अशोक कुमार शर्मा, आत्मकथा
मैं देहली हाफ पैंट इसलिए पहनकर गया था, क्योंकि उन दिनों मेरे पास फुल पैंट नहीं था।
इसकी वजह ये नहीं थी कि मेरा परिवार बहुत ही गरीब था, बल्कि वजह ये थी कि मैं बहुत ही पतला - दुबला और छोटी कद - काठी वाला एक कमजोर सा लड़का था और उन दिनों के चलन के मुताबिक मुझे हाफ पैंट ही सिलवाकर दिए जाते थे ।
यह यात्रा घरवालों से छुपकर की गई थी और इस यात्रा के खर्च के लिए मेरे पास एक फूटी कोड़ी भी नहीं थी, इसलिए मां से रो - धोकर मैंने 100 रुपए ऐंठ लिए थे, पर ये रकम देहली के खर्च के लिए पर्याप्त नहीं थी, इसलिए बाकी का यात्रा खर्च जुटाने के लिए मैंने अपने बड़े भाई साहब के बटुए पर हाथ साफ कर दिया।
करीब पचास साठ रुपए तो चुराए ही होंगे, पर इस चोरी की खबर उन्हे आज तक भी नहीं है। इस प्रकार मेरे इस शौक ने मुझे झूठ बोलने के साथ - साथ चोरी करना भी सिखा दिया था, पर दोस्तों ! यकीन मानिए। स्वभाव से आज भी मैं झूठा और चोर नहीं हूँ।
बस मेरी आकांक्षा और मजबूरी ने बचपन में मुझसे ये दो नीच कार्य करवा दिए, जिनका मलाल मुझे आज भी है।
मुझे ये अच्छी तरह याद है कि उन दिनों सीकर से देहली का ट्रेन किराया मात्र 28 रुपए ही था।
एक रात आठ बजे मैं एक जनरल डिब्बे में बैठकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया।






