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मंगलवार, 22 जून 2021

एक नाम की पहचान, जो खुद को ही रास न आई- रवीन्द्र यादव

अरुण आनंद - एक नाम की पहचान, जो खुद को ही रास न आई।
संस्मरण- रविन्द्र यादव

साहित्य देश इस बार 'संस्मरण स्तम्भ' में‌ लेकर आया है। Ghost Writer रवीन्द्र यादव जी का मार्मिक संस्मरण। जो उनके लेखन के साथ-साथ जासूसी उपन्यासकार अरुण आनंद के जीवन के कुछ पृष्ठों से रूबरू करवाता है, वहीं लोकप्रिय साहित्य के नेपथ्य के पीछे छिपे काले सच को सामने लाता है।  
  मुझे उम्मीद है इस भावुक संस्मरण को पढकर आपकी आँखें नम हो जायेंगी।।
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आज पाकेट बुक्स के कारोबार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में जुड़े गिनती के ही ऐसे लोग बचे होंगें जिन्हे 1990 का वह सुनहरा दौर याद होगा, जो अब कभी लौटकर नहीं आएगा। उसी दौर के एक किरदार का नाम था अरुण आनन्द.
उपन्यासकार- अरुण आनंद
उपन्यासकार- अरुण आनंद
      हालांकि यह उनका वास्तविक नाम नहीं था। उनका असली नाम था अरूण सागर। 1990 के दशक में वह पश्चिम बिहार दिल्ली के 540 जी एच 13, के थर्ड फ्लोर परं अपने मां बाप भाई बहन के साथ रहते थे। मेरी उम्र उस वक्त महज 16-17 साल होगी। जबकि अरूण सागर की उम्र तीस से ज्यादा थी। 
  मैं एक कामयाब लेखक बनने का बचकाना सपना साथ लेकर पैदा हुआ था और हताशा के साथ बेतहाशा धक्के खाता हुआ 1996 में आखिरकार ‘राजा पाकेट बुक्स तक जा पहुंचा था। 
        उस वक्त तक ‘राजा’ के राजकुमार गुप्ता को नॉवल किंग का मुकाम हासिल हो चुका था और मुझे भी यह अहसास हो चुका था कि मुझे ताजिन्दगी दूसरों के नाम से लिखकर ही अपने सपनों का जनाजा खुद कब्र तक पहुंचाना होगा। बाद में यही हुआ भी। राजा पाकेट बुक्स के कैंप में ही अरूण सागर से मेरी पहली मुलाकात हुई थी और यह मुलाकात किसी और ने नहीं खुद राजकुमार गुप्ता ने कराई थी। उस मुलाकात की इकलौती वजह बस इतनी सी थी कि गुप्ता साहब के पास मेरे जैसे नौसिखिए उपन्यासकार के उपन्यास पढ़ने का वक्त नहीं था क्योंकि उस वक्त वह नागराज और ध्रुव सीरीज की काॅमिक्स में ज्यादा बिजी थे। बाकी बचा वक्त अपने टाइगर व राज जैसे पसंदीदा ट्रेड मार्क के आगामी नॉवल पढ़ने में बिता देते थे। इसलिए उन्होने मेरे शुरुआती दो उपन्यासों को पढ़ने का बेगार अरूण सागर को दे दिया था।
        अरूण सागर 1994 में ही राजा पॉकेट बुक्स से जुड़ गए थे और ‘राजा पाकेट बुक्स’ के लिए ‘राज’ नाम से कई उपन्यास लिख चुके थे। उस वक्त उनका ‘राज’ में सबसे चर्चित उपन्यास ‘मिस इंडिया हत्याकांड’ था। जबकि ‘टाइगर’ के लिए जगदीश वर्मा साहब ने अपना बेस्ट देने का सिलसिला जारी रखा हुआ था। ‘भारत’ के लिए अलीगढ के कोई लेखक लिख रहे थे। जिनका नाम शायद राजेश चौहान था। केवल ‘धीरज’ ऐसा नाम था जिसमें नए राइटर की जरूरत थी। मेरे शुरूआती दोनों उपन्यास ‘अण्डरवर्ल्ड का बादशाह’ और ‘जुर्म का महारथी’ थे। जो बाद में अरूण सागर के हरी झंडी देने के बाद ‘धीरज’ नाम से ही राजा से प्रकाशित हुए थे। इसके साथ ही अरूण सागर से मेरा वह साथ जुड़ाव हुआ, जो कुछ अपवादों के साथ उनकी आखिरी सांस तक कायम रहा। 
