लेखक) योगेश मित्तल जी । इन्होंने विभिन्न लेखकों के नाम से साढे चार सौ (450) से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं। हमने (नीलम जासूस कार्यालय) भी इनकी तीन पुस्तकें प्रेत लेखक की आत्मकथा, वेदप्रकाश शर्मा- यादें, बातें और अनकहे किस्से और एक उपन्यास शैतान ।

बुधवार, 9 अगस्त 2023

मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - योगेश मित्तल

 मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - योगेश मित्तल

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आदरणीय सुबोध भारतीय जी ने विगत दिनों में मेरी दो किताबें *प्रेत लेखन और वेद प्रकाश शर्मा - यादें बातें और अनकहे किस्से*, क्या छापी, एक मुर्दा लेखक ज़िन्दा हो गया. एक जमाने में मुझे दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद, कलकत्ता, बम्बई बनारस के अधिकांश प्रकाशक जानते थे. वे सभी भी - जिन्होंने कभी मेरी एक लाइन भी नहीं छापी. लेकिन पाठकों में मेरी कोई पहचान नहीं थी. आज लोग मुझे बहुत अच्छी तरह पहचान रहे हैं तो इसका सबसे अधिक श्रेय नीलम जासूस कार्यालय से मेरी पुस्तकें प्रकाशित करने वाले माननीय सुबोध भारतीय जी को जाता है. 

