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मंगलवार, 13 जुलाई 2021

आबिद लखनवी

 नाम- आबिद लखनवी

  लोकप्रिय साहित्य के विकिपीडिया कहे जाने वाले आबिद रिजवी साहब ने कभी 'आबिद लखनवी' नाम से भी उपन्यास लिखे थे।

     आबिद जी का कहना है- यह मेरा आरम्भिक समय था, तब में सामाजिक उपन्यास लिखा करता था।

     उसी आरम्भिक समय में कुछ जासूसी उपन्यास भी‌ लिखे थे। आबिद जी तब इलाहाबाद के निवासी थे।

 राम प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'जासूस लोक' पत्रिका के प्रवेशांक में आबिद लखनवी का एक उपन्यास प्रकाशित हुआ था। इस पत्रिका के संपादक राय नरेन्द्र बहादुर थे।

     आबिद लखनवी के उपन्यास
1. चन्द्रलोक का हत्यारा (मार्च 1967)
2. तीस मार खाँ (जनवरी 1963)
3. जहरीले बादल  (जनवरी1963
आबिद रिजवी अन्य लिंक-


मंगलवार, 15 जून 2021

वी. एम. अस्थाना

वी. एम. अस्थाना - संक्षिप्त चर्चा
आबिद रिजवी
वी.एम. अस्थाना  लेखन के शुरुआती समय से छपने तक  'हैलन' के उपन्यासों के साथ अनुवादकनामरूप से चिपके रहे जैसे इब्ने सफ़ी  हिन्दी नॉवलों (जासूसी दुनिया ) के साथ 'प्रेम प्रकाश ' का नाम। 'हैलन' के उपन्यासों के साथ वी.एम.अस्थाना का नाम उसी तरह सोने की अँगूठी मे जड़े नगीने की तरह शोभायमान - मूल्यवान साबित होता रहा जैसे गौरी पॉकेट बुक्स , मेरठ के केशव पण्डित के उपन्यासों के साथ  'केशव पण्डित'।
    मूल लेखक (राकेश पाठक, जो केशव पण्डित के नाम से भी लिखते थे) ने हरचन्द (भरसक) कोशिश की कि वे अपने नाम से ख़्याति अर्जित कर सकें , पर सफल न हुए। वी.एम.अस्थाना ने भी अपने नाम से मशहूरियत पाने के इच्छा लेकर  नॉवल लिखे। पर कामयाब न हुए।
      वी.एम.अस्थाना कानपुर के एक बैंककर्मी थे। सतीश जैन की उसी तरह कि खोज थे जैसे गौरी पॉकेट बुक्स वालों की राकेश पाठक। दोनों को ही उनके प्रकाशकों ने हरेक से गोपनीय रखने की पूरी चेष्टा की। ....पर, इस वाकिया नवीस से सब कुछ खुला रहा, इसकी वजह ये रही कि उक्त दोनों प्रकाशकों ने, उपर्युक्त संदर्भित दोनों लेखकों के शुरुआती नॉवल छापने से पहले मुझसे पढ़वाने और सुधरवाने में  'हरि इच्छा' मानी। गौरी पॉकेट बुक्स वाले अंतिम समय तक इस बात को प्रकाशकों और लेखकों के बीच कई बार खुले तौर पर कहा -- "आबिद रिज़वी ने केशव पण्डित का पहला उपन्यास को सुधारने का इतना अमॉउण्ट वसूला कि जितना मैंने उसके लिखने वाले को पारश्रमिक रूप में भी न दिया था।" अब पता नहीं ये कथन लेखक की डिवैल्यूएशन के लिए था या मेरी वैल्यूएशन केे लिए।  वैसे मेरा आंकलन पहले वाले विचार पर ही  है।
  @आबिद रिजवी के स्मृति कोष से
महत्वपूर्ण तथ्य


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शनिवार, 25 मई 2019

आबिद रिजवी जी- तब और अब

एक नया स्तंभ है 'तब और अब', जिसमें कोशिश रहेगी लेखकगण के नये और पुराने चित्रों को दर्शाने की।
    इस स्तंभ का आरम्भ आबिद जी के चित्र के साथ कर रहे हैं।

समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। समय आदमी के चेहरे को बदल देता है।
     अब प्रिय आबिद जी की तस्वीरें ही देख लीजिएगा समय के साथ बहुत बदल गये, बस नहीं बदली तो उनकी मूँछें
    मूँछें कल भी शान थी, आज भी शान हैं।
    मूँछें आबिद जी की विशेष पहचान हैं।

                          


बुधवार, 25 अप्रैल 2018

आबिद रिज़वी- जीवन परिचय

नाम-  आबिद रिज़वी
पिता- श्री जव्वाद हुसैन(सैनिक सेवा, 07 राजपूताना रायफल्स Retd.)
माता- श्रीमती एज्जाज बानो
भाई - सैयद सज्जाद हुसैन (फ्लाइंग आफिसर I.A.F, (Retd.)
बहन- मुमताज़ बानो(सरकारी शिक्षिका- सेवानिवृत्त)
जन्मतिथि- 06 -फरवरी-1942 ई.
शिक्षा- एम. ए.- हिंदी( प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश-1963ई.)
        - बी.एड.(पंजाब युनिवर्सिटी-1965ई.)
शिक्षण कार्य-नेशनल इण्टर काॅलेज, महौदा, हमीरपुर ( उत्तर प्रदेश)
प्रथम उपन्यास-अनजानी-अनचाही राह( सामाजिक उपन्यास)
परिवार- तीन पुत्रियां- राना जैदी, जैदा रिज़वी, हिना रिज़वी
पत्नी- स्वर्गीय गौहर जहाँ (गवर्नमेंट गर्ल्स इण्टर काॅलेज- बागपत, Retd.)
पता- म.नं.- 258, सेक्टर-10, शास्त्री नगर, मेरठ, उतर प्रदेश-
संपर्क-8218846970,  9837408357
ईमेल- abidrizvi102@gmail.com
साइट- abidrizvi.com
लेखन कार्य- उपन्यास, जीवनी,
अनुवाद- उर्दू और अंग्रेजी की विभिन्न रचनाओं का हिंदी में अनुवाद।
आबिद रिजवी जी के उपन्यास

1.अनचाही-अनजानी राह
2. धुंधला चेहरा-धुंधला रूप
3. अतीत की परछाईयां
4. सरिता।
5. कोई आवाज न दे
6. दरवाजा खोल दो (प्रथम भाग)
7.  बंद गली का रास्ता (द्वितीय भाग)
8. संगमरमर के घोंसले
9. सवेरा होने वाला है।
10. अंगङाई
 (उपन्यास क्रम 5-10 तक, नीलम पॉकेट बुक्स से)
11. मेरी मदहोशी के दुश्मन (रवि पॉकेट बुक्स, 2018) 
12. इंका आग के शोलों में
13. इंका खतरे में-
14. इंका का हंगामा
15. इंका का प्रतिशोध
(क्रमांक 12,13 मूलकृति के लेखक जमील‌अहमद खान हैं।)
16. पहला शिकार (प्रथम जासूसी उपन्यास)
17. दूसरा शिकार
18. खूबसूरती का कत्ल
19. प्रोफेसर की हत्या
20.  विक्रांत और खूनी खजाने का षड्यंत्र
21.  वतन की वापसी
22. विक्रांत और मुल्क के सौदागर (प्रभात पॉकेट बुक्स, मेरठ)
(विभिन्न प्रकाशन संस्थानों के लिए काॅमिक्स लेखन)
आबिद रिजबी जी का साक्षात्कार- आबिद रिजवी

