हिंदी साहित्य और जासूसी उपन्यास – गोविंद सिंह
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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021
हिंदी साहित्य और जासूसी उपन्यास – गोविंद सिंह
सोमवार, 13 सितंबर 2021
कुमार प्रिय
चर्चा - उपन्यासकार कुमार प्रिय
कुमारप्रिय उर्फ कैलाश श्रीवास्तव, कुणाल श्रीवास्तव एवं सुशील कुमार श्रीवास्तव : तीन भाई, तीनों साहित्यकार।
अर्से से मेरी कुमारप्रिय से मुलाकात नहीं हुई है। मिलना चाहता हूँ। आखिरी बार हम लक्ष्मी नगर के एक मकान में मिले थे।
उसी मकान में किसी समय मोहन पाकेट बुक्स के मालिक - अपना मकान खरीदने से पहले किरायदार थे।
उनके बाद लक्ष्मी नगर, (जमुना पार - दिल्ली) का वही मकान कुमारप्रिय ने किराये पर लिया था, तब वह एक शिष्ट, सुशील महिला से विवाह भी कर चुके थे, लेकिन विवाह के कई वर्ष बाद भी उनके कोई सन्तान नहीं थी और उन दिनों उनकी धर्मपत्नी बहुत ज्यादा अस्वस्थ चल रहीं थीं। दवाओं और घर के खर्च उठाने में कुमारप्रिय पूरी तरह सफल नहीं हो रहे थे। पड़ोसी दुकानदारों से उधारी चलती रहती थी, इसलिये किसी काम में रुकावट नहीं आती थी, जिसका एक कारण यह भी था कि आसपास के लोग उनका बहुत ज्यादा आदर करते थे।
तब उनका उपन्यास लिखना बहुत कम हो गया था, पर रंगभूमि कार्यालय से निकलने वाली सभी पत्रिकाओं के लिए लिखना, प्रूफरीडिंग, सम्पादन करते रहे थे।
उन दिनों कुमारप्रिय उर्फ कैलाश श्रीवास्तव से बड़े और मंझले भाई कुणाल श्रीवास्तव कुसुम प्रकाशन (इलाहाबाद) से निकलने वाली सत्य कथाओं की पत्रिकाओं का सम्पादन करने लगे थे।
सबसे बड़े भाई सुशील कुमार श्रीवास्तव ( जो अपना नाम सिर्फ 'सुशील कुमार' ही लिखते थे ) फ्रीलांसिंग करते थे और विभिन्न बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छपते थे तथा प्रूफरीडिंग, एडीडिंग आदि काम भी एक निश्चित रकम पारिश्रमिक के रूप में लेकर किया करते थे।
लक्ष्मी नगर में एक मुलाकात के दौरान कुमारप्रिय ने कुछ निराशा जताते हुए कहा था - "योगेश जी, अब हम में और आप में कोई फर्क नहीं रह गया। (कुमारप्रिय का मतलब मेरे द्वारा दूसरे नामों और दूसरों के लिये उपन्यास लिखने से था।)
मगर उस समय भी एक विश्वास था उनमें कि जल्दी ही जब स्थिति ठीक हो जायेगी - बम्बई जाकर फिल्मों के लिये लिखेंगे। नहीं मालूम, उनकी यह तमन्ना पूरी हुई या नहीं। पर एक समय रंगभूमि प्रकाशन से छपवाये गये अपने पहले उपन्यास 'गुड़िया' से सारे भारत में धूम मचाने वाले तब के युवा लेखक का अचानक ही रूहपोश हो जाना अचरज और किस्मत के रंग व ठोकरों का विषय है।
मुझसे मिलने के बाद - मुझे हमेशा कुमारप्रिय अपने समय में सर्वाधिक उर्जा वाले जोशीले लेखक लगे थे, जो सदैव ही पोजिटिव सोच रखते थे। यही पोजिटिव सोच मुझ में भी कूट-कूट कर है, पर कुमारप्रिय की वजह से नहीं, अन्य कारणों से, बल्कि मुझे लगता है - कुमारप्रिय की पोजिटिव सोच का मैं ही जन्मदाता था। मुझसे दूरी होने पर, वह फिर से निराशावादी हो गये और संघर्ष में हार गये।
आज भी मैं उनके बारे में जानना चाहता हूँ कि कुमारप्रिय कहाँ हैं, कैसे हैं?