     सन् 2000 के साल के आगाज ने अब तक खुद को पाकेट बुक्स व्यवसाय का खुदा समझने वालों को यह आकाशवाणी सुनाई दे गई थी कि तुम्हारे गुरूर मनमानी और अति का अंत करीब है लेकिन किसी के भी अहंकार ने उसे सुनने की इजाजत नहीं दी। अरूण सागर सम्पन्न परिवार से थे इसलिए उन्हें महज पैसों के लिए ज्यादा वक्त तक दूसरों के नाम से लिखना रास न आया और वह जनरल बुक्स के लेखन से जुड़ गए। जिसमें पैसे भले ही कम मिलते थे लेकिन पहचान बराबर मिलती थी। वैसे भी वह दिल्ली से थे और अनिल मोहन व राज भारती जैसे दिग्गजों में उनका उठना बैठना था। जिनके साथ से उन्हे अगला फायदा यह हुआ कि जल्द ही उपन्यास में उन्हें अपनी पहचान मिल गई और उनका पहला उपन्यास ‘दस बजकर दस मिनट’ उनके अपने नाम से प्रकाशित हो गया। जो कि एक मर्डर मिस्ट्री था। इस उपन्यास में उनका नाम अरूण सागर के बजाय अरूण आनन्द लिखा गया। उसकी वजह बस इतनी सी थी कि उस समय मेरठ के एक फेमस प्रकाशन से ‘सागर’ नाम का एक सोशल ट्रेडमार्क निकला करता था, इसलिए अरूण के आगे से सागर हटाकर आनंद लगा दिया गया। 
      अरूण की इस कामयाबी का श्रेय जहां तक मुझे याद है अनिल मोहन को जाता था। मेरी अपनी जरूरत पैसा था इसलिए मैंने खुशी-खुशी अपनी उस दौर की तकदीर को स्वीकार कर लिया और उसी रास्ते पर आगे बढ़ चला। सन् 2000 तक मैंने ‘राजा’ के लिए ‘धीरज' ट्रेड नाम से लगातार सोलह जासूसी उपन्यास लिखे। जिनमें ‘साजिश का मोहरा’ ‘सबसे बड़ा माफिया’ और ‘गुनाह की आंधी’ काफी चर्चित उपन्यासों में रहे। राजा के साथ काम करने का एक बड़ा फायदा यह हुआ कि पाकेट बुक्स के गुमनाम लेखकों की दुनियां में जल्दी मेरी छोटी सी पहचान बन गई। 
 अरुण सागर का  सन् 2000 में पैसों को लेकर ‘राजा’ से विवाद हो गया और  ‘राजा’ को छोड़ दिया। उन्होंने मुझे भी वहां से हटा दिया और मुझे प्रदीप शर्मा के पास पहुंचा दिया। उस वक्त तक अरूण सागर के तीन और उपन्यास उनके नाम से प्रकाशित हो चुके थे लेकिन वजह चाहे पाकेट बुक्स के ढलान का दौर कहें या फिर शायद अनिल मोहन से उनके मतभेद, लेकिन अरूण सागर का नाम कुछ खास न कर सका और वह अपने नाम से छपना बंद हो गए। लेकिन जनरल बुक्स में नाम से छपने का रास्ता उनके सामने बराबर खुला था। बाद में वह पूरी तरह से जनरल बुक्स लेखन का हिस्सा बन गए। 
    सन् 2005 में मैं अगर तुलसी पेपर बुक्स जैसी दिग्गज संस्था का हिस्सा बना तो उसकी इकलौती वजह अरूण सागर की नसीहत ही थी। वह हमेशा कहते थे, गुमनाम लेखक का फायदा लेखक के बजाय प्रकाशक के साथ जुड़ने से है। उसी समय तुलसी ने लेखक के लिए एक अघोषित वैकेंसी भी जारी की थी लेकिन तब न मेरी हिम्मत थी और न ही हैसियत जो मैं मेरठ की नम्बर वन प्रकाशन संस्था तुलसी के कैंप में पांव रख पाता। फिर वह रास्ता भी बना और वह रास्ता सन् 2004-05 में अरूण सागर ने ही बनाया। हालांकि मेरे साथ ही उन्होंने भी तुलसी कैम्प में घुसने की कोशिश की थी। उस दौर के और भी कई नामी घोस्ट लेखकों ने की थी लेकिन मेरी खुशनसीबी कि उस कतार में चुनाव केवल मेरा ही हुआ। और यह मैनें अरूण सागर के बताए रास्ते पर चलकर किया। उसके बाद वक्त बड़ी तेजी से बीता। दिल्ली की यमुना में बहुत पानी बह गया। मेरे सामने एक नए और बुलंद लेखन के लिए खुद को साबित करने की पहाड़ जैसी चुनौती थी। मैंने अपनी जगह तो पक्की कर ली थी लेकिन वहां पर बना तभी रह सकता था जब आगे का दूसरा तीसरा और चौथा पड़ाव भी उसी कामयाबी से पार करता। वरना मेरा रास्ता वहां से अलग हो जाता। बेहतर से बेहतर लिखने का दबाब, अनुबंध और साथ कुछ अन्य बंदिंशें भी मुझे फॉलो करनी थीं जिनसे मुझे प्रत्यक्ष तो कोई नुकसान नजर न आया लेकिन इस सारे सिलसिले ने कुछ दिनों के लिए मुझे दिल्ली और वहां जुड़े लोगों से अलग कर दिया। अरूण सागर से भी मेरा सम्पर्क कुछ दिनों के लिए कटऑफ हो गया। आज सोचता हूं तो लगता है यह शायद अरूण सागर के अंदर छिपे एक लेखक के अहम् को रास नहीं आया होगा और फिर उन्होने मुझे अपनी ओर से कांटेक्ट करना बंद कर दिया लेकिन वह कोई समस्या नहीं थी। मुझे पता था एक दिन आऐगा और मैं उन्हे सब बता दूगा। फिर उनके पास मुझसे नाराजगी की कोई वजह नहीं रह जाएगी। लेकिन वह वक्त काफी देर से आया। उस वक्त तो मशरूफियत कुछ ऐसी हुई कि अगले एक