विकिपीडिया लिंक

शनिवार, 4 नवंबर 2017

प्यारे लाल आवारा - संस्मरण

प्यारे लाल 'आवारा ' - संस्मरण

इलाहाबाद के कीडगंज में निवास और प्रकाशन था । अत्यन्त निर्धन , बैकवर्ड क्लास परिवार में जन्म हुआ था।
      सिरकी  बाँस को छीलकर उसके परदे बनाना उनके परिवारी जनों का कार्य था। जब मैं उनके सम्पर्क में आया तो वे बी.ए. पास, चालीस साल के करीब सुखी परिवार वाले थे, पर बहुत अमीर नहीं।
   रूपसी प्रकाशन, बिरहाना रोड, कीडगंज , इलाहाबाद पता लिखा जाता था। उस दौर में निकलने वाले नाॅवल,जासूसी सामाजिक सभी मैगज़ीन कहलाते थे। हर माह निश्चित तिथि को निकलते थे। ज़रूरी इसलिए होता था क्योंकि पोस्टल सुविधा प्राप्त होती थी। बंडल बनाकर,पोस्ट आफिस से आए बैगो में भरकर, रिक्शे पर लादकर पोस्ट आफिस ले जाने कि प्रक्रिया अपनाई जाती थी । एक रूपया पच्चीस पैसे व पचहत्तर पैसे, इस दो कैटेगरी में मैगजीन होती थी।  प्यारे लाल जी के यहाँ से एक उनका लिखा उपन्यास हर माह रूपसी(पत्रिका) में निकलता था, दो अन्य पचहत्तर पैसे वाली मैगज़ीने -- रहस्य व रोमांच होती थी।
       प्यारे लाल जी खुद प्रकाशन के काम में दखलअंदाजी करना पसन्द न करते थे। मालिक वे ही थे, पर सारा काम उन्होंने अपने छोटे भाई श्याम लाल को सौंप रखा था। वे सुबह आठ बजे सोकर उठने के बाद नीचे आफिस में आते थे । आफिस,एक तरह से उनकी बैठक थी। जब तक वे बैठक में हैं,बैठक चलती रहती थी। बैठक खाली है तो मानिये प्यारे लाल जी नहीं है। रिक्शे पर घूमने, मिलने- जुलने निकल गये। निकल गये तो निकल गये, कोई बता नहीं सकता कि कब आयेंगे।  रिक्शे के अलावा कोई और सवारी का साधन उन दिनों न था। कार, स्कूटर ,मोटर साइकिल...राम का नाम लीजिए , या तो साईकिल कुछ अच्छी हैसियत तो रिक्शा । मैं सन् साठ- पैंसठ की बात कर रहा हूँ। बड़े सादा मिजाज़, लम्बे बाल पीछे को काढ़े हुए। एक बार कंघा मारकर ऊपर से उतर आए तो फिर सारा दिन हाथ से या झटककर बालों को ऊपर ले जाने का खुद का स्टाइल।  चौड़ी मोहरी का पायजामा, लम्बा साफ़-सफ़्फाफ़ कुरता, पैरों में काली, अँगूठे वाली चप्पल । सफेद कुरते- पायजामे से हमेशा एक सा प्यार। कभी किसी और पोशाक में नहीं देखा । घर- आफ़िस में हैं तो लिज़मिज़ा कुरता- पायज़ामा भी चलेगा।  बाहर जा रहें हैं तो इस्त्री युक्त। कपड़े घर मे धुलते थे, इसकी सनद यह की बालकनी मे हर दिन धुला कुरता- पायजामा एक जोड़ी सूखता नज़र आता था। कुरता- पायजामा मोटे सूत का। जाड़े में भी वही पोशाक, अलबत्ता बस खादी की जैकेट का इज़ाफा हो जाता था।
     ‌कद लम्बा, छ: फुट से निकलता हुआ,  दो-तीन इँच ऊपर । सनद यह है कि जब उनके करीब जाकर खड़ा होता तो उनके कंधे तक खुद को आँकता।
    जब मैं उनके पास जाता-आता था तो एक नौ-दस वर्षीय पुत्री के पिता थे। पुत्री का नाम नीता। मैं सुबह आठ बजे पहुँचा नहीं कि वे उतरकर आ रहे होते या मिनट दो मिनट बाद आ जाते। गुरू- शिष्य की गरिमा युक्त औपचारिकता का निर्वाह। मेज के पीछे हमेशा एक जगह मौजूद कुर्सी पर आसीन होते ही हल्की आवाज़ में पुकार--" श्याम... "
और मैंने हाथ बढ़ाकर कहा--" मैं लाता हूँ। "
उन्होंने नोट बढ़ाया और मैं सिगरेट लेने के लिए क़दम बढ़ाए। विल्स सिगरेट पीते थे। मैंने पैकेट लाकर दी , सिगरेट शुरू।
फिर आवाज़ दी,"नीता "
नीता चाय के दो कप के साथ हाज़िर। एक कप मेरी ओर बढ़ाई , दूसरी खुद शुरू। इस तरह शुरू हुई गुरू जी की दिनचर्या। रात को लिखते थे। कभी सारी-सारी रात, इस बात की चुगली उनकी सुबह आँखों की सुर्खी, सोई- सोई आँखें कर देती थीं। शाम को सिविल लाइन स्थित काफी हाउस में जाना ज़रूरी होता था। उस दौर में सैकड़ों साहित्यकार के रूप मे ख्याति प्राप्त हो, लुगदी साहित्य का यशस्वी कथाकार हो, कवि हो या राजनीति का नया-पुराना खिलाड़ी...काफी हाऊस में देखा जाना शान की बात समझता था ।....आगे फिर कभी..

