लेबल

सोमवार, 31 मई 2021

किस्सा प्रेम बाजपेयी का

किस्सा तब का है जब प्रेम बाजपेयी जी- 33 आराम पार्क,रामनगर,दिल्ली में रहते थे।

मनोज पॉकेट बुक्स और राज पॉकेट बुक्स (बाद में राजा पॉकेट बुक्स) के रास्ते अलग-अलग हो चुके थे।
अब तक,  13 साल से 'मनोज पॉकेट बुक्स' के लिए उपन्यास लिख रहे 'प्रेम' जी के लिए इस रिश्ते को अब और आगे खींचना मुश्किल हो गया था।
अंततः 'तन चुभी कीलों' के मुखड़े से शुरू होने वाला 'गीत'...'सौतन और सुहागन' के अंतरे से गुज़रता हुआ 'क्षमादान' पर जाकर द एण्ड हो गया।
'मनोज' जी ने अपनी 'पार्टी' से 'बाजपेयी' जी को निकाल दिया।
    उस उपन्यासकार को जिसके लिए तब 'ठण्डा मतलब कोकाकोला' के अंदाज़ में पंच लाइन हुआ करती थी। "मनोज पॉकेट बुक्स का अर्थ है 'प्रेम बाजपेयी' का नया उपन्यास।
डबडबाई आँखों से 'प्रेम' जी ने अंतिम बार 'मनोज' जी की तरफ़ देखा. मन-ही-मन सफ़र को याद किया और नियति मानते हुए विदा ली। 
बहू हो तो ऐसी- प्रेम बाजपेयी

रविवार, 30 मई 2021

नौकरी डाॅट काॅम और वेदप्रकाश शर्मा

 जासूसी साहित्य में कुछ अलग हटकर लिखने का श्रेय 'सस्पेंश के बादशाह वेदप्रकाश शर्मा' को जाता है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और सत्य घटनाओं पर आधारित काल्पनिक उपन्यास लिखें हैं।

      उनकी यही विशेषता उन्हें बाकी लेखकों से एक अलग मुकाम पर स्थापित करने में सहायक है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है, जाना था जापान पहुँच गये चीन समझ गये ना।
     लेखक अपने उपन्यास के प्रकाशन से पूर्व उपन्यास की थीम कुछ और घोषित करता है और उपन्यास का कथानक कुछ और हो जाता है।
यह ऐसे ही नहीं हो जाता। यह तब की घटना है जब वेदप्रकाश शर्मा जी एक खतरनाक बीमारी से जूझ रहे थे। बस तभी राजा पॉकेट बुक्स से वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था।
थी
।करी डाॅट काॅम- ये नाम है मेरे आगामी नये उपन्यास का। हो सकता है आप कहें कि यह अम तो किसी भी एंगिल से जासूसी उपन्यास का नाम नहीं लगता। यहाँ मैं‌ कुछ अंश तक आपकी बात से सहमत हूँ, परंतु विश्वास दिलाता हूँ इसके थ्रिल, सस्पेंश, इन्वेस्टिगेशन और सेंटीमेंट्स को आप वर्षों तक नहीं भूला सकेंगे।

