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रविवार, 17 दिसंबर 2023

उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा

उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा

वेद प्रकाश शर्मा मेरठ  की  शान हैं. उपन्यास साहित्य है या नहीं, यह साहित्य की मुख्य धारा से जुड़ी हस्तियों के बीच बहस का विषय हो सकता है लेकिन एक सफल उपन्यासकार इसकी परवाह न करते हुए अपने पाठकों से मिलने वाले प्यार को ही सबसे बड़ा ईनाम मानता है और उसकी नजर में यही है उसकी सफलता-असफलता का असली पैमाना। इस बहस से इतर एक उपन्यासकार उपन्यास की विधा को ही अपना सब कुछ मानता है। यही वह विधा है जो अपने पाठकों को तिलिस्म और फंतासी की दुनिया की सैर कराता है। इसके बावजूद समाज में मां-बाप बच्चों को आज भी उपन्यास पढ़ने से क्यों रोकते हैं? उपन्यास क्या है? इसे समाज अथवा साहित्य किस रूप में लेता है? इन बातों को लेकर उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह वेद प्रकाश शर्मा से की गई चर्चा से अपने पाठकों को रूबरू करा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार  संतराम पाण्डेय। 
        एक मुलाकात में श्री वेद प्रकाश शर्मा खुद ही बताना शुरू करते हैं। जब मैं हाई स्कूल में पढ़ रहा था तो स्कूल की मैग्जीन में मुझे भी कुछ लिखने का मौका मिला। मैंने जो कहानी लिखी उसका शीर्षक था ‘पैनों की जेल’। मेरी कहानी पढ़कर मेरे

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -25

 वो आखिरी मुलाकात। 
अंतिम अंक, प्रस्तुति- योगेश मित्तल
योगेश मित्तल जी द्वारा लिखित संस्मरण 'यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की' शृंखला का पुस्तक रूप में प्रकाशन किया जा चुका है। इसलिए इस शृंखला को यहीं पूर्ण किया जा रहा है। आप इस शृंखला को योगेश मित्तल जी द्वारा लिखित 'वेदप्रकाश शर्मा- यादें, बातें और अनकहे किस्से' (पृष्ठ-300) नामक रचना में पढ सकते हैं।

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -25 अंक उस पुस्तक में से लिया गया। 


फिर महीनों बीत गये।
'एक ही नारा - केशव हमारा' भी छपकर, बिक-बिकाकर खत्म हो गई। मैं अपनी लिखी किताबों की राइटर्स कॉपी लेने भी नहीं गया। बाद में जब मेरठ गया, तब शगुन नेकहा- 'अंकल, अभी कॉपी नहीं है। वापसी आयेगी तो मैं आपके एडरेस पर पाँच कॉपी भिजवा दूँगा ।'
'नहीं, कोई जरूरत नहीं है। मैं खुद ही आते-जाते, मिल-मिलाकर ले लूँगा।' मैंने कहा। 
मुझे अच्छी तरह याद नहीं कि उसके बाद मेरा अगला चक्कर कितने महीनों या साल के बाद लगा, पर याद है कि तब शास्त्रीनगर में ही वेद के परिचितों में से किसी के यहाँ चोरी की घटना घटी थी। खास बात यह थी कि जिनके यहाँ चोरी हुई थी, वे मेरठ से बाहर थे।

बुधवार, 28 सितंबर 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी -24

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी  की - 24
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'यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की'  संस्मरण के रचयिता योगेश मित्तल जी इस अंक में बता रहे हैं वेद जी से जुड़े रोचक पल।
 वेद ने कहा और मैं लग गया धन्धे पे। कीबोर्ड पर अब मेरी अंगुलियाँ पहले से फास्ट चलने लगी थीं। अंग्रेजी के कीबोर्ड के किस-किस अल्फाबेट से हिन्दी के स्वर और व्यंजन के कौन-कौन से अक्षर आते हैंसारा विवरण मेरी मेमोरी में ऐसे फिक्स हो गया था कि टाइपिंग करते हुए अंगुलियों को सेकेण्ड मात्र ही लगता थालेकिन एक समस्या थीवह यह कि मैंने बाकायदा टाइपिंग नहीं सीखी थीइसलिये दोनों हाथों की अंगुलियों से टाइपिंग नहीं करता थादायें हाथ की तर्जनी ही मेरी टाइपिंग का एकमात्र औजार थी और यह स्थिति आज भी बरकरार है और अब बाकायदा टाइपिंग सीखने और दोनों हाथों की सारी अंगुलियाँ चलाने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। 
यह मैंने इसलिये लिखा हैक्योंकि जो मित्र टाइपिंग नहीं जानतेलेकिन कम्प्यूटर पर काम करना चाहते हैंवे मन में किसी प्रकार की निराशा नहीं रखेंएक अंगुली से भी टाइपिंग का भरपूर मज़ा लिया जा सकता है। 

सोमवार, 26 सितंबर 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -23

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 23
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टावर वाली गली में उस समय गली के आरम्भ के किसी भी मकान के आसपास कोई नहीं था, ना ही उन मकानों के द्वार खुले हुए थे, लेकिन गली के पांचवें मकान का लोहे की सलाखों वाला मेन गेट खुला हुआ था और उसमें से एक गोरा-चिट्टा लम्बा और बेहद खूबसूरत नौजवान बाहर निकल रहा था।
मैं उसी मकान की ओर बढ़ गया। तभी मकान से दो और शख्स बाहर आये। एक कुछ छोटे कद का गेंहुए रंग का नौजवान था और दूसरा दबे सांवले रंग का औसत कद का नौजवान था, जो पहले नौजवान से कद में छोटा और दूसरे से बड़ा था।
मैं आगे बढ़ता हुआ उन तीनों अजनबियों के निकट पहुँचा और लम्बे और गोरे नौजवान से बोला-”यहाँ कोई कम्प्यूटर ठीक करने वाले रहते हैं?”
देवदत्त सर, हाँ, यही घर है।” लम्बा गोरा नौजवान बोला-”कोई काम है सर से....?”
मेरा कम्प्यूटर खराब हो गया है।”-  मैंने कहा। 
क्या गड़बड़ हुई है?”
*पता नहीं...। स्टार्ट नहीं हो रहा।” - मैंने कहा। 
कब से....?”

