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सोमवार, 30 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की-05

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 05
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वेद जी ने 'विजय और केशव पंडित' का प्रूफ पढ़ा फार्म ओम जी की ओर बढ़ा दिया और 'शमा' काटकर 'समा' किये गये शब्द को दिखाकर बोले - "आप यह बताइये, इसमें क्या सही है? यहाँ 'शमा' आना चाहिए या 'समा'...?"
"समा आयेगा...!" -ओम जी ने सेकेण्ड की भी देरी किये बिना, मेरे द्वारा की गई करेक्शन स्वरूप लिखे गये 'समा' शब्द पर उंगली रख, तुरन्त ही जवाब दिया।
अगले ही पल जो हुआ, वह अप्रत्याशित था।
       एक झटके से वेद जी कुर्सी से उठे और टेबल पर आगे की ओर, मेरी तरफ झुकते हुए, उन्होंने अपना लम्बा हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया तथा मेरे सुकड़े और कोहनी से मुड़े हाथ को एकदम थाम, खींच कर तेजी से हिला दिया, फिर एक गोल्डन जुबली मुस्कान मेरे चेहरे पर फेंकते हुए बोले -"फिर तो बहुत अच्छा हुआ, मैंने तेरे से प्रूफ पढ़वा लिये, वरना ख्वामखाह गलती रह जाती!" 

       फिर सिर घुमा वेद जी ने सुरेश जैन जी को ओर देखा - "क्यों सही किया न योगेश को प्रूफ पकड़ा दिया..?"

सुरेश जी गर्दन हिलाकर मुस्कुराये। उस समय बोले कुछ नहीं। हालांकि बाद में ओम जी और मेरे साथ ढेरों बातों में वह भी खुलकर शामिल हुए।
दोस्तों, कुछ समझे...

बुधवार, 25 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -04

 कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की -

प्रस्तुति- योगेश मित्तल
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      मनोज पाकेट बुक्स में जब वेद भाई ने छपना आरम्भ किया, उसके बाद मनोज पाकेट बुक्स में मेरे बहुत ज्यादा चक्कर नहीं लगे।
पर एक बार जब वहाँ पहुँचा, संयोगवश उस समय वेद भाई भी वहीं मौजूद थे ऑफिस में उनके अलावा सिर्फ गौरीशंकर गुप्ता जी थे। 
मनोज पाकेट बुक्स और राज पाकेट बुक्स के ऑफिस जब तक शक़्तिनगर में रहे, दोनों जगह मैं खुद को VIP शख्सियत जैसा महसूस करता रहा था।
      मनोज पाकेट बुक्स में तो मेनगेट से कोठी में दाखिल होकर, सीधे ही बायीं ओर बेसमेंट में जाने वाली सीढ़ियाँ थीं, जहाँ बाहर कोई दरबान नहीं होता था। 
मैं धड़धड़ाता हुआ सीढ़ियों से नीचे उतर जाता और नीचे पहुँच जाता। सीढ़ियों के साथ गैलरी के दायें बायें केबिन थे। 

            दायीं ओर एकाउन्टेन्ट नवीन और प्रूफरीडर भूपेन्द्र के छोटे- छोटे केबिन थे, जबकि बायीं ओर थोड़ी खाली जगह, फिर एक बड़ा केबिन था, जिसका इन्ट्रेन्स डोर साइड में न होकर, नजरों के सामने ही पड़ता था। मैं हमेशा बिना किसी से कुछ पूछे इन्ट्रेन्स डोर खोल कर बॉस लोगों के केबिन में घुस जाता था। अन्दर घुसते ही इन्ट्रेन्स डोर वाली तरफ ही दो-तीन कुर्सियाँ रखी होती थीं, फिर एक लम्बी टेबल, जिसके पीछे केबिन की बैक दीवार से कुछ स्पेस रखती हुई, राजकुमार गुप्ता जी और गौरीशंकर गुप्ता जी की रिवाल्विंग कुर्सियाँ। 
     अग्रवाल मार्ग वाले मनोज पाकेट बुक्स के उस ऑफिस में मेरे अलावा भी सम्भवतः कुछ अन्य लोगों के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा अजनबी लोगों को एकाउन्टेन्ट नवीन ही एकदम रोक देता था। उसका केबिन इस तरह बना था कि सीढ़ियों से गैलरी तक उसकी तीक्ष्ण निगाह से किसी का भी बचना नामुमकिन था। मतलब साफ था कि नवीन की नजरों में आये बिना किसी का भी मनोज पाकेट बुक्स में आना-जाना असम्भव था।

