लेबल

सोमवार, 13 सितंबर 2021

कुमार प्रिय

चर्चा - उपन्यासकार कुमार प्रिय

कुमारप्रिय उर्फ कैलाश श्रीवास्तव, कुणाल श्रीवास्तव एवं सुशील कुमार श्रीवास्तव : तीन भाई, तीनों साहित्यकार।

 अर्से से मेरी कुमारप्रिय से  मुलाकात नहीं हुई है। मिलना चाहता हूँ। आखिरी बार हम लक्ष्मी नगर के एक मकान में मिले थे।

उसी मकान में किसी समय मोहन पाकेट बुक्स के मालिक - अपना मकान खरीदने से पहले किरायदार थे।

उनके बाद लक्ष्मी नगर, (जमुना पार - दिल्ली)  का वही मकान कुमारप्रिय ने किराये पर लिया था, तब वह एक शिष्ट, सुशील महिला से विवाह भी कर चुके थे, लेकिन विवाह के कई वर्ष बाद भी उनके कोई सन्तान नहीं थी और उन दिनों उनकी धर्मपत्नी बहुत ज्यादा अस्वस्थ चल रहीं थीं। दवाओं और घर के खर्च उठाने में कुमारप्रिय पूरी तरह सफल नहीं हो रहे थे। पड़ोसी दुकानदारों से उधारी चलती रहती थी, इसलिये किसी काम में रुकावट नहीं आती थी, जिसका एक कारण यह भी था कि आसपास के लोग उनका बहुत ज्यादा आदर करते थे।

     तब उनका उपन्यास लिखना बहुत कम हो गया था, पर रंगभूमि कार्यालय से निकलने वाली सभी पत्रिकाओं के लिए लिखना, प्रूफरीडिंग, सम्पादन करते रहे थे। 

उन दिनों कुमारप्रिय  उर्फ कैलाश श्रीवास्तव से बड़े और मंझले भाई कुणाल श्रीवास्तव कुसुम प्रकाशन (इलाहाबाद) से निकलने वाली सत्य कथाओं की पत्रिकाओं का सम्पादन करने लगे थे। 

सबसे बड़े भाई सुशील कुमार श्रीवास्तव ( जो अपना नाम सिर्फ 'सुशील कुमार' ही लिखते थे )  फ्रीलांसिंग करते थे और विभिन्न बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छपते थे तथा प्रूफरीडिंग, एडीडिंग आदि काम भी एक निश्चित रकम  पारिश्रमिक के रूप में लेकर किया करते थे। 

    लक्ष्मी नगर में एक मुलाकात के दौरान कुमारप्रिय ने कुछ निराशा जताते हुए कहा था - "योगेश जी, अब हम में और आप में कोई फर्क नहीं रह गया। (कुमारप्रिय का मतलब मेरे द्वारा दूसरे नामों और दूसरों के लिये उपन्यास लिखने से था।) 

     मगर उस समय भी एक विश्वास था उनमें कि जल्दी ही जब स्थिति ठीक हो जायेगी - बम्बई जाकर फिल्मों के लिये लिखेंगे। नहीं मालूम, उनकी यह तमन्ना पूरी हुई या नहीं। पर एक समय रंगभूमि प्रकाशन से छपवाये गये अपने पहले उपन्यास 'गुड़िया' से सारे भारत में धूम मचाने वाले तब के युवा लेखक का अचानक ही रूहपोश हो जाना अचरज और किस्मत के रंग व ठोकरों का विषय है। 

    मुझसे मिलने के बाद -  मुझे हमेशा कुमारप्रिय अपने समय में  सर्वाधिक उर्जा वाले जोशीले लेखक लगे थे, जो सदैव ही पोजिटिव सोच रखते थे। यही पोजिटिव सोच मुझ में भी कूट-कूट कर है, पर कुमारप्रिय की वजह से नहीं, अन्य कारणों से, बल्कि मुझे लगता है - कुमारप्रिय की पोजिटिव सोच का मैं ही जन्मदाता था। मुझसे दूरी होने पर, वह फिर से निराशावादी हो गये और संघर्ष में हार गये।

    आज भी मैं उनके बारे में जानना चाहता हूँ कि कुमारप्रिय कहाँ हैं, कैसे हैं? 

