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बुधवार, 1 जून 2022

राजहंस उपन्यास साहित्य- महत्ता और प्रासंगिकता

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य- महत्ता और प्रासंगिकता

(राजहंस के विशेष संदर्भ में) डाॅ. ओकांरनारायण सिंह
  
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में उपन्यासों की विशिष्टताओं पर कभी कुछ नहीं लिखा गया। किसी भी साहित्य की व्याख्या में उसकी रचनाओं के संदर्भ में जब तक कुछ वर्णन न हो तो उस साहित्य को समझना कुछ क्लिष्ट हो सकता है। इसी संदर्भ में डाॅ.ओंकार नारायण सिंह (सेवानिवृत्त सह-आचार्य, इतिहास) उपन्यासकार राजहंस उर्फ केवलकृष्ण कालिया जी के उपन्यासों की विशिष्टताओं पर यह विशेष आलेख लिखा है, मेरे विचार से यह लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में प्रथम प्रयास है।

               साहित्य जगत के अन्तर्गत लोकप्रिय बनाम गम्भीर साहित्य विषयक विमर्श अनेकविध चर्चित होता रहा है। कथित बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा मान्य साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य को 'स्तरीय' तथा पॉकेट बुक्स रचनाओं को 'लुगदी साहित्य' की संज्ञा से विभूषित किया जाता रहा है। बिना इस तथ्य पर विचार किये कि तथाकथित स्तरीय साहित्य अपवादों के अतिरिक्त प्रायः पुस्तकालयों तक ही सीमित रहता है, जबकि लुगदी साहित्य की पहुँच घर-घर आबालवृद्ध-महिला तक रही है,जो उनके मनोरंजन का साधन बनने के समानान्तर चिंतन-विचार को भी प्रभावित करता रहा है। वस्तुत: यथार्थ साहित्य वह होता है जो सृजनात्मक मानदण्डों पर खरा उतरने के साथ जन-मन के शोध-बोध अथवा मनन-व्यवहार का भी आधार सिद्ध हो‌, यथा रामचरित मानस।

