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रविवार, 16 मई 2021

मेरठ का बदमाश- पात्र चर्चा

मेरठ का बदमाश- गैरीसन
हम जब भी कोई कृति पढने हैं तो उस कृति में कोई न कोई संवाद, घटना या पात्र हमें ऐसा मिल ही जाता है जो पाठक को प्रभावित करता है।
   पाठक भी एक बार उपन्यास को पढना छोड़ कर उसके विषय में सोचने लगता है।
आदरणीय वेदप्रकाश शर्मा जी का उपन्यास 'सिंगही और मर्डरलैण्ड' पढते वक्त भी एक ऐसा पात्र सामने आया जिसने कम भूमिका होते हुये भी अपना प्रभाव स्थापित किया। वह पात्र है गैरीसन। 
    यहाँ गैरीसन के विषय में चर्चा करने का एक और विशेष कारण है वह है -गैरीसन का मेरठ का बदमाश होना। वेदप्रकाश शर्मा जी स्वयं मेरठ के निवासी थे और उन्होंने यहां के एक पात्र का सर्जन किया।
     हालांकि गैरीसन नामक पात्र की भूमिका बहुत कम है, लेकिन विजय के साथ टकराते वक्त विजय भी उसकी ताकत को स्वीकारता है।
एक दृश्य देखें
विजय गुलफाम की ओर थोड़ा झुककर बोला-"गैरीसन नाम के किसी गुण्डे को जानते हो?"
"क्या? गैरीसन....।"- लगता था गुलफाम गैरूसन के नाम पर बुरी तरह से चौंका था।
" हाँ, क्या तुम गैरीसन से परिचित हो?"
"आप उसके विषय में क्यों पूछ रहे हो?"
"उस से काम है थोड़ा।"
"गैरीसन बहुत घाघ व्यक्ति है, बेहद खतरनाक लड़का है वो। आजकल उसकी खूब चल-पिल रही है। उसके इलाके में उस से टकराना आत्महत्या करना समझा जाता है। वास्तव में मास्टर, मैंने भी उसे कई बार देखा है, वह खतरनाक व्यक्ति है।"- गुलफाम एक ही साँस में कह गया।
" प्यारे गुलफाम‌ मियां।"- विजय बोला-"शायद भूल रहे हो तुम कि किस से बातें कर रहे हो। गैरीसन इससे ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकता, जितने अपने जमाने के तुम थे।"
"वो तो मैं जानता हूँ मास्टर, लेकिन मेरे ख्याल से उसके इलाके में जाकर उससे टकराना मौत के बस का रोग भी नहीं है। अगर आप कहें तो उसे यहाँ बुलवा दूँ?"

"नहीं प्यारे, अब हम वहीं जाकर उससे मिलेंगे। तुम उसकी तारीफ के पुल बाँधना छोड़ दो और उसके विषय में क्या जानते हो वह बताओ।"
"उसके विषय में यह सुना गया है कि वह मेरठ का बदमाश है, वहाँ पहले बहुत शरीफ था, किंतु सामाजिक तत्वों ने उसे बदमाश बनने पर मजबूर कर दिया और देखते ही देखते उसकी बदमाशी इतनी बढ गयी कि समस्त मेरठ उससे काँपने लगा। मेरठ की बदमाशी नामी है, ये तो आप जानते ही हैं।" (पृष्ठ-56,57)
  गैरीसन और विजय के मध्य एक लड़ाई का दृश्य भी है। यहाँ विजय को यह महसूस होता है कि यह गैरीसन को हराना कोई आसान काम नहीं है।
पहला वार किया विजय ने।
उसने उछलकर एक फ्लाइंग किक जमानी चाही, किंतु तुरंत ही विजय की आँख खुल गयी। सिर्फ आँख ही न खुल गई बल्कि जनाब की नानी भी याद आ गयी। साथ ही यह पता लग गया कि गैरीसन भी वह रसगुल्ला नहीं है, जिसे बस तुरंत ही हजम कर जाओ।(पृष्ठ-65)
    यह तो तय था कि विजय और गैरीसन के मध्य हुयी लड़ाई में विजय की जय तय है। और होता भी यही है लेकिन‌ इस लडा़ई के दौरान जब विजय गैरीसन पर शारीरिक रूप से विजय प्राप्त कर उसे मानसिक रूप से भी मात देता है तभी एक नकाबपोश गैरीसन की हत्या कर देता है।      विजय जैसा व्यक्ति भी गैरीसन से प्रभावित था, तभी तो वह उसकी मृत्यु पर दुखी होता है।
गैरीसन को उठाया गया, तेजी से अस्पताल पहुँचाने का प्रयास किया गया किंतु व्यर्थ। रास्ते में ही गैरीसन ने प्राण त्याग दिये।
न जाने क्यों विजय को गैरीसन की मौत का गहरा अफसोस था। (पृष्ठ-68)
उपन्यास- सिहंगी और मर्डरलैण्ड
लेखक-    वेदप्रकाश शर्मा 
धन्यवाद।
उपन्यास पढते वक्त आपके सामने भी ऐसे पात्र आये होंगे जिनसे आप प्रभावित हुये हैं। अगर आप उन पात्रों पर अपने विचार लिख कर भेजते हैं तो 'साहित्य देश ब्लॉग' पर आपके नाम के साथ उनका प्रकाशन होगा।
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