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सोमवार, 30 दिसंबर 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-41,42

 आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 41

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मेरठ में हम बस अड्डे पर ही उतरे। उसके बाद जब हम ठठेरवाड़ा के लिए रिक्शा ढूँढने लगे तो जल्दी ही कोई रिक्शा नहीं मिला।
पांचवें या छठे रिक्शेवाले ने ठठेरवाड़ा चलने के लिए हामी भरी तो हमारी जान में जान आई।
"बैठो योगेश जी !" बिमल ने मुझसे कहा।
बिमल की यह खास आदत थी, जब कोई साथ होता था तो अधिकांशतः खुद बाद में ही बैठते थे, दूसरे शख्स को पहले बैठाते थे।
दोनों के बैठने के बाद रिक्शेवाले ने रिक्शा दौड़ाया तो बिमल ने मुझसे कहा-"चलो, रिक्शा तो मिला।"
" बाबूजी, पहले आप जिन लोगों से बातें किये थे, सब पुलबेगम की तरफ रिक्शा चलाते हैं। उनमें शहर का कोई नहीं था।" बिमल की बात सुन रिक्शेवाला अचानक बोल उठा।
"ओह...अच्छा...!" बिमल ने कहा।
तभी रिक्शेवाले ने सवाल किया-"बाबूजी आप दिल्ली से आ रहे हैं...?"
"हाँ...!" बिमल ने कहा।
"फिर आपको दिल्ली चुंगी पर उतरना चाहिए था। दिल्ली से आने वाली बस दिल्ली चुंगी और डी.एन. कालेज पर भी रुकती है। उधर से ठठेरवाड़ा पास पड़ता।"
"अच्छा... !" बिमल मुस्कुराये और रिक्शेवाले से बोले-"पर अगर हम वहाँ उतर जाते तो आपके रिक्शे में कैसे बैठते बाबा। "
"हाँ, यह तो है।" रिक्शेवाला भी हंसा-"आज सुबह से मेरी भी बोहनी नहीं हुई थी । ऊपरवाला बड़ा कारसाज है। सबका ख्याल रखता है।"
रिक्शेवाला बड़ा बातूनी था। रास्ते भर कोई न कोई बात करता रहा।
          बहुत से रिक्शेवाले बातूनी होते हैं, किन्तु बैठने वाली सवारी को उनसे सड़क, रास्तों, फिल्मों से ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए।
      यह बात मुझे बिमल चटर्जी ने बाद में कभी समझाई थी।
और व्यक्तिगत तथा पारिवारिक बातों के अलावा राजनैतिक बातें भी हर किसी नये राह चलते मिलने वाले से नहीं करनी चाहिए।
आज के राजनैतिक उथल-पुथल वाले वातावरण में अक्सर मैं सीमा से बाहर निकल जाता हूँ, तब हमेशा बिमल की बातें याद आ जाती हैं।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-39,40

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार,भाग -39,40
योगेश मित्तल जी के स्मृति कोष से

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 39
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अगले कुछ दिनों में बस एक विशेष बात हुई ! पिताजी कलकत्ते से हमेशा के लिए दिल्ली आ गये ! कलकत्ते में हमारे घर में जो-जो सामान था, अधिकांश वहीं बेच दिया या मुफ्त में किसी पड़ोसी को दे दिया ! सिर्फ कपड़े और कुछ एक हल्की-फुल्की चीजें साथ ले आये थे, जिनमें शार्प झंकार का वह रेडियो भी था, जो बचपन के दिनों में हमारी सबसे प्रिय वस्तु हुआ करता था !

घर में रेडियो आ गया था, हम सब रेडियो पर फिल्मी गाने व हवामहल जैसे प्रोग्राम सुनना चाहते थे, लेकिन यह सम्भव न हुआ !
मकानमालिक जगदीश गुप्ता ने कहा -"रेडियो चलाओगे तो दस रुपये महीना देने होंगे !"
और दस रुपये उन दिनों बहुत होते थे ! 
पास ही के एक जाट रणवीर सिंह की गाय-भैंस के दूध की डेयरी से घर की चाय के लिए दूध लाया जाता था और सबके सामने रणवीर सिंह दूध दुह कर बेचा करता था, वह दूध उन दिनों पचास पैसे किलो होता था !