        मेरे बारे में जब भी कहीं कोई जिक्र आयेगा, डंके की चोट यह कहा जायेगा कि सुबोध भारतीय जी ने मुर्दा योगेश मित्तल को एक बार फिर ज़िन्दा कर दिया.
लेकिन अब मेरे पास बहुत सारे फोन आ रहे हैं कि जब मैं इतना अच्छा लिखता रहा हूँ तो पहले क्यों नहीं मशहूर हुआ.
मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - इसके अनेक कारण हैं, जिसमें एक मुझे हर समय पैसों की जरूरत रहती थी और घोस्ट राइटिंग में, दूसरों के लिए लिखने के लिए अधिक पैसे मिलते थे और जल्दी मिलते थे, बल्कि एडवांस भी मिल जाते थे. मैंने अपने जीवन में सौ से ज्यादा लेखकों या यूँ कहें नामों के लिए लिखा है, घोस्ट राइटिंग की है, लेकिन यह मैं साबित नहीं कर सकता.
और तो और मैने अपनी कालोनी के स्कूली बच्चों के लिए भी कविताएँ व लेख लिखकर दिये हैं और उनके पैरेन्ट्स से अच्छे पैसे भी लिये हैं.
लेकिन मेरे मशहूर न होने का कारण सिर्फ यही नहीं है कि मैंने पैसों के लालच में हमेशा घोस्ट राइटिंग की (प्रेत लेखन किया). 
एक कारण और सबसे बड़ा कारण मेरा बचपन से सिर्फ आठ साल की उम्र से अस्थमा का रेगुलर 365 दिन का मरीज होना भी था. 
अस्थमा को ठीक करने के लिए मैंने होमियोपैथी, आयुर्वेद, प्राकृतिक सभी तरीके आजमाये, लेकिन एलोपैथी के अलावा कहीं आराम नहीं मिला.
मेरे एक मित्र हरिओम सिंघल ( उपन्यासकार सचिन) ने तो एक बार कमर कस ली थी कि तुझे अस्थमा से छुटकारा दिला कर रहूँगा और उन दिनों मेरे लिए उसने न जाने कितना खर्चा भी किया. ऐसे दोस्त बहुत कम लोगों को मिलते हैं.
और इसके अलावा एक कारण और भी प्रमुख कारण शायद मेरा इमोशनल होना भी रहा है.
दरअसल मैं बचपन से ही जरूरत से ज्यादा इमोशनल हूँ ( शायद मूर्खता की हद तक). और मेरे बारे में यह निष्कर्ष मेरा अपना नहीं है. समय समय पर ऐसे ही शब्द मेरे बहुत से मित्रों बिमल चटर्जी, अशीत चटर्जी, देवेन्द्र रस्तोगी ( साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सह सम्पादकों में से एक), कुमारप्रिय, यशपाल वालिया, राज भारती, आदि अनेक लोगों ने कहे थे. लेकिन सबसे अच्छी तरह मुझे यह बात नूतन पाकेट बुक्स, सूर्या पाकेट बुक्स और माया पाकेट बुक्स के जन्मदाता आदरणीय सुमत प्रसाद जैन ने समझाई थी और उम्र के उस पड़ाव पर समझाई थी कि उस समय मैं खुद को बदल पाता तो शायद नाम और पैसा बहुत पहले कमा लेता.
           बात 1973 की है. तब मैं उम्र के लिहाज़ से पूरी तरह बालिग भी नहीं हुआ था, तब मेरा मेरठ आना जाना आरम्भ हो चुका था और मेरठ में ईश्वरपुरी तब प्रकाशकों का मुख्य गढ़ था, वहाँ अधिक समय बीतता था. कुछ समय छीपी बाड़ा में ओरियन्टल पाकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन के यहाँ बीतता था, जो कि मेरठ के प्रकाशन जगत में "मामा" के नाम से जाने जाते थे. (उनके बारे में आप सुबोध भारतीय जी द्वारा नीलम जासूस कार्यालय से प्रकाशित मेरी पुस्तक "वेदप्रकाश शर्मा : यादें, बातें और अनकहे किस्से में भी पढ़ चुके होंगे. तब वह लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के सर्वेसर्वा थे) 
एक दिन मैंने ईश्वरपुरी में प्रवेश ही किया ही था कि एक आवाज़ आई, " ओ लड़के...!"
हाँ, मेरठ के जैन भाइयों में से एक बड़े भाई आदरणीय सलेकचन्द जैन जी द्वारा पहली पहली बार मुझे ऐसे ही पुकारा गया था, किन्तु उस समय तक मैं ऐसी स्थिति में पहुँच चुका था कि अपने लिए 'लड़के' शब्द कहा जाना मेरी कल्पना में भी नहीं था. मैंने पलटकर भी नहीं देखा. आवाज़ दोबारा आई, "ओ लड़के, सुन तो... इधर देख...!"
और इस बार मैंने पलटकर देख ही लिया तो एक जेब वाली सफेद सेन्डो कट बनियान और चकाचक सफेद धोती में चश्माधारी सलेकचन्द दूर खड़े थे.
मुझे अपनी ओर आने का संकेत करते हुए बोले, "हाँ, तुझी से कह रहा हूँ... इधर आ...!"
          गली में मेरे आगे और कोई नहीं था. मेरे लिए समझना कठिन नहीं था कि सलेकचन्द जी मुझे ही बुला रहे थे.
        सलेकचन्द जी ने मुझे बुलाया और बीच की बातों का विवरण फिर कभी दूंगा, फिलहाल संक्षेप में यह कहूँगा कि उन्होंने मुझे मेरे नये उपनाम "प्रणय" के नाम से छापने का प्रपोजल दिया और मैने स्वीकार कर लिया. उपन्यास के बैक कवर पर मेरी लेटेस्ट फोटो भी दी जायेगी, यह भी तय हुआ.
मेरे पहले उपन्यास का नाम “पापी” सेलेक्ट हुआ और सलेकचन्द जी ने कहा, "एक अच्छी सी फोटो खिंचवाकर कृष्णानगर, दिल्ली के मशहूर बुक कवर आर्टिस्ट इन्द्र भारती तक पहुँचा दूं.
उन दिनों कलर फोटोग्राफी प्रचलन में नहीं आई थी. मैने गांधीनगर, दिल्ली की मुख्य रोड पर स्थित कंचन स्टुडियो से एक फोटो खिंचवाई और इन्द्र भारती तक पहुँचा दी. 
जब "पापी" उपन्यास प्रकाशित होकर मेरे हाथ में आया तो मैं यह देखकर हक्का बक्का रह गया कि उपन्यास के बैक कवर पर मेरा ब्लैक एंड व्हाइट फोटो कलर में छपा है.
तब मैं प्रकाशन जगत का पहला लेखक था, जिसकी तस्वीर उपन्यास के बैक कवर पर कलर में छपी थी.
उसके बाद मेरा दूसरा उपन्यास "कलियुग" भी आया और हिट हुआ. तीसरे उपन्यास का विज्ञापन भी दूसरे उपन्यास में दिया गया. तीसरे उपन्यास का नाम था - लोकलाज.
लेकिन तीसरा उपन्यास जब मैं लिख रहा था, मैं बुरी तरह बीमार पड़ गया. अस्थमा का जबरदस्त अटैक हुआ था. पूरा एक हफ्ता बिस्तर पर कुत्ते की तरह हांफते कांपते बीता. लिखना तो दूर की बात थी, कलम तक नहीं उठाई गई. 
खैर, ठीक होने के बाद उपन्यास लेकर मेरठ तो गया, लेकिन मुझे उपन्यास पहुँचाने में कुछ दिनों का बिलम्ब हो गया.
फिर जो कुछ हुआ, मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था.                      सलेकचन्द मुझ पर राशन पानी लेकर चढ़ गये और गुस्से में उन्होंने वो अल्फ़ाज़ निकाले कि मैं डर के मारे थर थर कांपने लगा. आखिर में उन्होंने कहा, "निकल जा यहाँ से वरना टांगें तोड़ दूंगा. तेरे जैसे झूठे गद्दार से मैंने कोई रिश्ता नहीं रखना."
और उस दिन मैं उठकर मेरठ से ऐसा भागा कि महीनों तक अन्य प्रकाशकों के बुलावे पर भी मेरठ नहीं गया.
खैर, आखिर एक बार बिमल चटर्जी पीछे पड़ गये कि योगेश जी, मैं हूँ ना. मैं हर समय आपके साथ रहूँगा और मेरे साथ होते हुए किसी की मज़ाल नहीं कि आपकी टांगें तोड़ दे."
बिमल चटर्जी से जो लोग मिले हैं. उनकी पर्सनैलिटी देखी है, वे समझ सकते हैं कि बिमल चटर्जी के आश्वासन ने मुझे कितना आश्वस्त किया होगा.
डील डौल पर्सनैलिटी से उस समय बिमल चटर्जी किसी पहलवान से कम नज़र नहीं आते थे, किन्तु बाद में शायद ज्यादा देर बैठे बैठे काम करने से उनका पेट आगे निकल आया तो यार दोस्त उन्हें "मोटे और मोटू भी कहने लगे थे.
खैर, हम मेरठ गये तो मैंने साफ कह दिया कि मैं सामने वाले मुख्य रास्ते से ईश्वरपुरी नहीं जाऊँगा, क्योंकि ईश्वरपुरी में प्रवेश के साथ अन्य सभी प्रकाशकों से पहले सलेकचन्द जी की कोठी थी.
बिमल चटर्जी ने मुझे बहुत समझाया - मैं हूँ ना. पर अन्त में उन्होंने मेरी मान - पीछे से नाले के पास के संकरे रास्ते से ईश्वरपुरी जाना स्वीकार कर लिया.
           हम ईश्वरपुरी पहुँचे तो संयोग ही था कि उस दिन सलेकचन्द जी से बिल्कुल सामना नहीं हुआ, लेकिन उनके छोटे भाई सुमतप्रसाद जैन ने मुझे बुलाया और मुझसे पूछा, "अमर पाकेट बुक्स में तेरे दोनों उपन्यास बहुत अच्छे गये थे. देता रहता तो बहुत नोट कमाता. हम भी तेरे दो चार उपन्यास साल में छाप लेते. तूने उपन्यास देना बन्द क्यों कर दिया?"
"मैंने बन्द नहीं किया." मैंने कहा और सारा किस्सा सुमत प्रसाद जैन उर्फ एसपी भाईसाहब को बताया तो वह बोले, "अरे पागल है तू, जाने से पहले एक बार मुझसे मिलता तो सही, सब ठीक करवा देता, अरे सलेक भाई साहब दिल के खरा सोना हैं, पर गुस्सा उनकी नाक पर धरा रहता है. बीमार भी बहुत रहते हैं. तू एक बार पांव पकड़ लेता तो सब ठीक हो जाता, उन्हें जितनी जल्दी गुस्सा आता है, उतनी जल्दी हवा भी हो जाता है. तूने बेवकूफी की, इतना अच्छा नाम से छप गया था. पाकेट बुक्स में पहला लेखक था, जिसकी बैक कवर में कलर फोटो छपी थी. अगर छपता रहता तो अब तक तो तेरी "सेल" पांच-छ: हजार से ज्यादा हो जाती, नोट भी भाईसाहब बहुत अच्छे देते, वो औरों की तरह कंजूस नहीं हैं. अब है, वो उपन्यास तेरे पास...?" 
"नहीं..!" मैंने धीरे से कहा, "मुझे नोटों की जरूरत थी तो वो उपन्यास वालिया साहब (यशपाल वालिया) को दे दिया और वो उनके नाम से धम्मी के भाई के पब्लिकेशन में छप भी गया है."
तो दोस्तों, यह किस्सा मैंने बहुत सी बातों को गोल कर संक्षेप में प्रस्तुत किया है, यदि आपने चाहा तो विस्तार में अपनी आगामी पुस्तक में लिखूँगा. लेकिन सिर्फ यही किस्सा नहीं है, मेरे मशहूर न होने का.
मेरे मशहूर न होने के और भी कई किस्से हैं, जिन्हें आप मेरी बेवकूफियों के किस्से भी नामज़द कर सकते हैं.
लेकिन सारे किस्से तभी कलमबद्ध करूँगा, जब आपका प्यार मिलेगा और आप जानना चाहेंगे.
फिलहाल बस....! 
‼️योगेश मित्तल‼️
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