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -03

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 03
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 02
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उन दिनों मैं मेरठ ही रह रहा था।
कभी देवीनगर में अपनी सबसे बड़ी बहन प्रतिमा जैन के यहाँ तो कभी हरीनगर के एक बहुत बड़े मकान के अलग-अलग पोर्शन में रहने वाले अपने चार मामाओं में से दूसरे नम्बर के मामाजी रामाकान्त गुप्ता जी के यहाँ या तीसरे नम्बर के मामाजी विजयकान्त गुप्ता के यहाँ सभी मामाओं के बच्चे मुझे सगे भाई जैसा मान और प्यार देते थे।
रामाकान्त मामाजी की पांचों बेटियों ने मुझे हमेशा सगे भाई जैसा मान और प्यार दिया है! उस समय बड़ी दो बेटियों संगीता और सविता का विवाह हो चुका था! छोटी तीनों बेटियों सरिता, अंजू और राखी के साथ अक्सर मैं लूडो या कैरमबोर्ड भी खेला करता था और कभी-कभी कोई कहानी भी सुनाता था, जबकि विजयकान्त मामाजी की बेटियाँ पूनम और नीलू तथा बेटे बबलू और टीनू मुझे देखते ही "भैया, कोई कहानी सुनाओ" की रट लगाकर घेर लेते थे।
रिश्तों और रिश्तेदारियों में उन दिनों बेपनाह और निस्वार्थ प्यार होता था और मुझे तो आज भी सभी से वही प्यार और सम्मान हासिल है। 
मामाजी का मकान ईश्वरपुरी की गली के तुरन्त बाद की गली का पहला ही मकान था। 
सुरेश जैन रितुराज
उस समय तक भारत में कामिक्स युग की शुरुआत हो चुकी थी और यहाँ पहली हंगामी शुरुआत करने का श्रेय 'एन. एस. धम्मी स्टुडियो' को जाता है, जिसका एक हिस्सा बालक हरविन्दर माँकड़ भी था, जो बाद में लोटपोट से जुड़ने के बाद कामिक्स जगत का सुपर स्टार बना।
        उस समय तक मैं नूतन कामिक्स, राज कामिक्स, मनोज कामिक्स और राधा कामिक्स के लिए अपना कुछ न कुछ योगदान दे चुका था। लेकिन यह किस्सा कामिक्स की दुनिया में फिर कभी....।
     आप सोचेंगे कि कामिक्स की दुनिया में एक नया आयाम लिखने वाले चचा चौधरी फेम के 'प्राण' का नाम न लेकर, मैंने एन. एस. धम्मी और हरविन्दर माँकड़ का जिक्र क्यों किया है तो सच्चाई और आँकड़ों के साथ इस विषय पर विस्तार से कामिक्स की दुनिया के कालम में लिखूँगा।

नये उपन्यास-2021,

शनिवार, 31 जुलाई 2021

कलाकार और मौत- पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'

 कलाकार और मौत - पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'

पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। 'जंजीर'(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था। 

