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शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा- 07

 मैं आवारा, इक बनजारा- भाग-07
अशोक कुमार शर्मा, आत्मकथा

मैं देहली हाफ पैंट इसलिए पहनकर गया था, क्योंकि उन दिनों मेरे पास फुल पैंट नहीं था।
इसकी वजह ये नहीं थी कि मेरा परिवार बहुत ही गरीब था, बल्कि वजह ये थी कि मैं बहुत ही पतला -  दुबला और छोटी कद - काठी वाला एक कमजोर सा लड़का था और उन दिनों के चलन के मुताबिक मुझे हाफ पैंट ही सिलवाकर दिए जाते थे ।
यह यात्रा घरवालों से छुपकर की गई थी और इस यात्रा के खर्च के लिए मेरे पास एक फूटी कोड़ी भी नहीं थी, इसलिए मां से रो - धोकर मैंने 100 रुपए ऐंठ लिए थे, पर ये रकम देहली के खर्च के लिए पर्याप्त नहीं थी, इसलिए बाकी का यात्रा खर्च जुटाने के लिए मैंने अपने बड़े भाई साहब के बटुए पर हाथ साफ कर दिया।
     करीब पचास साठ रुपए तो चुराए ही होंगे, पर इस चोरी की खबर उन्हे आज तक भी नहीं है। 
इस प्रकार मेरे इस शौक ने मुझे झूठ बोलने के साथ - साथ चोरी करना भी सिखा दिया था, पर दोस्तों ! यकीन मानिए। स्वभाव से आज भी मैं झूठा और चोर नहीं हूँ।
बस मेरी आकांक्षा और मजबूरी ने बचपन में मुझसे ये दो नीच कार्य करवा दिए, जिनका मलाल मुझे आज भी है।
मुझे ये अच्छी तरह याद है कि उन दिनों सीकर से देहली का ट्रेन  किराया मात्र 28 रुपए ही था।
एक रात आठ बजे मैं एक जनरल डिब्बे में बैठकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया। 

बुधवार, 30 जून 2021

उपन्यास साहित्य और मेरठ - प्रवीण जैन

उपन्यास साहित्य और मेरठ - प्रवीण जैन

       नो ड़ाऊट, मेरठ की  पहचान को जासूसी उपन्यासो, लुगदी लिटरेचर, पॉकेट बुक पब्लिशर्स ने नया आयाम  दिया। मगर मेरठ की अपनी अलग पहचान भी रही है, 1857 के स्वंत्रता संग्राम से भी पहले की । यह पहचान थी उस नौचंदी मेले से जो 1672 से पशुओं की खरीद फरोख्त के मेले से शुरु हुआ। जिसके नाम पर मेरठ से लखनऊ तक रेगुलर एक ट्रेन नौचंदी एक्सप्रेस चलती है और जैसा की किवदन्तियो मे कहा जाता है, देवी पार्वती के उस मन्दिर के सामने गढ़ रोड पर  लगने से है जिसे रावण की पटरानी मंदोदरी ने देवी भक्त होने के कारण बनवाया था। आपके कोई मित्र परिचित, रिश्तेदार मेरठ मे हो और नौचंदी मेला देखने के लिये आमन्त्रित न करे, यह तो हो ही नही सकता था, कम से कम 80 के दशक तो बिल्कुल नही। 

1672 से   अब तक मेला दो बार सिर्फ 1858 और 2020 मे  मुल्तवी हुआ है। 

          मेरठ के पॉकेट बुक बाज़ार मे आने से  पहले इलाहबाद ( अब प्रयागराज) जासूसी, सामाजिक, थ्रिलर, अपराध कथाओ के पब्लिकेशन का गढ़ था। निकहत पब्लिकेशंस, कुसुम प्रकाशन, मित्र प्रकाशन जैसे नामी ग्रामी प्रकाशक इलाहबाद मे ही थे। क्या खूब छापा इन्होने, जासूसी दुनिया, रहस्य , मनोरमा, मनोहर  कहानियाँ, माया, मनमोहन ( बाल पत्रिका) सत्य कथा जैसे मासिक  उपन्यास और रिसाले यहीं से  छपे। जिसे हम लुगदी पेपर पर छपा होने से लुगदी साहित्य कहते सुनते है उसकी शुरुआत न्यूज़ प्रिंट पेपर पर बुक साईज़ से हुई थी। 