शुक्रवार, 28 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 06

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 5  ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग की बात पर मैं मुस्कुराया- "जरूर चन्दर ने बताया होगा आपको...?"
"तुझे कैसे मालूम....? " अब की बार चौंकने की बारी ज्ञान की थी! 
मैं मुस्कुराया -"चन्दर की दुकान, मनोज की दुकान से बिल्कुल सटी हुई है! उसके कान मनोज में होने वाली बातों पर अक्सर लगी रहती हैं! और मनोज में लगभग सभी बुलन्द आवाज में बात करने वाले हैं! चन्दर ने कुछ टूटा-फूटा सुना और आपको वही सुना दिया!"
"मतलब बात सही है ना! मुकदमा शुरू हो गया!" 
"नहीं, अभी कोई मुकदमा शुरू नहीं हुआ!" मैंने कहा -"पर पासिबिल्टी है! और भाईसाहब, जब मुकदमा शुरू होगा ना, तब मैं स्पेशली दरीबे आऊँगा - आपको बताने के लिए!"
"हैंएएए....!" ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग मेरी बात और मिज़ाज नहीं समझे और जब तक वह कुछ समझते मैं उठते हुए दोबारा बोला - "अच्छा, चलता हूँ, मुझे राज और गौरी भाई साहब मेरा इन्तजार कर रहे होंगे! उन्हीं के साथ शक्तिनगर से आया हूँ!"
और मैं तुरन्त ही पीछे लौट पड़ा! 
"अरे योगेश, सुन, सुन तो... " ज्ञान पीछे से चिल्लाये, मगर मैं पलट कर "बाय-बाय" के अन्दाज़ में हाथ हिलाते हुए बोला -"बाद में..!" और आगे बढ़ गया!
ज्ञान ने बाद में भी आवाज दीं, पर मैंने सुनकर भी अनसुनी कर दीं और मनोज में पहुँचा! 
वहाँ राज और गौरी कहीं दिखाई नहीं दिये! काउन्टर पर सबसे आगे पन्नालाल जी बैठे थे! राजकुमार, गौरीशंकर और विनय कुमार गुप्ता के पिताजी! उनके पीछे बैठे थे जगदीश जी, जोकि रिश्ते में शायद राज, गौरी, विनय के भाई लगते थे! 
मैंने पन्नालाल जी को नमस्कार किया और विनम्र स्वर में उनसे पूछा - "भाई साहब कहाँ हैं?"
"कौन से भाई साहब?" पन्नालाल जी ने पूछा! 
"राज और गौरी भाई साहब!"
"वो तो गये...?" जवाब पीछे बैठे जगदीश जी ने कहा! 
"गये.....कहाँ....?" मुझे झटका सा लगा! मैं उनके साथ आया था और जब मैं शक्तिनगर जाता था, अगर कभी वे सीट पर नहीं होते तो मैं उनका इन्तजार करता था और आज मैं उनके साथ ही शक्तिनगर से दरीबा कलां आया था, पर दरीबा कलां से वह मुझसे कुछ भी कहे बिना एकदम कहाँ गायब हो गये? 
तब मैं बहुत ज्यादा भावुक इन्सान था! छोटी छोटी बातें मुझे चुभ जाती थीं! इसलिए बहुत खराब लगा! फिर भी मैंने यूँ ही जगदीश जी से सवाल कर लिया - "कहाँ गये हैं?"
"पटेलनगर....!"
जगदीश जी से यह जवाब सुनकर तो मुझे दूसरा झटका लगा! 
"अरे पटेलनगर मुझे भी ले जाते तो मुझे साथ न भी रखते तो मैं खेल खिलाड़ी के आफिस में बैठकर भारती साहब के लौटने का इन्तजार कर सकता था या वह पटेलनगर की जगह वापस शक्तिनगर जाते तो भी मुझे साथ ले सकते थे, वहाँ से मैं आगे विजय पाकेट बुक्स तो पैदल ही जा सकता था! 
बहरहाल जगदीश जी के जवाब के बाद अनमने मन से 838 नम्बर बस के स्टाप पर पहुँचा! बस पहले से खड़ी थी! उसमें बैठने की सीट थी! मैंने रमेशनगर का टिकट लिया और बैठ गया! 838 की कोई बस तिलकनगर और कोई उत्तमनगर जाती थी और उसका रास्ता पटेलनगर, रमेशनगर से था।