           इसी कसौटी पर प्रेमचंद, शरतचन्द्र, निराला, जयशंकर प्रसाद, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, सुदर्शन सिंह 'चक्र' प्रभृति कवि साहित्यकारों के समानान्तर लोकप्रिय उपन्यास जगत् के देवकीनंदन खत्री, इब्ने सफी, ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश काम्बोज, वेदप्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत, सुरेन्द्र मोहन पाठक, राजहंस, राजवंश, गुलशन नंदा, प्रेम बाजपेयी, रानू, कुशवाहा कांत, गुरुदत्त, आचार्य चतुरसेन शास्त्री इत्यादि की समीक्षा की जा सकती है।
           उपर्युक्त विचार दृष्टि से प्रस्तुत शोध-आलेख के अन्तर्गत उपन्यासकार 'राजहंस' उर्फ केवलकृष्ण कालिया  के उपन्यासों की रचना शैली एवं सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के साथ-साथ साम्प्रतिक प्रासंगिकता को निरूपित करने का प्रयास हुआ है। इसी संदर्भ में उनके मार्च -1974 में प्रकाशित 'सुहागिन' उपन्यास से सितम्बर 1998 ई. में प्रकाशित 'वापसी' तक के उपन्यासों को समाविष्ट किया गया है।
   'राजहंस' के उपन्यासों की विशिष्टता-  अन्तर्गत तक छू लेने वाले संवाद, मर्मस्पर्शी भाव-संवेदन तथा प्रत्येक परिवेश-व्यवहार का यथार्थ चित्रण रही है जिस शिद्दत से उन्होने 'सुहागिन, उल्फल, प्यासे सपने, प्यासी आँखें, धुआँ, तमाशा, मेहरबान, भीगा आँचल, नन्हां मसीहा, प्यासी आग और अहसास' उपन्यासों में ग्राम्य-संस्कृति सहजता, सरलता, सरसता का निरुपण किया है और उसी प्रखरता से मानवता, सुनीता, दलदल, तीसरा, आग, आहट, झूठे रिश्ते, भटकन, नसीब, दरिंदा, सौतेला, सेवक, राजा साहब, दुखियारी, आवारा, कोहरा, चिराग, कैसे कैसे लोग, तिनके इत्यादि उपन्यासों में नगरीय जीवन की विसंगति-विद्रूपता, साम्बन्धिक जटिलता, स्वार्थ, वासनान्धता विषयक अपसंस्कृति का भी निदर्शन किया है। 
     ग्राम्य आचार-विचार के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद के कथा साहित्य में वर्णित आमोद-प्रमोद राजहंस के उपन्यास अहसास, छोटी बहू के वैवाहिक वृतांतों में जीवन्त होता प्रतीत होता है। वन्य जीवन की दुरुहताएं जहाँ जोगी, तीसरा, प्यारा दुश्मन, मन मंदिर उपन्यासों में प्रकट हुयी है वहीं अभ्यारण्य संस्कृति की विशिष्टताएं 'प्यार नहीं बिकता', 'वापसी' आदि में अभिव्यक्त हुयी हैं। 
     इसी क्रम में कृषि-फार्मों के संघर्ष-द्वंद्व 'बिरजू, आशियाना, अपना कोई नहीं, बेगाना, संगदिल' उपन्यासों में संपूर्ण मार्मिकता से निर्दिष्ट किये गये हैं। 'जन्मदाता, टूटती दीवारें, फरिश्ता, बसेरा, दर्द' इत्यादि में पार्वत्य जीवन की संघर्षशीलता के समानान्तर 'शिकवा, अधूरी सुहागिन, अधूरा पति, दूरियां, आँधी' उपन्यासों में समुद्रतटीय संस्कृति का वैविध्य निरुपित हुआ है।
         एक ओर चाय बागान विषयक जानकारी 'उल्फत, जीवनसाथी, प्यारा दुश्मन' से उपलब्ध होती है तो दूसरी तरफ दस्यु जीवन का लोमहर्षक विवरण 'नजराना, योगी, तीसरा, सेवक' उपन्यासों में प्राप्त होता है। इसी प्रकार तस्कर प्रवृति की दुरभिसंधियों, अनाचार, विनाश का उल्फ़्त का वर्णन 'दलदल, मजबूर, तिनके, अधूरा पति, राजा साहब, आग' आदि उपन्यासों में अनुरेखन हुआ है। 
    बुर्दाफरोशी (मानवतस्करी) का निर्मम, एवं यंत्रणामय निरुपण 'कसक, उसके पीछे, उल्फ़्त, मनमंदिर, आँधी, छोटी बहू, स्वामी' में करने के समानान्तर देह व्यापारगत, दारुणता, विवशता का चित्रण 'उल्फ़्त, दलदल, अंधेरा, उसके साजन, अंधविश्वास, बेवफा दोस्त, तिनके और कैसे-कैसे लोग' में किया गया है। स
         समकालीन समाज में निर्देशित दबंगों के अत्याचार का मर्मान्तक दिग्दर्शन 'सुहागिन, धुँआ, सिसकता, सवेरा, छाव, नन्हां मसीहा, जलते आँसू, बिरजू, दूरियां' इत्यादि उपन्यासों में हुआ है।