रविवार, 25 सितंबर 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 22

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 22
 प्रस्तुति- योगेश मित्तल
सुशील कुमार से मेरी पहली मुलाकात उत्तमनगर, नन्दराम पार्क के बी ब्लॉक क्षेत्र में रामगोपाल के यहाँ हुई थी, जहाँ उन दिनों राजभारती जी द्वारा आरम्भ की गई नयी अपराध पत्रिका 'अपराध कथाएँ'  तथा माया पाकेट बुक्स में रजत राजवंशी नाम से प्रकाशित होने वाला पहला उपन्यास 'रिवाल्वर का मिज़ाज' कम्प्यूटर पर टाइप हो रहा था। 
रामगोपाल और उसकी पत्नी निशा दोनों ही सरकारी नौकरी में थे। उनके दो लड़के थे। उत्तमनगर में ही अपना मकान भी था, लेकिन रामगोपाल ने साइड बिजनेस के रूप में किसी भाई या अन्य के तीसरे नाम से कम्प्यूटर टाइपिंग और प्रिन्ट आउट का काम कर रखा था। 
       रामगोपाल के मकान में बाहर सामने खड़े व्यक्ति के हिसाब से बायीं ओर अन्दर जाने का लोहे की सलाखों का बड़ा और ऊंचा गेट था और दायीं ओर एक आम दरवाजों सा दरवाजा था, जो उस बाहरी कमरे का द्वार था, जिसमें तीन ब्लैक एण्ड व्हाइट मानीटर वाले फोर एट सिक्स कम्प्यूटर लगे थे। प्रिन्टर एक ही था। 
        जब हमने रामगोपाल के यहाँ काम आरम्भ करवाया था, तब तीन में से एक ही कम्प्यूटर पर एक भारी बदन की बहुत ही भले स्वभाव की लड़की उषा ही दिन भर टाइपिंग करती थी। शाम को जब रामगोपाल आफिस से लौटता तो टाइप्ड मैटर के पढ़े गये प्रूफ देखकर करेक्शन लगाने का काम वह स्वयं करता था। बाद में उषा की शादी तय हो गयी तो उसने काम छोड़ दिया और तब रामगोपाल के यहाँ कम्प्यूटर सीखने तीन लड़कियाँ आने लगी। एक मीना तो सामने ही रहने वाली जाट या गुर्जर लड़की थी, बाकी दोनों गढवाली लड़कियाँ आशा और कुसुम थीं। उन लड़कियों के आने के बाद रामगोपाल के यहाँ काम बहुत बढ़ गया। सीखने आई लड़कियाँ टाइपिंग भी करने लगीं थीं और रामगोपाल उनसे सिखाने के पैसे लेने की जगह काम करने के पैसे देने लगा था, लेकिन तब कम्प्यूटर जल्दी-जल्दी खराब होने लगे।  

शनिवार, 18 जून 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -21

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी -21
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

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उसके बाद हमारे बीच पारिवारिक बातें होती रही। उन्हीं बातों के बीच एक बार चाय और आ गई, लेकिन इस बार चाय के साथ नमकीन और बिस्कुट भी थे। हम चाय खत्म भी नहीं कर पाये थे कि घर में बने पकौड़े आ गये। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरे सामने वेद ने पकौड़ों का कोई आदेश नहीं दिया था।
यह पहला अवसर नहीं था, इससे पहले भी और बाद में भी अनेक अवसर ऐसे आये, जब वेद के यहाँ अपनेपन का गहरा स्पर्श मैंने महसूस किया। वेद की मेहमाननवाजी और सत्कार ने हर बार मेरे दिल में उसका कद पहले से अधिक ऊंचा किया था।
चाय नाश्ते के बाद वेद ने फिर कहा -"तो फिर नावल कब से शुरू करेगा?"
"फिलहाल दस-पन्द्रह दिन तो तुम्हारे विजय विकास सीरीज़ के उपन्यास पढ़ने में लगाऊँगा, उसके बाद ही टाइपिंग आरम्भ करूँगा।" मैंने कहा! 
"टाइपिंग...?" - वेद चौंक गया -"टाइपराइटर ले लिया है तूने?"
"नहीं, एक सेकेण्ड हैण्ड फोर एट सिक्स ले लिया है, आजकल उसी पर टाइपिंग करता हूँ।"
"फोर एट सिक्स...?"
"कम्प्यूटर...।"
"तूने कम्प्यूटर ले लिया...?"-  वेद ने आश्चर्य व्यक्त किया।