कुमारप्रिय ने भी पैसों की सख्त जरूरत होने पर एक वैसा ही काम किया था, जिसकी शुरुआत पाकेट बुक्स लाइन में बिमल चटर्जी ने की थी! कुमारप्रिय ने एक निश्चित एमाउंट लेकर जनता पाकेट बुक्स के स्वामी श्री जगदीश गुप्ता जी को अपने बहुत से नामों के कापीराइट दे दिये थे, पर खुद नहीं लिखे थे - कुमारप्रिय के नाम से जनता पाकेट बुक्स द्वारा छापे गये उपन्यास 'सौगात', 'बेवफा',  'गौरी' आदि मेरे द्वारा लिखे गये थे।

@योगेश मित्तल जी के स्मृति कोष से

बुधवार, 8 सितंबर 2021

नये उपन्यास-2021

कुछ नये और रिप्रिंट उपन्यासों की सूचना

साहित्य देश के समस्त पाठकों को नमस्कार।
एक बार हम पुनः उपस्थित हैं, आपके लिए कुछ उपन्यासों की सूचना लेकर।
1. माय फर्स्ट मर्डर केस- जयदेव चावरिया

    प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
    मूल्य -220, 160₹

यह एक जासूसी उपन्यास है। इसी उपन्यास के साथ उपन्यास साहित्य में एक लेखक का पदार्पण हो रहा है।
   जयदेव चावरिया इस से पूर्व कुछ सोशल साइटों पर लिखते रहें है, पर उपन्यास के रूप में यह उनका प्रथम‌ प्रयास है।


जूलरी शॉप के मालिक अशोक नंदा को एक रात किसी ने वक़्त से पहले परलोक पहुंचा दिया। पुलिस को पक्का शक था कि खून उसके दोनों बेटो में से किसी एक ने ही किया है । फिर कहानी में दखल होता है ऐसे जासूस का जिसका अशोक नंदा मर्डर केस पहला मर्डर केस था। जिसने जासूस को यह केस सौंपा उसे खुद यकीन नहीं था कि वह यह केस हल कर पायेगा।

अशोक नंदा का खून किसने किया ? क्या पुलिस कातिल को पकड़ पाई ? क्या जासूस अपना पहला मर्डर केस हल कर सका ? या यह केस उसका आखिरी केस साबित हुआ ?
एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री जिसमें आप उलझकर रह जायेंगे।

 Order Link- माय फर्स्ट मर्डर केस- जयदेव चावरिया


2. कंकाल टाइगर- परशुराम शर्मा
    प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
     श्रेणी- हाॅरर
     मूल्य- 350,  270₹
       परशुराम शर्मा जी का यह नवीनतम हाॅरर उपन्यास है।

तीसरे विश्वयुद्ध में दो सेनायें आमने-सामने हैं।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

निर्मल

नाम- निर्मल

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य एक ऐसा समुद्र है, जिसमें जितना डूबते जाओ उतने ही मोती मिलते जाते हैं। ऐसा ही एक और मोती मिला है नाम है- निर्मल।

   अब उपन्यासकार निर्मल के विषय में कोई ज्यादा जानकारी तो खैर उपलब्ध नहीं हो सकी। जो जानकारी प्राप्त हुयी है उसका स्त्रोत एक उपन्यास है- घूंघट और घुंघरू। यह उपन्यास 'पंकज पॉकेट बुक्स-मेरठ' से प्रकाशित है।

आबिद रिजवी जी और रवि पॉकेट बुक्स मनेष जैन जी से प्राप्त जानकारी अनुसार- निर्मल गौरी पॉकेट बुक्स वालों के छोटे भाई थे;  मूल नाम था निर्मल जैन। निर्मल नाम से कुछ उपन्यास प्रकाशित हुए थे। नॉवल किसने लिखे, यह जानकारी गोपनीय रही क्योंकि न प्रकाशन ज़्यादा दिन चल सका न लेखक का नाम ही।

निर्मल के उपन्यास

1. घूंघट और घुंघरू

सोमवार, 6 सितंबर 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा- 10

 मैं आवार, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा- 10

अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा `मैं आवारा, इक बनजारा` का दसवां और अतिंम अंक।