     इसी प्रकार धर्म के चोले में मूर्तिमान पाप का आशियाना, स्वामी, छाव, दरिंदा  आदि में पर्दाफाश किया गया है। आॅनर किलिंग सरीखी सामाजिक बुराई अपने दुष्परिणामों सहित 'नजराना', 'नन्हां मसीहा' में अभिव्यक्त होने के समानान्तर घर-परिवार के अनैतिक संबंधों तथा ढकी-छुपी वेश्यावृत्ति का वास्तविक प्रकटीकरण एवं तत्जनित विभीषिकाओं का शिकवा, प्यासे सपनें, सुनीता, मेहरबान, प्यासी आँखें, मानवता, घायल, टूटती दीवारें, भटकन, पापी, आहट, दुखियारी, फैसला, तमाशा, अन्यायी, बड़ी माँ, हवेली की दुल्हन, कोहरा, सेवक, वापसी, अधूरा पति,  इत्यादि उपन्यासों में सजीव चित्रण हुआ है।
     सामाजिक विद्रूपता और दोहरे मापदण्ड 'तमाशा, अँधेरी राहें, अविश्वास, , भटकन, कड़वा सच, सौतेला, बुजदिल, अहसास, जीवन साथी, बेवफा दोस्त, अधूरा पति' इत्यादि में पूरी प्रबलता से निर्दिष्ट करते हुये उनके कारण अनेक जीवन प्रभावित होने का मार्मिक निरुपण किया गया है। 
    मन जीवन का कटु यथार्थ समूची भाव- संवेदना सहित 'शिकवा, प्यासी आँखें, बिरजू, सुनीता, नजराना, अंगारे, अपना कॊई नहीं, दीदी, प्यार नहीं बिकता, प्यासी आग, चिराग, जलते आंसू' में व्यक्त हुआ है। 
  नियतिगत विडम्बनाएं 'योगी, अविश्वास, तीसरा, अधूरी सुहागिन,  सूना आँगन, बेवफा दोस्त' में जीवन को आमूल चूल परिवर्तन कर देने वाली सिद्ध हुयी हैं।  विश्वस्त बनकर विश्वासघात के रूप में घर-घर की कहानी 'प्यासी आँखें, मानवता, दलदल, भटकन, जीवन साथी, आहट, प्यारा दुश्मन, धुँआ, तिनके, कैसे-कैसे लोग, प्यासी आग के अन्तर्गत शब्दित हुयी हैं। 
बेवफाई की फितरत को उकेरते 'शिकवा, मेहरबान, आहट, टूटती दीवारें,  बेगाना, दुखियारी, नसीब, संगदिल,  मेहंदी रचे हाथ, अहसास' आदि उपन्यासों के समानान्तर प्रीति समर्पण की प्रकाष्ठा 'सुहागिन, प्यासे सपने, बिरजू, अधूरी सुहागिन, झूठे रिश्ते, टूटा सपना, नसीब, प्यार नहीं बिकता, दूरियां, बसेरा' आदि में मुखर हुयी है।
      राजहंस के विविधरंगी रचना-संसार के अन्तर्गत जहाँ 'शिकवा, दलदल, पापी, जन्म दाता, आग' में उन्मुक्त महाविद्यालयीन परिवेश निर्दिष्ट होता वहीं 'मेहरबान, सूना आँगन, बसेरा' में फौजी जीवन की विशिष्टताएं निर्दिष्ट हुयी हैं। एक ओर राजनीतिज्ञों द्वारा युवावर्ग को स्वार्थ साधन बना दिग्भ्रमित तथा पतित करने का चित्रण 'आग, औरत, नासूर' आदि में हुआ है  तो दूसरी ओर कौतुहल, लालसा भरे मासूमों को पथभ्रष्ट कर उनका जीवन नष्ट करने के ज्वलंत उदाहरण 'कसक, जीवन साथी, छोटी बहू, तिनके, दूरियां, मनमंदिर, स्वामी' आदि में उपलब्ध होते हैं। इसी क्रम में दहेज के दंश समानान्तर दहेज कानून के दुरुपयोग का मार्मिक विवरण 'मेंहदी रचे हाथ' उपन्यास में निरुपित हुआ है। जबकि 'कड़वा सच' में घर- समाज में परिव्याप्त दबी-ढकी सड़ांध समूर्त होती है।
   समलैंगिकता की व्यथा 'झूठे रिश्ते', तथा 'दरिंदा' में वहाँ मर्मस्पर्शी रूप से अभिव्यक्त होती है वहीं ड्रग्स के दावानल में झुलसती नयी पीढी का यातनामय जीवन 'तीसरा, चिराग, प्यार नहीं बिकता, कैसे-कैसे लोग' में निरुपित हुआ है। अभिजात संस्कृति के वैभव का 'बड़ी माँ, हवेली की दुल्हन, टूटा सपना' उपन्यासों में निदर्शन उपन्यासों के समानान्तर दारिद्रय की वेदना एवं शोषण 'घायल, अँधेरी राहें, उसके पीछे, नन्हां मसीहा, दीदी, भीगा आँचल' आदि में मुखरित हुयी है। 'बेवफा दोस्त' में मित्रता जा चरम तथा 'आवारा' में प्रतिशोध की दारुणता निर्दिष्ट हुयी है। 