@ आबिद रिजवी जी के स्मृति कोष से।

आबिद रिजवी©
- लेखक, प्रकाशक की अनुमति के बिना इस आलेख का अन्यत्र किसी भी प्रकार का प्रकाशन अमान्य और कानूनन अपराध है।

गुरुवार, 8 जून 2017

आबिद रिजवी - साक्षात्कार श्रृंखला-01

मैं राही की तरह चलता रहा, पीछे का निशान मिटता रहा।- आबिद रिजवी
साक्षात्कार शृंखला-01
    साहित्य देश ब्लॉग साक्षात्कार की इस प्रथम प्रस्तुति में आपके समक्ष लेकर आया है लोकप्रिय साहित्य के इन्साक्लोपीडिया आबिद रिजवी से हुयी बातचीत का साक्षात्कार रूप
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मेरठ निवासी आबिद रिजवी जी लोकप्रिय उपन्यास जगत के एक ऐसे शख्स हैं जिनके पास उपन्यास जगत की यादों का विशाल खजाना है। अगर आप एक बात पूछोगे तो वे उससे संबंधित कई आख्यान आपको सुनाते चलेंगे।
रिजवी साहब के पास जितना यादों का विशाल खजाना है उतने ही वे सहृदय और सरल व्यक्तित्व के स्वामी भी हैं।
  मेरी उनसे कुछ दिन पूर्व उपन्यास साहित्य को लेकर चर्चा हुयी, हालांकि यह चर्चा मुख्य तौर पर उनके जीवन से संबंधित ही थी।
  आबिद रिजवी जी की छात्रावस्था में ही लेखन की ओर रूचि थी और वे कक्षा 12 के दौरान ही विभिन्‍न पत्र- पत्रिकाओं के लिए अपने आलेख व कहानियाँ भेजने लग गये थे। उसके बाद लेखन का चला यह दौर आज तक यथावत जारी है।
मूल रूप से इलाहाबाद के निवासी आबिद रिजवी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद से ही पूर्ण की और वहीं से ही अपनी लेखन यात्रा की शुरुआत की।
उन्होंने बताया की तब के प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यासकार प्यारे लाल आवारा से मेरा संपर्क हुआ। प्यारे लाल आवारा तब अधेङावस्था की ओर थे और मैं युवा अवस्था की ओर। मैं सुबह आठ बजे ही उनकी सेवा में हाजिर हो जाता और उन्होंने ही मुझे लेखन की विभिन्‍न बारीकियों से परिचित करवाया।
    मैं तब विद्यार्थी ही था और मेरी आर्थिक स्थिति को देखते हुए प्यारे लाल आवारा ने मुझे तात्कालिक प्रसिद्ध पत्रिका ' जासूसी दुनिया' के कार्यालय भेज दिया। जहाँ मेरा संपर्क उर्दू के प्रसिद्ध लेखक इब्ने सफी और इब्ने सईद से हुआ। ये दोनों प्यारे लाल जी के मित्र थे।
    रिजवी साहब की प्रतिभा को देखते हुए इन्होंने प्यारे लाल आवारा जी को कहा था ये लङका तो " .... ना ए तराश है।" अर्थात यह तो एक ऐसा हीरा है जिसे तराशा नहीं गया।