कॉपीराइट : प्रकाशकाधीन - योगेश मित्तल

कॉपीराइट : प्रकाशकाधीन 

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पुराने उपन्यासों में कॉपीराइट के आगे प्रकाशकाधीन लिखा होना एक आम बात थी। कुछ प्रकाशकों ने एक पेजी कॉपीराइट फॉर्म बना रखा था तो कुछ प्रकाशकों का चार पेजी कॉपीराइट फॉर्म होता था। 

नाम से छपने वाले लेखकों से कॉपीराइट फॉर्म भरवाना एक रूटीन प्रक्रिया थी, जबकि मेरे जैसे नाम से न लिखने वाले बदनाम से कॉपीराइट फॉर्म भरवाना इतना जरूरी भी नहीं समझा जाता, बल्कि मुझसे तो बहुत कम बार बहुत कम प्रकाशकों ने कॉपीराइट फॉर्म भरवाये। 

मैंने 'प्रणय' नाम से छपे उपन्यासों के लिए या 'मेजर बलवन्त' नाम से छपे उपन्यास के लिए अथवा 'योगेश' नाम से छपे उपन्यासों के लिए भी कभी कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरा। 

लेकिन मैंने कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरा, इसे मेरी तड़ी मत समझिये कि मैंने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया या कोई बहुत बड़ी तोप चला दी। 

दरअसल यह प्रकाशकों की दयादृष्टि ही थी कि वे मुझसे कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरवाते थे। 

पर क्यों ? एक दिन यह राज भी फाश हो गया। प्रकाशक साहब का नाम नहीं लूँगा, पर अब जो मैं बताने जा रहा हूँ - वह शत-प्रतिशत सच है, बल्कि ऐसा सच है, जिसे जानने के बाद आप कहेंगे - यह तो आम बात है। ऐसा तो होता ही आया है। 

ऐसा होता ही रहता है। 

एक दिन एक प्रकाशक साहब ढेर सारे कागजों में कुछ तलाश कर रहे थे। किसी लेखक को एडवांस कैश नोट दिए थे, जिसका बाउचर था, जो ढूंढें नहीं मिल रहा था। 

मैंने उनका नाम लेकर पूछा, "हुज़ूर, क्या ढूंढ रहे हैं। इज़ाज़त हो तो खाकसार भी कुछ मदद कर दे।" 

उन्होंने ढेर सारी फाइलें मेरी ओर बढ़ा दीं, "ज़रा देख, इसमें फलाँ राइटर को फलाँ पेमेन्ट का एक बाउचर कहीं बीच में न घुसा पड़ा हो।"


मैं एक-एक फ़ाइल देखने लगा तो एक फ़ाइल पर मेरी निगाहें ठिठक गयीं, जिसमे मेरे नाम के बाउचर और मेरे नाम के कॉपीराइट थे। दोनों में साइन मेरे नहीं थे, लेकिन जिसके भी थे - एक ही राइटिंग थी। 

और ख़ास बात क्या थी - जानते हैं ? 

कल्पना कीजिये............

मैं उन दिनों एक उपन्यास के आठ सौ से पन्द्रह सौ तक लेता था, लेकिन बाउचर और कॉपीराइट में पाँच हज़ार की रकम भरी हुई थी। 

प्रस्तुति- योगेश मित्तल 

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

धाँय- धाँय- धाँय और योगेश मित्तल

 साहित्य देश के 'रोचक किस्सा' स्तम्भ में प्रस्तुत है 
   योगेश मित्तल जी ने स्वयं के नाम के अतिरिक्त अन्य लेखकों के नाम से भी लेखन किया है। जैसे 'एच. इकबाल' नाम से 'धाँय- धाँय- धाँय' उपन्यास लेखन।
योगेश मित्तल जी के जीवन का एक रोचक किस्सा उन्हीं के शब्दों में। 

जब मैं पहली बार भारती पॉकेट बुक्स में गया, रजिस्टर में लिखी जा रही इमरान सीरीज की यही स्क्रिप्ट मेरे हाथ में थी, नाम पढ़कर भारती पॉकेट बुक्स के स्वामी लालाराम गुप्ता ने कहा, "धाँय-धाँय-धाँय" यह भी कोई नाम है। योगेश जी आपको तो नाम रखने भी नहीं आते।"

रविवार, 11 दिसंबर 2022

काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा - योगेश मित्तल

 काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा 
काम्बोजनामा :वेदप्रकाश काम्बोज की लेखन यात्रा

कुछ लोग अपनी जीवनी लिखते हैं - कुछ किसी अन्य की, लेकिन इमोशन के बादशाह राम पुजारी जब कुछ लिखते हैं, अपना सब कुछ उसमें इस तरह झोंक देते हैं, इस कदर झोंक देते हैं कि लिखी हुई पुस्तक खूबसूरत शब्दों की एक गंगा बन, आनन्दप्रद शीतल धारा की तरह  मन-मस्तिष्क और आत्मा में मीठे-मीठे एहसास और प्रसंग, चित्र की भाँति उकेरती और चलचित्र की भाँति उभारती चली जाती है। 
काम्बोजनामा - जासूसी साहित्य में वर्षों शीर्ष पर रहने वाले दिग्गज उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज की सहज-सरल जीवनी नहीं है। यह उनका जन्म से अब तक का जिन्दगीनामा भी नहीं है। यह तो वेद प्रकाश काम्बोज के लेखकीय जीवन के अनन्त अच्छे-बुरे, सरल-कठिन, खट्टे-मीठे प्रसंगों की बेहद खूबसूरत झांकी है, जिसके लिए मैं आदरणीय वेद प्रकाश