    गत फरवरी के प्रथम सप्ताह में संवाद पढने को मिला कि एक अमरीकी उपन्यासकार और सुलेखक तथा उसकी परम सुंदर पत्नी की हत्या किसी ने रातो रात कर डाली। हत्या के पूर्व उन्हें निर्दयता से पीटा गया, फिर छुरे घुसेड़े गये और फिर गोली मारी गयी। जरा हिंसा का शृंगार, 'फिनिश' तो देखिये। 'वीभत्स' का कैसा विस्तार ! चित्रकार जैसे रंग-रंग से चित्र रगे, गवैया जैसे ढंग-ढंग तान पलेट लेकर संगीत सँवारे, कवि जैसे अक्षर, छंद, ध्वनि और रस से काव्य करे वैसी ही शांति, व्यवस्था और मनोयोग से हत्यारा हत्या भी करे! समाचार पढने के बाद मेरे मन में आया कि उस अमरीकी कलाकार की मृतात्मा से कभी भेंट होती तो मैं उससे पूछता कि जीवन में अधिक मजा था या मृत्यु में? यश में अधिक आनंद था या हंटरों से निर्दय पीटे जाने में? स्वार्थ और छुरे में से छाती की छलनी अधिक उन्माद से कौन करता है? खूबसूरत औरत और पिस्तौल की गोली में कितना फर्क है? उस अभागिनी सुंदरी से भी मैं जरूर पूछता कि रूप और मृत्यु में (ओ आर्या रूपवती शत्रु!) कोई भेद है भी?

  कुशवाहा कांत

     हिंदी कथा साहित्य से अगर आपका जरा भी संबंध है, तो आपने कुशवाहा कांत का नाम जरूर सुना होगा। यह दूसरी बात है कि आपने उक्त नाम अप्रसन्नता से सुना हो या प्रसन्नता से। 'उग्र गुरुड़म' में नहीं विश्वास करते बला से- यह लोग कुशवाहा कांत की 'उग्र स्कूल' का कलाकार मानते थे। हिंदी में फिलहाल मेरी नजरों में कमोबेश `उग्र स्कूल` का ही बोलबाला है। यद्यपि `उग्र` बीसियों  बरसों से नहीं के बराबर लिखते हैं। पर स्वयं मैं उसे अपने स्कूल के महज एक शाखा का विद्यार्थी मानता था। उस शाखा का नाम रख लीजिये `यौन सनसनी`। वर्तमान विश्व का बौद्धिक बाजार- खासकर दूसरे महायुद्ध के बाद- इसी सनसनी से सनक रहा है।  मगर पहले मुझे कुशवाहा कांत की खबर लेने दीजिये।

  कल और कलदार

मेर बातों का आप विश्वास करे तो मैंने अपनी रचनाओं में समाज को `ज्यो का त्यों` दर्शाने के फेर में `यौन सनसनी` को सजाया था, कलदार कमाने के लिये नहीं, पर दुर्याग्य से, `यौन सनसनी` चित्रण में-अपना सा मुहँ देखकर-बाजार के खरीददार चकाचक रस लेते हैं। रचनाओं की बिक्री तब ही होती है। पैसों की तो बरसात हो जाती है। एक बार मैंने ही कितने रुपये कमाये थे और कितने वक्त में। श्री ॠषभ जैन का उत्थान पर्व भी आपको भूला न होगा।  वैसे ही कुशवाहा कांत ने खूब रुपये कमाये। कहने वाले तो सैकड़ों हजार की कहानियां सुनाते हैं। मुझे इतना मालूम है कि एक दिन एक टाइप के पाठक काशी से कन्याकुमारी तक कुशवाहा कांत को हिंदी का श्रेष्ठ उपन्यासकार मानते थे? जब हिंदी के बिगड़े साहित्यिक  और  कलाकार उसको असफल, अश्लील कह रहे थे, तब वह बनारस में अपना बड़ा सा प्रेस खोलकर चौथाई मासिक पत्र और सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित कर,कलाकारों को हैरान और रोजगारों को परेशान कर रहा था।