'प्यासी आँखें' में वैवध्य तथा पुनर्विवाह की कारुणिकता का विपरीत पदन 'तमाशा' में विधुर के बेमेल पुनर्विवाह के दुष्परिणामों के रूप में प्रकट हुआ है। संदेह के दंश से त्रस्त जीवन 'अधूरा पति, अविश्वास, दर्द और बेवफा दोस्त' के अन्तर्गत एक ऐसी भूल की भेंट चढ जाते हैं, जो कभी हुयी ही नहीं थी। 'जन्मदाता' येनकेन प्रकातेण वासनापूर्ति के परिणामस्वरूप उत्पन्न जीवन की व्यथा तथा वैधानिकता को प्रश्नबद्ध करती है। 'तमाशा' मृगमरीचिका ग्रस्त साम्बन्धिक जटिलताओं का दस्तावेज है।  'भटकन' नारी मन जीवन की अधूरी लालसाओं का कथानक है।  बचपन के प्यार की नियतिगत विडम्बना के निवारणार्थ सहारा देने के बावजूद सामाजिक प्रताड़ना से विचलित होकर बेसहारा  कर दिये जाने की कापुरुषता का रेखांकन 'बुजदिल' में किया गया है, इसी प्रकार हर्षित नारी के बलात्कारी के साथ ही सामाजिक रीति नीति की विवशतावश विवाह कर दिये जाने के बाद की मन:स्थिति अथवा संत्रास का जीवंत वर्णन 'सुहागिन' तथा 'सौतेला' में निर्दिष्ट हुआ। पति द्वारा पत्नी के पतन का कारण भूत होने की लिप्सा, कुत्सितता 'अँधेरी राहें, दरिंदा, तमाशा, दूरियां' में पिता द्वारा पुत्री तथा भाई द्वारा बहन के प्रति ऐसी ही वंचना क्रमशः 'अन्यायी, घाव, मेहरबान, अधूरा पति' में निर्देषित करते हुये संबंधों का काला पक्ष उजागर किया गया है। 
समकालिक लेखक-प्रकाशक द्वंद्व से सम्बद्ध विवादों का निरुपण 'अँधेरा' में हुआ है। पिता की भूलों का दुष्परिणाम पुत्र द्वारा और भाई की भूल का खामियाजा बहन द्वारा भुगतना क्रमशः 'फैसला, प्यास, दुश्मन, आवारा, मानवता, चिराग' में मार्मिक रूप से अभिव्यक्त हुआ है। इसी प्रकार हत्यारे द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर उससे जुड़े ‌लोगों के जीवन एवं सपनों की भी उसके साथ ही हत्या हो जाने का चिरंतन यथार्थ, उसके पीछे में शिसात्मक दृष्टि से प्रदर्शित हुआ है।
  सारांशत: लोकप्रिय साहित्य में परिगणित उपन्यासों के रचयिता राजहंस की भावप्रवण भाषा शैली, संवाद संवेदन, विषयचयन, मार्मिक व्यथा, अभिव्यंजना, प्रासंगिकता व यथार्थ प्रस्तुतीकरण उनके साहित्य को गंभीर साहित्य से किसी भी प्रकार कमत्तर नहीं रहने देता। प्रत्यत् स्तरीयता की कसौटी पर खरा सिद्ध होने के समानान्तर मात्र पुस्तकालयों की शोभा बढाने के स्थान पर जन-मन को आंदोलित करते हुये प्रचुर पाठक समुदाय अर्जित करता है। 
          प्रणय प्रतिगत वेदना, कसक के समानान्तर प्रेमिल भाव, संवेदनागत, उत्फुल्लता, हासविलास के हृदयस्पर्शी निदर्शन तो उनके अधिकांश उपन्यासों की विशेषता है। साथ ही परित्यकता, विधवा व अपहृत महिला के प्रति संकुचित दृष्टि-व्यवहार, पितृसत्तात्मक संस्कृति के अन्तर्गत नारी-पुरुष के विचलन के प्रति दोहरे मापदण्ड, धार्मिकता के कलेवर में पनपती कलुषता, संबंधों की ओट में बढते दुराचार और आसक्ति, शोषण, षड्यंत्रगत उभयपक्षीय प्रलोभन-पतन की अपसंस्कृति का भी प्रकटीकरण उनकी लेखनी द्वारा हुआ है।  समकालीन 'आॅप्रेशन ब्लू स्टार' के संदर्भ में रचित उपन्यास 'स्वामी', सुपारी किलिंग को निदर्शित करते हुये 'आग, दलदल, छोटी बहू, प्यासी आग, बिरजू, सूना आंगन' इत्यादि युगीन प्रासंगिक विषयों को संस्पर्शित करते हैं। काॅलेज परिवेशगत प्रदूषण 'पापी, अधूरी सुहागिन, आग, नासूर' आदि उपन्यासों में तथा नाश के पर्याय नशे से उद्भूत दारुण गाथा 'तीसरा, चिराग, आवारा' में अभिव्यक्त हुयी है। 
     कतिपय संवाद सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक कोटि के  प्रतीत होते हैं। यथा...
- तो मेरे साथ जी नहीं तो मेरे भी क्यों? (शिकवा)
-  जो प्यार करते हैं वे नफरत नहीं कर पाता करते,  जो नफरत कर सकते हैं, उन्हे प्यार कभी था ही नहीं। (प्यासे सपने)
- जो सह नहीं सकता, वह लिख भी नहीं सकता। वह केवल शब्दों का जाल बुन सकता है। (अँधेरा)
- जब भी दर्द सहने की सीमा से आगे निकलने लगता है, उसे पन्नों पर बिखेर कर देखता रहता हूँ। (मेहरबान)
- जिस खून की गर्मी में आज तुम स्वयं को गलाती चली जा रही हो, उसी का रंग चुराकर पन्नें रंगती चली जाओ। (भटकन)
- जिंदगी बेवफा हो सकती है,....पीड़ा बहुत वफादार होती है। (दीदी)
- उप‌न्यासकार कोई भी हो, यदि अनुभव के आधार पर लिखता है तो वह मनुष्य होकर मनुष्यों की बात ही करता है। (दुखियारी)
प्रस्तुति-
डाॅ.ओंकार नारायण सिंह, सेवानिवृत्त सह-आचार्य, इतिहास, 
पुरोहितों का वास,
समदड़ी रेलवे स्टेशन(जिला बाड़मेर)राजस्थान






