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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

लव हिट पण्डित

 नाम- लव हिट पण्डित

 उपन्यास साहित्य में केशव पण्डित ने जो नाम कमाया उसका अनुसरण करते हुये बहुसंख्यक केशव पण्डित बाजार में आ गये। ऐसा ही एक नाम है -लव हिट पण्डित।

  हालांकि इस के विषय में कोई ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। एक उपन्यास से संक्षिप्त जानकारी मिलती है।

लव हिट पण्डित के उपन्यास

1. कानून से बड़ा

2. विस्फोट

3. रेप मिस्ट्री

प्रकाशक- पूनम पॉकेट बुक्स, शाहदरा दिल्ली

वितरक- राम पॉकेट बुक्स, दिल्ली

 उक्त समस्त जानकारी का स्त्रोत लव हिट पण्डित का उपन्यास 'कानून से बड़ा' है।

उक्त लेखक के विषय में अगर कोई जानकारी हो तो अवश्य शेयर करें।

Email- sahityadesh@gmail.com


मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

जयदेव चावरिया - साक्षात्कार शृंखला-10

साहित्य देश ब्लॉग साक्षात्कार के क्रम में प्रकाशित कर रहा है नवोदित उपन्यासकार जयदेव चावरिया का साक्षात्कार।

  जयदेव चावरिया हरियाणा के रेवाड़ी जिले के निवासी हैं। अपने प्रथम उपन्यास से पूर्व जासूसी कहानियों के माध्यम से पाठकों मे मध्य अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। सूरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित 'माय फर्स्ट मर्डर केस' लेखक का प्रथम उपन्यास है।
  'प्रथम उपन्यास, प्रथम साक्षात्कार'  साक्षात्कार शृंखला-10

उपन्यासकार जयदेव चावरिया
उपन्यासकार जयदेव चावरिया
1. जयदेव भाई, सर्वप्रथम आपको आपके प्रथम उपन्यास पर हार्दिक शुभकामनाएं। आज आप एक उपन्यासकारों की श्रेणी में पहुँच गये। बहुत से पाठक आपसे परिचित हैं, फिर भी हम एक बार आप विस्तृत परिचय जानना चाहेंगे।

   मैं जयदेव चावरिया में हरियाणा जिला रेवाड़ी का रहने वाला हूँ।  वैसे मेरा असली नाम जितेंद्र हैं पर मेरे दोस्त और मेरे परिवार वाले सभी मुझे जयदेव कहकर पुकारते थे। इसलिए मैंने अपना नाम जितेंद्र से जयदेव कर दिया। चावरिया मेरे पिता जी का गोत्र है। मेरे पिता जी का नाम रामलाल चावरिया है मेरे पिता जी के देहांत हुए करीब 18 साल हो गये। पिता जी रेलवे में काम करते थे।      पिता जी के देहांत के बाद पिता जी की जॉब मेरी माता जी (रेनू देवी जी) को मिल गयी। मेरे परिवार में मेरी बड़ी रजनी, उनसे छोटा भाई महेश, उनसे छोटी बहन पूजा फिर, आखिरी में 

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

जयदेव चावरिया

नाम - जयदेव चावरिया
पिता-  राम लाल
माता-  रेनू देवी
शिक्षा- 12th
सम्पर्क-
जयदेव चावरिया
Mob- -          90347 35152
Facebook id – Author jaidev Chawariya
Email-  jaidev5152@gmail.com
उपन्यासकार जयदेव चावरिया
उपन्यासकार जयदेव चावरिया
उपन्यास सूची
1. माय फर्स्ट मर्डर केस 13.09.2021

http://svnlibrary.blogspot.com/2021/12/482.html?m=1

           

रविवार, 5 दिसंबर 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -11

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 11

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ऐश ट्रे मेरी पहुँच से दूर थी। वेद भाई जहाँ बैठे थे, उससे कुछ दूर बायीं ओर। 

ऐश ट्रे अपनी ओर खींचने के लिए मुझे कुर्सी से उठकर टेबल पर काफी आगे झुकना पड़ा। फिर मैंने ऐश ट्रे खींच कर, उसके कॉर्नर पर अपनी सिगरेट का टोटा रगड़ कर बुझाया और बुझा हुआ टोटा ऐश ट्रे में डाल दिया। 