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -25

 वो आखिरी मुलाकात। 
अंतिम अंक, प्रस्तुति- योगेश मित्तल
योगेश मित्तल जी द्वारा लिखित संस्मरण 'यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की' शृंखला का पुस्तक रूप में प्रकाशन किया जा चुका है। इसलिए इस शृंखला को यहीं पूर्ण किया जा रहा है। आप इस शृंखला को योगेश मित्तल जी द्वारा लिखित 'वेदप्रकाश शर्मा- यादें, बातें और अनकहे किस्से' (पृष्ठ-300) नामक रचना में पढ सकते हैं।

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -25 अंक उस पुस्तक में से लिया गया। 


फिर महीनों बीत गये।
'एक ही नारा - केशव हमारा' भी छपकर, बिक-बिकाकर खत्म हो गई। मैं अपनी लिखी किताबों की राइटर्स कॉपी लेने भी नहीं गया। बाद में जब मेरठ गया, तब शगुन नेकहा- 'अंकल, अभी कॉपी नहीं है। वापसी आयेगी तो मैं आपके एडरेस पर पाँच कॉपी भिजवा दूँगा ।'
'नहीं, कोई जरूरत नहीं है। मैं खुद ही आते-जाते, मिल-मिलाकर ले लूँगा।' मैंने कहा। 
मुझे अच्छी तरह याद नहीं कि उसके बाद मेरा अगला चक्कर कितने महीनों या साल के बाद लगा, पर याद है कि तब शास्त्रीनगर में ही वेद के परिचितों में से किसी के यहाँ चोरी की घटना घटी थी। खास बात यह थी कि जिनके यहाँ चोरी हुई थी, वे मेरठ से बाहर थे।

सोमवार, 26 सितंबर 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -23

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 23
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टावर वाली गली में उस समय गली के आरम्भ के किसी भी मकान के आसपास कोई नहीं था, ना ही उन मकानों के द्वार खुले हुए थे, लेकिन गली के पांचवें मकान का लोहे की सलाखों वाला मेन गेट खुला हुआ था और उसमें से एक गोरा-चिट्टा लम्बा और बेहद खूबसूरत नौजवान बाहर निकल रहा था।
मैं उसी मकान की ओर बढ़ गया। तभी मकान से दो और शख्स बाहर आये। एक कुछ छोटे कद का गेंहुए रंग का नौजवान था और दूसरा दबे सांवले रंग का औसत कद का नौजवान था, जो पहले नौजवान से कद में छोटा और दूसरे से बड़ा था।
मैं आगे बढ़ता हुआ उन तीनों अजनबियों के निकट पहुँचा और लम्बे और गोरे नौजवान से बोला-”यहाँ कोई कम्प्यूटर ठीक करने वाले रहते हैं?”
देवदत्त सर, हाँ, यही घर है।” लम्बा गोरा नौजवान बोला-”कोई काम है सर से....?”
मेरा कम्प्यूटर खराब हो गया है।”-  मैंने कहा। 
क्या गड़बड़ हुई है?”
*पता नहीं...। स्टार्ट नहीं हो रहा।” - मैंने कहा। 
कब से....?”

रविवार, 25 सितंबर 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 22

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 22
 प्रस्तुति- योगेश मित्तल
सुशील कुमार से मेरी पहली मुलाकात उत्तमनगर, नन्दराम पार्क के बी ब्लॉक क्षेत्र में रामगोपाल के यहाँ हुई थी, जहाँ उन दिनों राजभारती जी द्वारा आरम्भ की गई नयी अपराध पत्रिका 'अपराध कथाएँ'  तथा माया पाकेट बुक्स में रजत राजवंशी नाम से प्रकाशित होने वाला पहला उपन्यास 'रिवाल्वर का मिज़ाज' कम्प्यूटर पर टाइप हो रहा था। 
रामगोपाल और उसकी पत्नी निशा दोनों ही सरकारी नौकरी में थे। उनके दो लड़के थे। उत्तमनगर में ही अपना मकान भी था, लेकिन रामगोपाल ने साइड बिजनेस के रूप में किसी भाई या अन्य के तीसरे नाम से कम्प्यूटर टाइपिंग और प्रिन्ट आउट का काम कर रखा था। 
       रामगोपाल के मकान में बाहर सामने खड़े व्यक्ति के हिसाब से बायीं ओर अन्दर जाने का लोहे की सलाखों का बड़ा और ऊंचा गेट था और दायीं ओर एक आम दरवाजों सा दरवाजा था, जो उस बाहरी कमरे का द्वार था, जिसमें तीन ब्लैक एण्ड व्हाइट मानीटर वाले फोर एट सिक्स कम्प्यूटर लगे थे। प्रिन्टर एक ही था। 
        जब हमने रामगोपाल के यहाँ काम आरम्भ करवाया था, तब तीन में से एक ही कम्प्यूटर पर एक भारी बदन की बहुत ही भले स्वभाव की लड़की उषा ही दिन भर टाइपिंग करती थी। शाम को जब रामगोपाल आफिस से लौटता तो टाइप्ड मैटर के पढ़े गये प्रूफ देखकर करेक्शन लगाने का काम वह स्वयं करता था। बाद में उषा की शादी तय हो गयी तो उसने काम छोड़ दिया और तब रामगोपाल के यहाँ कम्प्यूटर सीखने तीन लड़कियाँ आने लगी। एक मीना तो सामने ही रहने वाली जाट या गुर्जर लड़की थी, बाकी दोनों गढवाली लड़कियाँ आशा और कुसुम थीं। उन लड़कियों के आने के बाद रामगोपाल के यहाँ काम बहुत बढ़ गया। सीखने आई लड़कियाँ टाइपिंग भी करने लगीं थीं और रामगोपाल उनसे सिखाने के पैसे लेने की जगह काम करने के पैसे देने लगा था, लेकिन तब कम्प्यूटर जल्दी-जल्दी खराब होने लगे।  