रविवार, 20 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-11

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 10    ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
नाश्ता करके हम पटेलनगर के लिए निकले! भारती साहब घर पर नहीं थे! 
मैंने ऊपर खेल खिलाड़ी के आफिस में जाकर खेल खिलाड़ी की डाक देखी! पढ़ने में वक़्त लगता, इसलिए सारी डाक इकट्ठी करके एक बड़े ब्राउन लिफाफे में रख लीं और जवाब देने के लिए कुछ पोस्ट कार्ड साथ में डाल लिये! 
"अब किधर चलें?" वालिया साहब ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए मुझसे पूछा! 
"बैक टू पैविलियन...!" मैंने कहा! 
"नहीं यार, इतनी जल्दी घर जाकर क्या करेंगे? चलो, कनाट प्लेस चलते हैं!" और वालिया साहब ने स्कूटर पटेलनगर से शंकर रोड पर ले आये! फिर काफी देर सीधे चलने के बाद राम मनोहर लोहिया अस्पताल (तब के विलिंग्डन हास्पिटल) के पास से मोड़ लिया! 
फिर बंगला साहब गुरुद्वारे के निकट, बाहर ही फुटपाथ के समीप स्कूटर रोक दिया और बोले - "योगेश जी, आप यहीं रुको, मैं जरा मत्था टेक आऊँ!"
"मैं भी चलूँ..?" मैंने कहा! 
"फिर स्कूटर कौन देखेगा? पार्किंग में खड़ा किया तो ख्वामखाह टाइम वेस्ट होगा!"
"ठीक है!" मैंने कहा और स्कूटर के साथ खड़ा हो गया! वालिया साहब मत्था टेकने चले गये! स्वभाव से यशपाल वालिया भी धार्मिक प्रवृत्ति के थे! पर किसी विशेष गुरुद्वारे या मन्दिर जाने की उनकी आदत नहीं थी! चांदनी चौक गये तो शीशगंज गुरुद्वारे में मत्था टेक लिया! सेन्ट्रल सेक्रेटियेट गये तो रकाबगंज में मत्था टेक दिया! बिड़ला मन्दिर के निकट से गुज़रे तो वहाँ सिर झुकाने चले गये।

शुक्रवार, 18 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -10

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 9   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था -  ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता! 
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये! 
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में  जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!  