पिताजी डाॅक्टर थे ! बहुत भाग-दौड़ करने पर शीला सिनेमा टाकीज, पहाड़गंज, नई दिल्ली स्टेशन के पीछे जा रही एक सड़क पर उन्हें एक छोटी-सी दुकान किराए पर मिल गयी, जहाँ उन्होंने अपना क्लिनिक खोल लिया !
वे दिन हमारी आर्थिक परेशानियों के बड़े भारी दिन थे ! 
हम जगदीश गुप्ता के जिस मकान में किराए पर रह रहे थे, उससे पहले हम वहीं आगे की एक गली में सरदार जीतसिंह के मकान में रह चुके थे ! तब सरदार जीतसिंह के बच्चों बिमला, कान्ता और काले को मैं पढ़ाया भी करता था !
सरदार जीतसिंह के मकान के बिल्कुल साथ वाला मकान एक मुल्तानी विधवा का था, जिनके चार बच्चे थे ! सबसे बड़ी इन्दिरा दीदी, उनसे छोटा राम, उससे छोटा किशोर और सबसे छोटी बेबी ! 

रविवार, 30 जून 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-37,38

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-37

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 37
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अगले दिन कोई प्रकाशक नहीं आया ! मैं और बिमल चटर्जी दोनों इन्तजार करते रहे ! उसके अगले दिन भी कोई नहीं आया !
तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह तैयार होकर बिमल चटर्जी के घर की ओर निकलने वाला ही था कि द्वार पर भारी-भरकम स्याह-सा चेहरा प्रकट हुआ !
वह उत्तमचन्द थे ! बुक बाइन्डर !
"बाबे दी मेहर है ! चिन्ता नहीं करनी !" दोनों हाथ ऊपर उठा, उत्तमचन्द ने चिर-परिचित अन्दाज़ में अभिवादन किया !
"बाबे दी मेहर है !" मैंने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया-"आज सुबह-सुबह कैसे ?"
"चिन्ता नहीं करनी ! इधर से गुज़र रहा था ! सोचा - बड़े-बड़े लोगों से मिलते चलें !"
मैं ठहाका मारकर हँसा -"बड़े-बड़े लोगों से मिलने के लिए आप चारफुटिये से मिलने आये हैं ! मैं कहाँ से बड़ा नज़र आ रहा हूँ आपको ?"
उत्तमचन्द गम्भीर हो गये -"हमें तो जो रोटी दे, वही हमारे लिए बड़ा है !"
"अरे तो मैंने कौन-सी रोटी खिला दी आपको ? खिलाने-पिलाने वाला तो भगवान है ! मेरे यहाँ आने की जगह किसी मन्दिर चले गये होते !"
"वहाँ भी जाऊँगा, पर अभी नहाया नहीं हूँ !"
"तो आप बिना नहाये-धोये सिर उठाकर सीधे मेरे यहाँ चले आये हैं ! कुछ तो बात है ! क्या बात हैं ?" मैंने मुस्कुराते हुए भवें नीचे से ऊपर करते हुए पूछा !
"लड़के खाली बैठे हैं ! मैंने सोचा - योगेश जी से ही पूछ लेते हैं - पंकज पाॅकेट बुक्स का नया सैट कब आ रहा है ?" उत्तमचन्द के मुखमण्डल की मुस्कान का स्थान गम्भीरता ने ले लिया !
"इस बारे में तो कुमार साहब ही कुछ बता सकते हैं !" मैंने कहा !
"तो चलें...कुमार साहब के घर ?" उत्तमचन्द ने पूछा !
"चलिए !"
हम दोनों जब कुमारप्रिय के यहाँ पहुँचे ! कुमारप्रिय घर पर ताला लगा रहे थे ! स्पष्ट था - कहीं जाने को तत्पर हैं !

शुक्रवार, 14 जून 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-35,36

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 35
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राज भारती जी और यशपाल वालिया ने मेरा और बिमल का सहज स्वागत किया !
फोल्डिंग कुर्सी बिछाकर हम दोनों जम गये तो राज भारती जी ने बिमल से पूछा -"स्क्रिप्ट तैयार है तेरी ?"
"हाँ, लेकर आया हूँ !" बिमल ने कहा ! किन्तु सवाल मुझसे तो किया ही नहीं गया था ! मैं खुद टपक पड़ा जवाब देने को, बोला - "मैं भी लाया हूँ !"
"अच्छा...!" जवाबी आवाज यशपाल वालिया की थी, जो नाटकीय अन्दाज़ में कुर्सी से उठकर खड़े हुए और ऊपर से नीचे मुझे देख, भारती साहब से पंजाबी में बोले -"आपने इधर तो देखा ही नहीं ! इधर भी देख लो ! योगेश जी भी आये हैं ! स्क्रिप्ट भी लाये हैं !"
फिर वालिया साहब बिमल से बोले -"ये क्या मोटे ? तूने अपनी कुर्सी तो भारती साहब के पास रख ली, योगेश जी को पीछे छिपा दिया !"