रविवार, 11 सितंबर 2022

अमिताभ बच्चन का क्रेज और यशपाल वालिया

अमिताभ बच्चन का क्रेज और यशपाल वालिया
संस्मरण- योगेश मित्तल

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साहित्य देश ब्लॉग के स्तम्भ 'सिनेमा और साहित्य' के इस अंक में पढें आदरणीय योगेश मित्तल जी का एक रोचक संस्मरण। उपन्यासकार यशपाल वालिया जी की अमिताभ बच्चन के प्रति दीवानगी।
आजकल टीवी में मूवी चैनल इतने हो गये हैं कि हर वक़्त दसियों हिन्दी या डब की हुई फिल्में चलती रहती हैं, फिर इन्टरनेट पर फिल्म देखने की आसानी। आज की जेनरेशन में फिल्मों या किसी फिल्मी कलाकार के लिए सत्तर-अस्सी के दशक के फिल्म दर्शकों का सा पागलपन होगा, मुझे नहीं लगता। 
उन दिनों पहले राजेश खन्ना और बाद में अमिताभ बच्चन ने लोकप्रियता के झण्डे ही गाड़ दिये थे।
अमिताभ बच्चन की कई फिल्मों ने उन दिनों खासा हंगामा किया था! खूब चर्चा का विषय बनी थीं और खूब हिट हुई थी।
      आम दर्शकों की तरह लेखकों में भी अमिताभ बच्चन का क्रेज बढ़ रहा था। वेद प्रकाश शर्मा अमिताभ के तगड़े फैन थे, लेकिन मेरी जानकारी में तब जितने भी लेखक थे, उनमें से एक ही था, जिसने अमिताभ बच्चन की नई लगने वाली फिल्म - 'पहला दिन - पहला शो' ही देखनी हुआ करती थी और इस जुनून के चलते बहुत से सिनेमा हॉल के बाहर टिकट ब्लैक करने वाले ब्लैकियों से भी खासी पहचान कर ली थी।
ऐसे जुनूनी लेखक थे - यशपाल वालिया।

शनिवार, 18 जून 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -21

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी -21
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

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उसके बाद हमारे बीच पारिवारिक बातें होती रही। उन्हीं बातों के बीच एक बार चाय और आ गई, लेकिन इस बार चाय के साथ नमकीन और बिस्कुट भी थे। हम चाय खत्म भी नहीं कर पाये थे कि घर में बने पकौड़े आ गये। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरे सामने वेद ने पकौड़ों का कोई आदेश नहीं दिया था।
यह पहला अवसर नहीं था, इससे पहले भी और बाद में भी अनेक अवसर ऐसे आये, जब वेद के यहाँ अपनेपन का गहरा स्पर्श मैंने महसूस किया। वेद की मेहमाननवाजी और सत्कार ने हर बार मेरे दिल में उसका कद पहले से अधिक ऊंचा किया था।
चाय नाश्ते के बाद वेद ने फिर कहा -"तो फिर नावल कब से शुरू करेगा?"
"फिलहाल दस-पन्द्रह दिन तो तुम्हारे विजय विकास सीरीज़ के उपन्यास पढ़ने में लगाऊँगा, उसके बाद ही टाइपिंग आरम्भ करूँगा।" मैंने कहा! 
"टाइपिंग...?" - वेद चौंक गया -"टाइपराइटर ले लिया है तूने?"
"नहीं, एक सेकेण्ड हैण्ड फोर एट सिक्स ले लिया है, आजकल उसी पर टाइपिंग करता हूँ।"
"फोर एट सिक्स...?"
"कम्प्यूटर...।"
"तूने कम्प्यूटर ले लिया...?"-  वेद ने आश्चर्य व्यक्त किया।

बुधवार, 18 मई 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -20

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की -20
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
   लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में योगेश मित्तल जी एक चर्चित नाम है। उनका लेखकों और प्रकाशकों से घनिष्ठ संबंध रहा है, वे लेखक-प्रकाशक दिल्ली के हो या मेरठ के योगेश जी का सभी के साथ अपनत्व रहा है। योगेश जी ने स्वयं के नाम के साथ-साथ अनेक नामों से Ghost writing भी की है। सद्य प्रकाशित इनकी रचना 'प्रेत लेखन का नंगा सच' में इन्होंने प्रेत लेखन कॆ विषय में बहुत कुछ लिखा है। 
    शीघ्र ही इनकी एक और रचना प्रकाशित हो रही है जो उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा जी के जीवन से संबंधित है।
उसके बाद मैं अगले दो दिन ईश्वरपुरी के किसी भी प्रकाशक के यहाँ नहीं गया। 
देवीनगर गया था, वहाँ सतीश जैन उर्फ मामा ने कुछ पुराने आठ नौ फार्म के सामाजिक उपन्यास दिये, जो घोस्ट नामों से छपे हुए थे। उनमें तीन चार फार्म का मैटर बढ़ाना था। तरीका सतीश जैन ने यह बताया कि लगभग आठ पेज का मैटर उपन्यास के स्टार्टिंग में बढ़ाना है और इतने ही पेज आखिर में। उपन्यास का अन्त बेशक बदल जाये, उसकी कोई चिन्ता नहीं। बाकी बीच में जितने भी चैप्टर हैं, सबकी स्टार्टिंग दो तीन लाइन बदल देनी है या नयी एडजस्ट करनी है। 
             उपन्यास के मुख्य पात्रों के नाम सतीश जैन ने स्वयं ही पहले से काट-पीट करके बदल रखे थे। उपन्यास  का नाम भी कोई नया ही रखना था।
                   मतलब समझ गये आप...! एक पुराना उपन्यास, जो अच्छा रहा हो या बकवास... योगेश मित्तल का हाथ लगने के बाद एक नये नाम से बिल्कुल नये उपन्यास के रूप में पाठकों के हाथ में जाना था और लेखक को यानि मुझे नया उपन्यास लिखने के पारिश्रमिक से आधा ही पारिश्रमिक मिलना था और प्रकाशक के पास एक नया उपन्यास तैयार हो जाना था।  ऐसे कामों में मुझसे ज्यादा सिद्धहस्त उस दौर में दूसरा कोई भी लेखक नहीं था। यह मैं या मेरा अहंकार नहीं कह रहा है - यह शब्द उन दिनों लक्ष्मी पाकेट बुक्स के सर्वेसर्वा सतीश जैन के थे। इसका एक कारण यह भी था कि उन दिनों ज्यादातर लेखक अपनी दाल-रोटी के लिये लिखते थे और उनके लिखने का रूटीन रोज नियम से कुछ घण्टे लिखने का था, जबकि मेरे लिखने का न तो कोई टाइम होता था, ना ही मूड। जब पैन उठाया - काम शुरू। 
                       चौबीस घण्टों में किसी भी घण्टे मैं बिना किसी प्लानिंग के, बिना कुछ सोचे हुए भी कलम उठा लेता था तो दिमाग की बत्ती तुरन्त जल जाती थी और पैन फुल स्पीड से दौड़ने लगता था और यह खूबी अब भी मुझ में बरकरार है, यह और बात है कि इस खूबी का मैं अपने जीवन में माकूल फायदा नहीं उठा सका। 