 हत्या

       मनचले, रंगीले लेखक `उग्र` की साहित्यिक हत्या कर डाली गयी, इसे `उग्र` न भी माने, तो दुनिया मानती है। श्री ॠषभ चरण के दुःखद दर्शन सामने है। और कुशवाहा कांत की तो सचमुच हत्या ही की गयी थी। आने वाली होली के दिन उसकी तीसरी या चौथी मरण-तिथि पड़ेगी। वह `सफल बाजारू` किस तरह से मारा गया था, किस बुरी तरह मरा कि स्मरण पत्र से मेंरे तो रोंगेट खड़े हो जाते हैं। उस वर्ष की होली के आठ-दस दिन पूर्व, रात के वक्त कुशवाहा कांत के साथ आधे भड़ैत की तरह में बैठकर किसी ने उस पर अनेक घातक आक्रमण किये। सर में छुरा, सीने में छुरा, पेट में छुरा। फिर जख्म सोजन के बाद अस्पताल में डेढ हफ्ते तक पीड़ा और प्यास से तड़फता। फिर ऐन होली के दिन मरण।

 अरे ओ जाने वाले,

रुख से आँचल को हटा देना,

तुझे अपनी जवानी कि कसम।

औरत

आर्टिस्ट को धन जितना नहीं मारता, यश जितना नहीं, नशा भी नहीं, उसे बहुत आसानी से है औरत! इसलिये खूबसूरत स्त्री के कारण प्राण होने वाले कलाकारों की चर्चा में कुशवाहा कांत की याद आ गई। मालूम नहीं उसके मुकदमें में क्या प्रकाशित हुआ, क्या नहीं, पर जब  उसकी हत्या हुई  मैं कलकते में था तब यही अफवाह जोरों पर थी। धन, यश, नशा, औरत प्रतिभाशाली को वैसे ही सुलभ जैसे भूत साधनेवाले को भौतिक सुख। पर, आपने सुना होगा, भूत साधन प्रेत से प्राप्त चीजों का स्वयं उपयोग करते हुये मारे भय के काँपते हैं। प्रेत की कमाई खाने वाला प्रेत से मारा भी जाता है। फिर प्रतिभा बाजार में या विश्वविद्यालयों में तो बिकती-मिलती नहीं। यह तो ईश्वर की कृपा से मुफ्त मिलती है। और बाइबिल में लिखा है कि `अनायास मिली वस्तु का वितरण अमूल्य होना चाहिये।` किसी रंग का प्रतिभाशाली जब अपनी प्रतिभा से बाजारू लाभ उठाने लगता है तब नष्ट भी होने लग जाता है। प्रतिभा से नाजायज फायदा उठाना ही नहीं चाहिये। प्रतिभा की चाँदी बनाने वाले डाक्टरों का वश नहीं चलता, साधुओं का स्वर्ग नष्ट हो जाता है और कलाकार प्रतिभाहत ही नहीं पागल तक हो जाते हैं। `फ्लोबा`-फ्रांस के महान् लेखक ने जीवन से ऊबकर आत्महत्या को खूब माना था। यही गति श्रेष्ठ फ्रांसीसी कलाकार मोपासा की हुयी थी। अद्भुत इंग्लिश लेखक आस्कर वाइल्ड ने घोर अपमानजनक जेल जीवन भी भोगा सो तो दरकिनार, फ्रांस में जब वह मरा तो उसकी काया सड़ कर गल गयी थी। आस्कर वाइल्ड का शव कंधे पर उठाकर कब्रगाह ले  जाने वाले चंद चार नजदीकी यार मात्र थे और वर्षा हो रही थी धुँआधार, दुर्दिन, चारों तरफ अँधकार...अँधकार।