फिर ऐश ट्रे पीछे सरकाकर मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। 

       उन दिनों शास्त्रीनगर में तुलसी पेपर बुक्स आरम्भ तो हो चुकी थी, लेकिन काम करने वाले लोग उतने नहीं थे, जितने बाद में धीरे धीरे बढ़ गये थे। फिर भी कुछ तो थे, लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने जो देखा, मुझे स्वामीपाड़ा का वेद भाई का वो घर याद आ गया, जहाँ बरसात में कई जगह से टपकती छत के नीचे परछत्ती में, हम दोनों ने साथ मिलकर कुछ पेज लिखे थे और साथ साथ खाना - खाया था। 

और अचानक ही वो दिन क्यों याद आ गया, यह तो मेरी समझ में नहीं आया, पर जब वेद भाई वापस ऑफिस आये तो उनके हाथों में दो शीशे के मग थे और मग में फलों का जूस...। 

बस, उस समय कुछ ऐसा लगा था, जैसे वक़्त अचानक बरसों पीछे चला गया हो। 

एक मग मेरी ओर बढ़ा कर वेद भाई ने कहा - "चाय तो तू पीवैगा नहीं, ले अब सेहत बना।"

"चाय पीने के लिए मैंने कब मना किया।" मैं जूस का मग अपने होंठों की तरफ बढ़ाते हुए बोला -"अभी जूस पीते हैं। थोड़ी देर बाद चाय पियेंगे।"

“चाय क्या, खाना खिलावैंगे यार...। पहले जूस तो पी...।"- वेद भाई ने कहा और मग होंठों से लगा लिया। 

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 10
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
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 दिल्ली में जो लोग रहते हैं, कहीं भी घूम फिर आयें, चैन की सांस, मानों दिल्ली में ही मिलती है। 
वैसे तो यह हर शहर में रहने वाले, अपने शहर के लिए महसूस करते हों, पर दिल्ली वालों की बात कुछ और ही है। 
दिल्ली के साथ बहुत सी बातें जुड़ जाती हैं। जैसे - 
दिल्ली है दिल वालों की। 
अब दिल्ली दूर नहीं। 
दिल्ली दिल है हिन्दुस्तान का। 
और
        दिल बड़ा है दिल्ली का, किसी भी गाँव, शहर, प्रान्त, देश का व्यक्ति दिल्ली आता है तो दिल्ली का होकर रह जाता है। 
बहुत से आक्रांता आये दिल्ली और बार-बार आये। कुछ दिल्ली को लूटकर चले गये तो कुछ यहीं के हो गये। 
हम जब कलकत्ता (आज का कोलकाता) रहते थे, दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर कलकत्ता ही लगता था। वहाँ बोटानिकल गार्डेन के विशाल बरगद की छांव में हवाओं के झोंके मन प्रसन्न कर देते थे तो धर्मतल्ला और उसके आस-पास फुटबॉल क्लबों के मैदान एक जुनून सा पैदा कर देते थे और दक्षिणेश्वर, ताड़केश्वर, काली मंदिर, हुगली नदी, डायमंड हार्बर तथा कलकत्ते का कोना-कोना दिल से नहीं, रोम-रोम से जुड़ा लगता था और हम कलकत्ते से बाहर के अपने रिश्तेदारों को 'कलकत्ते' के बारे में यह सब बताते हुए बड़ा गर्व महसूस करते थे कि कलकत्ते में 'कलकत्ता' नाम का तो कोई रेलवे स्टेशन ही नहीं है। एक रेलवे स्टेशन है 'हावड़ा' और दूसरा रेलवे स्टेशन है -'सियालदह' और हवाई अड्डा है - 'दमदम।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद, उपन्यास अंश

 अब उसके लिये कत्ल करना बहुत जरूरी हो गया था...इस ताबड़तोड़ भयानक घटनाचक्र में यही एकमात्र उसके बचाव का मार्ग रह गया था।

      अपने अँधेरे कमरे में वह बड़ी देर से इन्हीं विचारों के बवंडर में इधर-उधर घूमे जा रहा था। अपने तीव्र मानसिक तनाव में वह कमरे की बत्ती जलाना भी भूल गया था। एकाकीपन तथा घना अँधेरा मन को और भी विचलित कर देता है।

          तनाव में इधर से उधर और उधर से इधर चलते हुये वह सिगरेट पर सिगरेट फूँके जा रहा था। उसके  मस्तिष्क में सुधा के वाक्य गूँज-गूँज कर प्रलय मचा रहे थे। 

29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद
29 दिसम्बर की रात - विक्की आनंद

“केवल चौबीस घण्टे...इससे अधिक समय मैं तुम्हें नहीं दे सकती।”

“मेरे पेट में पनप रहा तुम्हारा बच्चा- अब मुझे कुलबुलाता अनुभव हो रहा है।”

उसने सुधा से आँख न मिलाते हुये कहा- 

शनिवार, 27 नवंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 9

 यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 09

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मेरा स्टैण्ड अब भी वही है, जो पहले था।” वेद भाई ने कहा - “मैं अब भी ट्रेडमार्क के सख्त खिलाफ हूँ, मगर ऐसा कोई लेखक नज़र तो आवै, जिसे पढ़ते ही लगे कि बस, इसे चांस मिलना जरूरी है। यह जरूर तहलका मचायेगा।”

यार, किसी को चांस मिलेगा, तभी न वह तहलका मचायेगा।” - मैंने कहा। 

तो ठीक है, मैं तुझे दे रहा हूँ चांस। बोल - लिखेगा?”