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-33,34

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 33
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अचानक अपना ही घर मेरे लिए कारागार बन गया !

लेखकों-प्रकाशकों तथा बिमल चटर्जी की विशाल लाइब्रेरी में आनेवाले लोगों से जो रिश्ता बना था, उसकी वजह से घर में मेरा समय कम ही बीतता था !
बहुत बार तो केवल रात का खाना ही घर पर होता था, दिन का भोजन कहीं न कहीं यारों के साथ होता था !

लेकिन...
सब दिन होत न एक समाना !

वह दिन भी अन्य दिनों से अलग था !

सुबह-सुबह की पहली चाय कुमारप्रिय के साथ एक टी स्टाॅल में पीने के बाद अलग हुआ तो बिमल चटर्जी के यहाँ पहुँच गया ! वहाँ से हम साथ-साथ विशाल लाइब्रेरी पहुँचे !

"योगेश जी, भारती पाॅकेट बुक्स का मेरा नाॅवल तो कम्प्लीट होनेवाला है ! आपका 'जगत के दुश्मन' कहाँ तक पहुँचा ?" बिमल ने पूछा तो मैंने बताया - "आखिरी ढलान पर है, जरा-सा धक्का लगाना है, पूरा हो जायेगा !"
बिमल हँस पड़े -"मुझे तो आज और कल, दो दिन लगेंगे ! आप भी पूरा कर लो ! फिर साथ में ही चलेंगे ! ठीक !"
"ठीक !" मैंने कहा !

रविवार, 14 अप्रैल 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-31,32

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 31
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          उस दिन फूलचन्द सुबह-सुबह घर आ गया ! वह अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान था और उसके माता-पिता उसकी इतनी ज्यादा चिन्ता करते थे, जितनी कोई माँ-बाप अपनी जवान बेटी की भी नहीं करते।

           फूलचन्द गाँधीनगर में रहने पर शुरुआती दौर में बने मेरे दोस्तों नरेश कुमार गोयल और अरुण कुमार शर्मा का सहपाठी रह चुका था और उन दोनों का ही अच्छा दोस्त था, लेकिन मेरी उससे सिर्फ पहचान ही थी।

           फूलचन्द कद में मुझसे खास बड़ा नहीं था, सिर्फ इंच-दो इंच का रहा होगा, लेकिन उसका शारीरिक गठन बहुत अच्छा था और सबसे खास बात यह थी कि उसका रंग एकदम गोरा-चिट्टा था ! चेहरे पर हमेशा मासूमियत छाई रहती थी ! किन्तु उसके चेहरे पर मूँछ-दाढ़ी का अभाव था।

         वह इतना खूबसूरत था कि यदि साड़ी-ब्लाऊज में सामने आ जाये तो गली-मोहल्ले के दिलफेंक लड़के 'अश्-अश्' कर उठें और उस पर लाइन मारने के अवसर ढूँढने लगें।

       नवीं-दसवीं में तीन साल फेल होने के कारण वह नरेश और अरुण से पिछड़ अवश्य गया था, किन्तु बचपन से साथ-साथ पढ़ने के कारण बनी दोस्ती बरकरार थी।

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-29,30

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 29
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"मैं तो गर्ग एण्ड कम्पनी में पैसे लेने आया था ! मनोज में भी गया था।  उन्हें बाल पाॅकेट बुक्स देनी थीं ?" मैंने राज भारती जी से कहा।  फिर पूछा -"पर आप यहाँ कहाँ ?"
"क्यों ? तू ही यहाँ माल कमाने आ सकता है ? राज भारती को कोई नहीं जानता।" राज भारती हँसते हुए बोले तो मैं हड़बड़ाया -"नहीं-नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था !"
"मतलब-वतलब छोड़ ये बता ज्ञान ने पैसे दिये ?"
"हाँ, दिये !" मैंने कहा।

उन दिनों मेरे मुँह से किसी भी पारिश्रमिक अथवा पेमेन्ट के लिए अधिकांशतः 'पैसे' शब्द ही मुँह से निकलता था ! राज भारती जी के संसर्ग ने ही मुझे 'पेमेन्ट' या 'पारिश्रमिक' बोलना सिखाया।