ताव और भाव

  वह मेरे ही बिहड़ मिर्जापुर जिले का अल्हड़ लेखक था-वही खुशवाहा कांत। वह अभी नौजवान था। गधापचीसी से महज चंद जूते आगे। भले मानसों की राय में वह बुरा लेखक था इसलिये नहीं कि वह यौवन सनसनी लिखता था बल्कि इसलिये कि वह बाजार में सफल था। कुशवाहा कांत के आगे-पीछे `यौन सनसनी` लेखक अनेक पर उन नामधारी भले आदमियों की नजर नहीं। सबकी आँखों का कांटा था वह। उसके मारे  जाने से बहुतों को खुशी भी हुयी हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। उसे अगर आदर देकर बढावा दिया गया होता तो संभव था वह `यौन सनसनी` से हटकर और भी उत्तम साहित्यिक मार्ग ग्रहण करता। पर, हमारे यहाँ ऐसी चाल नहीं।

     कुशवाहा कांत ने क्या बुरा किया था। किसकी गाय मारी थी उसने? वह उत्तेजक साहित्य लिखता था- यही न, हिंदी में कितने पाठक हैं, सारे भारत को बतलाइये। पहले यही बतलाइये कि सारे भारत में पढे-लिखे लोग ही कितने हैं? 15 प्रतिशत, उसमें कितने हिंदी जानते हैं? उनमें खरीदकर कितने पढने वाले हैं? मैं दावे  से कहता हूँ, आज का सत्ताधारी स्वदेशी राजनीतिक अपने दुष्ठ कर्मों से सारे भारत की जनता का जितना नुकसान कर रहा है, हिंदी का कोई भी साहित्यिक उसका पासंग भी नहीं कर सकता, फिर भी कुशवाहा कांत को बुरा करने वाले भले मानस ऐसे अनैतिक अधिकारियों से घृणा कर नहीं सकते। उलटे पापियों, जनलूटकों, भ्रष्टाचारियों को महिमान्, श्रीमान्, क्या-क्या नहीं करते हैं। फोटो छापते हैं, जीवनी छापते हैं, अभिनंदन ग्रंथ और  मानपत्र समर्पित करते हैं।

  मैं कहता हूँ आज के अनेक मिनिस्टर या डिप्लामेंट यदि मरने के पहले ही मार* न डाले गये तो मरते ही युग के स्मृति-पट से यूँ मिट जायेंगे जैसे जानवर विशेष के सिर से सींग गायब-कोई उसका  नामलेवा न रह जायेगा। पर कुशवाहा कांत के पाठक उसके मर जाने पर भी कम होने वाले नहीं। भले ही आप उसे किसी दर्जे का लेखक कहें और उन्हें किसी दर्जे का पाठक।

  फागुन के दिन चार

      उस दिन रंग नहीं था तो कुशवाहा कांत उपन्यासकार के कफन पर बाकी सारी विलासी रंग-रंगीली लाल रही-नीली पीली थी। उन्माद नहीं था तो उस मैखार की काया में बाकी सारा शहर उन्मत्त था। अस्सी से वरुणा तक, करुणा केवल कुशवाहा कांत की अर्थी के निकट, बाकी चारों ओर उल्लास, हास, विलास, रास। शहर में इतना जीवन था कि उस मुर्दे की सुधि जिगरी दोस्तों को भी न आई हो, तो आश्चर्य क्या। होली के रंगीन विशेषांकों में उसके लिये अखबार वाले  ब्लैक बार्डर लगाते भी तो क्योंकर। सो, जब उसकी उम्र वाले तरुण अपने प्रिय और प्रियतमों से गले लग रहे थे तब कुशवाहा कांत को चिंता पर सुलाकर जलाया जा रहा था।

कुशवाहा कांत
लो?

