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रविवार, 11 दिसंबर 2022

काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा - योगेश मित्तल

 काम्बोजनामा - एक अद्भुत काव्यकथा 
काम्बोजनामा :वेदप्रकाश काम्बोज की लेखन यात्रा

कुछ लोग अपनी जीवनी लिखते हैं - कुछ किसी अन्य की, लेकिन इमोशन के बादशाह राम पुजारी जब कुछ लिखते हैं, अपना सब कुछ उसमें इस तरह झोंक देते हैं, इस कदर झोंक देते हैं कि लिखी हुई पुस्तक खूबसूरत शब्दों की एक गंगा बन, आनन्दप्रद शीतल धारा की तरह  मन-मस्तिष्क और आत्मा में मीठे-मीठे एहसास और प्रसंग, चित्र की भाँति उकेरती और चलचित्र की भाँति उभारती चली जाती है। 
काम्बोजनामा - जासूसी साहित्य में वर्षों शीर्ष पर रहने वाले दिग्गज उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज की सहज-सरल जीवनी नहीं है। यह उनका जन्म से अब तक का जिन्दगीनामा भी नहीं है। यह तो वेद प्रकाश काम्बोज के लेखकीय जीवन के अनन्त अच्छे-बुरे, सरल-कठिन, खट्टे-मीठे प्रसंगों की बेहद खूबसूरत झांकी है, जिसके लिए मैं आदरणीय वेद प्रकाश

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

साक्षात्कार- वेदप्रकाश कांबोज

 मैं मानसिक रूप से एक बेहद आवारा किस्म का आदमी हूँ- वेदप्रकाश कांबोज
साहित्य देश इस बार प्रस्तुत कर रहा है लोकप्रिय साहित्य के सितारे आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज जी का साक्षात्कार। सन् 1958 में अपने लेखन की शुरुआत करने वाले कांबोज जी आज भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
     साहित्य देश ब्लॉग के लिए यह  साक्षात्कार युवा उपन्यासकार राम पुजारी जी ने लिया है।

1. आदरणीय वेदप्रकाश कांबोज जी आपका का नाम लोकप्रिय साहित्य में एक मील का पत्थर है। आपके पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग रहा है। यहाँ हम सर्वप्रथम जानना चाहेंगे आपके के जीवन के आरम्भिक पृष्ठों को जैसे बचपन, शिक्षा इत्यादि के बारे में।
- सबसे पहले तो इस बात को समझो कि जो तुम कह रहे हो नाम है। या ...मान लो कि नहीं है,  नाम का होना या न होना महत्त्वपूर्ण  नहीं है। महत्त्वपूर्ण होता है लेखन यात्रा पर इसका प्रभाव। समझदार वही  होता जो लगातार सीखता रहता है। फिर लेखन तो  एक सतत धारा है। इसमें मुझ से पहले भी बड़े लेखक रहे हैं और मेरे समकालीन भी रहे और बाद में भी रहेंगे। 
और जहां तक बचपन का सवाल है तो ये जान लो कि मेरा बचपन साधारण होते हुए भी विशेष था। असल में वो समय ही विशेष था। देश नया-नया आज़ाद हुआ था। संघर्ष के दिन थे। पढ़ने का शौक था स्कूली पुस्तकों से ज्यादा मैंने अन्य पुस्तकें ज्यादा पढ़ी।
अपने पुस्तकालय में कांबोज जी
अपने पुस्तकालय में कांबोज जी
2. कांबोज जी आपका झुकाव उपन्यास लेखन की तरफ कैसे हो गया, तब आपकी उम्र क्या रही होगी और आप क्या करते थे? 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

            “जासूस शब्द सुनते ही दो नाम मस्तिष्क की दीवारों पर उभरते हैं पहला शरलक होम्स और दूसरा इसके रचियता सर आर्थर कानन डॉयल । 221 B, बेकर स्ट्रीट में रहने वाला शरलक वह जासूस है जो अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर अनुमान लगाता है, तर्क करता है और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता है और अंत में अपराधियों का पता लगा लेता है ।”