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 19

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 19
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

         
नूतन पाकेट बुक्स का ऑफिस उस समय खुला हुआ था। सुमत प्रसाद जैन अपनी सीट पर बिराजमान थे। एक कोने में एक वर्कर कुछ बण्डल पैक कर रहा था। 
सुमत प्रसाद जैन ने जब सामने से मुझे गुजरते देखा तो एकदम आवाज लगाई -"योगेश ।"
मैं रुकामुड़ाफिर पलटकर नूतन पाकेट बुक्स के ऑफिस में प्रविष्ट हो गया। 
"चाय पियेगा..?" सुमत प्रसाद जैन ने पूछा। 
"नहीं... ऐसी कोई तलब नहीं है।"-  मैंने कहा तो सुमत प्रसाद जैन बड़ी आत्मीयता से बोले -"कर दी न दिल तोड़ने वाली बात। दिन भर में बीस कप चाय पीने वाला योगेश मित्तल हमें चाय को मना कर रहा है। अबे यारबड़ी देर से मेरा चाय पीने का मूड कर रहा थालेकिन अकेले पीने का मन नहीं हो रहा थाइसीलिये तो तुझे देखकर आवाज दी।"
"ठीक हैमंगा लीजिये।" - मैं हंसते हुए बोला। 
                           तो जनाब यह भी नूतन पाकेट बुक्स और सूर्या पाकेट बुक्स के संस्थापक सुमत प्रसाद जैन का एक मूडी अन्दाज़ थाजिसकी जितनी तारीफ की जायेकम है। मूड होने पर भी सिर्फ इसलिये चाय नहीं पी रहे थेक्योंकि उस समय अकेले पीने का मूड नहीं था और गुफ्तगू करने वाला कोई साथी नज़र नहीं आ रहा था। 
              मेरे 'हाँकरते ही सुमत प्रसाद जैन पैकिंग में लगे वर्कर से बोले -"जा बेटागिरधारी के यहाँ चाय बोल देतूने भी पीनी हो तो तीन चाय बोल देइयो।"

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की – 18

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की – 18
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

ताला तेरा नहीं हैयह क्या बात हुई?” - वेद ने चकित होकर कहा।
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थी
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थीलेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहतासामने की गैलरी में आ खड़े हुएजयन्ती प्रसाद सिंघल जी बुलन्द और रौबदार आवाज कानों में पड़ी –“अबे तू जिन्दा हैमैं तो  समझामर-खप गया  होगा। सदियाँ बीत गईं तुझे देखे।”
सदियाँ....।”- मैं और वेद दोनों जयन्ती प्रसाद सिंघल के इस शब्द पर मुस्कुरायेतभी जयन्ती प्रसाद सिंघल जी का खुशी से सराबोर स्वर उभरा -”अरे वेद जीआप भी आये हैंइस नमूने के साथ। धन्य भाग हमारे। आये हैं तो जरा हमारी कुटिया भी तो पवित्र कर दीजिये।” 
                                       जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थी
                                       जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थीजयन्ती प्रसाद सिंघल जी ने दूसरी भी खोल दीफिर स्वयं टेबल के पीछे बांस की कुर्सी पर विराजे और हमसे बैठने का अनुरोध किया। 
वेद और मैं बैठ गयेपर बैठते-बैठते वेद ने कह ही दिया - “मैं तो यहाँ योगेश जी कमरा देखने आया थापर यहाँ तो दिक्खै आपने अपना ताला लगा रखा है।”
इसका ताला तोड़ करअपना न लगाता तो और क्या करतादस महीने में तो यह कमरा भूतों का डेरा हो जाता। हम सारे घर की रोज सफाई करवावैं हैंलेकिन...।”
दस महीने कहाँ हुए अभी...।”- तभी मैंने जयन्ती प्रसाद सिंघल जी की बात काटते हुए कहा।
वह बोले –“हिसाब लगाना आवै है या सिर्फ कागज़ काले करना ही जानै है?”

रविवार, 10 अप्रैल 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17
 प्रस्तुति- योगेश मित्तल
मैं सतीश जैन के सामने था।
“तुम पागल हो?- सतीश जैन ने कहा।
वो तो मैं हूँ....पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है?” मैंने बेहद शान्ति से सवाल किया। 
तुम यारइसे जानते कितना हो?” - सतीश जैन का स्वर अभी भी गर्म था। 
इसे... किसे...?”- समझते हुए भी मैंने पूछा। 
इसी को...रामअवतार को....?”
नहीं जानता...।” -मैंने स्वीकार किया -”आपके यहाँ ही मिला हूँ।”
अरे मैं नहीं जानता उसे..। उसके घर के लोगों को...। कैसा आदमी हैकैसा परिवार हैऔर तुम.... तुम्हें उसने एक बार कहा और तुम उसके यहाँ खाने पहुँच गये। यार ये कोई तुक है। अक्ल-वक्ल कुछ है तुममें या दिमाग से एकदम पैदल होजितने का तुमने खाना नहीं खाया होगाउससे ज्यादा तो तुमने किराया खर्च कर दिया। कितना किराया खर्चा?”
साठ रुपये....।” - मैंने धीरे से कहा -"तीस जाने के...तीस आने के।”
इससे कम मेंतुम यहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठकर उससे अच्छा खाना खा सकते थेजैसा वहाँ खाया होगा।”
हाँखाना बेशक ज्यादा अच्छा खा सकता थालेकिन रेस्टोरेंट में वो माहौल... ।”
तुम यार बिल्कुल बेवकूफ हो। ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे के यहाँ खाना खाने कैसे जा सकते हो। तुम जासूसी उपन्यास लिखते होतुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे साथ कुछ ऊंच-नीच भी घट सकता है।”
टेन्शन मत लो यार...। कुछ हुआ तो नहीं। रामअवतार जी बहुत सिम्पल आदमी हैं।” - मैंने सतीश जैन को समझाना चाहापर उनका मूड सही नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे द्वारा रामअवतार जी के यहाँ खाना खाने से खफा हैं या मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया इसलियेपर सतीश जैन ने कुछ जाहिर नहीं किया। मुझसे ठीक से बात किये बिना ही वह ऑफिस की ओर पलट गये। मैं भी सतीश जैन के पीछे पीछे ऑफिस में दाखिल हुआ। 
       सतीश जैन कीऑफिस टेबल के अपोजिट बिछी फोल्डिंग चेयर पर बैठते हुए मैंने यूँ ही सवाल किया –“कितने दिन का टूर है?”
कम से कम दो हफ्ते तो लगेंगे ही।” सतीश जैन ने कहापर उनकी आवाज़ में अभी भी जो तल्खी थीमुझे समझ में आ गया कि उनका मूड अभी भी सही नहीं है। 

