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बुधवार, 1 मई 2019

अमित श्रीवास्तव जी के उपन्यास का लेखकीय

फरेब उपन्यास के लेखकीय से...

नमस्कार दोस्तों,
         आपके समक्ष अपना पहला उपन्यास प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी और गर्व का अनुभव हो रहा है। यह उपन्यास कई लोगो की मेहनत का नतीजा है। सर्वप्रथम मैं धन्यवाद अदा करता हूं अपने माता पिता और मेरी धर्मपत्नी शालिनी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा साथ दिया। और मेरे हर निर्णय का समर्थन किया। यदि शुभानंद जी और सूरज पाकेट बुक्स ने मुझ पर विश्वास नहीं दिखाया होता तो यह बुक आप के सामने नही आ पाती। यह बुक जो इतनी अच्छी बनी उसमे सूरज पाकेट बुक्स की क्रिएटिव टीम का बहुत बड़ा हाथ है। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूं मिथिलेश गुप्ता जी, देवेन पांडे जी, एडिटर डॉ प्रदीप शर्मा जी, शाहनवाज भाई और निशांत मौर्य जी का जिन्होंने इसके कवर और डिजाईन पर मेहनत की, खास कर शाहनवाज भाई जी की मेहनत तो कबिले तारीफ थी, क्योंकि उन्होंने विभिन्न विचारों को ध्यान में रखकर कवर बनाया। विशेष आभार प्रकट करना चाहूँगा रमाकान्त मिश्र जी और आदित्य वत्स जी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया, साथ ही शुभानंद जी का, जिनसे एक नया लेखक इस मुकाम पर पहुँचा। अंत मे आभार प्रकट करता हूं उन समस्त पाठकों का जिन्होने अपना बहुमूल्य समय देकर इस उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की। मैं उम्मीद करता हूं यह उपन्यास आप सब की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

                       दिसम्बर 2012 में जब मैं पहली बार फेसबुक की दुनिया में शामिल हुआ तब लोगों में हिन्दी नावेल के प्रति जागरूकता नही थी। आज वक्त बदल चुका है। नये लेखकों को अच्छे मंच मिल चुके है। पुराने लेखकों ने फिर से कलम उठा ली है। उदाहरण परशुराम सर, एस सी बेदी सर, अमित खान सर हैं। यह बदलते वक्त की निशानी है। यह सब ऐसे ही नही बदला इसको बदलने में फेसबुक और वाट्सअप पर बन रहे अनेक ग्रुप का अभूतपूर्व योगदान भी रहा है। जिन्होने इस विधा में जान डाल दी। सर्वप्रथम मेरा जुड़ाव हुआ सुरेन्द्र मोहन पाठक ग्रुप और अनिल मोहन लिजेंड ग्रुप से, जहाँ मैने बहुत सी जानकारी प्राप्त की, अनील मोहन लिजेंड ग्रुप में मेरी मुलाकात हुई आदित्य वत्स जी से जिन्होने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। नौ सितम्बर 2016 मेरे जन्मदिन के दिन मुझे ऐसा गिफ्ट मिला जिसे मैं भूल नही सकता। आदित्य जी ने इस दिन एक ग्रुप बनाया "दिवाने दे क्रेजी" और इस का एडमीन मुझे बना दिया यहाँ से मुझे फरेब लिखने की प्ररेणा मिली और यहाँ से सूरज पॉकेट बुक्स और उनके लेखकों से मेरी जान-पहचान हुई जिनके कारण फरेब अपने मुकाम पर पहुँचा।


            ‌‌18 फरवरी 2017 की सुबह जब मैं सो कर उठा तो एक अशुभ समाचार मेरा इंतजार कर रहा था। लोगो के दिलो पर राज करने वाले स्व.वेद प्रकाश शर्मा जी नही रहे। यह घटना मुझे बहुत आहत करने वाली थी। मैं समझ नही पा रहा था इस घटना को कैसे सहन करूँ। उस समय फरेब अपने अन्तिम स्टेज पर था। यू तो मैने अपने जीवन में अनेक लेखको को पढ़ा पर अन्त में तीन लेखको को ही पढ़ता था जिन में सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनील मोहन, ओर स्व. वेद प्रकाश जी थे। सब अपनी विशेषताओं के कारण पंसद थे पर वेद जी का स्थान अलग था। मेरे उपन्यास की शुरुवात वेद जी से ही हुई। आज भी उनके नाम के साथ कई उपन्यास जहन में आते हैं जिनमे रामबाण, कठपुतली, डमरुवाला, बीवी का नशा, दहेज में रिवॉल्वर, देवकांता सन्तति, असली खिलाड़ी, शिखंडी, बहू मांगे इंसाफ, जिगर का टुकड़ा, प्रमुख हैं। उनकी यादें सदा इस दिल में रहेगी। फरेब समर्पित है स्व. वेद प्रकाश शर्मा जी को जिनके कारण यह छोटा कलमकार कुछ लिख पाया।
        फरेब की यह कहानी सुमित अवस्थी के मर्डर केस से प्रारंभ होती है। पुलिस लाख कोशिश के बाद भी कातिल को नही पकड़ पाती जब इस केस की जड़ें चंद्रेश मल्हौत्रा के केस से जुड़ती हैं। जिसकी बीवी कुछ दिनो से लापता है। तो कइयों की जिन्दगी में तूफान आते हैं। फरेब की ऐसी दास्तान सामने आती है जो आप के होश उड़ा देगी। सुमित अवस्थी के कातिल को जान कर आप हैरान हो जायेंगे। इस बुक के प्रति अपनी निष्पक्ष राय मुझे फेसबुक या मेल आईडी पर दें। आपके सुझावो के इंतजार में-


आपका
अमित श्रीवास्तव
लेखक- अमित श्रीवास्तव जी



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