बुधवार, 18 मई 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -20

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की -20
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
   लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में योगेश मित्तल जी एक चर्चित नाम है। उनका लेखकों और प्रकाशकों से घनिष्ठ संबंध रहा है, वे लेखक-प्रकाशक दिल्ली के हो या मेरठ के योगेश जी का सभी के साथ अपनत्व रहा है। योगेश जी ने स्वयं के नाम के साथ-साथ अनेक नामों से Ghost writing भी की है। सद्य प्रकाशित इनकी रचना 'प्रेत लेखन का नंगा सच' में इन्होंने प्रेत लेखन कॆ विषय में बहुत कुछ लिखा है। 
    शीघ्र ही इनकी एक और रचना प्रकाशित हो रही है जो उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा जी के जीवन से संबंधित है।
उसके बाद मैं अगले दो दिन ईश्वरपुरी के किसी भी प्रकाशक के यहाँ नहीं गया। 
देवीनगर गया था, वहाँ सतीश जैन उर्फ मामा ने कुछ पुराने आठ नौ फार्म के सामाजिक उपन्यास दिये, जो घोस्ट नामों से छपे हुए थे। उनमें तीन चार फार्म का मैटर बढ़ाना था। तरीका सतीश जैन ने यह बताया कि लगभग आठ पेज का मैटर उपन्यास के स्टार्टिंग में बढ़ाना है और इतने ही पेज आखिर में। उपन्यास का अन्त बेशक बदल जाये, उसकी कोई चिन्ता नहीं। बाकी बीच में जितने भी चैप्टर हैं, सबकी स्टार्टिंग दो तीन लाइन बदल देनी है या नयी एडजस्ट करनी है। 
             उपन्यास के मुख्य पात्रों के नाम सतीश जैन ने स्वयं ही पहले से काट-पीट करके बदल रखे थे। उपन्यास  का नाम भी कोई नया ही रखना था।
                   मतलब समझ गये आप...! एक पुराना उपन्यास, जो अच्छा रहा हो या बकवास... योगेश मित्तल का हाथ लगने के बाद एक नये नाम से बिल्कुल नये उपन्यास के रूप में पाठकों के हाथ में जाना था और लेखक को यानि मुझे नया उपन्यास लिखने के पारिश्रमिक से आधा ही पारिश्रमिक मिलना था और प्रकाशक के पास एक नया उपन्यास तैयार हो जाना था।  ऐसे कामों में मुझसे ज्यादा सिद्धहस्त उस दौर में दूसरा कोई भी लेखक नहीं था। यह मैं या मेरा अहंकार नहीं कह रहा है - यह शब्द उन दिनों लक्ष्मी पाकेट बुक्स के सर्वेसर्वा सतीश जैन के थे। इसका एक कारण यह भी था कि उन दिनों ज्यादातर लेखक अपनी दाल-रोटी के लिये लिखते थे और उनके लिखने का रूटीन रोज नियम से कुछ घण्टे लिखने का था, जबकि मेरे लिखने का न तो कोई टाइम होता था, ना ही मूड। जब पैन उठाया - काम शुरू। 
                       चौबीस घण्टों में किसी भी घण्टे मैं बिना किसी प्लानिंग के, बिना कुछ सोचे हुए भी कलम उठा लेता था तो दिमाग की बत्ती तुरन्त जल जाती थी और पैन फुल स्पीड से दौड़ने लगता था और यह खूबी अब भी मुझ में बरकरार है, यह और बात है कि इस खूबी का मैं अपने जीवन में माकूल फायदा नहीं उठा सका। 

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 19

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 19
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

         
नूतन पाकेट बुक्स का ऑफिस उस समय खुला हुआ था। सुमत प्रसाद जैन अपनी सीट पर बिराजमान थे। एक कोने में एक वर्कर कुछ बण्डल पैक कर रहा था। 
सुमत प्रसाद जैन ने जब सामने से मुझे गुजरते देखा तो एकदम आवाज लगाई -"योगेश ।"
मैं रुकामुड़ाफिर पलटकर नूतन पाकेट बुक्स के ऑफिस में प्रविष्ट हो गया। 
"चाय पियेगा..?" सुमत प्रसाद जैन ने पूछा। 
"नहीं... ऐसी कोई तलब नहीं है।"-  मैंने कहा तो सुमत प्रसाद जैन बड़ी आत्मीयता से बोले -"कर दी न दिल तोड़ने वाली बात। दिन भर में बीस कप चाय पीने वाला योगेश मित्तल हमें चाय को मना कर रहा है। अबे यारबड़ी देर से मेरा चाय पीने का मूड कर रहा थालेकिन अकेले पीने का मन नहीं हो रहा थाइसीलिये तो तुझे देखकर आवाज दी।"
"ठीक हैमंगा लीजिये।" - मैं हंसते हुए बोला। 
                           तो जनाब यह भी नूतन पाकेट बुक्स और सूर्या पाकेट बुक्स के संस्थापक सुमत प्रसाद जैन का एक मूडी अन्दाज़ थाजिसकी जितनी तारीफ की जायेकम है। मूड होने पर भी सिर्फ इसलिये चाय नहीं पी रहे थेक्योंकि उस समय अकेले पीने का मूड नहीं था और गुफ्तगू करने वाला कोई साथी नज़र नहीं आ रहा था। 
              मेरे 'हाँकरते ही सुमत प्रसाद जैन पैकिंग में लगे वर्कर से बोले -"जा बेटागिरधारी के यहाँ चाय बोल देतूने भी पीनी हो तो तीन चाय बोल देइयो।"

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की – 18

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की – 18
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