मेरी बात और है।” मैंने कहा - “मैं बहुत ज्यादा सेक्रीफाइस करने की स्थिति में नहीं हूँ।”

सेक्रीफाइस किस बात का... कौन सेक्रीफाइस करने के लिए कह रहा है?”  वेद ने कहा - “तू बता, क्या लेगा - एक उपन्यास के?”

कम से कम एक हज़ार तो मिलना ही चाहिए...।” मैंने झिझकते-झिझकते कहा। 

मैं दो हज़ार दूंगा...। बोल, कब दे रहा है उपन्यास...?”

मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम। वेद से ऐसी किसी बात की मैंने कल्पना तक नहीं की थी। 

चुप क्यों है...। बता कब दे रहा है उपन्यास...। मुझे हर महीने एक चाहिए...। और तेरी पहली किताब तब छापूंगा, जब तेरे तीन उपन्यास मेरे पास हो जायेंगे।”

            “फिर तो अभी काफी लम्बा इन्तजार करना पड़ेगा।” मैं गम्भीर होकर बोला-”आज तो मैं दिल्ली जाने की सोच रहा हूँ। खेल-खिलाड़ी का काम लटका होगा, जाते ही कम्पलीट करना होगा और कुछ और प्रकाशक भी अपनी पत्रिकाओं का काम मुझसे ही करवाते हैं।”

ठीक है। यह फैसला तो तूने करना है कि कब किसका क्या काम करना है। पर याद रहे, मैं तुझे चांस दे रहा हूँ, पर यह चांस हरएक को नहीं दे सकता।”

क्यों भला...?” मैंने पूछा।  

देख योगेश, लिखने वाले बहुत हैं, पर लिख क्या रहे हैं, यह जानने से पहले यह समझ कि लिख कैसे रहे हैं।”

कैसे लिख रहे हैं..?” मैंने पूछा। 

रविवार, 21 नवंबर 2021

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 08

 कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 8

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रॉयल पाकेट बुक्स की बाहरी बैठक को अपना ठिकाना बनाने के बाद मुझे सबसे पहले उन्हीं का काम पूरा करना चाहिए था, पर उन्होंने काम पूरा करने के लिए एक हफ्ते का वक़्त दिया था, इसलिये मैं निश्चिन्त तो था, पर दिमाग में यही था कि सबसे पहले अपने लैण्डलॉर्ड का काम ही पूरा किया जाये, लेकिन सुबह दस बजे के करीब गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे।   


मैंने रायल पाकेट बुक्स की उन किताबों में से एक किताब सामने रखी हुई थी और उसे पढ़ रहा था, कहानी बढ़ाने का काम बिना पढ़े तो हो ही नहीं सकता था। हालांकि मुझे दो बार ऐसा दुर्लभ कार्य भी करना पड़ा था, जब विमल पॉकेट बुक्स, में प्रकाशित होने वाले उपन्यास `कलंकिनी` के अन्तिम सोलह पेज कहानी पढ़े बिना ही लिखने पड़े थे और एक बार हरीश पॉकेट बुक्स (राज पॉकेट बुक्स की एक अन्य संस्था) में प्रकाशित हो रहे एस. सी. बेदी के एक उपन्यास का अन्त उपन्यास पढ़े बिना लिखना पड़ा था। पर वो किस्सा फिर कभी...। 

मेरठ के प्रकाशकों में तो लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन उर्फ मामा ने मैटर बढ़ाने-घटाने में मुझे Best होने तक का तमगा दे दिया था और उन्हीं की यह कारस्तानी या करिश्मा था कि ईश्वरपुरी के प्रकाशकों में भी मेरी चर्चा फैल गई थी। 

फिर मेरे बारे में एक यह बात भी सतीश जैन ने फैला दी थी कि योगेश मित्तल से तो जो चाहे काम करवा लो, न पैसे के लिए हुज्जत करता है, ना ही मना करता है और यह मशहूरी गंगा पॉकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन तक भी पहुँच चुकी थी। 