  बाजार जीतते वक्त औ जीत लेने के बाद भी अनेक बार पत्र लिख और पुस्तकें भेजकर उसने मुझे गुरु माना पर मेरा मुहँ सहज सीधा होने वाला कहाँ। कभी मैंने न तो उसके पत्रों का उत्तर दिया और न आशीर्वाद ही। मिर्जापुर का वह भी, मैं भी। मैं `मतवाला` निकालता था, वह `चिनगारी`। पर हमने न तो कभी एक दूसरे को देखा न बातें की। इतनी बातें आज मैं लिख रहा हूँ उसके मर जाने के तीन या चार साल बाद।

`समाज`

                                 पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र`

*भावुकता की बहस में कही पाठकगण गोड़से पंथ के अनुगामी न बन जाये।                                

 पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र` का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। `जंजीर`(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था। 

   

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

वंदना भारती

 नाम- वंदना भारती

    मलियाना से अभी तक तीन उपन्यासकारों का संबंध ज्ञात हुआ है। सुरेश साहिल, विनोद प्रभाकर और वंदना भारती।

इनमें से कौन मूलतः मलियाना (मेरठ) का था और कौन सिर्फ यहाँ से प्रकाशित हुआ यह अभी तक अज्ञात है।

      मलियाना की एक प्रकाशन संस्था थी 'श्यामा पॉकेट बुक्स' वहीं से वंदना भारती के उपन्यास प्रकाशन की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त कोई जानकारी उपलब्ध नहीं ।



विनोद प्रभाकर

 नाम- विनोद प्रभाकर

मेरठ उपन्यास लेखकों का केन्द्र रहा है। मेरठ जिला मुख्यालय ही नहीं वरन आसपास के क्षेत्रों से भी काफी उपन्यास लेखक सक्रिय थे।
    मेरठ के नजदीक शहर है मलियाना। वहीं के एक जासूसी उपन्यासकार थे विनोद प्रभाकर।
विनोद प्रभाकर के उपन्यास 'श्यामा पॉकेट बुक्स, मलियाना' से प्रकाशित हुये थे। 
       विनोद प्रभाकर के उपन्यास
  1. नहीं खुलेगा राज- 1990
  2. कत्ल के हिस्सेदार
  3. रात के शहंशाह
  4. महानायक
  5. जलाकर राख कर दूंगा
  6. अयोध्या का पापी
संपर्क -श्यामा पॉकेट बुक्स
          1252, मलियाना मेरठ
उक्त लेखक के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध हो तो हमसे शेयर करें।
Email- sahityadesh@gmail.com




मंगलवार, 27 जुलाई 2021

वह विनय प्रभाकर है और रामनारायण पासी भी- विजयशंकर चतुर्वेदी

काफी सयाना है तु। आज से दुश्मनी नहीं दोस्ती बनाना मांगता है। क्योंकि अपन भी तेरा भाई बंद है। फरक है तो दोनों के काम करने के स्टाइल में। तू तो खूब माथा-पच्ची करके प्लान बनाता है। लोगों के अपनी मिठी बातों के जाल में फसाकर ऐसा बेवकूफ बनाता है कारण तू आज तक पुलिस के हाथ नहीं लगा, बरोबर? जबकि अपन का स्टाइल एकदम शार्टकट है, चापर या तलवार या तमंचा दिखाया कि तुरंत सामने वाले का सारा माल अपन के पास, क्या?

    ये लाइनें हैं विनय प्रभाकर के जंगी उपन्यास `मौत आयेगी सात तालों में` की। रेल्वे स्टालों में देश भर के यात्रियों के मनोरंजन का साधन होते थे विनय प्रभाकर के ऐसे उपन्यास। जलजलाते संवाद, रहस्य-रोमांच से भरी कहानी और शब्दों के जादू में बांध लेने वाली पठनीयता विनय प्रभाकर की पूंजी है। विनय प्रभाकर चर्चगेट में  एमटीएनएल यानि महानगर टेलिफोन निगम लिमिटेड के कर्मचारी हैं। रेल्वे की इमारत में लाइनमैन का पद संभाल रहे हैं। लोअर परेल की सीबी गुलवाली चाल में रहते हैं। दस बाई बारह के कमरे में। पानी खोली के अंदर आता है, टेलिफोन पड़ोसी के सांझे में और संडास पूरी चाल के।

