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| तस्वीर सन् 2022 |
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शनिवार, 1 अगस्त 2020
मनहर चौहान
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प्रदीप कुमार शर्मा
विजय लक्ष्मी
संजीव पालीवाल
अंजलि देशपाण्डे
सोमवार, 27 जुलाई 2020
प्रिंस सईद
प्रेम कुमार शर्मा
नाम- प्रेम कुमार शर्मा
जन्म- 03.03.1956मृत्यु- 24.09.2021
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के निवासी प्रेम कुमार शर्मा का जन्म एक साहित्यिक परिवार में हुआ था। इनके पिता भी लेखक थे, जिन्होंने उपन्यास, कविता के अतिरिक्त फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाया था। साहित्यिक परिवार में पैदा होने के कारण इनका झुकाव साहित्य की तरह रहा, काॅलेज समय से ही इन्होने साहित्यिक लेखन आरम्भ कर दिया था।
सन् 70-80 के मध्य पत्रकारिता की। 'नूतन कहानियाँ', 'सच्ची कहानियाँ' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। सन् 90 के दशक में प्रसिद्ध उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा जी के निमंत्रण पर मेरठ आ गये और तुलसी पॉकेट बुक्स की पत्रिका 'तुलसी कहानियाँ' का संपादन कार्य। मेरठ में आने के पश्चात प्रेम कुमार शर्मा जी का झुकाव जासूसी उपन्यास लेखन की तरह हो गया। जहाँ उन्होंने स्वयं के नाम से उपन्यास लिखे वहीं प्रेम कुमार शर्मा जी द्वारा लिखित कुछ उपन्यास 'अजगर' नाम से भी प्रकाशित हुये।
प्रेम कुमार शर्मा के क्रमशः उपन्यास
1. देखो और मार दो (प्रथम उपन्यास)
2. सावधान, कुत्ते खुले हैं।
3. आप्रेशन हिंदू
4. काला सच ( अप्रकाशित)
5. दानव देश ( अप्रकाशित)
अंजुम अर्शी
एक खास बात और
हथियार के नाम पर बूमरैंग टाइप की गेंद का इस्तेमाल सैमुएल अंजुम अर्शी साहब ने अपने मास्टर ब्रेन सीरीज़ के उपन्यासों में बखूबी किया था, वो अपने किस्म का अनूठा उदाहरण है!
दुश्मन पर मास्टर ब्रेन की गेंद का वार और दुश्मन चारों खाने चित्त और गेंद फिर से मास्टर ब्रेन के हाथ में।
आप में से जिसने भी पढ़े होंगे - मास्टर ब्रेन सीरीज़ के उपन्यास, निश्चय ही भूले नहीं होंगे और खास बात यह कि यह खूबी सिर्फ मास्टर ब्रेन के उपन्यासों में ही मिलेगी।
सफदरजंग अस्पताल में 28 नम्बर वार्ड के इंचार्ज किसी समय ये ही थे और बहुत सारी नर्सों तथा वार्ड बाय को ट्रेनिंग भी दिया करते थे।
सैमुएल अंजुम अर्शी साहब मेहमाननवाजी में जवाब नहीं रखते थे। कोई भी आये - सिर आँखों पर बैठाते थे। अच्छा सत्कार करते थे और बड़े प्यार से धीरे धीरे बात करते थे।
जबरदस्त कुक भी थे। खास तौर से नानवेज बनाने में इनका जवाब नहीं था।
आप यदि दस बार इनके यहाँ गये होंगे तो हर बार आपको नयी-नयी डिश खिलाई होगी, क्योंकि इनकी याद्दाश्त भी गज़ब की हुआ करती थी और....
इससे ज्यादा और मुझसे बेहतर इनके बारे में आज के लोगों में दूसरा एक भी शख्स कुछ नहीं बता सकता।
आखिरी बार इनसे नोयडा स्थित जर्मन डिजाइन की बनी कोठी में हुई थी। बदकिस्मती से आज वो पता याद नहीं है।
और हाँ, मुसलमान नहीं, क्रिश्चियन थे और इनकी दो बीवियाँ थीं।
#योगेश मित्तल जी के स्मृति कोष से
रविवार, 26 जुलाई 2020
अजय ठकराल
यह जानकारी सुनील प्रभाकर के उपन्यास 'मौत का साया' से मिली है। जो गौरी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था।
'मौत का साया' का एक संवाद देखें-
जेम्स को एक पुस्तक विक्रेता कहता है-
" ये लीजिये- अजय ठकराल का नया उपन्यास 'दबे पांव' कमाल का उपन्यास है....।"
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कर्नल रंजीत एक जासूसी उपन्यासकार थे। मखमूर जालंधरी का असल नाम गुरबख्श सिंह था और वे कर्नल रंजीत के नाम से उपन्यास रचना करते थे।(हंस- मार्च,...

