रविवार, 3 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

प्रस्तुति- योगेश‌ मित्तल

मेरे द्वारा काम करने के बाद वो पुराना उपन्यास इतना नया हो जाता था कि जिस किसी ने भी पहले पढ़ भी रखा हो, उसे पढ़ा-पढ़ा सा बेशक लगे, पर उसे आसानी से पता नहीं चल सकता था कि यह उपन्यास कहाँ पढ़ा है। इसका कारण यह भी था, मुझसे काम करवाने के बाद सतीश जैन अक्सर अन्दर के कुछ पात्रों के नाम स्वयं बदल देते थे या किसी से बदलवा देते थे और पुराना घिसा पिटा उपन्यास नया हो जाता था। 

एक तरह से यह पाठकों से चीटिंग थी और इस चीटिंग में प्रकाशक का साथ देने वाला शख्स आपका अपना योगेश मित्तल था, जिसे कि प्रकाशक सबसे ईमानदार और सच्चा लेखक मानते थे और कहते भी थे। 

पर तब मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। 

मेरी सोच बस, यह थी कि मैं लेखक हूँ और मुझे लिखने का जो भी काम मिल रहा है, करना चाहिए और फिर मुझे अपनी बीमारी की वजह से हर समय पैसों की जरूरत रहती थी। दवाएँ और डाक्टरी इलाज, उस समय की कमाई के हिसाब से बहुत मंहगा पड़ता था। मेरा सोचना यह भी होता था कि मैं यदि घर खर्च के लिए घर के लोगों की बहुत मदद न भी करवाऊँ, कम से कम अपनी बीमारी, अपने इलाज के खर्च का बोझ तो घर पर न डालूँ। 

सतीश जैन ने दूसरा जो उपन्यास मुझे दिया, वह विक्रान्त सीरीज़ का ही था। 

मैंने दोनों लिफाफे थामते हुए पूछा - “कब तक चाहिये?”

इस बार कोई जल्दी नहीं है।” - सतीश जैन बोले -”बेशक आप दिल्ली ले जाओ। जब चक्कर लगे, तब दे जाना। स्पेशली आने की जरूरत नहीं है।”

यह मेरे लिए घोर अचरज़ की बात थी। सतीश जैन के लिए मैं जब से काम कर रहा था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था।

ठीक है, फिर मैं अभी चलूँ।”-  मैंने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, लेकिन उठा नहीं। 

रविवार, 27 मार्च 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 15

यादें वेद पकाश शर्मा जी की - 15
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

क्या काम कराना होगा?” - पूछते हुए मेरे चेहरे पर वही मुहब्बत भरी मुस्कान उभर आई, जिसे आपने मेरे रजत राजवंशी नाम से छपे कुछ उपन्यासों की तस्वीरों तथा फेसबुक की तस्वीरों में देखा है। 
वेद भाई ने बड़े रहस्यमय अन्दाज़ में चेहरा आगे किया और धीरे से पूछा –“बता दूँ...?”
हाँ...हाँ...बताओ।” - मैं भी कुछ मज़े लेने वाले मूड में आ गया था। 
तो सुन...मामा... एस. पी. साहब से नूतन पॉकेट बुक्स में छपे कुछ पुराने-सुराने उपन्यास विक्रांत और विजय सीरीज़ के फ्री में लाया होगा, उन्हीं को कवर-सवर फाड़ के योगेश मित्तल के सामने फेंकेगा, ताकि योगेश मित्तल को पता न चले, यह उपन्यास पहले कहाँ छपे हैं, फिर योगेश मित्तल से कहेगा कि यार, इसमें आधा-आधा फार्म शुरू और आखिर में बढ़ा दो और हर चैप्टर की शुरू और आखिर के तीन-तीन चार-चार लाइन चेन्ज कर दो।”
वेदप्रकाश शर्मा
हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 

हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 
किसी और से भी ले सकै है, प्रभात पॉकेट बुक्स से भी ले सकै है। तिलक चन्द जी के भी पांव पकड़ सकै है, पर एस. पी. साहब का नाम मैंने इसलिए लिया है, क्योंकि मेरा ख्याल है - एस. पी. साहब से 'मामा' की कुछ ज्यादा ही पटती है।”
पटती है?”- मैं हँसा। 
वेद प्रकाश शर्मा के चेहरे पर भी हँसी आ गई, एकदम ही वह बोले - “तू कहीं गलत तो नहीं समझ रहा  मैंने कहा - पटती है। 'फटती है' नहीं कहा है।”
नहीं, मैं गलत नहीं समझा।” मैंने 'पटती है' ही समझा है। तुम तो जानते ही हो, मैं आमिष  शब्दों का प्रयोग नहीं करता। उपन्यासों में बेशक किसी लफंट-लम्पट-मवाली के मुंह से नानवेजिटेरियन शब्द बुलवा दूं, व्यक्तिगत जीवन में खुद कभी इस्तेमाल नहीं करता।” 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 14

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 14
        प्रस्तुति योगेश मित्तल
"ऐसी क्या मुसीबत आ गई कि मुझे बुलाने के लिए आपको मेरठ आना पड़ा?" मैंने राजेन्द्र भूषण जैन से पूछा तो वह बोले -"मुझे क्या पता, मुझसे तो गौरीशंकर जी ने रिक्वेस्ट की थी कि जैन साहब, योगेश मेरठ में कहीं होगा, उसके घर पर पता करवाया था, दिल्ली में तो वह है नहीं। आप मेरठ जाकर उसे पकड़ कर लाओ, जो भी खर्चा होगा, आपको हम देंगे।"
वेदप्रकाश शर्मा
वेदप्रकाश शर्मा जी
"काम नहीं बताया उन्होंने।" - मैंने पूछा! 
"मैंने पूछा नहीं, उन्होंने बताया नहीं। पिछली बार राज कुमार गुप्ता जी ने भेजा था, तब भी हमने कोई सवाल नहीं किया था।" राजेन्द्र भूषण बोले।
मैं सोचने लगा, क्या करूँ? दिल्ली जाऊँ या नहीं?
     मेरठ की मेरी यादों में, दिल्ली से मुझे बुलाने के लिए प्रकाशकों द्वारा किसी को मेरठ भेजने की घटनाएँ तीन बार हुई है। दो बार मनोज पाकेट बुक्स से - एक बार राजकुमार गुप्ता द्वारा तथा एक बार गौरीशंकर गुप्ता द्वारा राजेन्द्र भूषण जैन को मेरठ भेजा गया और एक बार विजय पाकेट बुक्स का मैसेज लेकर टूरिंग एजेन्ट इन्द्र मेरठ आये थे।