"आज तो लगता है - मनोज से भी पेमेन्ट मिल गई है ?" भारती साहब मेरा चेहरा गौर से देखते हुए चुटकी लेकर बोले !
"हाँ !" मैं हँसा।
"तब तो पार्टी हो जाये !"
"हाँ-हाँ, जरूर ! बताइये कहाँ चलना है ?"
"सब्र कर...सब्र कर ! तूने तो अपनी जेब भर ली ! अब मैं भी जरा कुछ नाश्ते-पानी का जुगाड़ कर लूँ !" राज भारती  बदस्तूर मुस्कुराते हुए बोले।

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-27,28

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 27
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बैठने के लिए उन दिनों चन्दर की दुकान में छोटे-छोटे स्टूल थे।

एक पर वो बैठा, दूसरे के शीर्ष पर हाथ से थपकी दे, मुझसे बोला -"बैठ।"
मैं यन्त्रवत् बैठ गया।

"यार, मैं तुझसे बहुत दिन से बात करने की सोच रहा था। पर कभी कस्टमर्स की भीड़, कभी तेरे साथ बिमल चटर्जी या अरुण शर्मा होते थे, इसलिए कभी चांस नहीं मिला, पर आज तू पकड़ में आ गया और अभी कस्टमर भी नहीं हैं !"
मैं मुस्कुरा दिया, बोला कुछ नहीं।

"तुझे जल्दी तो नहीं है ना ?" चन्दर ने फिर पूछा।
मैंने "नहीं" में सिर हिला दिया।

"पानी पियेगा ?" पूछने के साथ-साथ चन्दर ने स्टूल से उठ, वहीं कहीं से काँच का एक गिलास उठाया और कुछ पीछे नीचे जमीन पर रखी एक बेहद खूबसूरत सुराही उठाई और सुराही से पानी काँच के गिलास में उड़ेलकर, मेरी ओर बढ़ा दिया।

प्यास तो नहीं थी, फिर भी मैंने गट-गट पानी पीकर गिलास खाली कर दिया और वापस चन्दर को थमा दिया।

चन्दर गिलास वहीं कहीं नीचे रखने के बाद फिर से स्टूल पर बैठ गया।

"अच्छा बता, किस-किसके लिए लिख रहा है ?" स्टूल पर जमकर बैठने के बाद उसने पूछा।
मैंने पहले तो बगल की दुकान की ओर इशारा किया और बोला -"मनोज में लिख रहा हूँ।"
फिर एक क्षण रुककर बोला -"गर्ग एण्ड कम्पनी और भारती पाॅकेट बुक्स में भी लिख रहा हूँ।"
"बेकार है, यह सब बनिये लोग बड़े चालू होते हैं ! इनमें कोई भी तुझे तेरे नाम से नहीं छापेगा । तू जिन्दगी भर लिखता रहेगा। कोई फायदा नहीं होगा।" चन्दर ने कहा !

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-25,26

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 25
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"आप भी लीजिए ना...।" कुमारप्रिय ने बिमल जैन को केवल चाय की चुस्की भरते देखकर, बिस्कुट और नमकीन की ओर संकेत करते हुए कहा तो बिमल जैन बोले -"नहीं, ठीक है। आप लीजिए।"

     कुछ पल सन्नाटा रहा।  जब हमारे कपों में चाय लगभग अन्तिम घूँट भर थी, तभी बिमल जैन फट पड़े -"मुझे तो आप लोगों ने बरबाद कर दिया। आगे नहीं करना है - मुझे पब्लिकेशन। अब और एक पैसा नहीं लगाऊँगा !"
"अरे ! क्या हुआ ? ऐसे क्यों नाराज हो रहे हैं जैन साहब ?" कुमारप्रिय चौंकते हुए बोले।
"क्या हुआ ? चाय पी लीजिये। फिर दिखाता हूँ - क्या हुआ ?" बिमल जैन तल्ख स्वर में बोले।

कुमारप्रिय ने चाय का आखिरी घूँट भर कप टेबल पर रख दिया। मैं पहले ही अपना कप खाली कर चुका था।

बिमल जैन खड़े हो गये और दूसरे कमरे की ओर बढ़ते हुए बोले -"इधर आइये !"

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-23,24

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 23
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आबिद रिजवी मेरे और बिमल चटर्जी के लिए उस दिन से पहले महज़ एक नाम था, जिसकी हमने बहुत बार विभिन्न सन्दर्भों में चर्चा सुनी थी ! न केवल लालाराम गुप्ता और राज भारती जी से, बल्कि प्रकाशन जगत के कई अन्य दिग्गजों से ! एक बार जनाब फारुक अर्गली ने भी आबिद रिजवी का नाम लिया था, तब वह बिमल चटर्जी से एक विशेष चर्चा कर रहे थे !