ताला तेरा नहीं हैयह क्या बात हुई?” - वेद ने चकित होकर कहा।
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थी
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थीलेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहतासामने की गैलरी में आ खड़े हुएजयन्ती प्रसाद सिंघल जी बुलन्द और रौबदार आवाज कानों में पड़ी –“अबे तू जिन्दा हैमैं तो  समझामर-खप गया  होगा। सदियाँ बीत गईं तुझे देखे।”
सदियाँ....।”- मैं और वेद दोनों जयन्ती प्रसाद सिंघल के इस शब्द पर मुस्कुरायेतभी जयन्ती प्रसाद सिंघल जी का खुशी से सराबोर स्वर उभरा -”अरे वेद जीआप भी आये हैंइस नमूने के साथ। धन्य भाग हमारे। आये हैं तो जरा हमारी कुटिया भी तो पवित्र कर दीजिये।” 
                                       जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थी
                                       जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थीजयन्ती प्रसाद सिंघल जी ने दूसरी भी खोल दीफिर स्वयं टेबल के पीछे बांस की कुर्सी पर विराजे और हमसे बैठने का अनुरोध किया। 
वेद और मैं बैठ गयेपर बैठते-बैठते वेद ने कह ही दिया - “मैं तो यहाँ योगेश जी कमरा देखने आया थापर यहाँ तो दिक्खै आपने अपना ताला लगा रखा है।”
इसका ताला तोड़ करअपना न लगाता तो और क्या करतादस महीने में तो यह कमरा भूतों का डेरा हो जाता। हम सारे घर की रोज सफाई करवावैं हैंलेकिन...।”
दस महीने कहाँ हुए अभी...।”- तभी मैंने जयन्ती प्रसाद सिंघल जी की बात काटते हुए कहा।
वह बोले –“हिसाब लगाना आवै है या सिर्फ कागज़ काले करना ही जानै है?”

रविवार, 10 अप्रैल 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17
 प्रस्तुति- योगेश मित्तल
मैं सतीश जैन के सामने था।
“तुम पागल हो?- सतीश जैन ने कहा।
वो तो मैं हूँ....पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है?” मैंने बेहद शान्ति से सवाल किया। 
तुम यारइसे जानते कितना हो?” - सतीश जैन का स्वर अभी भी गर्म था। 
इसे... किसे...?”- समझते हुए भी मैंने पूछा। 
इसी को...रामअवतार को....?”
नहीं जानता...।” -मैंने स्वीकार किया -”आपके यहाँ ही मिला हूँ।”
अरे मैं नहीं जानता उसे..। उसके घर के लोगों को...। कैसा आदमी हैकैसा परिवार हैऔर तुम.... तुम्हें उसने एक बार कहा और तुम उसके यहाँ खाने पहुँच गये। यार ये कोई तुक है। अक्ल-वक्ल कुछ है तुममें या दिमाग से एकदम पैदल होजितने का तुमने खाना नहीं खाया होगाउससे ज्यादा तो तुमने किराया खर्च कर दिया। कितना किराया खर्चा?”
साठ रुपये....।” - मैंने धीरे से कहा -"तीस जाने के...तीस आने के।”
इससे कम मेंतुम यहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठकर उससे अच्छा खाना खा सकते थेजैसा वहाँ खाया होगा।”
हाँखाना बेशक ज्यादा अच्छा खा सकता थालेकिन रेस्टोरेंट में वो माहौल... ।”
तुम यार बिल्कुल बेवकूफ हो। ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे के यहाँ खाना खाने कैसे जा सकते हो। तुम जासूसी उपन्यास लिखते होतुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे साथ कुछ ऊंच-नीच भी घट सकता है।”
टेन्शन मत लो यार...। कुछ हुआ तो नहीं। रामअवतार जी बहुत सिम्पल आदमी हैं।” - मैंने सतीश जैन को समझाना चाहापर उनका मूड सही नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे द्वारा रामअवतार जी के यहाँ खाना खाने से खफा हैं या मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया इसलियेपर सतीश जैन ने कुछ जाहिर नहीं किया। मुझसे ठीक से बात किये बिना ही वह ऑफिस की ओर पलट गये। मैं भी सतीश जैन के पीछे पीछे ऑफिस में दाखिल हुआ। 
       सतीश जैन कीऑफिस टेबल के अपोजिट बिछी फोल्डिंग चेयर पर बैठते हुए मैंने यूँ ही सवाल किया –“कितने दिन का टूर है?”
कम से कम दो हफ्ते तो लगेंगे ही।” सतीश जैन ने कहापर उनकी आवाज़ में अभी भी जो तल्खी थीमुझे समझ में आ गया कि उनका मूड अभी भी सही नहीं है। 

रविवार, 3 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

प्रस्तुति- योगेश‌ मित्तल

मेरे द्वारा काम करने के बाद वो पुराना उपन्यास इतना नया हो जाता था कि जिस किसी ने भी पहले पढ़ भी रखा हो, उसे पढ़ा-पढ़ा सा बेशक लगे, पर उसे आसानी से पता नहीं चल सकता था कि यह उपन्यास कहाँ पढ़ा है। इसका कारण यह भी था, मुझसे काम करवाने के बाद सतीश जैन अक्सर अन्दर के कुछ पात्रों के नाम स्वयं बदल देते थे या किसी से बदलवा देते थे और पुराना घिसा पिटा उपन्यास नया हो जाता था। 

एक तरह से यह पाठकों से चीटिंग थी और इस चीटिंग में प्रकाशक का साथ देने वाला शख्स आपका अपना योगेश मित्तल था, जिसे कि प्रकाशक सबसे ईमानदार और सच्चा लेखक मानते थे और कहते भी थे। 

पर तब मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। 

मेरी सोच बस, यह थी कि मैं लेखक हूँ और मुझे लिखने का जो भी काम मिल रहा है, करना चाहिए और फिर मुझे अपनी बीमारी की वजह से हर समय पैसों की जरूरत रहती थी। दवाएँ और डाक्टरी इलाज, उस समय की कमाई के हिसाब से बहुत मंहगा पड़ता था। मेरा सोचना यह भी होता था कि मैं यदि घर खर्च के लिए घर के लोगों की बहुत मदद न भी करवाऊँ, कम से कम अपनी बीमारी, अपने इलाज के खर्च का बोझ तो घर पर न डालूँ। 

सतीश जैन ने दूसरा जो उपन्यास मुझे दिया, वह विक्रान्त सीरीज़ का ही था। 

मैंने दोनों लिफाफे थामते हुए पूछा - “कब तक चाहिये?”