दशक तक मुझे पीछे मुड़कर देखने का वक्त ही न मिला। लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं था कि मैं अरूण सागर को भूल गया था। अरूण सागर ने लेखन की दुनियां में मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। मेरे लिए हमेशा नए रास्ते बनाए थे। मै उन्हे भुलाने की गुस्ताखी कर भी कैसे सकता था। वह तो बस नियति का खेल था। जिसमें एक बड़ा रोल मोबाइल के आगमन ने अदा किया, जिसके बाद बेसिक फोन के युग का लगभग अंत सा हो गया। हर किसी के लैंडलाइन डिस्कनेक्ट हो गए। उनमें अरूण सागर का लैंडलाइन कनेक्शन भी शामिल था। और उनके मोबाइल नम्बर का पता केवल उनके घर जाकर ही चल सकता था। जहां जाने में मैंने आलस्य दिखाया। पत्रों का जमाना तब पूरी तरह से लदा नहीं था। लिहाजा मैंने उन्हे पत्र लिखे।
     सन् 2008 में अपनी शादी का कार्ड भी उन्हें भेजा लेकिन तब भी जब कोई रिप्लाई न आया तो इधर के भी लेखक का हल्का सा अहम् जाग गया। काश! उस वक्त मैंने सच जानने की कोशिश की होती। असल में तो यह सब वक्त और भाग्य का उलटफेर था। दो लेखकों की तकदीर उनकी अपनी तकदीर में एक कहानी लिखना चाहती थी। यह तो मुझे काफी बाद में पता चला था कि हमारे कटआफ के बाद अरूण सागर के साथ क्या हुआ था। 
    2005 का वक्त गुजरते-गुजरते पाकेट बुक्स की तरह ही जनरल बुक्स का बाजार भी सिमट गया था। अरूण सागर के पिता का रिटायरमेंट हो गया था। पारिवारिक बंटवारे के बाद एम आई जी जैसे फ्लैट से निकलकर अरूण सागर एक बेहद पुराने एल आई जी फ्लैट में आ गए थे। जनरल बुक्स की आय उनके खर्च के लिए नाकाफी थी। लिहाजा माता पिता पर निर्भर हो गए। यहां कोई समस्या नहीं थी लेकिन एक लेखक के अहम् के लिए शायद यह समस्या थी। शायद तभी चालीस की उम्र के बाद कहीं जाकर उनका विवाह हो सका था और साथ ही एक लाइलाज दिमागी बीमारी भी सिर उठा चुकी थी। जिसने उन्हे लगभग एक दायरे में समेट दिया था। उन्हें आइन्दा वक्त में और ज्यादा तरक्की न कर पाने का शायद उतना मलाल नहीं था जितना कि उन्हें यह मलाल रहा कि वह अपने पिछले दौर को भी बरकरार न रख सके थे। हालांकि उनका वह कदरन कम रुतबा भी कुछ कम नहीं था लेकिन अहसासे कमतरी का शिकार होने से वह खुद को बचा न सके थे। 
     फिर भी मेरी उनसे आइन्दा मुलाकात हुई थी, जो मेरे ही प्रयासों से उनके ग्राउंड फ्लोर वाले एल आई जी फ्लैट में हुई थी। दस साल बाद मैं उन्हे तलाश करता हुआ उनके खुद उनके पास पहुंचा था। यह चार-पांच घंटे की मुलाकात थी। जिसमें यह सारी बातें मालूम हो सकीं । यह मुलाकात उनके वातानुकूलित कक्ष में हुई थी। जिसका मतलब साफ है कि कम से कम वह आर्थिक तंगी से तो जूझ नहीं रहे थे और जिसकी वजह केवल उनके पेंशनर पिता थे। उस दरम्यान उनके हाथ की बनी कई कॉफी पीते हुए पिछले दस सालों के घटनाक्रम हमारे बीच साझा हुए थे। 
       तभी मुझे यह भी पता चला कि वह अब तक 150 से ज्यादा जनरल बुक्स लिख चुके थे। सभी बुक्स उनके नाम व फोटो से प्रकाशित हुईं थीं। जिसमें उनकी एक किताब को राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उस किताब का नाम तो मुझे याद नहीं आ लेकिन यह बाखूबी याद है कि वह 'टूर एण्ड ट्रैवल्स' पर लिखी गई थी और राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित थी। दुर्भाग्य देखिए, यह पुरूस्कार लेखक को नहीं, प्रकाशक को मिला था और राजा पाकेट के राजबाबू ने वह पुरुस्कार लिया था। उस किताब पर अंकित पुरुस्कार प्राप्त करने की तस्वीरें भी उन्होने मुझे दिखाई थीं। वह एक बेहद खुशगवार मुलाकात थी मगर कयामत देखिए वह हमारी आखिरी मुलाकात साबित हुई थी। उसके बाद मुझे केवल उनकी मौत की खबर मिली। इस मुलाकात के बमुश्किल चंद माह बाद ही एक दिन अरूण सागर के भाई का मेरे पास फोन आया। उन्होंने जैसे बम फोड़ा कि अरूण सागर नहीं रहे। उन्होने फांसी लगाकर खुद को खत्म कर लिया। इस खबर को आत्मसात करना आसान नहीं था। मैंने अरूण सागर के रूप में क्या खोया यह मेरे अलावा कोई नहीं समझ सकता। 