गुरुवार, 17 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -09

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 8   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
"तूने तो गद्दारी करने की ठान ली है, पर हमें तो व्यापार करना है! सारी खबरें रखनी ही पड़ेंगी!" गौरी भाई साहब मुस्कुराते हुए गर्दन हिलाते हुए बोले! 
"मैंने कौन सी गद्दारी कर दी...?" मैंने पूछा! 
"अब मेरा मुंह मत खुलवा!" गौरीशंकर गुप्ता बोले - "हमारे दुश्मनों के यहाँ रविवार को भी चाय नाश्ता करने पहुँचा हुआ था!  या कह दे नहीं गया था - रविवार को तू विजय पाकेट बुक्स में...!"
"जगदीश जी ने बताया है कुछ.,.?" 
"अरे जगदीश जी को देख कर तो तू और  राजभारती टी स्टाल में घुस गये थे! पता चलने पर राज भाई ने एक लड़के को साइकिल से राणा प्रताप बाग भेजा था! उसने तुझे भी वहाँ देखा था और बाकी सबको भी! चल, अब भी कह दे कि तू नहीं गया था विजय पाकेट बुक्स में...!" गौरीशंकर गुप्ता निरन्तर मुस्कुरा रहे थे! 
"असली जासूस तो आपलोग हो!" मैं हंसा - "आपने तो पूरी जासूसी एजेन्सी खोल रखी है! योगेश मित्तल सांस  भी लेता है तो आपको पता चल जाता है - कहाँ पर खड़े होकर सांस ली थी! पर उस दिन आप मुझे दरीबे में छोड़, अचानक कहाँ गायब हो गये थे...?"
"हम पटेलनगर गये थे, यह तो जगदीश जी ने तुझे बता ही दिया था बेटा... फिर क्यों पूछ रहा है?" गौरीशंकर गुप्ता बोले! राजकुमार गुप्ता इस बीच बिल्कुल खामोश रहे, लेकिन वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे! 

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-08

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 7   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
राणा प्रताप बाग पहुँचकर, फिर उसी हाल में महफ़िल जमी, जहाँ किताबों का भण्डार था और वीपी पैकेट और रेलवे के बण्डल तैयार किये जाते थे। 
आज की महफ़िल में वासुदेव और हरविन्दर नहीं थे! वे वापस कानपुर और लुधियाना चले गये थे, लेकिन आज की महफ़िल में इन्देश्वर जोशी भी हम सबके साथ ही एक फोल्डिंग कुर्सी पर बैठा था, जैसे वह विजय पाकेट बुक्स में नौकरी करने से पहले साथ ही बैठा करता था।
थोड़ी देर बाद कुछ और लोग आ गये, जिन्हें मैं नहीं जानता था, किन्तु वे सभी उम्रदराज थे, अत: मेरे लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि वे सब विजय कुमार मलहोत्रा के पुराने एवं घनिष्ठ मित्र हैं। 
विजय जी उन्हें राजहंस के हिन्द व मनोज में छपने का किस्सा सुनाने लगे। 
उन सब बातों में न मेरे लिए कुछ नया था, ना ही बताने योग्य नया। 
अचानक वालिया साहब ने एक दस का नोट इन्देश्वर जोशी की ओर बढ़ाते हुए धीरे से कहा - "इन्देश, यार मेरे लिए एक पान ले आ..!" फिर मेरी ओर देख कर बोले -"एक योगेश जी के लिए भी..!"
"आओ योगेश जी, चलते हो?" इन्देश ने उठते हुए मेरा हाथ थामते हुए मुझसे कहा -"चलो, पान ले आयें।"
मैंने पहले भी बताया है - मैं एकदम मस्तमौला था! छोटी-बड़ी गाड़ियों में बैठने और घूमने वालों से भी मेरी दोस्ती थी तो फटे और मैले कपड़ों में दिखने वालों से भी बहुत मुहब्बत भरे रिश्ते थे मेरे। 
       और एक आदत उन दिनों मेरी जिन्दगी का खास अंग थी, वह यह कि कितना ही जरूरी कहीं जाना हो, अचानक कोई भी किसी काम को कहे, मना करना तो मैंने सीखा ही नहीं था! 
यहाँ तक कि जब मैं बंगला साहब गुरुद्वारे के सामने कनाट प्लेस में रहता था, तब कई अड़ोसी-पड़ोसी मुझसे कभी कोई  मामूली सा बाज़ार का काम सौंप देते थे तो चाहें कितना ही व्यस्त रहा होऊँ, कभी इन्कार नहीं करता था! वहाँ के पड़ोसियों ने बाज़ार से आधा किलो चीनी ला देने और स्टुडियो से फोटो ला देने ही नहीं, रीगल या रिवोली सिनेमा हॉल में फिल्म 'हाऊस फुल' रही हो तो मुझसे फिल्मों के टिकट तक ला देने का काम लिया था!
मेरी कनाट प्लेस के सिनेमा हॉल्स के गेटकीपर्स से भी उन दिनों अच्छी खासी जान-पहचान थी, जिसे आप दोस्ती भी कह सकते हैं।

बुधवार, 16 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 07

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 6  ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