मजे की बात यह कि तब तक फारुक अर्गली कभी भी आबिद रिजवी से मिले नहीं थे !

फारुक साहब ने बिमल से कहा था -"बिमल, मेरे विचार से जासूसी साहित्य और पाॅकेट बुक्स में हिन्दी में लिखनेवाले बंगाली लेखक अभी तक तो अकेले तुम्हीं हो !"
बिमल की मुस्कान बड़ी ही दिलफरेब थी ! वह मुस्कान बिखेरते हुए बोले -"हाँ, वरना जासूसी में तो आपके मुसलमान लेखकों ने हिन्दी पर पूरा कब्जा कर रखा था !"

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-21,22

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 21


हम जिस मकान में रहते थे, उसमें हमारे अलावा भी कई किरायेदार थे।
एक - हरीश चन्द्र श्रीवास्तव, जो कनाट प्लेस स्थित जीवनदीप बिल्डिंग में हिन्दुस्तान स्टील के आफिस में काम करते थे।
एक देशराज थे, जिनकी परचून की दुकान थी।
एक अन्य हरिओम कश्यप, जो किसी पोस्ट आॅफिस में पोस्टमैन थे, बाद में मलकागंज के किसी पोस्ट आॅफिस में उन्होंने काफी समय तक ड्यूटी की।
एक भूरेलाल थे, जो शायद किसी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करते थे।

          सभी परिवार काफी हिल-मिल कर रहते थे ! हरिओम कश्यप अविवाहित थे और अकेले ही रहते थे ! वह रोज सुबह आठ बजे अपने कमरे को ताला लगाकर निकल जाते और शाम साढ़े सात बजे आते।
बाकी परिवारों के पुरुष भी नौ बजे ये पहले काम पर निकल जाते थे ! फिर भी स्त्रियाँ और परिवार के अन्य लोग घर पर ही होते थे।

       सुमेरचन्द जैन साढ़े दस बजे के बाद आये ! मुख्य द्वार से मकान की गैलरी में कदम रखते ही उन्होंने आवाज दी -"योगेश...!"
और योगेश के दिल में आया - भागकर कहीं छिप जाये ! पर ऐसा सम्भव नहीं था, मकान में बहुत लोग थे और अपने घर में भी मम्मी, बड़ी बहन मधु, छोटी बहन सरिता और छोटा भाई राकेश थे।
पिताजी तब कलकत्ता में थे।

योगेश जी सुमेरचन्द जैन के सामने पहुँचे !
चेहरे पर मीठी मुस्कान लाकर कहा -"नमस्ते जैन साहब !"
"नमस्ते !" सुमेरचन्द ने नमस्ते का जवाब कुछ रूखेपन के साथ दिया और तुरन्त अगली लाइन सुना दी -"फटाफट पैसे ले आओ ! मुझे अभी कई जगह जाना है ! टाइम नहीं है मेरे पास !"
"आइये, बैठिये तो सही ! कुमार साहब भी अभी आनेवाले हैं !" मैंने कहा।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-19,20

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 19
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ज्ञान ने मुझे देखते ही कुछ तेज़ आवाज़ में कहा था -"बेईमान, धोखेबाज, गद्दार !"
और मैं एकदम सन्नाटे में डूब गया था ! 
ऐसा क्या कर दिया मैंने ? मन ही मन मैंने सोचा था !

पर ज्ञान की आवाज़ की एक विशेषता यह थी कि वह गुस्से में भी बोलता तो आवाज़ में कड़कपन या कठोरता नहीं महसूस होती थी ! 
पता नहीं क्यों...उस दिन मुझे ज्ञान के शब्दों से आघात-सा अवश्य लगा, पर तुरंत ही शब्द होठों से निकले -"क्या हुआ ? इतने गर्म क्यों हो रहे हो ?"

अक्सर ज्ञान के होठों से गालियों के फूल भी बरसते थे ! गुस्से में ही नहीं सामान्य सी बात-चीत में भी ! मेरे सवाल का जवाब उसने मुंह से एक भद्दी गाली निकालने के बाद दिया -"तू भरोसे के काबिल ही नहीं है ! क्या प्रॉमिस किया था तूने ? दरीबे में कदम तब रखेगा, जब मेरे लिए स्क्रिप्ट लेकर आएगा ?"     
"तो यह क्या है ?" मैंने बाल पॉकेट बुक्स की स्क्रिप्ट ज्ञान के सामने रख दी -"तुम्हारे लिए स्क्रिप्ट लेकर ही आया हूँ !"
"बहुत एहसान कर दिया ! हमें नहीं चाहिए तेरी स्क्रिप्ट ! ले जा, यह भी उन्हीं को दे आ, जो तेरे सगे हैं !" ज्ञान स्क्रिप्ट उठाकर पीछे रखते हुए बोला !