     कहना न होगा कि इतिहास ने खुद को बड़े ही क्रूर ढंग से दोहराया। कुछ और यादें ताजा हो गई। इससे पहले 1980 के दशक के बेहद कामयाब मगर गुमनाम लेखक यशपाल वालिया का भी लगभग ऐसा ही दर्दनाक अंजाम हुआ था। जब मैंने राजा को ज्वाइन किया था तो उनके बहुत चर्चे होते थे। वह यशपाल वालिया, जो वर्मा साहब से पहले ‘टाइगर’ में लिखते थे और जिन्होंने टाइगर के लिए इंस्पेक्टर विजय यादव, सरदार करतार सिंह जैसे किरदार गढ़े थे। गोवा के रैकेटियर जैसे हिट किरदारों को जन्म दिया था। सही मायने में ‘टाइगर’ के जनक वालिया ही थे। बाद में जगदीश कुमार वर्मा साहब ने उस कामयाबी को और चांद सूरज लगाए। कह सकते हैं कि उपरोक्त मौतों का जिम्मेदार कानूनी तौर पर भले ही कोई न हो लेकिन नैतिकता की परिभाषा कानून की परिभाषा से बहुत अलग होती है। जिसमें मेरा ज्यादा विश्वास है।
      इसमें कोई दो राय नहीं कि पॉकेट बुक्स का संसार आज यदि पूरी तरह से तहस नहस हुआ तो उसकी वजह वक्त का बदलाव और तकनीक का उदय नही, बल्किं केवल पॉकेट बुक्स प्रकाशक और उसके चंद लेखक ही हैं। और है निर्विवाद रूप से उनकी कमजोरी और उनका अहंकार। उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि अगर वह इतने ही काबिल लेखक थे तो उन्हें नये लेखकों के आने से अपना सिंहासन हिलता क्यों महसूस होता था? और प्रकाशक अगर इतने ही बडे सूरमा थे तो उन चंद लेखकों के खौफ से उन्होने सागर, वालिया और जगदीश वर्मा जैसे लेखकों क्यों हमेशा हाशिए पर रखा? क्यों उन्हें उनकी पहचान के साथ सामने आने नहीं दिया? अगर उन्होने यह अक्षम्य गुनाह न किया होता तो आज पाकेट बुक्स का बाजार इतना बेजार न हुआ होता। तब यहां फ्रट लाइन लेखकों की पूरी कतार खड़ी होती। तब किसी एक लेखक के स्वर्गवासी हो जाने से, किसी दूसरे के ओवरऐज हो जाने से और तीसरे के बीमार हो जाने से इस कारोबार के अस्तित्व पर कोई फर्क नहीं आया हो़ता। तब यह बाजार आज इतना वीरान नहीं पड़ा होता और अपने वजूद को बचाने की लड़ाई न लड़ रहा होता।
     उपसंहार के तौर पर बस इतना ही कहूंगा कि इस इतिहास से कुछ नए अहंकारियों को सबक लेने की जरूरत है। पुराने और दिग्गज प्रकाशकों का अंहकार तो समझ में आता है क्योंकि गुजरे वक्त में अनकी अपनी सार्थकता थी। उनका अपना एक बड़ा और बुलंद मुकाम था। ऐसे में अगर उन्हे यह लगता था कि पॉकेट बुक्स का भूत वर्तमान भविष्य सब उनसे है तो वह पूरी तरह गलत नहीं थे। लेकिन क्या कयामत है कि यह गुमान आज भी कुछ लोगों में कूट-कूटकर भरा है। यह वही लोग हैं जिन्हें मैंने नए अहंकारी प्रकाशकों की संज्ञा दी है। हालांकि असल में तो न वह दिग्गज हैं। न प्रकाशक हैं और न ही पाकेट बुक्स के मौजूदा बाजार में उनकी कोई हैसियत है। असल में तो वह महज नौसिखिए पार्टटाइम और टाइमपास प्रकाशक है, मगर जिन्हें लगता है कि आज पॉकेट बुक्स में जो कुछ बचा खुचा पड़ा है उसे सम्भालने का इन्क्लाबी दारोमदार बस उन्ही पर है और उनके बाद पाकेट बुक्स का कोई नामलेवा नहीं रहेगा। बहरहाल इस मोर्चे पर अगर कोई सार्थक प्रयास दिख रहा है तो वह केवल इस समृद्ध विरासत के अवशषों को सहेजकर रखने का अहद है। यह बीड़ा गुरप्रीत सिंह जी ने उठाया हुआ है और जिसमें वह पूरे मनोयोग से प्रयासरत हैं। उनका यह सराहनीय प्रयास नमन के योग्य है। मैं पूरे सम्मान से उन्हे नमन करता हूं।
धन्यवाद
रवीन्द्र यादव, उत्तर प्रदेश
Email-11ravind@gmail.com 
अरुण आनंद उपन्यास सूची- अरुण आनंद 
रवीन्द्र यादव
रवीन्द्र यादव