सोमवार, 24 मई 2021

कहानी उपन्यासकरा राजहंस की-05

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 4   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
यूँ तो कोई भी लेखक प्रकाशकों द्वारा लेखक के नाम के ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन और ट्रेडमार्क नाम में किसी भी लेखक की कृति के प्रकाशन की परिपाटी का समर्थन शायद ही करे, पर उन दिनों पाकेट बुक्स ट्रेड में दो लेखक ऐसे थे - जो ट्रेडमार्क लेखकों के सिस्टम के  सख्त खिलाफ थे! 
एक वेद प्रकाश शर्मा और दूसरा मैं! मौका मिलने पर दोनों ही ट्रेडमार्क प्रचलन के विरुद्ध जी भरकर ज़हर उगल देते थे! 
जब हम दोनों आपस में बातचीत करते तो ऐसे प्रकाशकों के खिलाफ मन की भड़ास भी खूब निकालते थे! 
हमारी नज़र में एक ट्रेडमार्क नाम टाइटिल कवर पर देकर, अन्दर किसी भी उपन्यासकार का उपन्यास छापना, पाठकों से सरासर चीटिंग था! धोखा था! 
हमें इससे बेहतर पैटर्न तो वह लगता था, जब प्रकाशक कोई भी नाम एक पत्रिका के रूप में रजिस्टर्ड करवा लेते थे और उसमें किसी भी लेखक का उपन्यास छाप देते देते थे, किन्तु तब वह अन्दर के पहले या तीसरे पृष्ठ पर असली लेखक का नाम भी अवश्य छापते थे!
विजय पाकेट बुक्स बनाम राजहंस, हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के मुकदमे के समय ट्रेडमार्क पर अपने विचारों के मामले में, मैं कन्फ्यूज-सा हो गया था, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा तब तक अपने स्टैण्ड पर कायम रहे, जब तक कि उन्होंने और सुरेश चन्द जैन ने पार्टनरशिप में तुलसी पाकेट बुक्स की शुरुआत नहीं की!
मुझ में और वेद प्रकाश शर्मा में सबसे बड़ा फर्क यह था कि मैं प्रकाशकों के सामने ट्रेडमार्क विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार कभी नहीं रखता था, सिर्फ नजदीकी दोस्तों के सामने ही अपने विचार प्रकट करता था, जबकि वेद प्रकाश शर्मा प्रकाशकों के सामने भी बेहिचक अपने उद्गार प्रकट कर देते और ट्रेडमार्क सिस्टम और नकली उपन्यासों के लिए प्रकाशकों को ही सौ परसेन्ट दोषी करार देते थे।

रविवार, 23 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 04

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 3 ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
                     ✖️
आप में से कितने लोग शराब पीते हैं और कितनी..? जो नहीं पीते, सवाल उनसे नहीं है! जो शराब को बुरी चीज़ समझते हैं, सवाल उनसे भी नहीं है! सवाल सिर्फ उनसे है, जो शराब पीते हैं! सवाल उनसे भी है, जो शराब पीते तो नहीं, पर शराब को बुरी चीज़ नहीं समझते! सवाल उनसे भी है,जो कभी-कभार मित्रों को कम्पनी देने के लिए घूंट, दो घूंट कहें या पैग-दो पैग हलक से नीचे उतार लेते हैं! सवाल उनसे भी है, जो दिन भर की थकान उतारने के लिए रात को सोने से पहले शराब का एक-आध पैग लेने में कभी कोई हर्ज नहीं समझते! 
और आपका जवाब जो भी हो, एक बात निश्चित जान लीजिये, शराब आखिर शराब है! आज आप उसे थकान दूर करने के लिए लेते हों, दवा के तौर पर लेते हों, अगर आपने खुद पर अंकुश नहीं रखा तो 'दवा' का 'दर्द' बनना तय है! 
केवलकृष्ण शराब तब भी पीते थे, जब वह एक साधारण सी दवा कम्पनी के मामूली एजेन्ट थे, पर तब उन्हें दिन भर घूमना पड़ता था! पैदल हों, चाहें स्कूटर पर गली-गली खाक छाननी पड़ती थी! किसी डाक्टर के पास तो किसी केमिस्ट के पास! दवाओं के बारे में बताते-बताते जुबान भी थक जाती थी! घुटनों और कूल्हों में भी दर्द होने लगता था, ऐसे में रात को खाने से पहले एक छोटा पैग ले लेने से, सोने के बाद तसल्ली की नींद आ जाती थी! उन दिनों एक ही अद्धा चार या पांच दिन भी चल जाता था! 
पीते तो थे ही, इसलिए पीना कभी पाप नज़र नहीं आया, लेखक बने तो लेखकों और प्रकाशक महोदय के साथ पीने का अवसर मिला, जब गाँठ से अपना एक पैसा खर्च नहीं हो रहा था तो भी केवलकृष्ण को अपने पीने की सीमा पता थी! आरम्भ में वह एक पैग से ज्यादा नहीं पीता था, विजय कुमार मलहोत्रा की आदत थी - वह किसी पर भी, कभी भी, अधिक पीने के लिए दबाव नहीं डालते थे, मगर जहाँ चार यार जमा हो जायें, ना-नुकुर बेकार हो जाती है! मैं यह नहीं कहूँगा कि किन लोगों की सोहबत में केवलकृष्ण उर्फ़ राजहंस अधिक पीने लगे, मगर यह हकीकत है कि एक से दो, दो से तीन, तीन से चार, फिर पांच-छ: पैग भी डकार लेना, राजहंस के लिए आम बात हो गई! 
और जब एक उपन्यास का पारिश्रमिक तीस चालीस हज़ार की सीमा तक आ गया तो अपने लिए मंहगी शराब खरीदना और घर में भी 'कोटा' रखना भी आम बात हो गई!
हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स में राजहंस की इन्ट्री के बाद जब भी विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण उर्फ़ राजहंस से मिलना चाहा, वह या तो घर में नहीं मिला या पता चला अभी आराम कर रहे हैं और फिलहाल बातचीत करने की स्थिति में नहीं हैं!
कोई भी फैसला करने से पहले विजय कुमार मलहोत्रा एक बार केवलकृष्ण से बात करना चाहते थे और बात नहीं हो पा रही थी! समय नष्ट हो रहा था।