     सस्पेंस लिखने वाले विनय प्रभाकर के नाम के लेकर  भी कुछ कम सस्पेंस नहीं है। उनका असली नाम है रामनारायण पासी और वह देख चुके हैं उमर के अड़तीस वसंत। रामनारायण तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े हैं। वैसे तो उनका मुलुक उत्तर प्रदेश है। प्रतापगढ़ जिले का संगीपुल उनका गाँव है। लेकिन पढाई लिखाई मुंबई में होने और बचपन से लेकर जवानी यहीं बिताने के कारण यही अपना मुलुक लगने लगता है। छोटा भाई जगदीश तो अब गाँव लौट गया है, वरना वह भी पिता रामेश्वर के साथ इसी खोली में रहता और सायन के एक म्युनिसिपल स्कूल में पढता। खुद रामनारयण ने हाईस्कूल पास किया परेल की तुलसी मानस स्कूल से। पिता चिंचपोकली की अपोलो मिल में मुलाजिम थे। दस-बारह साल पहले रियायर होकर गाँव चले गये अपने पिता की सेवा करने। रामनारायण की दादी तो अभी-अभी गुजरी है, छह-सात माह पहले।

राकेश पाठक - उपन्यास पोस्टर

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के एक्शन लेखक राकेश पाठक जी के उपन्यासों के कुछ पोस्टर


राकेश पाठक जी के उपन्यास 'प्लास्टिक की बीवी' का एक पोस्टर


Rakesh pathak novel

Rakesh pathak novel

Rakesh pathak novel


सोमवार, 26 जुलाई 2021

कहानी विनय प्रभाकर की

वह विनय प्रभाकर भी है और रामनारायण पासी भी और मेरे पापा है- दीपक पासी
    लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में विनय प्रभाकर को एक छद्म लेखक के तौर पर जाना जाता है। लेनिक इस छद्म लेखक के पीछे एक चेहरा और है और वह चेहरा है रामनारायण पासी का। रामनारायण पासी जी ने विनय प्रभाकर के नाम से अधिकांश उपन्यास लिखे हैं और 'नाना पाटेकर' जैसा जीवंत किरदार उपन्यास साहित्य को दिया है। 
       रामनारायण पासी के सुपुत्र दीपक पासी से जाने उनके बारे में।
      एक समय था जब मनोरंजन का मुख्य साधन था उपन्यास ।वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे कई उपन्यास लेखक उस समय एक स्टार थे।
इन्हीं में से एक थे विनय प्रभाकर। विनय प्रभाकर द्वारा लिखे उपन्यास की काफ़ी माँग थी। बहुत से लोग उन्हें पढ़ा करते थे।
बहुत कम लोगों को पता है विनय प्रभाकर  के नाम से लिखने वाले अधिकतर उपन्यास श्री राम नारायण पासी जी  ने लिखा था। विनय प्रभाकर की मेजर  नाना पाटेकर सीरीज के तो सारे उपन्यास रामनारायण पासी जी ने ही लिखा थे।
    बहुत कम लोगों को पता है और मैंने भी कभी पब्लिक प्लेटफ़ोरम पर इसका ज़िक्र नहीं किया की विनय प्रभाकर के नाम से उपन्यास लिखने वाले रामनारायण पासी जी मेरे पिताजी है। 
   रामनारायण पासी/ विनय प्रभाकर
विनय प्रभाकर के नाम से तक़रीबन सभी उपन्यास पापा ने ही लिखे थे। इसके अलावा कुछ उपन्यास अर्जुन पंडित और दूसरों के नाम से भी लिखे थे। थ्रिलर और सस्पेंस  के साथ साथ  प्रकाशक जो भी विषय कहते हर उस  सब्जेक्ट पर लिखने में महारत हासिल थी पापा को। 

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...