रॉयल पाकेट बुक्स का किरायेदार होने के सबसे पहले ही दिन सुबह सुबह सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे, तब तक मैंने किसी भी प्रकाशक को अपने वहाँ रहने के बारे में बताया तक नहीं था, इसलिये सुशील जैन को देख, एकदम हक्का-बक्का हो उठा। 

“आप यहाँ कैसे....? यहाँ के बारे में तो मैंने अभी किसी से कोई चर्चा भी नहीं की।" -मैंने अचरज से कहा तो बड़ी मीठी मुस्कान छिड़कते हुए सुशील जैन बोले - "दिल्ली का कोई लेखक मेरठ में हो और हमें पता न चले, यह तो हो ही नहीं सकता। हमारे जासूस कदम-कदम पर फैले हुए हैं। फिर यह तो ईश्वरपुरी से ईश्वरपुरी का मामला है। हमारी नाक के नीचे रहकर भी तू हमारी नज़रों से छिप जायेगा, ऐसा तो तुझे सोचना भी नहीं चाहिए।" 

अपनी बात कहते-कहते सुशील जैन मेरे पलंग पर मेरे करीब बैठ गये। 

शनिवार, 20 नवंबर 2021

कैसे बना मैं उपन्यासकार- तरुण इंजिनियर

 'मैं उपन्यासकार कैसे बना' शृंखला के इस अंक में आप पढेंगे उपन्यासकार तरुण इंजिनियर के उपन्यासकार जीवन के आरम्भिक अंश कैसे बन उपन्यासकार बने।

कैसे बना मैं उपन्यासकार

दोस्तो,

मैं आपको बता दू कि मेरा जन्म बिजनौर के एक छोटे से कस्बे किरतपुर के रस्तोगी परिवार में सन् 1960 में हुआ था,मेरा पूरा नाम तरुण कुमार रस्तोगी है

बचपन से ही मैं नटखट व लेखक प्रवृत्ति क रहा हूँ। जिसकी वजह से मेरे पिता श्री रामनाथ रस्तोगी ने मुझे घर से दूर, नैनीताल पढने के भेज दिया था। उनका मानना था कि घर से दूर रहकर शायद मेरे जहन से लेखक रूपी कीड़ा एकदम‌ मर जायेगा, पर ऐसा हुआ नहीं।

      नैनिताल की वादियों में पहुंचकर, मेरे दिमाग ने शब्दरूपी झील में, कलम की परवार चलानी फिर शुरु कर दी क्योंकि नैनिताल का वातावरण ही कुछ ऐसा है, यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर ना कुछ लिखने वाला भी लिखना शुरु कर देता है।

      यही मेरे साथ हुआ। पढाई के साथ-साथ मेरी लघु कहानियाँ, कवितायें व गजलें देश की नामी-गिरामी पत्रिकाओं 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी' व 'नंदन' में प्रकाशित होने लगी। प्रशंसकों के पत्र  आते रहे। मैं एक के बाद एक कहानियाँ लिखता गया। कुछ हास्य लेख मेरे 'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स' व 'पंजाब केसरी' में भी छपे। दिन कटते रहे...साल कटते रहे, अचानक एक दिन मेरी मुलाकात हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार रानू से हो गयी। जो उस समय नैनिताल की एक सत्य घटना पर आधारित 'पूजा' उपन्यास लिखने के लिये आये हुये थे। मेरी उनसे मुलाकातें होती रही, फिर मुलाकातें दोस्ती में बदल गयी और कुछ ही दिनों में रानू जी मेरे अच्छे दोस्तों में से एक बन गये। जितना मैं उनके सम्पर्क में आता गया,‌ मेरे अंदर भी उपन्यासकार बनने की ललक जागने लगी। मैं उनके साथ बैठकर छोटे-छोटे शाॅट लिखने लगा। उन्हें पसंद आये और उन्होंने मेरी प्रशंसा की, मेरा हौसला बढ  गया। 

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

प्रायश्चित - रानू, उन्यास समीक्षा

रानू – प्रायश्चित- 1977

सन् 1970 व 1980 ईं के दशक के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार रानू की प्रसिद्धि इतनी ज्यादा थी कि इस समय उनके नाम से कई जाली उपन्यास भी हाथोहाथ बिक जाते थे। उनकी पत्नी सरला रानू भी उन्यासकार थी। पति-पत्नी दोनों एलीगन रोड़ इलाहाबाद में रहते थे। उनकी पत्नी को भी उनकी प्रसिद्धि का भरपूर लाभ मिला। 

प्राश्चित उपन्यास का पहला संस्करण 1977ई. में हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था।

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...