            हिन्दी भाषा में जासूस के लिए गुप्तचर शब्द का इस्तेमाल किया जाता था बाद में इसकी जगह जासूस शब्द प्रचलित होता चला गया । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव और संचालन के लिए गुप्तचरों के एक ऐसे तंत्र की रचना की जोकि अभेद्य थी । उस काल खंड से लेकर आज के आधुनिक काल तक प्रशासन की सफलता गुप्तचरों अथवा जासूसों पर ही निर्भर रहती है । पुलिस विभाग में जब कोई व्यक्ति एक रकम के एवज में कोई सूचना या इन्फोर्मेशन देता है तो उसे इन्फोर्मर कहा जाता है । 

वार्ष्णय टाइम्स, दिसंबर 2020
वार्ष्णय टाइम्स, दिसम्बर2020
           विश्व युद्ध के दौरान जासूसों की देशभक्ति और जांबाजी के कई किस्से अखबारों और पत्रिकाओं के द्वारा लोकप्रिय होते चले गए । ये वो दौर था जब युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक देश दूसरे देश में अपने जासूसों के जाल को बेहद गुप्त रूप से बुनता था और जरूरी सूचनाएँ हासिल करने में लगा रहता था । 

सोमवार, 20 जनवरी 2020

'देव भक्ति' उपन्यास विमोचन



लेखक राम पुजारी जी के उपन्यास 'देव भक्ति- आस्था का खेल' का विमोचन विश्व पुस्तक मेला- दिल्ली में दिनांक 06.1.2020 को किया गया। यह उपन्यास गुल्ली बाबा पब्लिकेशन से प्रकाशय है।


सोमवार, 1 जुलाई 2019

3. साक्षात्कार- राम पुजारी

 आने वाला वक्त अच्छा होगा- राम पुजारी
साक्षात्कार शृंखला-03

'लव जिहाद..एक चिड़िया' और 'अधूरा इंसाफ...एक और दामिनी' जैसे सामाजिक उपन्यास लिख कर कम समय में ज्यादा चर्चित रहने वाले राम पुजारी जी की कलम में समाज की विकृतियों के प्रति एक स्वाभाविक आक्रोश दृष्टिगत होता है। 
     हमने राम पुजारी जी से विभिन्न विषयों पर साक्षात्कार रूप में चर्चा की जो यहाँ प्रस्तुत है। राम पुजारी जी वर्तमान में बठिण्डा (पंजाब) में एक  कम्पनी में कार्यरत हैं।


1. आप अपने बारे जरा बताइये?

     अपने बारे में..., मैं एक नवरतन कंपनी में इंजीनियर हूँ और पढ़ने का बहुत शौक है।
कॉमिक्स से लेकर लोकप्रिय साहित्य सभी पढ़ लेता हूँ। वैसे बता दूं लोकप्रिय साहित्य अभी पढ़ना शुरू किया।

2. किन लेखकों को पढा आपने?

     कॉमिक्स में फैंटम, ध्रुव, नागराज और चाचा चौधरी....और उपन्यास में शरतचंद्र बाबू, विमल मित्र जी, कम्बोज जी, शर्मा जी, पाठक जी, मंटो साहब, कृष्ण चन्दर जी, धर्मवीर भारती और अमृता प्रीतम जी...और भी हैं। पर...इनके सारे नहीं...कुछ-कुछ पढ़ें है।

डैन ब्राउन, चेतन भगत, सर आर्थर कॉनन डॉयल और मारियो पूजो इनके भी कुछ-कुछ पढ़ें हैं।

3.आपको सबसे ज्यादा कौन सी पुस्तक पसंद आयी।

     English में The God Father और हिंदी में गुनाहों का देवता।

4.  दोनों अलग है एक क्राइम फिक्शन है तो दूसरी लव स्टोरी।

      जी।  क्या करें पसंद-पसंद की बात है, जैसे ...कम्बोज जी के विजय ने बहुत प्रभावित किया... और गुनाहों के देवता की सुधा ने।

5. आपके मन में  लेखक बनने की इच्छा कब और कैसे उठी?

