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सोमवार, 23 मई 2022
रीमा भारती
1. बिच्छू
धीरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित रीमा भारती के उपन्यास
शुक्रवार, 20 मई 2022
नये उपन्यास-2022
साहित्य देश ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।
नये उपन्यासों की सूचना स्तम्भ में प्रस्तुत है आपके लिए कुछ नये उपन्यासों की जानकारी। हालांकि यह पोस्ट कुछ समय पहले आ जानी चाहिए थी, पर अतिव्यस्तता के कारण देर हो गयी।
1. तीसरी आँख- कमलदीप
प्रकाशक- अजय पॉकेट बुक्स
कमलदीप जी उपन्यास क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं पर वे पर्दे के पीछे ही रहे हैं, अर्थात Ghost writing करते रहे हैं। लेकिन अब अजय पॉकेट बुक्स ने उन्हें उन्हीं के काम से प्रकाशित किया है।
तीसरी आँख एक मर्डर मिस्ट्री पर आधारित उपन्यास है। जिसमें अमन नामक डिटेक्टिव रामा पैलेस में हुये मर्डर की जांच करता है। पत्थर की जुबान रखने वाले शातिर अपराधी भी अमन के आगे तोते की तरह बोलने लगता था। मुर्दे के हलक में हाथ डालकर सच्चाई उगलवाने की काबिलियत थी उसमे , वही अमन वर्मा रामा पैलेस में एक के बाद एक हो रहे क़त्ल के चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया था। तीन -तीन क़त्ल की वारदांतो ने उस तेज तरार जासूस की खोपड़ी घुमा कर रख दी थी उसकी तीसरी आँख क्या इन क़त्ल का राज़ उजागर कर सकी...?
लेखक का स्वयं के नाम से प्रकाशित होने का यह प्रथम अवसर है। अतः पाठक मित्रों को यह उपन्यास एक बार तो अवश्य पढना चाहिये।
एक बात और भी गौरी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित केशव पण्डित का प्रथम उपन्यास 'सुहाग की हत्या' के रचयिता कमलदीप जी ही हैं।
किंडल लिंक- तीसरी आँख- कमलदीप
2. हेरीटेज हाॅस्टल हत्याकाण्ड- आनंद चौधरी
प्रकाशक- अजय पॉकेट बुक्स
बुधवार, 18 मई 2022
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -20
देवीनगर गया था, वहाँ सतीश जैन उर्फ मामा ने कुछ पुराने आठ नौ फार्म के सामाजिक उपन्यास दिये, जो घोस्ट नामों से छपे हुए थे। उनमें तीन चार फार्म का मैटर बढ़ाना था। तरीका सतीश जैन ने यह बताया कि लगभग आठ पेज का मैटर उपन्यास के स्टार्टिंग में बढ़ाना है और इतने ही पेज आखिर में। उपन्यास का अन्त बेशक बदल जाये, उसकी कोई चिन्ता नहीं। बाकी बीच में जितने भी चैप्टर हैं, सबकी स्टार्टिंग दो तीन लाइन बदल देनी है या नयी एडजस्ट करनी है।
उपन्यास के मुख्य पात्रों के नाम सतीश जैन ने स्वयं ही पहले से काट-पीट करके बदल रखे थे। उपन्यास का नाम भी कोई नया ही रखना था।
मतलब समझ गये आप...! एक पुराना उपन्यास, जो अच्छा रहा हो या बकवास... योगेश मित्तल का हाथ लगने के बाद एक नये नाम से बिल्कुल नये उपन्यास के रूप में पाठकों के हाथ में जाना था और लेखक को यानि मुझे नया उपन्यास लिखने के पारिश्रमिक से आधा ही पारिश्रमिक मिलना था और प्रकाशक के पास एक नया उपन्यास तैयार हो जाना था। ऐसे कामों में मुझसे ज्यादा सिद्धहस्त उस दौर में दूसरा कोई भी लेखक नहीं था। यह मैं या मेरा अहंकार नहीं कह रहा है - यह शब्द उन दिनों लक्ष्मी पाकेट बुक्स के सर्वेसर्वा सतीश जैन के थे। इसका एक कारण यह भी था कि उन दिनों ज्यादातर लेखक अपनी दाल-रोटी के लिये लिखते थे और उनके लिखने का रूटीन रोज नियम से कुछ घण्टे लिखने का था, जबकि मेरे लिखने का न तो कोई टाइम होता था, ना ही मूड। जब पैन उठाया - काम शुरू।