14 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण। सचमुच आज के समय में कई लोग दूसरे का हक मार लेते हैं। पॉकेट बुक्स के पतन के पीछे कहीं न कहीं ऐसे कारण भी होंगें, इसका अंदाजा भी था, जो ये संस्मरण पढ़कर सही साबित हुआ है।

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  2. ऐसे संस्मरण पढ़कर मुझे गुरुदत्त की प्यासा याद आ जाती है। बस शुरू से अभी तक यही है। कुछ नहीं बदला है।

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  3. वाह भाई वाह बहुत ही बढ़िया जानकारी.
    Rest in peace Arun Sagar🌹🌹

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  4. यशपाल वालिया ने आत्महत्या क्यूं की थी ये भी पता चलना चाहिये

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  5. बहुत समय पहले...मैं भी...राज...मनोज से मिल चुका हूँ...
    हम सब कहीं-न-कहीं 'बड़े' प्रकाशक...'बड़े' लेखकों के शिकार रहे हैं...
    अच्छा रहा जो...नपुंसक निकला...
    वरना...बड़े लोगों ने मेरी 'आत्महत्या' के लिए बेहद फ़र्टाइल ज़मीन तो तैयार कर ही दी थी...
    #प्रदीप

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    1. दण्ड तो प्रकाशकों को भी मिला है। पाकेट बुक्स बिज़नेस के 98% प्रकाशक आज अंतर्ध्यान हो गए हैं। राजा जैसे जो इक्का दुक्का बचे हैं उनका दर्द जानने के लिए बस आज उनके ऑफिस पर एक नजर डालने की जरूरत है। जहां कभी कारोबार की महफिलें जगमगाती थी आज वहां मनहूसियत बरसती है। 10 मिनट भी बैठा नहीं जाएगा।

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  6. वह जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने!
    लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई!!

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