जब हम `राधा पॉकेट बुक्स` पहुंचे, तो हमारी मुलाकात शायद उस पॉकेट बुक्स के मालिक मनेष जैन जी के छोटे भाई से हुई थी, जिनका कि नाम मैं नहीं जानता।

क्योंकि उनका नाम पूछने कि मेरी हिम्मत ही नहीं हुई थी।

वहां मशहूर उपन्यासकार और मेरे बचपन के हीरो श्री परशुराम जी शर्मा पहले से ही मौजूद थे, जो उस वक्त मनेष जैन के छोटे भाई से `बालाजी स्टूडियो` की मालकिन और मशहूर हीरो रह चुके जितेंद्र की सुपुत्री एकता कपूर के सीरियलों की बात कर रहे थे । 

उनकी बातें सुनकर मुझे ऐसा लगा कि किसी न किसी रूप में  परशुराम जी शर्मा का फिल्मी लाइन में भी दखल है। वैसे वह उन दिनों तुलसी पॉकेट बुक्स से निकलने वाली पत्रिका तुलसी कहानियों के संपादक थे। मैंने बतौर संपादक उनका नाम तुलसी कहानियों में पढ़ा था। उनकी बातों से मुझे आगे जाकर यह भी पता चला कि प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यासकार श्री प्रेम बाजपेई का निधन कुछ दिनों पहले हो चुका है और उनके सुपुत्र फिल्म लाइन में जाने का इरादा रखते हैं। 

प्रेम बाजपेई के निधन की खबर सुनकर मुझे बहुत गहरा धक्का लगा, क्योंकि मैं उस महान हस्ती का भी नियमित पाठक था और उनके उपन्यास मुझे बहुत ही अच्छे लगते थे।

पर उस दुख के साथ - साथ खुशी इस बात की थी कि अपने चहेते और लोकप्रिय लेखक श्री परशुराम जी शर्मा को, जिनकी अब तक मैंने सिर्फ उपन्यासों पर छपी हुई फोटो ही देखी थी, आज साक्षात देख भी लिया।

मैंने ये कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अचानक उनसे यूं मुलाकात हो जाएगी।

उनका पहनावा बहुत ही शानदार था और वे सचमुच किसी फिल्म के हीरो जैसे लग रहे थे।

मैंने मनेष जैन जी के छोटे भाई  को एक ही सांस में अपना परिचय देते हुए बताया कि मेरा नाम अशोक कुमार शर्मा है और मैं अपना उपन्यास अपने नाम और फोटो के साथ आपकी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित करवाना चाहता हूँ।

उन्होंने गौर से मेरी और देखा और फिर गम्भीरता से पूछा कि -पहले कभी कहीं से छपे हो ?

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा -09

मैं आवारा, एक बंजारा- अशोक कुमार शर्मा
        आत्मकथा, भाग-09   
       
बाद में मैंने मशहूर लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक जी की विमल  सीरीज स्टाइल में एक उपन्यास और लिख डाला, जिसका कि शीर्षक था - 36 करोड़ का हार
यह उपन्यास मेरे पाठकों को बहुत ही ज्यादा पसंद आया और इसी उपन्यास से मेरे उपन्यासों के मुख्य किरदार 'सरदार जगतार सिंह जग्गा' का जन्म हुआ, जिनका कि नाम आगे जाकर काफी मशहूर हुआ। 
       इसका सबूत मेरे पास देश के हर कोने से आए वे हजारों खत है, जो आज भी मेरे पास सुरक्षित मौजूद है।
यह उपन्यास मेरे नाम और फोटो के साथ प्रकाशित हुआ था और इस उपन्यास के प्रकाशन की दास्तान कुछ यूं है दोस्तों कि इस उपन्यास को लिखने के बाद मैं एक बार फिर दिल्ली और मेरठ के कई प्रकाशको के दफ्तरों में गया, पर इस बार मैं राजा पॉकेट बुक्स के मालिक श्री राजकुमार जी गुप्ता से नहीं मिला, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं मैं उनके रौब और प्रभाव में आकर पहले की तरह ही इस उपन्यास को भी उनके ट्रेडमार्क के तहत प्रकाशित करने की इजाजत नहीं दे दूं ।
       दिल्ली के प्रकाशकों ने एक बार फिर मुझे घास नहीं डाली और यही हाल मेरा मेरठ जाकर भी हुआ।
मैं 'तुलसी पॉकेट बुक्स' जाकर  श्री वेद प्रकाश जी शर्मा और ऋतुराज जी उर्फ सुरेश जैन जी से भी मिला, पर उन्होंने भी मुझे कोई खास तवज्जो नहीं दी। 