मंगलवार, 29 जून 2021

चन्द्रमोहन

 नाम- चन्द्रमोहन
उपन्यासकार चन्द्रमोहन
उपन्यासकार चन्द्रमोहन
  उक्त लेखक के विषय में कोई ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं होती। हां, एक उपन्यास 'फरेबी' से कुछ जानकारी प्राप्त हुयी है। यहाँ प्रस्तुत जानकारी का आधार वही एक उपन्यास रहा है।
       चन्द्रमोहन‌ के उपन्यास
1. फरेबी (आॅरियंटल पॉकेट बुक्स, मेरठ)



सोमवार, 28 जून 2021

इंस्पेक्टर आजाद

नाम - इंस्पेक्टर आजाद
   एक समय था जब उपन्यास साहित्य में इंस्पेक्टर, कर्नल, कैप्टन जैसे नाम से लेखक हुआ करते थे। उसी समय में एक नाम आया था इंस्पेक्टर आजाद
     हालांकि इस लेखक के विषय में कोई ज्यादा जानकारी तो नहीं मिली। हालांकि यह 'सुपर पॉकेट बुक्स, मायापुरी- दिल्ली' का प्रकाशन था।

इंस्पेक्टर आजाद के उपन्यास
1. अंधा डिक्टेटर
इंस्पेक्टर आजाद
इंस्पेक्टर आजाद




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रविवार, 27 जून 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा-06

 मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा
आत्मकथा, भाग-06
 गत अंक पांच यहाँ से पढें -  आत्मकथा भाग- 05
    आपने गतांक में पढा कैसे एक उपन्यासकार फिल्म क्षेत्र में संघर्ष करता है। वहाँ उसके कैसे अनुभव रहे।
  अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा के इस भाग में पढें उनके उपन्यास लेखन के क्षेत्र में संघर्ष को।

तो अब चलिए दोस्तो मेरे इस अंतिम सफर का लुत्फ़ उठाने के लिए मेरे साथ।
आशा है, मेरे इस अंतिम सफर में भी आपको काफी मजा आएगा ।
ये बात ईस्वी सन् 1979 के आसपास की है, जब मैं पांचवीं कक्षा का स्टूडेंट था।
उन दिनों उपन्यासों का स्वर्ण युग  हुआ करता था और उपन्यासकार किसी फिल्म के हीरो से कम नहीं समझे जाते थे।  
     उपन्यास पढ़ाकूओं के घरों में 50 से लेकर 250 - 300 तक का  उपन्यास संग्रह बड़ी आसानी से मिल जाया करता था। 
मेरे मौहल्ले में भी कम से कम ऐसे 40 - 50 पढ़ाकूओं के घर थे, जिनमें शायद अव्वल नंबर मेरे ही घर का था। 
और वो इसलिए, क्योंकि मेरे घर का प्रत्येक सदस्य उपन्यास पढ़ा करता था। 
उस वक्त मेरी समझ में यह नहीं आता था कि ये लोग बिना चित्रो वाली इतनी मोटी - मोटी किताबों को आखिर पढ़ कैसे लेते हैं और इनमें ऐसा क्या लिखा हुआ होता है, जो कि लोग अपना खाना - पीना तक भूल कर हर वक्त इनमें ही खोए हुए रहते हैं।
इसी उत्सुकता की वजह से मैंने एक रात को सब घरवालों के सो जाने के बाद रजाई ओढ़ कर तथा एक टॉर्च को रोशन कर मुंह में दबाने के बाद उसकी रोशनी में उस समय के सबसे मशहूर लेखक आदरणीय गुलशन नंदा द्वारा लिखा गया उपन्यास 'राख और अंगारे'  पूरी रात जागकर पढ़ा। 
वो टॉर्च मैंने इसलिए रोशन की थी, क्योंकि उन दिनों हमारे छोटे से गांव में बिजली का आगमन नहीं हुआ था। 
गुलशन नंदा के इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैं तो जैसे उपन्यासों का दीवाना ही हो गया था।  
साहित्यदेश
      घर के और पूरे मोहल्ले के उपन्यास संग्रहो को मैंने दीमक बनकर दो-तीन साल में ही लगभग पूरा चट कर डाला। 
उनमें से ज्यादातर उपन्यास गुलशन नंदा, प्रेम बाजपेई, इब्ने सफी, राजहंस, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश कांबोज और कुशवाहा कांत के ही थे। 
      प्रथम उपन्यास 'राख और अंगारे' पढ़ने के बाद ही मेरे मन में यह लालसा जाग उठी कि क्यों न मैं भी उपन्यास लिखने लगूं और फेमस राइटर गुलशन नंदा की तरह ग्लैमर की दुनिया का एक चमकता हुआ सितारा बनकर क्यों न उनकी तरह ही चमकने लगूं। 