इस बार कोई जल्दी नहीं है।” - सतीश जैन बोले -”बेशक आप दिल्ली ले जाओ। जब चक्कर लगे, तब दे जाना। स्पेशली आने की जरूरत नहीं है।”

यह मेरे लिए घोर अचरज़ की बात थी। सतीश जैन के लिए मैं जब से काम कर रहा था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था।

ठीक है, फिर मैं अभी चलूँ।”-  मैंने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, लेकिन उठा नहीं। 

रविवार, 27 मार्च 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 15

यादें वेद पकाश शर्मा जी की - 15
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

क्या काम कराना होगा?” - पूछते हुए मेरे चेहरे पर वही मुहब्बत भरी मुस्कान उभर आई, जिसे आपने मेरे रजत राजवंशी नाम से छपे कुछ उपन्यासों की तस्वीरों तथा फेसबुक की तस्वीरों में देखा है। 
वेद भाई ने बड़े रहस्यमय अन्दाज़ में चेहरा आगे किया और धीरे से पूछा –“बता दूँ...?”
हाँ...हाँ...बताओ।” - मैं भी कुछ मज़े लेने वाले मूड में आ गया था। 
तो सुन...मामा... एस. पी. साहब से नूतन पॉकेट बुक्स में छपे कुछ पुराने-सुराने उपन्यास विक्रांत और विजय सीरीज़ के फ्री में लाया होगा, उन्हीं को कवर-सवर फाड़ के योगेश मित्तल के सामने फेंकेगा, ताकि योगेश मित्तल को पता न चले, यह उपन्यास पहले कहाँ छपे हैं, फिर योगेश मित्तल से कहेगा कि यार, इसमें आधा-आधा फार्म शुरू और आखिर में बढ़ा दो और हर चैप्टर की शुरू और आखिर के तीन-तीन चार-चार लाइन चेन्ज कर दो।”
वेदप्रकाश शर्मा
हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 

हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 
किसी और से भी ले सकै है, प्रभात पॉकेट बुक्स से भी ले सकै है। तिलक चन्द जी के भी पांव पकड़ सकै है, पर एस. पी. साहब का नाम मैंने इसलिए लिया है, क्योंकि मेरा ख्याल है - एस. पी. साहब से 'मामा' की कुछ ज्यादा ही पटती है।”
पटती है?”- मैं हँसा। 
वेद प्रकाश शर्मा के चेहरे पर भी हँसी आ गई, एकदम ही वह बोले - “तू कहीं गलत तो नहीं समझ रहा  मैंने कहा - पटती है। 'फटती है' नहीं कहा है।”
नहीं, मैं गलत नहीं समझा।” मैंने 'पटती है' ही समझा है। तुम तो जानते ही हो, मैं आमिष  शब्दों का प्रयोग नहीं करता। उपन्यासों में बेशक किसी लफंट-लम्पट-मवाली के मुंह से नानवेजिटेरियन शब्द बुलवा दूं, व्यक्तिगत जीवन में खुद कभी इस्तेमाल नहीं करता।” 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 14

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 14
        प्रस्तुति योगेश मित्तल
"ऐसी क्या मुसीबत आ गई कि मुझे बुलाने के लिए आपको मेरठ आना पड़ा?" मैंने राजेन्द्र भूषण जैन से पूछा तो वह बोले -"मुझे क्या पता, मुझसे तो गौरीशंकर जी ने रिक्वेस्ट की थी कि जैन साहब, योगेश मेरठ में कहीं होगा, उसके घर पर पता करवाया था, दिल्ली में तो वह है नहीं। आप मेरठ जाकर उसे पकड़ कर लाओ, जो भी खर्चा होगा, आपको हम देंगे।"
वेदप्रकाश शर्मा
वेदप्रकाश शर्मा जी
"काम नहीं बताया उन्होंने।" - मैंने पूछा! 
"मैंने पूछा नहीं, उन्होंने बताया नहीं। पिछली बार राज कुमार गुप्ता जी ने भेजा था, तब भी हमने कोई सवाल नहीं किया था।" राजेन्द्र भूषण बोले।
मैं सोचने लगा, क्या करूँ? दिल्ली जाऊँ या नहीं?
     मेरठ की मेरी यादों में, दिल्ली से मुझे बुलाने के लिए प्रकाशकों द्वारा किसी को मेरठ भेजने की घटनाएँ तीन बार हुई है। दो बार मनोज पाकेट बुक्स से - एक बार राजकुमार गुप्ता द्वारा तथा एक बार गौरीशंकर गुप्ता द्वारा राजेन्द्र भूषण जैन को मेरठ भेजा गया और एक बार विजय पाकेट बुक्स का मैसेज लेकर टूरिंग एजेन्ट इन्द्र मेरठ आये थे।