सोमवार, 30 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की-05

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 05
========================
वेद जी ने 'विजय और केशव पंडित' का प्रूफ पढ़ा फार्म ओम जी की ओर बढ़ा दिया और 'शमा' काटकर 'समा' किये गये शब्द को दिखाकर बोले - "आप यह बताइये, इसमें क्या सही है? यहाँ 'शमा' आना चाहिए या 'समा'...?"
"समा आयेगा...!" -ओम जी ने सेकेण्ड की भी देरी किये बिना, मेरे द्वारा की गई करेक्शन स्वरूप लिखे गये 'समा' शब्द पर उंगली रख, तुरन्त ही जवाब दिया।
अगले ही पल जो हुआ, वह अप्रत्याशित था।
       एक झटके से वेद जी कुर्सी से उठे और टेबल पर आगे की ओर, मेरी तरफ झुकते हुए, उन्होंने अपना लम्बा हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया तथा मेरे सुकड़े और कोहनी से मुड़े हाथ को एकदम थाम, खींच कर तेजी से हिला दिया, फिर एक गोल्डन जुबली मुस्कान मेरे चेहरे पर फेंकते हुए बोले -"फिर तो बहुत अच्छा हुआ, मैंने तेरे से प्रूफ पढ़वा लिये, वरना ख्वामखाह गलती रह जाती!" 

       फिर सिर घुमा वेद जी ने सुरेश जैन जी को ओर देखा - "क्यों सही किया न योगेश को प्रूफ पकड़ा दिया..?"

सुरेश जी गर्दन हिलाकर मुस्कुराये। उस समय बोले कुछ नहीं। हालांकि बाद में ओम जी और मेरे साथ ढेरों बातों में वह भी खुलकर शामिल हुए।
दोस्तों, कुछ समझे...

बुधवार, 25 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -04

 कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की -

प्रस्तुति- योगेश मित्तल
=============================
      मनोज पाकेट बुक्स में जब वेद भाई ने छपना आरम्भ किया, उसके बाद मनोज पाकेट बुक्स में मेरे बहुत ज्यादा चक्कर नहीं लगे।
पर एक बार जब वहाँ पहुँचा, संयोगवश उस समय वेद भाई भी वहीं मौजूद थे ऑफिस में उनके अलावा सिर्फ गौरीशंकर गुप्ता जी थे। 
मनोज पाकेट बुक्स और राज पाकेट बुक्स के ऑफिस जब तक शक़्तिनगर में रहे, दोनों जगह मैं खुद को VIP शख्सियत जैसा महसूस करता रहा था।
      मनोज पाकेट बुक्स में तो मेनगेट से कोठी में दाखिल होकर, सीधे ही बायीं ओर बेसमेंट में जाने वाली सीढ़ियाँ थीं, जहाँ बाहर कोई दरबान नहीं होता था। 
मैं धड़धड़ाता हुआ सीढ़ियों से नीचे उतर जाता और नीचे पहुँच जाता। सीढ़ियों के साथ गैलरी के दायें बायें केबिन थे। 