आप सौ परसेन्ट एक ईमानदार और सच्चे इन्सान हैं, वफ़ादार और अच्छे इन्सान हैं, लेकिन कभी कभी वक़्त आपके खिलाफ हो जाता है और जब वक़्त आपके खिलाफ हो, आपकी ईमानदारी में दूसरे को बेईमानी नज़र आती है। सच्चाई में झूठ नज़र आता है। ऐसे समय कोई सफाई देना या अपने अज़ीज़ को यह समझाना कि आप ईमानदार हैं, सच्चे हैं, शुभचिन्तक हैं, दोस्त हैं, सब बेकार होता है। ऐसे समय खामोश रह जाना ही सबसे उत्तम कदम होता है।
         यह सब मैं इसलिये बता रहा हूँ, क्योंकि जो-जो लोग, मेरी पीठ पीछे भी हमेशा मेरी तारीफ करते थे, सराहना करते थे - राजहंस और हिन्द - मनोज के विजय पाकेट बुक्स से विवाद में एकदम अकारण मुझे शक की निगाहों से देखने लगे थे। हालांकि बाद में, मैं उन सबके लिए भी वही पहले वाला प्यारा-दुलारा योगेश मित्तल बन गया था, लेकिन कुछ समय तक मुझे कड़वाहटें, जिल्लतें और उपेक्षा भी सहनी पड़ी थी। 
       विजय पाकेट बुक्स में वासुदेव और हरविन्दर से भारती साहब ने उन्हीं दिनों मेरा प्रथम परिचय कराया था। बाद में तो हम कई बार मिले, पर उस रोज भी वासुदेव और हरविन्दर बहुत मुहब्बत से मिले। हाथ पकड़ कर वासुदेव ने कई बार हाथ हिलाया।
 उसने यह भी कहा -"आपका नाम तो कई बार सुना था। मिलने का अवसर पहली बार मिला है।"
हरविन्दर ने भी हाथ मिलाया, पर सहज अन्दाज़ में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाकर छोड़ दिया। 
विजय कुमार मल्होत्रा उस समय एक साइड में खड़े, इन्देश्वर जोशी से पहले से, विजय पाकेट बुक्स में काम कर रहे पैकर को, वासुदेव, हरविन्दर, सावन और मीनू वालिया की पुरानी सभी किताबों के दो-दो बण्डल निकाल कर कार की डिकी में रखने का आदेश दे रहे थे। उस समय मुझे विजय कुमार मल्होत्रा के उस आदेश का मतलब समझ में नहीं आया था, पर बाद में सब पता चल गया था। 
     वे सारी किताबें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए निकलवाई जा रही थीं। दरअसल विजय कुमार मलहोत्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हमेशा राजहंस की किताबों की बिक्री पर ही ज्यादा जोर देते रहे थे, लेकिन अब उन्हें समझ आ गया था कि उन्हें अपने सभी लेखकों पर बराबर का जोर लगाना चाहिए था। 
उस समय विजय कुमार मल्होत्रा की पीठ मेरी तरफ थी। अपने वर्कर को सब कुछ समझाने के बाद जैसे ही वह पलटे, उनकी नज़र मुझपर पड़ी और छूटते ही वह बोले - "ये मनोज का जासूस कब आया?"
मुझे काटो तो खून नहीं। 