कुमारप्रिय ने भी पैसों की सख्त जरूरत होने पर एक वैसा ही काम किया था, जिसकी शुरुआत पाकेट बुक्स लाइन में बिमल चटर्जी ने की थी! कुमारप्रिय ने एक निश्चित एमाउंट लेकर जनता पाकेट बुक्स के स्वामी श्री जगदीश गुप्ता जी को अपने बहुत से नामों के कापीराइट दे दिये थे, पर खुद नहीं लिखे थे - कुमारप्रिय के नाम से जनता पाकेट बुक्स द्वारा छापे गये उपन्यास 'सौगात', 'बेवफा', 'गौरी' आदि मेरे द्वारा लिखे गये थे।
@योगेश मित्तल जी के स्मृति कोष से
बुधवार, 8 सितंबर 2021
नये उपन्यास-2021
कुछ नये और रिप्रिंट उपन्यासों की सूचना
साहित्य देश के समस्त पाठकों को नमस्कार।
एक बार हम पुनः उपस्थित हैं, आपके लिए कुछ उपन्यासों की सूचना लेकर।
1. माय फर्स्ट मर्डर केस- जयदेव चावरिया
यह एक जासूसी उपन्यास है। इसी उपन्यास के साथ उपन्यास साहित्य में एक लेखक का पदार्पण हो रहा है।
जयदेव चावरिया इस से पूर्व कुछ सोशल साइटों पर लिखते रहें है, पर उपन्यास के रूप में यह उनका प्रथम प्रयास है।
जूलरी शॉप के मालिक अशोक नंदा को एक रात किसी ने वक़्त से पहले परलोक पहुंचा दिया। पुलिस को पक्का शक था कि खून उसके दोनों बेटो में से किसी एक ने ही किया है । फिर कहानी में दखल होता है ऐसे जासूस का जिसका अशोक नंदा मर्डर केस पहला मर्डर केस था। जिसने जासूस को यह केस सौंपा उसे खुद यकीन नहीं था कि वह यह केस हल कर पायेगा।
एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री जिसमें आप उलझकर रह जायेंगे।
Order Link- माय फर्स्ट मर्डर केस- जयदेव चावरिया
2. कंकाल टाइगर- परशुराम शर्मा
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
श्रेणी- हाॅरर
मूल्य- 350, 270₹
परशुराम शर्मा जी का यह नवीनतम हाॅरर उपन्यास है।
मंगलवार, 7 सितंबर 2021
निर्मल
नाम- निर्मल
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य एक ऐसा समुद्र है, जिसमें जितना डूबते जाओ उतने ही मोती मिलते जाते हैं। ऐसा ही एक और मोती मिला है नाम है- निर्मल।
अब उपन्यासकार निर्मल के विषय में कोई ज्यादा जानकारी तो खैर उपलब्ध नहीं हो सकी। जो जानकारी प्राप्त हुयी है उसका स्त्रोत एक उपन्यास है- घूंघट और घुंघरू। यह उपन्यास 'पंकज पॉकेट बुक्स-मेरठ' से प्रकाशित है।
आबिद रिजवी जी और रवि पॉकेट बुक्स मनेष जैन जी से प्राप्त जानकारी अनुसार- निर्मल गौरी पॉकेट बुक्स वालों के छोटे भाई थे; मूल नाम था निर्मल जैन। निर्मल नाम से कुछ उपन्यास प्रकाशित हुए थे। नॉवल किसने लिखे, यह जानकारी गोपनीय रही क्योंकि न प्रकाशन ज़्यादा दिन चल सका न लेखक का नाम ही।
निर्मल के उपन्यास
1. घूंघट और घुंघरू
सोमवार, 6 सितंबर 2021
मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा- 10
मैं आवार, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा- 10
अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा `मैं आवारा, इक बनजारा` का दसवां और अतिंम अंक।
जब हम `राधा पॉकेट
बुक्स` पहुंचे,
तो हमारी मुलाकात शायद उस पॉकेट बुक्स के मालिक मनेष जैन जी
के छोटे भाई से हुई थी,
जिनका कि नाम मैं नहीं जानता।
क्योंकि उनका नाम
पूछने कि मेरी हिम्मत ही नहीं हुई थी।
वहां मशहूर उपन्यासकार और मेरे बचपन के हीरो श्री परशुराम जी शर्मा पहले से ही मौजूद थे, जो उस वक्त मनेष जैन के छोटे भाई से `बालाजी स्टूडियो` की मालकिन और मशहूर हीरो रह चुके जितेंद्र की सुपुत्री एकता कपूर के सीरियलों की बात कर रहे थे ।