     लेखक होना या बनना... मैं मानता हूं कि अपने विचारों को अभिव्यक्त करना है। लिखता था...मैं शुरू से ही, लेकिन ऐसे नहीं कि बुक बन जाये। छोटी कहानियाँ-किस्से लिखता था, बाद कैरियर की दौड़ में समय ही नहीं मिला। फिर जब मेरे एक्सीडेंट हुआ तो मैं 4 महीनें बेड पर रहा, उसी दौरान समय बहुत था मेरे पास, जब लिखना शुरू किया तो बड़े भैया ने उसमें काफी सुधार किया और कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। फिर पुरानी आदत फॉर्म में आ गई, इस तरह से लेखक बन गया।

6. आपने किन लेखकों से प्रेरणा ली है? 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

लोकप्रिय साहित्य के लिए...

               साहित्य देश ब्लॉग के लिए
       इस असीम(लोकप्रिय साहित्य के) महासागर का अभी मैं अंजुली भर जल हूँ, इस बारे में कुछ लिखूं ये मेरा सौभाग्य है।
अपने से पहले वाले लेखकों को प्रणाम करते हुए मैं अपनी बात शुरू करता हूं (गलतियां सारी मेरी, बधाइयां सारी वरिष्ठ लेखकों की)।

   "वो किताब, किताब नहीं जिसका कोई पाठक न हो।
   वो किताब, किताब नहीं जो पुस्तकालय में सिर्फ सजती हों।"

      बड़े भैया के उपन्यासों को छुप छुप कर पढ़ना शुरू किया तो मैं सातवीं में था। संडे मॉर्निंग मिक्की माउस कार्टून देखने के लिए बेकरार रहता था और, इवनिंग में विक्रम-बेताल।
            कॉमिक्स की दुनियां में नागराज पैदा ही हुआ था और, सुमन-सौरभ, नंदन, राम-रहीम, राजन-इक़बाल औऱ बिल्लू, चाचा चौधरी जलवा बिखेर रहे थे।
             उसी दौरान भैया अपने  दोस्तों के साथ विजय की बातें किया करते थे। मेरी उत्सुकता का कोई ठिकाना नहीं था जब मैं भैया को तुकबंदी करते हुए विजय बनने की कोशिश करते देखा करता था।
         फिर किसी दिन ओमप्रकाश शर्मा जी का नॉवेल भी देखा। इतनी बड़ी-बड़ी किताबें कैसे पड़ते हैं भैया... वो भी बिना चित्रों के। ये सवाल था मेरा।
         फिर भैया पढ़ाई के बाद कंप्यूटर कोर्स करने लगे।
हमारी भाभी (जो बड़े भैया की भी भाभी थीं) उन दिनों रानू, गुलशन नन्दा और जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा के नॉवेल पढ़ा करती थीं। सवाल वही की बिना चित्रों के कैसे इतने मोटे नॉवेल पढ़ती हैं।
            खैर,  वक़्त गुज़रा (वक़्त हमेशा क्या तेज़ी से ही गुजरता है ?)। भैया अपनी ज़िंदगी में - नौकरी में बिजी हो गए। बड़ी भाभी जी बच्चों में और फिर ज़माना भी बदल गया-नॉवेल, कॉमिक की जगह टीवी आ गया। फिर भी यदा-कदा घर में कॉमिक्स और नोवेल्स के दर्शन हो ही जाते थे(ये शौक़ इतनी आसानी से जाता भी नहीं)।
           स्कूलिंग के बाद  मेरा इंजीनियरिंग में एडमिशन हुआ। चार साल दुनियां से बेखबर पढ़ाई और मौज मस्ती में गुजरे गए। पढ़ने का सिलसिला टूट-सा गया। फिर नौकरी औऱ छोकरी ने वक़्त न दिया।
             आशिकी में जब कुछ न कर पाए तो नौकरी ही कर लें-इस भावना से दिलो दिमाग को अपने ऑफिस में गिरवी रख दिया। नतीज़ा ये की इमेज अच्छी बन गयी, और हम भी सीनियर हो गए।
        ऐसे में एक दिन दिल्ली में निर्भया कांड हो गया जो मुझे रुला गया (मैं कई सालों से रोया नहीं था-पिता जी के न रहने पर भी)।
      फिर मेरा एक्सीडेंट हो गया(बहुत अच्छा हुआ!) और मैं 4 महीनें बेड पर रहा। ऐसे में मैंने वक़्त गुजरने के लिए कुछ लिखना-पढ़ना शुरू किया तो भैया ने कुछ पुराने नॉवेल दिए(उस वक़्त तो मना करते थे)। मैंने पढ़े औऱ पढ़ता ही गया।
सब पढ़ा-कम्बोज जी, ओमप्रकाश जी, पाठक जी, रानु जी, गुलशन  नंदा जी कुछ जीवनियां भी पढ़ी जो आबिद रिज़वी जी की लिखी हुई थीं।
             और आज तक पढ़ रहा हूँ सोचता हूँ कि हर चीज में कुछ न कुछ सकारात्मक होता है तो एक्सीडेंट ने मुझे लोकप्रिय साहित्य की दुनियां से परिचय करवा दिया। आजकल शरतचन्द्र, टैगोर, प्रेमचंद, कृष्णचंदर के आलवा वेद प्रकाश कंबोज जी,सुरेंद्र मोहन पाठक जी, जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी, वेदप्रकाश शर्मा जी सभी पढ़ रहा हूं। जो मिल जाता है चन्दर, आरिफ मरहवीं, कुशवाहा कांत, शिवानी पढ़ने की कोशिश करता हूँ।