शनिवार, 22 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 03

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 2
========================
सम्बन्धों में खटास की शुरुआत
लेखक सैकड़ों पैदा हुए हैं, हैं और होते रहेंगे, लेकिन ऐसे कुछ ही लेखक होते हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद आप उनकी लेखनी के प्रभाव से काफी देर तक अपने आपको मुक़्त न करा सकें! 
ऐसे लेखक भी बहुत होंगे, जिनकी कृति का कथानक आपके दिल में चलचित्र सा घूमने लगे, लेकिन अगर आप स्वयं भी एक लेखक हैं तो किसी अन्य लेखक की कृतियाँ पढ़कर आपके लेखन में उसी लेखक की शैली जड़ें जमा ले, आप भी उसी लेखक की तरह लिखने लगें तो उस लेखक की शैली का लोहा तो आपको मानना ही पड़ेगा! 
ऐसे ही एक लेखक हुए हैं गोविन्द सिंह! गोविन्द सिंह की लेखन शैली का कमाल था कि पढ़ते हुए लगता था कि घटनाएँ कहीं इर्दगिर्द, कहीं निकट ही घट रही हैं! 
सुमन पाकेट बुक्स में रतिमोहन नाम से गोविन्द सिंह ही लिखते थे और अगर आप एक लेखक हैं तो रतिमोहन या गोविन्द सिंह के कुछ उपन्यास पढ़ने के बाद अपनी कहानी या उपन्यास लिखिये, आपके लेखन में उनकी भाषा शैली का प्रभाव अवश्य आ जायेगा।

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-02

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 01
============================
सम्बन्धों में खटास की शुरुआत
                          