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार- 17,18

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 17,18
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उन दिनों मैं आज जैसा चतुर-चालाक-हाज़िरजवाब कुछ भी नहीं था !

जब ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग ने मुझसे कहा -"ओए छोटू ! हमने तेरा नाम छाप दिया, ये क्या कम है ? ओए तू तो सारे हिन्दुस्तान में मशहूर हो गया ! हिन्दुस्तान के कोने-कोने में जाती है गोलगप्पा !"

तो एक बार तो मुझे कुछ भी नहीं सूझा कि क्या कहूँ ! फिर भी धीरे से बोला -"सब लोग तो कहानी छापने के पैसे देते हैं !"
सच कहूँ तो मैं उस समय बोल नहीं रहा था, घिघिया रहा था !

पर जो लोग ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग को जानते रहे हैं, कभी न कभी उससे मिले हैं – वे अच्छी तरह समझ सकते हैं कमसिन उम्र में मेरा उस आदमी से बात करना कितना कठिन था ! मैं उसके सामने खड़ा था, यही बहुत था !  

"कहाँ-कहाँ छपी है तेरी कहानी ? किस-किस ने दिए हैं पैसे ?" ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग ने पूछा !
बच्चों की पत्रिकाओं में तो मैंने गोलगप्पा के अलावा कहीं कोई कहानी भेजी नहीं थी ! अतः ज्ञानेन्द्र के सवाल तो और कोई जवाब तो सूझा नहीं, मैंने कह दिया -"मनोज वाले भी देते हैं !"
"ये कबाड़िये..!" मेरे मुंह से मनोज नाम सुनते ही ज्ञानेन्द्र ने सिर को दायीं ओर झटका दिया और बोला था ! 

तब मैं नहीं समझ सका था कि ज्ञानेन्द्र ने मनोज वालों के लिए "कबाड़िये" क्यों कहा ! पर बाद में घनिष्ठता हो जाने पर जाना कि वह पीठ पीछे हमेशा उन्हें इसी तरह सम्बोधित करता था, लेकिन जब भी राजकुमार गुप्ता या गौरीशंकर गुप्ता सामने पड़ते "भाई साहब-भाई साहब” करके बिछ जाता ! और बाद में मैंने यह भी जाना कि मनोज वालों ने किस तरह कड़ी मेहनत करके, कबाड़ के धंधे से, प्रकाशन व्यवसाय में बुलंदी हासिल की ! 

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-15,16

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 15
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बिमल चटर्जी को मैंने अरुण के साथ मनोज पाॅकेट बुक्स जाने का किस्सा सच-सच बता दिया, वह सचमुच नाराज हुए।
"योगेश जी, मैंने आपसे कहा भी था कि हम मनोज पाॅकेट बुक्स चलेंगे ! फिर अरुण के साथ जाने की क्या जरूरत थी ?" बिमल बोले ! 
मैं चुप रहा ! मैंने पहले ही उन्हें बता दिया था कि मुझे बिना बताये - फिल्म के बहाने ले जाया गया था !

बिमल का गुस्सा थोड़ी ही देर का रहा ! 

कुछ देर बाद बोले -"चलो, कोई बात नहीं ! गौरी भाई साहब से सब्र नहीं हो रहा होगा, तभी अरुण को बोला होगा ! दरअसल मैंने उन्हें बताया था कि योगेश मित्तल एक छोटा बच्चा है, जो मेरे लिए कहानियाँ लिख रहा है ! तो उन्हें छोटे बच्चे को देखने की धुन सवार हो गई थी ! मुझसे भी कई बार कहा था - यह योगेश मित्तल कौन है ? इसे लेकर आ ! मेरी ही गलती है, जो अब तक आपको साथ लेकर नहीं गया !"

उसके बाद दिनचर्या में बदलाव यह आया कि मेरा बिमल चटर्जी के लिए लिखना बन्द हो गया, लेकिन हमारे सुबह-शाम अब भी साथ बीतते थे ! अक्सर हम साथ बैठकर भी लिखते थे !  


उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-13,14

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 13
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कुछ दिन यूँ ही बीत गये ! फिर आया शुक्रवार का दिन !

बिमल चटर्जी बोले - "आओ योगेश जी, आज फिल्म देखने चलते हैं !"

"फिल्म ! कौन-सी फिल्म ?"मैंने पूछा !
"जवानी दीवानी !"

अखबार पढ़ना बचपन से मेरी आदत रही थी ! कलकत्ता में घर में अंग्रेजी का स्टेट्समैन रोज आता था, किन्तु रविवार के दिन अंग्रेजी का अमृत बाजार पत्रिका तथा हिन्दी के सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र भी आते थे ! पर फिल्मों वाला पन्ना सिर्फ़ फिल्मों के नाम देखने तक सीमित था ! शुक्रवार को कौन सी नई फिल्म लगी है, इस पर ध्यान जाता था, पर कहाँ लगी है ? इस पर कभी ध्यान नहीं देता था, क्योंकि फिल्म देखने के प्रति मन में कोई इच्छा या उत्साह नहीं होता था !


इसलिए उस दिन मुझे यह मालूम था कि फिल्म आज ही लगी है ! अत: बोला -"फिल्म आज ही लगी है ! टिकट नहीं मिलेगा !"

"सब मिल जायेगा, पर आपने यहाँ किसी से कहना नहीं है कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं और बाद में भी....कि हम फिल्म देखकर आये हैं !"
"ऐसा क्यों ?" तब मैंने नहीं पूछा, लेकिन बाद में बिमल के बिना बताये पता चल गया !

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-11,12

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 11
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गुप्ता जी ने जब यह कहा कि उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ी है तो तत्काल ही मैंने पूछा - "कैसी लगी ?"
"ठीक है...!" गुप्ता जी ने ढीले-ढाले अन्दाज़ में कहा !
तभी वहाँ भारती साहब भी आ गये।  पर आज वह अकेले थे !
उन्होंने भी मुझसे हाथ मिलाया। भारती साहब से उस समय हाथ मिलाकर मैंने स्वयं को कितना गर्वित महसूस किया, बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।
मैंने लकड़ी की कुर्सी भारती साहब के लिए छोड़ दी और खुद एक फोल्डिंग चेयर बिछाकर उस पर बैठ गया।

"अभी आया है ?" भारती साहब ने मेरी ओर देखते हुए पूछा !
"हाँ, बस कुछ ही देर हुई है।" -मैंने कहा।
"सुस्त लग रहा है ?"
"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं।"
"चाय पी ?" भारती साहब ने मुझसे पूछा !
जवाब गुप्ता जी ने दिया -"मैं अभी मंगाने वाला था !"
"मंगाने वाला था, क्या होता है, आर्डर कर !" 
"पंडित जी !" गुप्ता जी ने आवाज़ दी !

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-09,10

योगेश मित्तल जी के संस्मरण
आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 9
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आज सोचता हूँ - मेरी वो खिंचाई अस्वाभाविक नहीं थी ! मेरे सामने कोई अजूबा आ जाये तो उसकी हकीकत जानने के लिए मैं भी कुछ तो शगूफे छेड़ूँगा ही !

"माशूका नहीं समझे ! माशूका उर्दू का शब्द है, इसका मतलब है प्रेमिका !” जब वालिया साहब ने मुझसे कहा और हठात ही मेरे मुंह से निकल गया था - "मालूम है !”

तब इससे पहले की कोई और कोई भी प्रतिक्रिया देता, शुरु से खामोश बैठे गुप्ता जी (लालाराम गुप्ता) ने अब पहली बार मुँह खोला, बोले -"योगेश जी को सब पता है, इन्हें आप सब बच्चा मत समझिये !" और इसी के साथ उन्होंने दराज में रखी "जगत की अरब यात्रा" की मेरी स्क्रिप्ट निकालकर राज भारती जी की ओर बढ़ा दी !

अब सोचता हूँ तो लगता है कि उस समय गुप्ता जी को अवश्य ही मुझ पर तरस आ गया होगा !

गुप्ता जी ने स्क्रिप्ट क्या बढ़ाई, माहौल में एकदम सन्नाटा छा गया ! सबकी नज़रें मेरी स्क्रिप्ट पर ठहर गई थीं !
तभी कहीं कोई कुण्डी खड़की थी ! 

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-07,08

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार- भाग- 07

           इंसान जिद्द पर आ जाए तो क्या नहीं कर सकता ! पर जिद्द अच्छी बातों के लिए हो तो ठीक ही रहती हैं ! और तब तो एक आदत के अलावा मुझ में कोई बुरी आदत थी ही नहीं ! 

