कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 8
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रॉयल पाकेट बुक्स की बाहरी बैठक को अपना ठिकाना बनाने के बाद मुझे सबसे पहले उन्हीं का काम पूरा करना चाहिए था, पर उन्होंने काम पूरा करने के लिए एक हफ्ते का वक़्त दिया था, इसलिये मैं निश्चिन्त तो था, पर दिमाग में यही था कि सबसे पहले अपने लैण्डलॉर्ड का काम ही पूरा किया जाये, लेकिन सुबह दस बजे के करीब गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे।
मैंने रायल पाकेट बुक्स की उन किताबों में से एक
किताब सामने रखी हुई थी और उसे पढ़ रहा था, कहानी बढ़ाने का काम बिना पढ़े तो हो ही नहीं सकता था। हालांकि मुझे
दो बार ऐसा दुर्लभ कार्य भी करना पड़ा था, जब विमल पॉकेट बुक्स, में प्रकाशित होने वाले उपन्यास `कलंकिनी` के अन्तिम सोलह पेज कहानी
पढ़े बिना ही लिखने पड़े थे और एक बार हरीश पॉकेट बुक्स (राज पॉकेट बुक्स की एक
अन्य संस्था) में प्रकाशित हो रहे एस. सी. बेदी के एक उपन्यास का अन्त उपन्यास
पढ़े बिना लिखना पड़ा था। पर वो किस्सा फिर कभी...।
मेरठ के प्रकाशकों में तो लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के
स्वामी सतीश जैन उर्फ मामा ने मैटर बढ़ाने-घटाने में मुझे Best होने तक
का तमगा दे दिया था और उन्हीं की यह कारस्तानी या करिश्मा था कि ईश्वरपुरी के
प्रकाशकों में भी मेरी चर्चा फैल गई थी।
फिर मेरे बारे में एक यह बात भी सतीश जैन ने फैला दी थी कि योगेश
मित्तल से तो जो चाहे काम करवा लो, न पैसे के लिए हुज्जत करता है, ना ही मना करता है और यह मशहूरी गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील
जैन तक भी पहुँच चुकी थी।
रॉयल पाकेट बुक्स का किरायेदार होने के सबसे पहले ही दिन सुबह सुबह
सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे,
तब तक मैंने किसी भी प्रकाशक को अपने वहाँ रहने के बारे में बताया तक
नहीं था, इसलिये
सुशील जैन को देख, एकदम
हक्का-बक्का हो उठा।
“आप यहाँ कैसे....?
यहाँ के बारे में तो मैंने अभी किसी से कोई चर्चा भी नहीं की।" -मैंने
अचरज से कहा तो बड़ी मीठी मुस्कान छिड़कते हुए सुशील जैन बोले - "दिल्ली का
कोई लेखक मेरठ में हो और हमें पता न चले, यह तो हो ही नहीं सकता। हमारे जासूस कदम-कदम पर फैले हुए हैं। फिर यह
तो ईश्वरपुरी से ईश्वरपुरी का मामला है। हमारी नाक के नीचे रहकर भी तू हमारी
नज़रों से छिप जायेगा, ऐसा तो
तुझे सोचना भी नहीं चाहिए।"
अपनी बात कहते-कहते सुशील जैन मेरे पलंग पर मेरे करीब बैठ गये।







