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ज्ञान ने मुझे देखते ही कुछ तेज़ आवाज़ में कहा था -"बेईमान, धोखेबाज, गद्दार !"
और मैं एकदम सन्नाटे में डूब गया था !
ऐसा क्या कर दिया मैंने ? मन ही मन मैंने सोचा था !
पर ज्ञान की आवाज़ की एक विशेषता यह थी कि वह गुस्से में भी बोलता तो आवाज़ में कड़कपन या कठोरता नहीं महसूस होती थी !
पता नहीं क्यों...उस दिन मुझे ज्ञान के शब्दों से आघात-सा अवश्य लगा, पर तुरंत ही शब्द होठों से निकले -"क्या हुआ ? इतने गर्म क्यों हो रहे हो ?"
अक्सर ज्ञान के होठों से गालियों के फूल भी बरसते थे ! गुस्से में ही नहीं सामान्य सी बात-चीत में भी ! मेरे सवाल का जवाब उसने मुंह से एक भद्दी गाली निकालने के बाद दिया -"तू भरोसे के काबिल ही नहीं है ! क्या प्रॉमिस किया था तूने ? दरीबे में कदम तब रखेगा, जब मेरे लिए स्क्रिप्ट लेकर आएगा ?"
"तो यह क्या है ?" मैंने बाल पॉकेट बुक्स की स्क्रिप्ट ज्ञान के सामने रख दी -"तुम्हारे लिए स्क्रिप्ट लेकर ही आया हूँ !"
"बहुत एहसान कर दिया ! हमें नहीं चाहिए तेरी स्क्रिप्ट ! ले जा, यह भी उन्हीं को दे आ, जो तेरे सगे हैं !" ज्ञान स्क्रिप्ट उठाकर पीछे रखते हुए बोला !