शनिवार, 15 जनवरी 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 13

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 13
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"नहीं-नहीं, तुलसी का नम्बर तो हमेशा पहला रहेगा।"- मैंने वेद भाई की बात पर पुरजोर तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की। 
"रहने दे.... रहने दे....। लिखेगा तो तू... तब ना... जब ये दो-दो पेज वाले तुझे छोड़ेंगे"
"नहीं यार, अब की बार यह इल्लत नहीं पालनी...।" -मैंने वेद भाई को आश्वासन दिया। 
"तेरे कहने से क्या होता है, किसी ने सौ-दो सौ एडवांस दिये। दो चार चिकनी चुपड़ी बातें की तेरी छाती खुशी से फूल जायेगी कि तेरा कितना मान-सम्मान है।"
"नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होगा।"  
        इस बार वेद प्रकाश शर्मा ठहाका मार कर हंसे और सरलता छोड़ कुछ ड्रामेटिक अन्दाज़ में बोले - "ऐसा है भाई योगेश जी, तुम भी यहीं हो और मैने तो रहना ही यहीं है। छ: महीने का समय काफी रहेगा?"
"किस बात के लिए...?" - मैंने पूछा। 
"नॉवल शुरू करने के लिए... हमारे लिए नॉवल शुरू करने के लिए।"- वेद भाई ने हंसते हुए कहा - "भाई मेरे, कम्पलीट तो जभी होगा, जब शुरू होगा। ऐसा करियो... जब शुरू करै तो मेरे से सौ का नोट ले जाइयो, एक फार्म का मैटर दिखा के। और वो सौ का नोट समझ ले मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने के लिए होगा। उसका तेरे उपन्यास के मेहनताने से कोई मतलब नहीं होगा।"
मैं तुरन्त ही कुछ न कह सका। फिर कुछ देर बाद धीरे से बोला -"यार, इतनी खराब रेपुटेशन तो नहीं है।"
        वेद भाई फिर हंसे -"खराब....। रेपुटेशन...। भाई...यूँ बता, तेरी रेपुटेशन है कहाँ? बेपेंदी का लोटा है, जिधर नोटों की शक्ल दिखी, उधर ही लुढ़क गया। ऐसे कोई धन्धा होवै है।"
"यार, मैं धन्धा करता ही कहाँ हूँ।" - मैंने कहा -"मैं तो कलम का पुजारी हूँ।"

शनिवार, 8 जनवरी 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 12

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 12
प्रस्तुति- योगेश मित्तल          
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रिक्शा रुका तो मेरे उतरने से पहले ही सतीश जैन की आवाज़ आई - "हज़ार साल की उम्र है तुम्हारी। खूब ऐड़ियाँ रगड़-रगड़कर मरोगे ।"
"ठीक है, मैं वापस जाता हूँ ।"- मैं रिक्शे से उतरते-उतरते वापस रिक्शे में बैठ गया और बोला -"ईश्वरपुरी होकर आता हूँ । तब तक शटर बंद करके चले जाना ।" 
"अरे नहीं, रुको ।"- सतीश जैन तुरन्त अपनी कुर्सी से उठकर बाहर आ गए और रिक्शे वाले को धमकी देते हुए  बोले - "खबरदार, जो इस आदमी को यहां से कहीं लेकर गया ।"
मगर रिक्शेवाला भी कम नहीं था, बोला -'बाबूजी, हमें तो पईसा से मतलब है ।" फिर मेरी तरफ इशारा करके बोला -"ये बाबूजी, पईसा देंगे तो हम कहीं भी ले जाएंगे। आप हमको धमकी तो देओ ना।" 
सतीश जैन अपने असली अन्दाज़ में आ गये, रिक्शे वाले से बोले - "अरे नहीं यार, आपको हम धमकी नहीं दे रहे। आपसे तो रिक्वेस्ट कर रहे हैं, आप यह बताओ - किराया कितना हुआ।"
"बीस रुपये...।" - रिक्शे वाले ने वही बताया, जो मुझसे तय हुआ था। 

रविवार, 5 दिसंबर 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -11

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 11

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ऐश ट्रे मेरी पहुँच से दूर थी। वेद भाई जहाँ बैठे थे, उससे कुछ दूर बायीं ओर। 

ऐश ट्रे अपनी ओर खींचने के लिए मुझे कुर्सी से उठकर टेबल पर काफी आगे झुकना पड़ा। फिर मैंने ऐश ट्रे खींच कर, उसके कॉर्नर पर अपनी सिगरेट का टोटा रगड़ कर बुझाया और बुझा हुआ टोटा ऐश ट्रे में डाल दिया। 

फिर ऐश ट्रे पीछे सरकाकर मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। 

       उन दिनों शास्त्रीनगर में तुलसी पेपर बुक्स आरम्भ तो हो चुकी थी, लेकिन काम करने वाले लोग उतने नहीं थे, जितने बाद में धीरे धीरे बढ़ गये थे। फिर भी कुछ तो थे, लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने जो देखा, मुझे स्वामीपाड़ा का वेद भाई का वो घर याद आ गया, जहाँ बरसात में कई जगह से टपकती छत के नीचे परछत्ती में, हम दोनों ने साथ मिलकर कुछ पेज लिखे थे और साथ साथ खाना - खाया था। 

और अचानक ही वो दिन क्यों याद आ गया, यह तो मेरी समझ में नहीं आया, पर जब वेद भाई वापस ऑफिस आये तो उनके हाथों में दो शीशे के मग थे और मग में फलों का जूस...। 

बस, उस समय कुछ ऐसा लगा था, जैसे वक़्त अचानक बरसों पीछे चला गया हो। 

एक मग मेरी ओर बढ़ा कर वेद भाई ने कहा - "चाय तो तू पीवैगा नहीं, ले अब सेहत बना।"

"चाय पीने के लिए मैंने कब मना किया।" मैं जूस का मग अपने होंठों की तरफ बढ़ाते हुए बोला -"अभी जूस पीते हैं। थोड़ी देर बाद चाय पियेंगे।"

“चाय क्या, खाना खिलावैंगे यार...। पहले जूस तो पी...।"- वेद भाई ने कहा और मग होंठों से लगा लिया। 

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...