बुधवार, 23 जून 2021

लुगदी साहित्य को आज की पीढी पसंद करती है- संजय आर्य

लुगदी साहित्य को आज की पीढी पसंद करती है- संजय आर्य


लुगदी साहित्य लुगदी पेपर से आधुनिक समय में सफेद पेपर और उसके आगे डिजिटल किंडल फॉरमेट तक की यात्रा कर चुका है। बाबू देवकीनंदन की चंद्रकांता ने लुगदी सहित्य को एक अलग ही मुक़ाम पर पहुंचा दिया। 'चन्द्रकांता' से यात्रा अमित खान की वेब सीरीज 'बिच्छु का खेल' तक पहुंच गई है।  लुगदी साहित्य को आज की पीढ़ी के बीच भी पहले की तरह पसंद किया जाना 'शुभ संकेत' है।
      वास्तव में देखा जाए तो जासूसी उपन्यास-लेखन की जिस परंपरा को गोपाल  राम गहमरी ने जन्म दिया था, उसका हिन्दी में विकास ही न हो सका।
       प्रेमचंद के  जिस उपन्यास  'गबन' को पठनीयता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है, उस 'गबन' की अनेक कथा स्थितियां एक विदेशी क्राइम थ्रिलर से मिलती-जुलती हैं और जिसका अनुवाद गोपालराम गहमरी  ने  'जासूस' पत्रिका में किया था।
      गहमरी जी की बाद की पीढ़ी को जो भी लोकप्रियता मिली, उसका बहुत कुछ श्रेय पूर्व स्थापित देवकीनंदन खत्री जी के साहित्य को ही जाता है। इन्होंने अपने लेखन से वह  वातावरण  स्थापित कर दिया था कि लोगों  की रुचि  लोकप्रिय साहित्य को पढ़ने की और बढ़ गयी थी। उसका प्रमुख कारण था लुगदी साहित्य की भाषा। जो सामान्य जनता  की भाषा हुआ करती थी। आसानी से सभी को समझने में सहायक।
         वैसे देखा जाए तो हिंदी साहित्य में गंभीर साहित्य और लोकप्रिय साहित्य दोनो को पाठकों का भरपूर प्रेम मिला है।
    50-60 के दशक में वेदप्रकाश काम्बोज का नाम घर -घर मे लोकप्रिय था।    उस समय जासूसी और सामाजिक साहित्य में बड़ा विभाजन था।  गुलशन नंदा, रानू, प्रेम वाजपेयी, राजहंस, राजवंश और मनोज के उपन्यास सामाजिकता और रूमानियत से भरे हुए थे। ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज, इब्ने सफी, अकरम इलाहाबादी जासूसी उपन्यासकार थे। सामाजिक उपन्यास बिकते ज्यादा थे, पढ़े कम जाते थे।