शनिवार, 15 जनवरी 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 13

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 13
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"नहीं-नहीं, तुलसी का नम्बर तो हमेशा पहला रहेगा।"- मैंने वेद भाई की बात पर पुरजोर तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की। 
"रहने दे.... रहने दे....। लिखेगा तो तू... तब ना... जब ये दो-दो पेज वाले तुझे छोड़ेंगे"
"नहीं यार, अब की बार यह इल्लत नहीं पालनी...।" -मैंने वेद भाई को आश्वासन दिया। 
"तेरे कहने से क्या होता है, किसी ने सौ-दो सौ एडवांस दिये। दो चार चिकनी चुपड़ी बातें की तेरी छाती खुशी से फूल जायेगी कि तेरा कितना मान-सम्मान है।"
"नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होगा।"  
        इस बार वेद प्रकाश शर्मा ठहाका मार कर हंसे और सरलता छोड़ कुछ ड्रामेटिक अन्दाज़ में बोले - "ऐसा है भाई योगेश जी, तुम भी यहीं हो और मैने तो रहना ही यहीं है। छ: महीने का समय काफी रहेगा?"
"किस बात के लिए...?" - मैंने पूछा। 
"नॉवल शुरू करने के लिए... हमारे लिए नॉवल शुरू करने के लिए।"- वेद भाई ने हंसते हुए कहा - "भाई मेरे, कम्पलीट तो जभी होगा, जब शुरू होगा। ऐसा करियो... जब शुरू करै तो मेरे से सौ का नोट ले जाइयो, एक फार्म का मैटर दिखा के। और वो सौ का नोट समझ ले मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने के लिए होगा। उसका तेरे उपन्यास के मेहनताने से कोई मतलब नहीं होगा।"
मैं तुरन्त ही कुछ न कह सका। फिर कुछ देर बाद धीरे से बोला -"यार, इतनी खराब रेपुटेशन तो नहीं है।"
        वेद भाई फिर हंसे -"खराब....। रेपुटेशन...। भाई...यूँ बता, तेरी रेपुटेशन है कहाँ? बेपेंदी का लोटा है, जिधर नोटों की शक्ल दिखी, उधर ही लुढ़क गया। ऐसे कोई धन्धा होवै है।"
"यार, मैं धन्धा करता ही कहाँ हूँ।" - मैंने कहा -"मैं तो कलम का पुजारी हूँ।"

शनिवार, 8 जनवरी 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 12

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 12
प्रस्तुति- योगेश मित्तल          
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रिक्शा रुका तो मेरे उतरने से पहले ही सतीश जैन की आवाज़ आई - "हज़ार साल की उम्र है तुम्हारी। खूब ऐड़ियाँ रगड़-रगड़कर मरोगे ।"
"ठीक है, मैं वापस जाता हूँ ।"- मैं रिक्शे से उतरते-उतरते वापस रिक्शे में बैठ गया और बोला -"ईश्वरपुरी होकर आता हूँ । तब तक शटर बंद करके चले जाना ।" 
"अरे नहीं, रुको ।"- सतीश जैन तुरन्त अपनी कुर्सी से उठकर बाहर आ गए और रिक्शे वाले को धमकी देते हुए  बोले - "खबरदार, जो इस आदमी को यहां से कहीं लेकर गया ।"
मगर रिक्शेवाला भी कम नहीं था, बोला -'बाबूजी, हमें तो पईसा से मतलब है ।" फिर मेरी तरफ इशारा करके बोला -"ये बाबूजी, पईसा देंगे तो हम कहीं भी ले जाएंगे। आप हमको धमकी तो देओ ना।" 
सतीश जैन अपने असली अन्दाज़ में आ गये, रिक्शे वाले से बोले - "अरे नहीं यार, आपको हम धमकी नहीं दे रहे। आपसे तो रिक्वेस्ट कर रहे हैं, आप यह बताओ - किराया कितना हुआ।"
"बीस रुपये...।" - रिक्शे वाले ने वही बताया, जो मुझसे तय हुआ था। 

रविवार, 5 दिसंबर 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -11

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 11

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ऐश ट्रे मेरी पहुँच से दूर थी। वेद भाई जहाँ बैठे थे, उससे कुछ दूर बायीं ओर। 

ऐश ट्रे अपनी ओर खींचने के लिए मुझे कुर्सी से उठकर टेबल पर काफी आगे झुकना पड़ा। फिर मैंने ऐश ट्रे खींच कर, उसके कॉर्नर पर अपनी सिगरेट का टोटा रगड़ कर बुझाया और बुझा हुआ टोटा ऐश ट्रे में डाल दिया। 

फिर ऐश ट्रे पीछे सरकाकर मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। 

       उन दिनों शास्त्रीनगर में तुलसी पेपर बुक्स आरम्भ तो हो चुकी थी, लेकिन काम करने वाले लोग उतने नहीं थे, जितने बाद में धीरे धीरे बढ़ गये थे। फिर भी कुछ तो थे, लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने जो देखा, मुझे स्वामीपाड़ा का वेद भाई का वो घर याद आ गया, जहाँ बरसात में कई जगह से टपकती छत के नीचे परछत्ती में, हम दोनों ने साथ मिलकर कुछ पेज लिखे थे और साथ साथ खाना - खाया था। 

और अचानक ही वो दिन क्यों याद आ गया, यह तो मेरी समझ में नहीं आया, पर जब वेद भाई वापस ऑफिस आये तो उनके हाथों में दो शीशे के मग थे और मग में फलों का जूस...। 

बस, उस समय कुछ ऐसा लगा था, जैसे वक़्त अचानक बरसों पीछे चला गया हो। 

एक मग मेरी ओर बढ़ा कर वेद भाई ने कहा - "चाय तो तू पीवैगा नहीं, ले अब सेहत बना।"