चौबीस घण्टों में किसी भी घण्टे मैं बिना किसी प्लानिंग के, बिना कुछ सोचे हुए भी कलम उठा लेता था तो दिमाग की बत्ती तुरन्त जल जाती थी और पैन फुल स्पीड से दौड़ने लगता था और यह खूबी अब भी मुझ में बरकरार है, यह और बात है कि इस खूबी का मैं अपने जीवन में माकूल फायदा नहीं उठा सका।
शुक्रवार, 6 मई 2022
गुंजन
प्रकाशक- नीलम पॉकेट बुक्स, मेरठ
श्रेणी- Ghost Writer
Hindi Pulp Fiction में एक और नाम मिला है वह है गुंजन।
गुंजन के उपन्यास नीलम पॉकेट बुक्स मेरठ से प्रकाशित होते रहे हैं। नाम के प्रतीत होता है गुंजन एक Ghost Writer है।
गुंजन के उपन्यास
- अनुपमा
- घुटन - सितम्बर 1976
- उमंग
शनिवार, 30 अप्रैल 2022
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 19
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
नूतन पाकेट बुक्स का ऑफिस उस समय खुला हुआ था। सुमत प्रसाद जैन अपनी सीट पर बिराजमान थे। एक कोने में एक वर्कर कुछ बण्डल पैक कर रहा था।
मैं रुका, मुड़ा, फिर पलटकर नूतन पाकेट बुक्स के ऑफिस में प्रविष्ट हो गया।
"नहीं... ऐसी कोई तलब नहीं है।"- मैंने कहा तो सुमत प्रसाद जैन बड़ी आत्मीयता से बोले -"कर दी न दिल तोड़ने वाली बात। दिन भर में बीस कप चाय पीने वाला योगेश मित्तल हमें चाय को मना कर रहा है। अबे यार, बड़ी देर से मेरा चाय पीने का मूड कर रहा था, लेकिन अकेले पीने का मन नहीं हो रहा था, इसीलिये तो तुझे देखकर आवाज दी।"
"ठीक है, मंगा लीजिये।" - मैं हंसते हुए बोला। तो जनाब यह भी नूतन पाकेट बुक्स और सूर्या पाकेट बुक्स के संस्थापक सुमत प्रसाद जैन का एक मूडी अन्दाज़ था, जिसकी जितनी तारीफ की जाये, कम है। मूड होने पर भी सिर्फ इसलिये चाय नहीं पी रहे थे, क्योंकि उस समय अकेले पीने का मूड नहीं था और गुफ्तगू करने वाला कोई साथी नज़र नहीं आ रहा था।
मीरा बाजपेयी
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022
दिनेश ठाकुर
मूल नाम- प्रदीप कुमार शर्मा
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में दिनेश ठाकुर का एक विशेष नाम है। दिनेश ठाकुर का वास्तविक नाम प्रदीप कुमार शर्मा था, इन्होंने प्रदीप कुमार शर्मा, प्रदीप शर्मा, प्रदीप ठाकुर आदि नामों से भी उपन्यास लेखन किया है, लेकिन उन्होंने जो विशेष ख्याति प्राप्त हुयी है वह है दिनेश ठाकुर नाम से लिखे इनके 'रीमा भारती' सीरीज के उपन्यासों से। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'राहु-केतु' और 'विजय चौहान' सीरीज के भी उपन्यास लिखे हैं।
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| दिनेश ठाकुर |
रीमा भारती 'भारतीय सीक्रेट सर्विस' की एक एजेंट है, जो अपने शरीर को माध्यम बना (HoneyTrap) कर अपराधी वर्ग को पकड़ती है। www.sahityadesh.blogspot.com