      लोकप्रिय साहित्य को 'मास से क्लास' तक पहुंचाने के लिए सुरेंद्र मोहन पाठक को अवश्य श्रेय दिया जाना चाहिए ।विदेशी पब्लिकेशन के द्वारा उनके उपन्यास '65 लाख की डकैती' को अनुवाद कर पब्लिश किया जाना लोकप्रिय साहित्य का  अपूर्वभूत सम्मान है।
     वेदप्रकाश शर्मा  का उल्लेख किये  बिना ये चर्चा अधूरी रहेगी।    प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता आमिर खान ने अपनी फिल्म 'तलाश' के प्रमोशन की शुरुआत वेदप्रकाश शर्मा के निवास से की थी, जो जाने-माने उपन्यासकार और लगभग आधा दर्जन फिल्मों के स्क्रिप्ट राइटर वेद प्रकाश शर्मा  की लोकप्रियता को विशाल सम्मान है ।
     कहते हैं कि 1993 में वर्दी वाला गुंडा की पहले ही दिन देशभर में 15 लाख कॉपी बिक गई थीं।
      लेकिन वस्तुतः ऐसे उदाहरण नाम-मात्र ही है। अभी भी लोकप्रिय साहित्य और उनके लेखकों को वह स्थान नही मिला है जिसके वे हकदार है। हमेशा से लुगदी साहित्य हेय दृष्टि का शिकार रहा है।  और अभी भी अपनी जड़ें तलाश रहा है। 
     एक बार मैंने सुरेंद्र मोहन पाठक सर से प्रश्न किया था कि
''सर क्या कारण है कि हिंदी के लेखको को अंग्रेजी लेखकों के समान सम्मान नही मिलता?''
उनका जवाब था- "कोई पढे तो, हिंदी किताबो को पाठक ही नहीं मिलते।''
   आवश्यकता है -वर्तमान में उपलब्ध प्रचार-प्रसार के साधनों के माध्यम से  लोकप्रिय साहित्य के प्रति रुचि फिर से बढ़ाने की ताकि हिंदी के पाठकों में ज्यादा से ज्यादा वृद्धि हो।
    साहित्य के इतिहास में प्रारम्भिक समय मे अनेक आलोचकों ने लुगदी साहित्य की चर्चा की तो की लेकिन  बाद के समय मे उसको लगभग भुला ही दिया गया ।

आज के युवा लेखक नई ऊर्जा से भरपूर है।  नए लेखको में संतोष पाठक, इकराम फरीदी, कंवल शर्मा,  सबा खान, अनिल गर्ग, अनुराग कुमार जीनियस, अजिंक्य शर्मा आदि का नया पाठक वर्ग तैयार हो रहा है और निश्चित रूप से किसी नए सवेरे की उम्मीद अवश्य ही की जाना चाहिए।

'राहुल प्रसाद 'की कविता की कुछ पंक्तियां याद आ रही है।
ये ख्वाहिशें, ये चाहतें, ये धड़कनें बेहिसाब,
चलो मिलकर लिखते हैं, एक नई किताब।
ये नया सवेरा, ये नया दिन, ये नई-नवेली रात,
चलो मिलकर करते हैं, फिर कोई नई रूमानी बात।