हाँ, बाद में बुरी आदतें भी सीखीं, पर बहुत धीरे-धीरे ! उनका जिक्र भी समय आने पर करूंगा ! 
अगर आप नौजवान या किशोर ना कहें तो सीधे-सीधे शब्दों में कह सकते हैं कि उन दिनों मैं बहुत आदर्शवादी बच्चा था, बस एक बुरी आदत थी मुझ में ! तब मैं बहुत गुस्सैल था ! आज जो लोग मुझे जानते हैं, यकीन ही नहीं करते कि कभी मुझे गुस्सा भी आता रहा होगा !  

जब गुप्ता जी ने कहा -  “उपन्यास दस दिन में पूरा करना होगा, लेकिन कम्पलीट करने से पहले आप अगले संडे को यहां आइये, तब तक जितना भी मैटर लिखा हो साथ ले आइयेगा !" 

 तब मैंने सोचा – ‘अब उठने का वक्त हो गया है !’ 
वैसे भी मेरी नज़र में अब कोई बात बाकी रह ही नहीं गयी थी ! मैं उठ खड़ा हुआ ! 
गुप्ता जी ने फ़ौरन टोक दिया -"अरे-अरे, आप तो एकदम खड़े हो गए ! अभी हमने आपको जाने की इज़ाज़त कहाँ दी है !" 

सोमवार, 28 जनवरी 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-05, 06

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 5
लेखक- योगेश मित्तल
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अरुण कुमार शर्मा उन दिनों कोई नौकरी पाने के लिए भी भाग-दौड़ कर रहा था ! अतः उसका मुझसे मिलना कम ही होता था !

भारती पाॅकेट बुक्स का विज्ञापन वाला अखबार मुझे थमाने के बाद अगले दिन सुबह ही सुबह वह मेरे घर आ गया ! तब मैं नहा-धोकर तैयार था ! मुझे सुबह जल्दी उठने और जल्दी नहा लेने की आदत तब भी थी, अब भी है !

"आ चल, बाहर चलते हैं !" अरुण ने कहा !
हम बाहर निकल मामचन्द चायवाले की दुकान पर बाहर पड़ी खाली बेंच पर बैठ गये !
तब चाय पन्द्रह पैसे की होती थी ! चाय का आर्डर अरुण ने दिया और मुझसे पूछा -"तो क्या सोचा है ?"
"किस बारे में ?" मैंने पूछा तो वह गर्म हो गया और बहुत भद्दी भाषा में उसने जो कुछ कहा, उसका मतलब यह था कि कभी अपने लिए भी कुछ करना है या हमेशा बिमल चटर्जी और कुमारप्रिय के लिए लिखना है !

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार- 03, 04

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार -भाग-03
लेखक- योगेश मित्तल (रजत राजवंशी)
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कलकत्ते से आने के बाद दिल्ली के गाँधीनगर में बसने पर मेरे सबसे पहले जो दो दोस्त बने, उनमें से एक था नरेश गोयल, दूसरा था अरुण कुमार शर्मा।
नरेश गोयल तो ठीक-ठाक फैमिली से था, पर अरुण कुमार शर्मा के दिन मुफ़लिसी के थे।
        रघुवर पुरा नम्बर दो या शायद शान्ति मोहल्ले में घर जरूर अपना था, पर अधबना, जिसका फर्श भी कच्चा था ! लम्बा-गोरा भूरी आँखों वाला अरुण कुमार शर्मा रोज ही सुबह शाम मुझसे मिलता था।  जब मेरी सिटिंग 'विशाल लाइब्रेरी' में होने लगी तो वह मुझसे मिलने विशाल लाइब्रेरी भी आने लगा, किन्तु एक-दो बार में ही उसे भी और मुझे भी यह एहसास हो गया कि बिमल चटर्जी ने उसे पसन्द नहीं किया है, बल्कि विशाल लाइब्रेरी में उसका आना भी बिमल को नापसन्द था।
        अरुण को अक्सर पैसों की जरूरत रहती थी ! कभी वह मुझसे माँगता तो मैं मना नहीं करता था।
           जब उसने यह जाना कि मैं बिमल चटर्जी के लिए कहानियाँ लिख रहा हूँ और बिमल मुझे हर कहानी के पाँच रुपये देते हैं तो उसके दिल में भी कहानियाँ लिखने की धुन सवार हो गी।

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