'माँ भारती की लाड़ली किंतु उदण्ड बेटी' यह टैग लाइन रीमा भारती के उपन्यासों में मिलती है।
हिंदी जासूसी साहित्य में वेदप्रकाश शर्मा जी के पात्र 'केशव पण्डित' के बाद अगर और किस पात्र की नकल हुयी है तो वह है रीमा भारती।
रीमा भारती के उपन्यासों पर अश्लील का आरोप भी लगा था फिर मेरठ में एक कोर्ट केस के माध्यम से अश्लीलता पर रोक लगी थी।
रीमा भारती के उपन्यासों को हम तीन अलग-अलग रूप में देखते हैं।
- दिनेश ठाकुर द्वारा लिखित रीमा भारती सीरीज के उपन्यास।
- लेखिका रीमा भारती द्वारा लिखित 'रीमा भारती' सीरीज के उपन्यास।
दुर्गा पॉकेट बुक्स की ट्रेड नाम 'रीमा भारती' के उपन्यास।
लिंक - रीमा भारती™ दुर्गा पॉकेट बुक्स लिंक - प्रदीप कुमार शर्मा लिंक- रीमा भारती- रीमा भारती
दिनेश ठाकुर के उपन्यासों की सूची।
रविवार, 24 अप्रैल 2022
साहित्य देश - पांच वर्ष की यात्रा
साहित्य देश के पांच वर्ष
समय अपनी अबाध गति से चलता है। समय की गति चाहे दृष्टिगत नहीं होती पर महसूस अवश्य होती है। समय बहुत कुछ सिखाता है, नये अनुभव देता है।
मुझे शिक्षा विभाग में आये हुये पांच वर्ष होने को है (27 जून 2017), माउंट आबू में आये हुये भी इतना समय होने को है। और 24 अप्रैल 2017 को आरम्भ हुये 'साहित्य देश' ब्लॉग को भी पांच वर्ष हो गये।
इन पांच वर्षों की यात्रा में 'साहित्य देश' ने लेखक, प्रकाशक और उपन्यास प्रेमियों के साथ मिलकर अथक प्रयास से लोकप्रिय साहित्य संरक्षण का कार्य किया है वह स्वयं में अद्वितीय कार्य है।
कहते हैं
मसला ये नहीं की हल कौन करे,
मसला ये है कि पहल कौन करे।
'साहित्य देश' की पहल ने आज जो भी कार्य किया है वह शुरुआत है।
जब हम भी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के समुद्र में उतरते हैं तो हमें पता चलता है की कार्य अभी बहुत कुछ बाकी है। हम (पाठक)या लेखक, प्रकाशक इस विषय पर कभी गंभीर हुये ही नहीं। आज आप इंटरनेट पर सर्च करोगे तो चार-पांच लेखकों से आगे की कोई जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है। क्यों?, क्योंकि हमने इस विषय पर चिंतन-मनन ही नहीं किया, कोई सार्थक कार्य ही नहीं किया।
आज भी बहुत से उपन्यास पाठकों के पास है लेकिन चिंता का विषय यह है की वे उन उपन्यासों की जानकारी ही शेयर नहीं करना चाहते। कारण, कहा नहीं जा सकता।
उपन्यास साहित्य में एक से बढकर एक लेखक हुये हैं लेकिन श्रेय कितनो को मिला? क्योंकि अधिकांश लेखकों की रचनाए समय की गर्द में खो गयी। साहित्य देश का यही प्रयास है उन लेखकों को पाठकों के समक्ष लाया जाये, उन अनमोल कृतियाँ का संरक्षण किया जाये।
हमने आबिद रिजवी जी के उपन्यास kindle पर उपलब्ध करवाने की कोशिश से जो कार्य आरम्भ किया था उसे आगे बढाते हुये हम रजत राजवंशी (योगेश मित्तल) जी के उपन्यास भी Online उपलब्ध करवाये हैं, और आगे भी यह प्रयास यथावत रहेगा।
हम आबिद रिजवी जी और योगेश मित्तल जी का विशेष धन्यवाद करते हैं जो उन्होंने 'साहित्य देश' के लिए अमूल्य समय और जानकारी प्रदान की है।
यह सफर आगे भी जारी रहेगा।
धन्यवाद।
गुरप्रीत सिंह