            दायीं ओर एकाउन्टेन्ट नवीन और प्रूफरीडर भूपेन्द्र के छोटे- छोटे केबिन थे, जबकि बायीं ओर थोड़ी खाली जगह, फिर एक बड़ा केबिन था, जिसका इन्ट्रेन्स डोर साइड में न होकर, नजरों के सामने ही पड़ता था। मैं हमेशा बिना किसी से कुछ पूछे इन्ट्रेन्स डोर खोल कर बॉस लोगों के केबिन में घुस जाता था। अन्दर घुसते ही इन्ट्रेन्स डोर वाली तरफ ही दो-तीन कुर्सियाँ रखी होती थीं, फिर एक लम्बी टेबल, जिसके पीछे केबिन की बैक दीवार से कुछ स्पेस रखती हुई, राजकुमार गुप्ता जी और गौरीशंकर गुप्ता जी की रिवाल्विंग कुर्सियाँ। 
     अग्रवाल मार्ग वाले मनोज पाकेट बुक्स के उस ऑफिस में मेरे अलावा भी सम्भवतः कुछ अन्य लोगों के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा अजनबी लोगों को एकाउन्टेन्ट नवीन ही एकदम रोक देता था। उसका केबिन इस तरह बना था कि सीढ़ियों से गैलरी तक उसकी तीक्ष्ण निगाह से किसी का भी बचना नामुमकिन था। मतलब साफ था कि नवीन की नजरों में आये बिना किसी का भी मनोज पाकेट बुक्स में आना-जाना असम्भव था।

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -03

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 03
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की - 02
=============================
उन दिनों मैं मेरठ ही रह रहा था।
कभी देवीनगर में अपनी सबसे बड़ी बहन प्रतिमा जैन के यहाँ तो कभी हरीनगर के एक बहुत बड़े मकान के अलग-अलग पोर्शन में रहने वाले अपने चार मामाओं में से दूसरे नम्बर के मामाजी रामाकान्त गुप्ता जी के यहाँ या तीसरे नम्बर के मामाजी विजयकान्त गुप्ता के यहाँ सभी मामाओं के बच्चे मुझे सगे भाई जैसा मान और प्यार देते थे।
रामाकान्त मामाजी की पांचों बेटियों ने मुझे हमेशा सगे भाई जैसा मान और प्यार दिया है! उस समय बड़ी दो बेटियों संगीता और सविता का विवाह हो चुका था! छोटी तीनों बेटियों सरिता, अंजू और राखी के साथ अक्सर मैं लूडो या कैरमबोर्ड भी खेला करता था और कभी-कभी कोई कहानी भी सुनाता था, जबकि विजयकान्त मामाजी की बेटियाँ पूनम और नीलू तथा बेटे बबलू और टीनू मुझे देखते ही "भैया, कोई कहानी सुनाओ" की रट लगाकर घेर लेते थे।
रिश्तों और रिश्तेदारियों में उन दिनों बेपनाह और निस्वार्थ प्यार होता था और मुझे तो आज भी सभी से वही प्यार और सम्मान हासिल है। 
मामाजी का मकान ईश्वरपुरी की गली के तुरन्त बाद की गली का पहला ही मकान था। 
सुरेश जैन रितुराज
उस समय तक भारत में कामिक्स युग की शुरुआत हो चुकी थी और यहाँ पहली हंगामी शुरुआत करने का श्रेय 'एन. एस. धम्मी स्टुडियो' को जाता है, जिसका एक हिस्सा बालक हरविन्दर माँकड़ भी था, जो बाद में लोटपोट से जुड़ने के बाद कामिक्स जगत का सुपर स्टार बना।
        उस समय तक मैं नूतन कामिक्स, राज कामिक्स, मनोज कामिक्स और राधा कामिक्स के लिए अपना कुछ न कुछ योगदान दे चुका था। लेकिन यह किस्सा कामिक्स की दुनिया में फिर कभी....।
     आप सोचेंगे कि कामिक्स की दुनिया में एक नया आयाम लिखने वाले चचा चौधरी फेम के 'प्राण' का नाम न लेकर, मैंने एन. एस. धम्मी और हरविन्दर माँकड़ का जिक्र क्यों किया है तो सच्चाई और आँकड़ों के साथ इस विषय पर विस्तार से कामिक्स की दुनिया के कालम में लिखूँगा।

नये उपन्यास-2021,

शनिवार, 31 जुलाई 2021

कलाकार और मौत- पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'

 कलाकार और मौत - पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'

पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। 'जंजीर'(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था। 