अब समझ आने लगा है कि बिना चित्रों के कैसे इतनी मोटी नावेल पढ़ी जाती है/थी।

         ये एक अजीब ही दुनियां है। इसमें पुराने समय के दिग्गज और नए जमाने के लेखक दोनों ही अपनी लेखनी से मनोरंजन प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
            जब गृहकार्य से निपट कर महिलायें किसी लव स्टोरी को पढ़ती थीं और अपने सर्किल में इनके पात्रों के बारे में बतियाती थीं, ठीक ऐसे ही जैसे आजकल सीरियल की डिस्कशन होती है। वो दिन क्या कभी लौट के आएंगे--किसी ने पूछा था क्या ऐसा हो सकता है।
              होने को तो सभी कुछ हो सकता है पर उसके लिए तो हमें अपनी धरोहरों को बचाना होगा। उस सहित्य को जीवंत रखना होगा जिसकी मशाल को एक सदी से पहले के लेखकों ने हमारे हाथों में दी।
        इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर श्री गुरप्रीत सिंह जी ने साहित्य ब्लॉगस्पोट के जरिये एक शुरुआत की है -उस दौर के सुनहरे इतिहास को, किस्सों को, लेखकों की कहानियों को और लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इस लोकप्रिय साहित्य को संजोने की।
सौभाग्य से
कम्बोज जी, पाठक जी,आबिद जी, योगेश मित्तल जी, धरम राकेश जी, अनिल मोहन जी (अन्य किसी लेखक के बारे सूचित करें) आज हमारे बीच हैं जिनके सामने ये इतिहास बना था।

राम 'पुजारी'
( लेखक 'अधूरा इंसाफ...एक और दामिनी' तथा 'लव जिहाद...एक चिड़िया' जैसी चर्चित उपन्यासों के लेखक हैं।)
राम पुजारी

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