उनकी बातें सुनकर मुझे ऐसा लगा कि किसी न किसी रूप में परशुराम जी शर्मा का फिल्मी लाइन में भी दखल है। वैसे वह उन दिनों तुलसी पॉकेट बुक्स से निकलने वाली पत्रिका तुलसी कहानियों के संपादक थे। मैंने बतौर संपादक उनका नाम तुलसी कहानियों में पढ़ा था। उनकी बातों से मुझे आगे जाकर यह भी पता चला कि प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यासकार श्री प्रेम बाजपेई का निधन कुछ दिनों पहले हो चुका है और उनके सुपुत्र फिल्म लाइन में जाने का इरादा रखते हैं।प्रेम बाजपेई के
निधन की खबर सुनकर मुझे बहुत गहरा धक्का लगा, क्योंकि मैं उस महान हस्ती
का भी नियमित पाठक था और उनके उपन्यास मुझे बहुत ही अच्छे लगते थे।
पर उस दुख के साथ -
साथ खुशी इस बात की थी कि अपने चहेते और लोकप्रिय लेखक श्री परशुराम जी शर्मा को, जिनकी अब तक मैंने सिर्फ उपन्यासों पर छपी हुई फोटो ही देखी थी, आज साक्षात देख भी लिया।
मैंने ये कभी सपने
में भी नहीं सोचा था कि अचानक उनसे यूं मुलाकात हो जाएगी।
उनका पहनावा बहुत
ही शानदार था और वे सचमुच किसी फिल्म के हीरो जैसे लग रहे थे।
मैंने मनेष जैन जी
के छोटे भाई को एक ही सांस में अपना परिचय
देते हुए बताया कि मेरा नाम अशोक कुमार शर्मा है और मैं अपना उपन्यास अपने नाम और
फोटो के साथ आपकी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित करवाना चाहता हूँ।
उन्होंने गौर से मेरी और देखा और फिर गम्भीरता से पूछा कि -पहले कभी कहीं से छपे हो ?
गुरुवार, 2 सितंबर 2021
मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा -09
आत्मकथा, भाग-09
यह उपन्यास मेरे पाठकों को बहुत ही ज्यादा पसंद आया और इसी उपन्यास से मेरे उपन्यासों के मुख्य किरदार 'सरदार जगतार सिंह जग्गा' का जन्म हुआ, जिनका कि नाम आगे जाकर काफी मशहूर हुआ। इसका सबूत मेरे पास देश के हर कोने से आए वे हजारों खत है, जो आज भी मेरे पास सुरक्षित मौजूद है।
यह उपन्यास मेरे नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हुआ था और इस उपन्यास के प्रकाशन की दास्तान कुछ यूं है दोस्तों कि इस उपन्यास को लिखने के बाद मैं एक बार फिर दिल्ली और मेरठ के कई प्रकाशको के दफ्तरों में गया, पर इस बार मैं राजा पॉकेट बुक्स के मालिक श्री राजकुमार जी गुप्ता से नहीं मिला, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं मैं उनके रौब और प्रभाव में आकर पहले की तरह ही इस उपन्यास को भी उनके ट्रेडमार्क के तहत प्रकाशित करने की इजाजत नहीं दे दूं ।
दिल्ली के प्रकाशकों ने एक बार फिर मुझे घास नहीं डाली और यही हाल मेरा मेरठ जाकर भी हुआ।
मैं 'तुलसी पॉकेट बुक्स' जाकर श्री वेद प्रकाश जी शर्मा और ऋतुराज जी उर्फ सुरेश जैन जी से भी मिला, पर उन्होंने भी मुझे कोई खास तवज्जो नहीं दी।
सोमवार, 30 अगस्त 2021
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की-05
यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 05
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वेद जी ने 'विजय और केशव पंडित' का प्रूफ पढ़ा
फार्म ओम जी की ओर बढ़ा दिया और 'शमा' काटकर 'समा' किये गये शब्द को दिखाकर बोले - "आप यह
बताइये, इसमें क्या
सही है? यहाँ 'शमा' आना चाहिए या 'समा'...?"
"समा आयेगा...!" -ओम जी ने सेकेण्ड की भी देरी किये बिना, मेरे द्वारा की गई
करेक्शन स्वरूप लिखे गये 'समा' शब्द पर उंगली रख, तुरन्त ही
जवाब दिया।
अगले ही पल जो हुआ, वह अप्रत्याशित था।
एक झटके से वेद जी कुर्सी से उठे और टेबल पर आगे की
ओर, मेरी तरफ
झुकते हुए, उन्होंने अपना लम्बा हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया तथा मेरे सुकड़े और कोहनी से मुड़े
हाथ को एकदम थाम, खींच कर तेजी से हिला दिया, फिर एक गोल्डन
जुबली मुस्कान मेरे चेहरे पर फेंकते हुए बोले -"फिर तो बहुत अच्छा हुआ, मैंने तेरे से
प्रूफ पढ़वा लिये, वरना ख्वामखाह गलती रह जाती!"