    गत फरवरी के प्रथम सप्ताह में संवाद पढने को मिला कि एक अमरीकी उपन्यासकार और सुलेखक तथा उसकी परम सुंदर पत्नी की हत्या किसी ने रातो रात कर डाली। हत्या के पूर्व उन्हें निर्दयता से पीटा गया, फिर छुरे घुसेड़े गये और फिर गोली मारी गयी। जरा हिंसा का शृंगार, 'फिनिश' तो देखिये। 'वीभत्स' का कैसा विस्तार ! चित्रकार जैसे रंग-रंग से चित्र रगे, गवैया जैसे ढंग-ढंग तान पलेट लेकर संगीत सँवारे, कवि जैसे अक्षर, छंद, ध्वनि और रस से काव्य करे वैसी ही शांति, व्यवस्था और मनोयोग से हत्यारा हत्या भी करे! समाचार पढने के बाद मेरे मन में आया कि उस अमरीकी कलाकार की मृतात्मा से कभी भेंट होती तो मैं उससे पूछता कि जीवन में अधिक मजा था या मृत्यु में? यश में अधिक आनंद था या हंटरों से निर्दय पीटे जाने में? स्वार्थ और छुरे में से छाती की छलनी अधिक उन्माद से कौन करता है? खूबसूरत औरत और पिस्तौल की गोली में कितना फर्क है? उस अभागिनी सुंदरी से भी मैं जरूर पूछता कि रूप और मृत्यु में (ओ आर्या रूपवती शत्रु!) कोई भेद है भी?

  कुशवाहा कांत

     हिंदी कथा साहित्य से अगर आपका जरा भी संबंध है, तो आपने कुशवाहा कांत का नाम जरूर सुना होगा। यह दूसरी बात है कि आपने उक्त नाम अप्रसन्नता से सुना हो या प्रसन्नता से। 'उग्र गुरुड़म' में नहीं विश्वास करते बला से- यह लोग कुशवाहा कांत की 'उग्र स्कूल' का कलाकार मानते थे। हिंदी में फिलहाल मेरी नजरों में कमोबेश `उग्र स्कूल` का ही बोलबाला है। यद्यपि `उग्र` बीसियों  बरसों से नहीं के बराबर लिखते हैं। पर स्वयं मैं उसे अपने स्कूल के महज एक शाखा का विद्यार्थी मानता था। उस शाखा का नाम रख लीजिये `यौन सनसनी`। वर्तमान विश्व का बौद्धिक बाजार- खासकर दूसरे महायुद्ध के बाद- इसी सनसनी से सनक रहा है।  मगर पहले मुझे कुशवाहा कांत की खबर लेने दीजिये।

  कल और कलदार

मेर बातों का आप विश्वास करे तो मैंने अपनी रचनाओं में समाज को `ज्यो का त्यों` दर्शाने के फेर में `यौन सनसनी` को सजाया था, कलदार कमाने के लिये नहीं, पर दुर्याग्य से, `यौन सनसनी` चित्रण में-अपना सा मुहँ देखकर-बाजार के खरीददार चकाचक रस लेते हैं। रचनाओं की बिक्री तब ही होती है। पैसों की तो बरसात हो जाती है। एक बार मैंने ही कितने रुपये कमाये थे और कितने वक्त में। श्री ॠषभ जैन का उत्थान पर्व भी आपको भूला न होगा।  वैसे ही कुशवाहा कांत ने खूब रुपये कमाये। कहने वाले तो सैकड़ों हजार की कहानियां सुनाते हैं। मुझे इतना मालूम है कि एक दिन एक टाइप के पाठक काशी से कन्याकुमारी तक कुशवाहा कांत को हिंदी का श्रेष्ठ उपन्यासकार मानते थे? जब हिंदी के बिगड़े साहित्यिक  और  कलाकार उसको असफल, अश्लील कह रहे थे, तब वह बनारस में अपना बड़ा सा प्रेस खोलकर चौथाई मासिक पत्र और सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित कर,कलाकारों को हैरान और रोजगारों को परेशान कर रहा था।