टीम साहित्य देश
Email sahityadesh@gmail.com
Mob- 9509583944
शनिवार, 23 अप्रैल 2022
यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की – 18
“ताला तेरा नहीं है, यह क्या बात हुई?” - वेद ने चकित होकर कहा।
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थी
बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थी, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहता, सामने की गैलरी में आ खड़े हुए, जयन्ती प्रसाद सिंघल जी बुलन्द और रौबदार आवाज कानों में पड़ी –“अबे तू जिन्दा है, मैं तो समझा, मर-खप गया होगा। सदियाँ बीत गईं तुझे देखे।”
“सदियाँ....।”- मैं और वेद दोनों जयन्ती प्रसाद सिंघल के इस शब्द पर मुस्कुराये, तभी जयन्ती प्रसाद सिंघल जी का खुशी से सराबोर स्वर उभरा -”अरे वेद जी, आप भी आये हैं, इस नमूने के साथ। धन्य भाग हमारे। आये हैं तो जरा हमारी कुटिया भी तो पवित्र कर दीजिये।” जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थी
जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बाँयीं ओर स्थित रायल पॉकेट बुक्स के छोटे से ऑफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया। ऑफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थी, जयन्ती प्रसाद सिंघल जी ने दूसरी भी खोल दी, फिर स्वयं टेबल के पीछे बांस की कुर्सी पर विराजे और हमसे बैठने का अनुरोध किया।
“इसका ताला तोड़ कर, अपना न लगाता तो और क्या करता, दस महीने में तो यह कमरा भूतों का डेरा हो जाता। हम सारे घर की रोज सफाई करवावैं हैं, लेकिन...।”
“दस महीने कहाँ हुए अभी...।”- तभी मैंने जयन्ती प्रसाद सिंघल जी की बात काटते हुए कहा।
वह बोले –“हिसाब लगाना आवै है या सिर्फ कागज़ काले करना ही जानै है?”
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मेरठ उपन्यास यात्रा-01
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...
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वेदप्रकाश शर्मा ' सस्पेंश के बादशाह ' के नाम से विख्यात वेदप्रकाश शर्मा लोकप्रिय जासूसी उपन्यास जगत के वह लेखक थे जिन्होंन...
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केशव पण्डित हिन्दी उपन्यासकार केशव पण्डित गौरी पॉकेट बुक्स के Ghost Writer थे। गौरी पॉकेट बुक्स बंद हो जाने के बाद इसका टाइटल 'तु...
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रानू हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासकार थे। अपने समय के प्रसिद्ध लेखक रानू के पाठकों का एक विशेष वर्ग था। रानू के उपन्यास जितने चाव से अपने समय...
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- मेरे पास उपलब्ध उपन्यासों की सूची। समयानुसार इसे संशोधित किया जाता रहा है। मेरा उद्देश्य 'लोकप्रिय उपन्यास संग्रह' है, जिसके अ...
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नाम- राज भारती लोकप्रिय साहित्य के सितारे राज भारती मूलत पंजाबी परिवार से संबंधित थे। इनका मूल नाम ....था। दिल्ली के निवासी राज भारती जी ने...


