सुरेश जी गर्दन हिलाकर मुस्कुराये। उस समय बोले कुछ
नहीं। हालांकि बाद में ओम जी और मेरे साथ ढेरों बातों में वह भी खुलकर शामिल हुए।
दोस्तों, कुछ समझे...?
बुधवार, 25 अगस्त 2021
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -04
कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 4
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
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मनोज पाकेट बुक्स में जब वेद भाई ने छपना आरम्भ किया, उसके बाद मनोज
पाकेट बुक्स में मेरे बहुत ज्यादा चक्कर नहीं लगे।
पर एक बार जब वहाँ पहुँचा, संयोगवश उस
समय वेद भाई भी वहीं मौजूद थे ऑफिस में उनके अलावा सिर्फ गौरीशंकर गुप्ता जी थे।
मनोज पाकेट बुक्स और राज पाकेट बुक्स के ऑफिस जब तक शक़्तिनगर
में रहे, दोनों जगह मैं
खुद को VIP शख्सियत
जैसा महसूस करता रहा था।
मनोज
पाकेट बुक्स में तो मेनगेट से कोठी में दाखिल होकर, सीधे ही बायीं ओर बेसमेंट में जाने वाली
सीढ़ियाँ थीं, जहाँ बाहर कोई दरबान नहीं होता था।
मैं धड़धड़ाता हुआ सीढ़ियों से नीचे उतर जाता और
नीचे पहुँच जाता। सीढ़ियों के साथ गैलरी के दायें बायें केबिन थे।
अग्रवाल मार्ग वाले मनोज पाकेट बुक्स के उस ऑफिस में मेरे अलावा भी सम्भवतः कुछ अन्य लोगों के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा अजनबी लोगों को एकाउन्टेन्ट नवीन ही एकदम रोक देता था। उसका केबिन इस तरह बना था कि सीढ़ियों से गैलरी तक उसकी तीक्ष्ण निगाह से किसी का भी बचना नामुमकिन था। मतलब साफ था कि नवीन की नजरों में आये बिना किसी का भी मनोज पाकेट बुक्स में आना-जाना असम्भव था।
मंगलवार, 24 अगस्त 2021
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -03
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उन दिनों मैं मेरठ ही रह रहा था।
कभी देवीनगर में अपनी सबसे बड़ी बहन प्रतिमा जैन के यहाँ तो कभी हरीनगर के एक बहुत बड़े मकान के अलग-अलग पोर्शन में रहने वाले अपने चार मामाओं में से दूसरे नम्बर के मामाजी रामाकान्त गुप्ता जी के यहाँ या तीसरे नम्बर के मामाजी विजयकान्त गुप्ता के यहाँ सभी मामाओं के बच्चे मुझे सगे भाई जैसा मान और प्यार देते थे।
रामाकान्त मामाजी की पांचों बेटियों ने मुझे हमेशा सगे भाई जैसा मान और प्यार दिया है! उस समय बड़ी दो बेटियों संगीता और सविता का विवाह हो चुका था! छोटी तीनों बेटियों सरिता, अंजू और राखी के साथ अक्सर मैं लूडो या कैरमबोर्ड भी खेला करता था और कभी-कभी कोई कहानी भी सुनाता था, जबकि विजयकान्त मामाजी की बेटियाँ पूनम और नीलू तथा बेटे बबलू और टीनू मुझे देखते ही "भैया, कोई कहानी सुनाओ" की रट लगाकर घेर लेते थे।
रिश्तों और रिश्तेदारियों में उन दिनों बेपनाह और निस्वार्थ प्यार होता था और मुझे तो आज भी सभी से वही प्यार और सम्मान हासिल है।
मामाजी का मकान ईश्वरपुरी की गली के तुरन्त बाद की गली का पहला ही मकान था।
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| सुरेश जैन रितुराज |
उस समय तक मैं नूतन कामिक्स, राज कामिक्स, मनोज कामिक्स और राधा कामिक्स के लिए अपना कुछ न कुछ योगदान दे चुका था। लेकिन यह किस्सा कामिक्स की दुनिया में फिर कभी....।
आप सोचेंगे कि कामिक्स की दुनिया में एक नया आयाम लिखने वाले चचा चौधरी फेम के 'प्राण' का नाम न लेकर, मैंने एन. एस. धम्मी और हरविन्दर माँकड़ का जिक्र क्यों किया है तो सच्चाई और आँकड़ों के साथ इस विषय पर विस्तार से कामिक्स की दुनिया के कालम में लिखूँगा।
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