 हत्या

       मनचले, रंगीले लेखक `उग्र` की साहित्यिक हत्या कर डाली गयी, इसे `उग्र` न भी माने, तो दुनिया मानती है। श्री ॠषभ चरण के दुःखद दर्शन सामने है। और कुशवाहा कांत की तो सचमुच हत्या ही की गयी थी। आने वाली होली के दिन उसकी तीसरी या चौथी मरण-तिथि पड़ेगी। वह `सफल बाजारू` किस तरह से मारा गया था, किस बुरी तरह मरा कि स्मरण पत्र से मेंरे तो रोंगेट खड़े हो जाते हैं। उस वर्ष की होली के आठ-दस दिन पूर्व, रात के वक्त कुशवाहा कांत के साथ आधे भड़ैत की तरह में बैठकर किसी ने उस पर अनेक घातक आक्रमण किये। सर में छुरा, सीने में छुरा, पेट में छुरा। फिर जख्म सोजन के बाद अस्पताल में डेढ हफ्ते तक पीड़ा और प्यास से तड़फता। फिर ऐन होली के दिन मरण।

 अरे ओ जाने वाले,

रुख से आँचल को हटा देना,

तुझे अपनी जवानी कि कसम।

औरत

आर्टिस्ट को धन जितना नहीं मारता, यश जितना नहीं, नशा भी नहीं, उसे बहुत आसानी से है औरत! इसलिये खूबसूरत स्त्री के कारण प्राण होने वाले कलाकारों की चर्चा में कुशवाहा कांत की याद आ गई। मालूम नहीं उसके मुकदमें में क्या प्रकाशित हुआ, क्या नहीं, पर जब  उसकी हत्या हुई  मैं कलकते में था तब यही अफवाह जोरों पर थी। धन, यश, नशा, औरत प्रतिभाशाली को वैसे ही सुलभ जैसे भूत साधनेवाले को भौतिक सुख। पर, आपने सुना होगा, भूत साधन प्रेत से प्राप्त चीजों का स्वयं उपयोग करते हुये मारे भय के काँपते हैं। प्रेत की कमाई खाने वाला प्रेत से मारा भी जाता है। फिर प्रतिभा बाजार में या विश्वविद्यालयों में तो बिकती-मिलती नहीं। यह तो ईश्वर की कृपा से मुफ्त मिलती है। और बाइबिल में लिखा है कि `अनायास मिली वस्तु का वितरण अमूल्य होना चाहिये।` किसी रंग का प्रतिभाशाली जब अपनी प्रतिभा से बाजारू लाभ उठाने लगता है तब नष्ट भी होने लग जाता है। प्रतिभा से नाजायज फायदा उठाना ही नहीं चाहिये। प्रतिभा की चाँदी बनाने वाले डाक्टरों का वश नहीं चलता, साधुओं का स्वर्ग नष्ट हो जाता है और कलाकार प्रतिभाहत ही नहीं पागल तक हो जाते हैं। `फ्लोबा`-फ्रांस के महान् लेखक ने जीवन से ऊबकर आत्महत्या को खूब माना था। यही गति श्रेष्ठ फ्रांसीसी कलाकार मोपासा की हुयी थी। अद्भुत इंग्लिश लेखक आस्कर वाइल्ड ने घोर अपमानजनक जेल जीवन भी भोगा सो तो दरकिनार, फ्रांस में जब वह मरा तो उसकी काया सड़ कर गल गयी थी। आस्कर वाइल्ड का शव कंधे पर उठाकर कब्रगाह ले  जाने वाले चंद चार नजदीकी यार मात्र थे और वर्षा हो रही थी धुँआधार, दुर्दिन, चारों तरफ अँधकार...अँधकार।

ताव और भाव

  वह मेरे ही बिहड़ मिर्जापुर जिले का अल्हड़ लेखक था-वही खुशवाहा कांत। वह अभी नौजवान था। गधापचीसी से महज चंद जूते आगे। भले मानसों की राय में वह बुरा लेखक था इसलिये नहीं कि वह यौवन सनसनी लिखता था बल्कि इसलिये कि वह बाजार में सफल था। कुशवाहा कांत के आगे-पीछे `यौन सनसनी` लेखक अनेक पर उन नामधारी भले आदमियों की नजर नहीं। सबकी आँखों का कांटा था वह। उसके मारे  जाने से बहुतों को खुशी भी हुयी हो, तो कोई ताज्जुब नहीं। उसे अगर आदर देकर बढावा दिया गया होता तो संभव था वह `यौन सनसनी` से हटकर और भी उत्तम साहित्यिक मार्ग ग्रहण करता। पर, हमारे यहाँ ऐसी चाल नहीं।