"चाय पीने के लिए मैंने कब मना किया।" मैं जूस का मग अपने होंठों की तरफ बढ़ाते हुए बोला -"अभी जूस पीते हैं। थोड़ी देर बाद चाय पियेंगे।"

“चाय क्या, खाना खिलावैंगे यार...। पहले जूस तो पी...।"- वेद भाई ने कहा और मग होंठों से लगा लिया। 

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
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 दिल्ली में जो लोग रहते हैं, कहीं भी घूम फिर आयें, चैन की सांस, मानों दिल्ली में ही मिलती है। 
वैसे तो यह हर शहर में रहने वाले, अपने शहर के लिए महसूस करते हों, पर दिल्ली वालों की बात कुछ और ही है। 
दिल्ली के साथ बहुत सी बातें जुड़ जाती हैं। जैसे - 
दिल्ली है दिल वालों की। 
अब दिल्ली दूर नहीं। 
दिल्ली दिल है हिन्दुस्तान का। 
और
        दिल बड़ा है दिल्ली का, किसी भी गाँव, शहर, प्रान्त, देश का व्यक्ति दिल्ली आता है तो दिल्ली का होकर रह जाता है। 
बहुत से आक्रांता आये दिल्ली और बार-बार आये। कुछ दिल्ली को लूटकर चले गये तो कुछ यहीं के हो गये। 
हम जब कलकत्ता (आज का कोलकाता) रहते थे, दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर कलकत्ता ही लगता था। वहाँ बोटानिकल गार्डेन के विशाल बरगद की छांव में हवाओं के झोंके मन प्रसन्न कर देते थे तो धर्मतल्ला और उसके आस-पास फुटबॉल क्लबों के मैदान एक जुनून सा पैदा कर देते थे और दक्षिणेश्वर, ताड़केश्वर, काली मंदिर, हुगली नदी, डायमंड हार्बर तथा कलकत्ते का कोना-कोना दिल से नहीं, रोम-रोम से जुड़ा लगता था और हम कलकत्ते से बाहर के अपने रिश्तेदारों को 'कलकत्ते' के बारे में यह सब बताते हुए बड़ा गर्व महसूस करते थे कि कलकत्ते में 'कलकत्ता' नाम का तो कोई रेलवे स्टेशन ही नहीं है। एक रेलवे स्टेशन है 'हावड़ा' और दूसरा रेलवे स्टेशन है -'सियालदह' और हवाई अड्डा है - 'दमदम।

शनिवार, 27 नवंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 9

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 09

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मेरा स्टैण्ड अब भी वही है, जो पहले था।” वेद भाई ने कहा - “मैं अब भी ट्रेडमार्क के सख्त खिलाफ हूँ, मगर ऐसा कोई लेखक नज़र तो आवै, जिसे पढ़ते ही लगे कि बस, इसे चांस मिलना जरूरी है। यह जरूर तहलका मचायेगा।”

यार, किसी को चांस मिलेगा, तभी न वह तहलका मचायेगा।” - मैंने कहा। 

तो ठीक है, मैं तुझे दे रहा हूँ चांस। बोल - लिखेगा?”

मेरी बात और है।” मैंने कहा - “मैं बहुत ज्यादा सेक्रीफाइस करने की स्थिति में नहीं हूँ।”

सेक्रीफाइस किस बात का... कौन सेक्रीफाइस करने के लिए कह रहा है?”  वेद ने कहा - “तू बता, क्या लेगा - एक उपन्यास के?”

कम से कम एक हज़ार तो मिलना ही चाहिए...।” मैंने झिझकते-झिझकते कहा। 

मैं दो हज़ार दूंगा...। बोल, कब दे रहा है उपन्यास...?”

मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम। वेद से ऐसी किसी बात की मैंने कल्पना तक नहीं की थी। 

चुप क्यों है...। बता कब दे रहा है उपन्यास...। मुझे हर महीने एक चाहिए...। और तेरी पहली किताब तब छापूंगा, जब तेरे तीन उपन्यास मेरे पास हो जायेंगे।”

            “फिर तो अभी काफी लम्बा इन्तजार करना पड़ेगा।” मैं गम्भीर होकर बोला-”आज तो मैं दिल्ली जाने की सोच रहा हूँ। खेल-खिलाड़ी का काम लटका होगा, जाते ही कम्पलीट करना होगा और कुछ और प्रकाशक भी अपनी पत्रिकाओं का काम मुझसे ही करवाते हैं।”

ठीक है। यह फैसला तो तूने करना है कि कब किसका क्या काम करना है। पर याद रहे, मैं तुझे चांस दे रहा हूँ, पर यह चांस हरएक को नहीं दे सकता।”

क्यों भला...?” मैंने पूछा।  

देख योगेश, लिखने वाले बहुत हैं, पर लिख क्या रहे हैं, यह जानने से पहले यह समझ कि लिख कैसे रहे हैं।”

कैसे लिख रहे हैं..?” मैंने पूछा। 

रविवार, 21 नवंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 08

 कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 8

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रॉयल पाकेट बुक्स की बाहरी बैठक को अपना ठिकाना बनाने के बाद मुझे सबसे पहले उन्हीं का काम पूरा करना चाहिए था, पर उन्होंने काम पूरा करने के लिए एक हफ्ते का वक़्त दिया था, इसलिये मैं निश्चिन्त तो था, पर दिमाग में यही था कि सबसे पहले अपने लैण्डलॉर्ड का काम ही पूरा किया जाये, लेकिन सुबह दस बजे के करीब गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे।   