सोमवार, 24 मई 2021

कहानी उपन्यासकरा राजहंस की-05

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 4   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
यूँ तो कोई भी लेखक प्रकाशकों द्वारा लेखक के नाम के ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन और ट्रेडमार्क नाम में किसी भी लेखक की कृति के प्रकाशन की परिपाटी का समर्थन शायद ही करे, पर उन दिनों पाकेट बुक्स ट्रेड में दो लेखक ऐसे थे - जो ट्रेडमार्क लेखकों के सिस्टम के  सख्त खिलाफ थे! 
एक वेद प्रकाश शर्मा और दूसरा मैं! मौका मिलने पर दोनों ही ट्रेडमार्क प्रचलन के विरुद्ध जी भरकर ज़हर उगल देते थे! 
जब हम दोनों आपस में बातचीत करते तो ऐसे प्रकाशकों के खिलाफ मन की भड़ास भी खूब निकालते थे! 
हमारी नज़र में एक ट्रेडमार्क नाम टाइटिल कवर पर देकर, अन्दर किसी भी उपन्यासकार का उपन्यास छापना, पाठकों से सरासर चीटिंग था! धोखा था! 
हमें इससे बेहतर पैटर्न तो वह लगता था, जब प्रकाशक कोई भी नाम एक पत्रिका के रूप में रजिस्टर्ड करवा लेते थे और उसमें किसी भी लेखक का उपन्यास छाप देते देते थे, किन्तु तब वह अन्दर के पहले या तीसरे पृष्ठ पर असली लेखक का नाम भी अवश्य छापते थे!
विजय पाकेट बुक्स बनाम राजहंस, हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के मुकदमे के समय ट्रेडमार्क पर अपने विचारों के मामले में, मैं कन्फ्यूज-सा हो गया था, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा तब तक अपने स्टैण्ड पर कायम रहे, जब तक कि उन्होंने और सुरेश चन्द जैन ने पार्टनरशिप में तुलसी पाकेट बुक्स की शुरुआत नहीं की!
मुझ में और वेद प्रकाश शर्मा में सबसे बड़ा फर्क यह था कि मैं प्रकाशकों के सामने ट्रेडमार्क विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार कभी नहीं रखता था, सिर्फ नजदीकी दोस्तों के सामने ही अपने विचार प्रकट करता था, जबकि वेद प्रकाश शर्मा प्रकाशकों के सामने भी बेहिचक अपने उद्गार प्रकट कर देते और ट्रेडमार्क सिस्टम और नकली उपन्यासों के लिए प्रकाशकों को ही सौ परसेन्ट दोषी करार देते थे।

शनिवार, 22 मई 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-01

राजहंस...एक शाश्वत लेखक
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विजय पॉकेट बुक्स की स्थापना सन 1967 में हुई और उन्होंने  सन 1971 में राजहंस के ट्रेड नेम का रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में अर्जी दी। रजिस्ट्रेशन बहरहाल तब नहीं हुआ लेकिन उन्होंने इस नाम से विभिन्न घोस्ट लेखकों से 8 किताबें लिखवा लीं थी।

केवल कृष्ण कालिया, विजय पॉकेट बुक्स के उपन्यासों के कमीशन एजेंट थे। वह उपन्यास  की बुकिंग आर्डर लाते और अपना कमीशन प्रकाशन से कमा लेते।

सन 1974 के आसपास, कालिया ने भी उपन्यास लिखने की इच्छा जाहिर की और विजय पॉकेट बुक्स से राजहंस नाम से ही लिखने की अनुमति मांगी। 

विजय पॉकेट बुक्स ने एग्रीमेंट द्वारा लिखित कई प्रतिबंध लादते हुए केवल कृष्ण कालिया को यह अनुमति दे दी। जिसके अनुसार कालिया किसी भी अन्य पार्टी-प्रिंटर या प्रकाशक के लिए नही लिख सकते। वह इस नाम का प्रयोग लेखक के रूप में स्वयं के लिए भी नहीं कर सकते न ही किसी और को लिखने के लिए उधार दे सकते हैं। इत्यादि इत्यादि।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

राजहंस

राजहंस अपने समय के एक चर्चित उपन्यासकार थे।
सामजिक उपन्यासकारों में एक अपना एक अलग व विशेष स्थान था।
राजहंस के डायमंड पॉकेट बुक्स- से प्रकाशित कुछ उपन्यास ।
1. स्वामी
2. कोहरा
3. संगदिल
4. नसीब
5. तिनके
6. नासूर
7. सिसकता सवेरा
8. चिंगारी
9. दूरियाँ
10. औरत
राजहंस के तुलसी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास
11. कांटों भरी राह
12. नया रास्ता
13. सीने की जलन
14. राहें और मंजिलें
15. कागज के फूल
16. पाप और पूजा
17. नामुराद
18. फर्ज की दीवार
19. ममता का चिराग
20. आन-बान
21. धूप-छांव
22. प्रहरी
23. संध्या
24. उङती पतंग
25. दहलीज
26. मुसाफिर
27. लाङली
28. आंख का तारा
29.
30.
31.
32.
33.
34.
36.
37.
38.
अशोक पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास
1. सूना आंगन
2. उल्फत
3. उसके पीछे
4. अविश्वास
5. अधूरा पति
6. तिनके
7. घायल
8. कड़वा सच (अशोक पॉकेट बुक्स से प्रकाशित प्रथम उपन्यास) 
9. कसक.       (अशोक पॉकेट बुक्स से द्वितीय) 
विजय पॉकेट बुक्स से प्रकाशित राजहंस के उपन्यास


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