आपने राजहंस के उपन्यास पढ़े हैं....? 
आपने शेखर के उपन्यास पढ़े हैं...? 
आपने रतिमोहन के उपन्यास पढ़े हैं....? 
'हाँ या नहीं' - जिसमें भी आपका जवाब हो, उसे अपने पास ही रखिये, क्योंकि मेरा इसके बाद एक सवाल यह भी है कि... 
क्या आप लेखक हैं...?
यदि हैं तो आगे चलकर आप समझ जायेंगे कि मैंने राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स के मुकदमे का किस्सा बयान करने से पहले यह कैसे सवाल छेड़ दिये! 
अब आयें विजय पाकेट बुक्स और राजहंस उर्फ केवलकृष्ण कालिया के सम्बन्धों की बात पर... 
विजय कुमार मलहोत्रा ने जब राजहंस प्रकाशित करना आरम्भ किया, उसके गेटअप, मैटर, कवर डिजाइन में कोई कमी नहीं छोड़ी! बैक कवर पर राजहंस के रूप में केवलकृष्ण कालिया की खूबसूरत फोटो! 
बैक कवर को सजाने-संवारने का काम शादीपुर डिपो और वेस्ट पटेलनगर के बीच पड़ने वाले बलजीत नगर में रहने वाले आर्टिस्ट एन. एस. धम्मी से लिया गया! किन्तु कवर डिजाइन के लिए अमरोहा में रहने वाले बेहतरीन आर्टिस्ट "शैले" से शानदार डिजाइन बनवाये गये!
शैले उस समय पाकेट बुक्स में सबसे खूबसूरत डिजाइन बनाने वाले, सबसे मंहगे आर्टिस्ट के रूप में जाने जाते थे! 
पुस्तक में टोटल मैटर के हिसाब से बत्तीस, तैंतीस, चौंतीस लाइने सैट की जाती थीं और एक लाइन में कम से कम बारह शब्द होते थे! 
राजहंस का उपन्यास पढ़ने वाले सभी पाठकों को भरपूर मनोरंजन के साथ सालिड पाठ्यसामग्री मिले, इसका पूरा ख्याल रखा जाता था! 
राजहंस के सभी उपन्यासों के प्रूफ कम से कम दो बार तथा आवश्यकता पड़ने पर तीन बार भी पढ़े जाते थे! विजय कुमार मलहोत्रा चाहते थे कि राजहंस के उपन्यासों में भाषाई और मात्रा की कोई गलती नहीं रहे।
एक बात यहाँ मैं आप सबको बता देना चाहूँगा कि बहुत से लेखकों के लेखन में पहले भी मात्राओं की गलतियां होती रहती थीं, अब भी होती हैं! किन्तु प्रकाशक प्रूफरीडिंग में लेखकों की गलतियां भी शुद्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध रहते थे! 
इसके अलावा उस समय की मशहूर फिल्मी पत्रिकाओं में राजहंस के पूरे- पूरे पेज के विज्ञापन दिये गये! 
'राजहंस' की 'सेल' बढ़ने पर विजय कुमार मलहोत्रा ने कभी भी केवलकृष्ण के कुछ कहने का इन्तजार नहीं किया! हमेशा पारिश्रमिक बिना कहे ही बढ़ा दिया।

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -01

 दवाओं का एजेन्ट केवलकृष्ण बना उपन्यासकार राजहंस- भाग-01
===========================
विजय कुमार मलहोत्रा के पास राणा प्रताप बाग में अन्दरूनी रोड पर सड़क के मुहाने पर काफी बड़ी जगह थी! 
उसी पते पर विजय कुमार मलहोत्रा ने विजय पाकेट बुक्स की नींव रखी!
विजय कुमार मलहोत्रा की अशोक पाकेट बुक्स के स्वामी बसन्त सहगल से अच्छी दोस्ती थी! अक्सर उन दोनों का राणा प्रताप बाग स्थित विजय पाकेट बुक्स के आफिस में अथवा शक्ति नगर स्थित बसन्त जी की बैठक में जमावड़ा होता! संयोगवश मैं गिनती के उस खुशकिस्मतों में हूँ, जिसे दोनों जगह बैठने का अवसर मिला! 
विजय पाकेट बुक्स जब शैशवावस्था में थी, अशोक पाकेट बुक्स एक नामी प्रकाशन संस्था थी! इसका एक खास कारण यह भी था कि उन दिनों उपन्यासकारों में गुलशन नन्दा एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित नाम था और अशोक पाकेट बुक्स ने गुलशन नन्दा के कई उपन्यास प्रकाशित किये थे, जिनके कापीराइट भी उन्हीं के पास थे और आये दिन गुलशन नन्दा के उपन्यासों के रिप्रिन्ट होते रहते थे, जिसके कारण बहुत कुछ छापने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी! 
मैंने सुरेन्द्र मोहन पाठक की आपबीती की श्रृंखला नहीं पढ़ी, किन्तु यकीन है कि श्रृंखला पूरी होने से पहले उसमें मेरा जिक्र भी आना चाहिए और बसन्त सहगल का भी! 
मुझे याद नहीं कि अशोक पाकेट बुक्स में सहगल साहब ने सुरेन्द्र मोहन पाठक को छापा या नहीं छापा, किन्तु दोनों की दोस्ती मशहूर रही थी तथा शाम की बहुत सी महफ़िलों में दोनों ने परस्पर जाम टकराये थे.

Featured Post

मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...