मैंने रायल पाकेट बुक्स की उन किताबों में से एक किताब सामने रखी हुई थी और उसे पढ़ रहा था, कहानी बढ़ाने का काम बिना पढ़े तो हो ही नहीं सकता था। हालांकि मुझे दो बार ऐसा दुर्लभ कार्य भी करना पड़ा था, जब विमल पॉकेट बुक्स, में प्रकाशित होने वाले उपन्यास `कलंकिनी` के अन्तिम सोलह पेज कहानी पढ़े बिना ही लिखने पड़े थे और एक बार हरीश पॉकेट बुक्स (राज पॉकेट बुक्स की एक अन्य संस्था) में प्रकाशित हो रहे एस. सी. बेदी के एक उपन्यास का अन्त उपन्यास पढ़े बिना लिखना पड़ा था। पर वो किस्सा फिर कभी...। 

मेरठ के प्रकाशकों में तो लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन उर्फ मामा ने मैटर बढ़ाने-घटाने में मुझे Best होने तक का तमगा दे दिया था और उन्हीं की यह कारस्तानी या करिश्मा था कि ईश्वरपुरी के प्रकाशकों में भी मेरी चर्चा फैल गई थी। 

फिर मेरे बारे में एक यह बात भी सतीश जैन ने फैला दी थी कि योगेश मित्तल से तो जो चाहे काम करवा लो, न पैसे के लिए हुज्जत करता है, ना ही मना करता है और यह मशहूरी गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन तक भी पहुँच चुकी थी। 

रॉयल पाकेट बुक्स का किरायेदार होने के सबसे पहले ही दिन सुबह सुबह सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे, तब तक मैंने किसी भी प्रकाशक को अपने वहाँ रहने के बारे में बताया तक नहीं था, इसलिये सुशील जैन को देख, एकदम हक्का-बक्का हो उठा। 

“आप यहाँ कैसे....? यहाँ के बारे में तो मैंने अभी किसी से कोई चर्चा भी नहीं की।" -मैंने अचरज से कहा तो बड़ी मीठी मुस्कान छिड़कते हुए सुशील जैन बोले - "दिल्ली का कोई लेखक मेरठ में हो और हमें पता न चले, यह तो हो ही नहीं सकता। हमारे जासूस कदम-कदम पर फैले हुए हैं। फिर यह तो ईश्वरपुरी से ईश्वरपुरी का मामला है। हमारी नाक के नीचे रहकर भी तू हमारी नज़रों से छिप जायेगा, ऐसा तो तुझे सोचना भी नहीं चाहिए।" 

अपनी बात कहते-कहते सुशील जैन मेरे पलंग पर मेरे करीब बैठ गये। 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की-07

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की-07
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लक्ष्मी पाकेट बुक्स की किताबों की कम्पोजिंग और प्रिन्टिंग करने वाले एक शख्स का मकान और कम्पोजिंग एजेन्सी और प्रिन्टिंग प्रेस बाहरी मेरठ के कंकरखेड़ा क्षेत्र में थी! 
अचानक ही एक दिन मेरे दिल में आया कि जब मैं लगातार मेरठ में ही रह रहा हूँ तो मुझे वहीं कहीं एक कमरा ले लेना चाहिए! 
लक्ष्मी पाकेट बुक्स के उन दिनों के स्वामी सतीश जैन उर्फ मामा से मैंने इस बात का जिक्र किया! उस समय वह कंकरखेड़ा वाले प्रेस वाले वहीं थे! ( उनका नाम आज याद नहीं है! सहूलियत के लिए हम 'राजनाथ जी' कहेंगे!) 

बातचीत में शामिल होते हुए उन्होंने पूछा - "शहर से थोड़ा दूर...चल जायेगा?"
"चल जायेगा!" मैंने बिना सोचे समझे कह दिया! 
उनके पास एक मोपेड थी! वह उसी समय मुझे मोपेड पर बैठा कर कंकरखेड़ा ले गये! 
उन्हीं के मकान में एक कमरा था, जिसका एक दरवाजा बाहरी गली और एक मकान के अन्दर पड़ता था! 
लेट्रीन-बाथरूम सभी किरायेदारों के लिए एक ही था और पानी के लिए एक हैण्डपम्प था, जो मकान के अन्दर मेरे कमरे के बिल्कुल निकट ही था! 
जब मैंने कमरा देखा तो खास बात मैंने यही देखी थी कि उसका एक द्वार बाहर की गली में था, जिससे मुझे 'टैम-बेटैम' घर आने में भी कोई परेशानी नहीं होनी थी! 
बाहर से ताला, फिर दरवाजा खोला और अपने घर के अन्दर! 
मैंने कमरा किराए पर ले लिया! 
उन दिनों मैं कुछ नये प्रकाशकों के लिए विक्रांत सीरीज़ के उपन्यास लिख रहा था! 
उन दिनों बहुत से ऐसे प्रकाशकों के लिए भी लिखा, जिनसे दिली जुड़ाव कभी भी कुछ ज्यादा नहीं रहा! 
उनमें से ज्यादातर ऐसे प्रकाशन थे, जो जब शुरू हुए, तभी हम जैसे सभी लेखकों को यह पता चल गया था कि यह गाड़ी ज्यादा चलने वाली नहीं है, इसके कई कारण थे! वे सिर्फ नकली ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश काम्बोज और एच. इकबाल छापकर नोट छापना चाहते थे!
किसी अच्छे लेखक को उसके नाम से छापने में, उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। 

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