प्रस्तुति- संजय आर्य, इंदौर

मंगलवार, 22 जून 2021

एक नाम की पहचान, जो खुद को ही रास न आई- रवीन्द्र यादव

अरुण आनंद - एक नाम की पहचान, जो खुद को ही रास न आई।
संस्मरण- रविन्द्र यादव

साहित्य देश इस बार 'संस्मरण स्तम्भ' में‌ लेकर आया है। Ghost Writer रवीन्द्र यादव जी का मार्मिक संस्मरण। जो उनके लेखन के साथ-साथ जासूसी उपन्यासकार अरुण आनंद के जीवन के कुछ पृष्ठों से रूबरू करवाता है, वहीं लोकप्रिय साहित्य के नेपथ्य के पीछे छिपे काले सच को सामने लाता है।  
  मुझे उम्मीद है इस भावुक संस्मरण को पढकर आपकी आँखें नम हो जायेंगी।।
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आज पाकेट बुक्स के कारोबार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में जुड़े गिनती के ही ऐसे लोग बचे होंगें जिन्हे 1990 का वह सुनहरा दौर याद होगा, जो अब कभी लौटकर नहीं आएगा। उसी दौर के एक किरदार का नाम था अरुण आनन्द.
उपन्यासकार- अरुण आनंद
उपन्यासकार- अरुण आनंद
      हालांकि यह उनका वास्तविक नाम नहीं था। उनका असली नाम था अरूण सागर। 1990 के दशक में वह पश्चिम बिहार दिल्ली के 540 जी एच 13, के थर्ड फ्लोर परं अपने मां बाप भाई बहन के साथ रहते थे। मेरी उम्र उस वक्त महज 16-17 साल होगी। जबकि अरूण सागर की उम्र तीस से ज्यादा थी। 
  मैं एक कामयाब लेखक बनने का बचकाना सपना साथ लेकर पैदा हुआ था और हताशा के साथ बेतहाशा धक्के खाता हुआ 1996 में आखिरकार ‘राजा पाकेट बुक्स तक जा पहुंचा था। 

रविवार, 20 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-11

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 10    ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
नाश्ता करके हम पटेलनगर के लिए निकले! भारती साहब घर पर नहीं थे! 
मैंने ऊपर खेल खिलाड़ी के आफिस में जाकर खेल खिलाड़ी की डाक देखी! पढ़ने में वक़्त लगता, इसलिए सारी डाक इकट्ठी करके एक बड़े ब्राउन लिफाफे में रख लीं और जवाब देने के लिए कुछ पोस्ट कार्ड साथ में डाल लिये! 
"अब किधर चलें?" वालिया साहब ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए मुझसे पूछा! 
"बैक टू पैविलियन...!" मैंने कहा! 
"नहीं यार, इतनी जल्दी घर जाकर क्या करेंगे? चलो, कनाट प्लेस चलते हैं!" और वालिया साहब ने स्कूटर पटेलनगर से शंकर रोड पर ले आये! फिर काफी देर सीधे चलने के बाद राम मनोहर लोहिया अस्पताल (तब के विलिंग्डन हास्पिटल) के पास से मोड़ लिया! 
फिर बंगला साहब गुरुद्वारे के निकट, बाहर ही फुटपाथ के समीप स्कूटर रोक दिया और बोले - "योगेश जी, आप यहीं रुको, मैं जरा मत्था टेक आऊँ!"
"मैं भी चलूँ..?" मैंने कहा! 
"फिर स्कूटर कौन देखेगा? पार्किंग में खड़ा किया तो ख्वामखाह टाइम वेस्ट होगा!"
"ठीक है!" मैंने कहा और स्कूटर के साथ खड़ा हो गया! वालिया साहब मत्था टेकने चले गये! स्वभाव से यशपाल वालिया भी धार्मिक प्रवृत्ति के थे! पर किसी विशेष गुरुद्वारे या मन्दिर जाने की उनकी आदत नहीं थी! चांदनी चौक गये तो शीशगंज गुरुद्वारे में मत्था टेक लिया! सेन्ट्रल सेक्रेटियेट गये तो रकाबगंज में मत्था टेक दिया! बिड़ला मन्दिर के निकट से गुज़रे तो वहाँ सिर झुकाने चले गये।

शुक्रवार, 18 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -10

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 9   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था -  ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता! 
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये! 
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में  जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!  

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...