     कुशवाहा कांत ने क्या बुरा किया था। किसकी गाय मारी थी उसने? वह उत्तेजक साहित्य लिखता था- यही न, हिंदी में कितने पाठक हैं, सारे भारत को बतलाइये। पहले यही बतलाइये कि सारे भारत में पढे-लिखे लोग ही कितने हैं? 15 प्रतिशत, उसमें कितने हिंदी जानते हैं? उनमें खरीदकर कितने पढने वाले हैं? मैं दावे  से कहता हूँ, आज का सत्ताधारी स्वदेशी राजनीतिक अपने दुष्ठ कर्मों से सारे भारत की जनता का जितना नुकसान कर रहा है, हिंदी का कोई भी साहित्यिक उसका पासंग भी नहीं कर सकता, फिर भी कुशवाहा कांत को बुरा करने वाले भले मानस ऐसे अनैतिक अधिकारियों से घृणा कर नहीं सकते। उलटे पापियों, जनलूटकों, भ्रष्टाचारियों को महिमान्, श्रीमान्, क्या-क्या नहीं करते हैं। फोटो छापते हैं, जीवनी छापते हैं, अभिनंदन ग्रंथ और  मानपत्र समर्पित करते हैं।

  मैं कहता हूँ आज के अनेक मिनिस्टर या डिप्लामेंट यदि मरने के पहले ही मार* न डाले गये तो मरते ही युग के स्मृति-पट से यूँ मिट जायेंगे जैसे जानवर विशेष के सिर से सींग गायब-कोई उसका  नामलेवा न रह जायेगा। पर कुशवाहा कांत के पाठक उसके मर जाने पर भी कम होने वाले नहीं। भले ही आप उसे किसी दर्जे का लेखक कहें और उन्हें किसी दर्जे का पाठक।

  फागुन के दिन चार

      उस दिन रंग नहीं था तो कुशवाहा कांत उपन्यासकार के कफन पर बाकी सारी विलासी रंग-रंगीली लाल रही-नीली पीली थी। उन्माद नहीं था तो उस मैखार की काया में बाकी सारा शहर उन्मत्त था। अस्सी से वरुणा तक, करुणा केवल कुशवाहा कांत की अर्थी के निकट, बाकी चारों ओर उल्लास, हास, विलास, रास। शहर में इतना जीवन था कि उस मुर्दे की सुधि जिगरी दोस्तों को भी न आई हो, तो आश्चर्य क्या। होली के रंगीन विशेषांकों में उसके लिये अखबार वाले  ब्लैक बार्डर लगाते भी तो क्योंकर। सो, जब उसकी उम्र वाले तरुण अपने प्रिय और प्रियतमों से गले लग रहे थे तब कुशवाहा कांत को चिंता पर सुलाकर जलाया जा रहा था।

कुशवाहा कांत
लो?

  बाजार जीतते वक्त औ जीत लेने के बाद भी अनेक बार पत्र लिख और पुस्तकें भेजकर उसने मुझे गुरु माना पर मेरा मुहँ सहज सीधा होने वाला कहाँ। कभी मैंने न तो उसके पत्रों का उत्तर दिया और न आशीर्वाद ही। मिर्जापुर का वह भी, मैं भी। मैं `मतवाला` निकालता था, वह `चिनगारी`। पर हमने न तो कभी एक दूसरे को देखा न बातें की। इतनी बातें आज मैं लिख रहा हूँ उसके मर जाने के तीन या चार साल बाद।

`समाज`

                                 पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र`

*भावुकता की बहस में कही पाठकगण गोड़से पंथ के अनुगामी न बन जाये।                                

 पाण्डेय बेचन शर्मा `उग्र` का यह आर्टिकल कुशवाहा कांत के अंतिम उपन्यास `जंजीर` में प्रकाशित हुआ था। `जंजीर`(1954) को कुशवाहा कांत के भाई जयंत कुशवाहा ने पूर्ण किया था। 

   

Featured Post

मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...