  और इस हीरे ने इस कथन को सत्य भी साबित कर दिया। आप स्वयं देखिए जो शख्स इब्ने सफी से लेकर सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश शर्मा से होते हुए कंवल शर्मा, सबा खान और नये लेखक अनुराग कुमार जीनियस के समय में भी उतनी ही ऊर्जा से कार्यरत है। वहीं रिजवी साहब के जमाने के असंख्य लेखक आज गुमनामी के अंधेर में खो गये। खैर.......
सन् 1963-64 के समय में रिजवी जी को जासूसी दुनिया के कार्यालय से 60 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।
  स्नातक स्तरीय शिक्षा इन्होंने गोरखपुर के .....काॅलेज से पूर्ण की जहां इनका परिचय हिंदी के विद्वान डाॅ. रामकुमार वर्मा पद्मविभूष, जगदीश गुप्त और डाॅ. रघुवंश से हुआ। रिजवी साहब अपने समय के युनिवर्सिटी में एक मात्र मुस्लिम युवक थे जो हिंदी के छात्र थे।
इस विषय पर उन्होंने बङी ही शांति से कहा, -" मुझे आत्मसंतोष है की मुझे साहित्य जगत का सानिध्य मिला।"
यही सानिध्य आबिद रिजवी को बहुप्रतिभा वाला लेखक बनाता है।
इन्होंने युवावस्था में ही चार उपन्यास लिखे।
अजजाही-अनजानी राह, धुंधला चेहरा-धुंधला रूप, अतीत की परछाईयां, सरिता।
- "आप के ये उपन्यास आज कहां से उपलब्ध हो सकते हैं।"- मैंने पूछा।
-रिजवी जी ने उत्तर दिया,-" मैं राही की तरह चलता रहा, पीछे का निशान मिटता रहा। अब आप इसे शौक, स्वभाव या अक्ल मानिए मैंने कभी अपना लिखा संग्रह करने का उस वक्त सोचा तक भी नहीं। यही मेरी जिंदगी का पहलू है। खैर.....।"
    उस दौर के लेखक इतने डिग्रधारी नहीं थे लेकिन रिजवी साहब ने उच्चस्तरीय डिग्री भी ली और स्कूल- काॅलेज में पढाया भी, लेकिन साथ-साथ अपने लेखक को जिंदा रखा।
      बुंदेलखंड के एक इंटर काॅलेज में 120₹ माहवार पर पढाने लगे और वहाँ के अध्यापकों  की प्रेरणा से इन्होंने B.Ed.भी किया। हजारी लाल इंटर काॅलेज ...... से B.ed के पश्चात वहीं पर नौकरी भी लग गयी लेकिन इनके अंदर का लेखक ज्यादा दिन तक एक बंद जिंदगी जैसी नौकरी से खुश न था। काॅलेज के अत्यधिक आग्रह के पश्चात ये ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के दौरान काॅलेज से त्यागपत्र दे आये।
सन् 1967 में शादी हो गयी। इन्होंने अपने समय की प्रसिद्ध पत्रिका 'पेरेमेशन और खान वाले सीरीज' के लिए लिखना आरम्भ कर दिया।
"जिंदगी गुजरती रही और मैं लिखता रहा। आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व इलाहाबाद से मेरठ आ गया। उस समय मेरठ में तीस से उपर प्रकाशन थे और ये मेरा सौभाग्य है की मैंने लगभग प्रकाशन के लिए लिखा। शायद ही ऐसा कोई विषय हो जिस पर मैंने नहीं लिखा।" 

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 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...