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रविवार, 29 दिसंबर 2024

आकाश ठाकुर

नाम- आकाश ठाकुर
प्रकाशक- वीर पॉकेट बुक्स, मेरठ

लेखक आकाश ठाकुर और प्रकाशक 'वीर पॉकेट बुक्स' नाम मेरी नजर में पहली बार ही आया है। इस विषय में कोई विषय जानकारी उपलब्ध नहीं है।
वीर पॉकेट बुक्स के एक सेट में रितुराज जी के दो उपन्यास 'प्यासी कली' और 'बदनसीब' का विज्ञापन देखने का अवश्य मिला है।
आकाश ठाकुर के उपन्यास
  1. विक्रांत और खूनी टाइगर
  2. विक्रांत और चक्रम

रविवार, 8 दिसंबर 2024

शारदा पाॅकेट बुक्स, मेरठ

       शारदा पॉकेट बुक्स, मेरठ

जहां मेरठ उपन्यास साहित्य का केन्द्र रहा है, वहीं यह भी विदित रहे कि यहाँ प्रकाशन असंख्य पनपे और खत्म हुये थे।
और 99% प्रकाशन 'जैन परिवार' के  ही थे।
इसी क्रम में एक प्रकाशन का और नाम सामने आता है और वह है शारदा पॉकेट बुक्स, मेरठ।
यह प्रकाशन किस दशक में था, कब बंद हुआ यह तो कन्फर्म जानकारी नहीं अपितु यह सन् 2000 से पूर्व का ही था, जब मेरठ में उपन्यास साहित्य का स्वर्णकाल रहा था।
इस प्रकाशन से संबंधित कुछ जानकारी मिली हैं।
शारदा पॉकेट बुक्स के मालिका का नाम 'घसीटा मल जैन' था, यह प्रकाशन क्षेत्र में 'जी. एम. जैन' से जाने जाते थे।
हालांकि यह प्रकाशन ज्यादा नहीं चला।

शारदा पॉकेट बुक्स, मेरठ

  शारदा पॉकेट बुक्स के एक सैट का परिचय-

1. विक्रांत की अरब यात्रा-   ओमप्रकाश शर्मा
2. मैडम इन चाइना-             चंदर
3. लाशों की बस्ती-              एन. सफी
4. खून का पुजारी-               वेदप्रकाश काम्बोज
5. गुजरते दिन, तड़पती यादें- मस्तराम

धन्यवाद- मनेष जैन (रवि पॉकेट बुक्स, मेरठ)

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024

कंवल पाॅकेट बुक्स, दिल्ली

कंवल पॉकेट बुक्स, दिल्ली 

कंवल पॉकेट बुक्स, दिल्ली-35
A-1/239B, लाॅरेसं रोड़, 
दिल्ली-110035

पॉकेट बुक्स के इतिहास में असंख्य प्रकाशक आये और गये । कुछ का नाम चला और कुछ अँधेरे में लुप्त हो गये ।
   इस शृंखला में हमारा प्रयास रहेगा आपको पॉकेट बुक्स के विषय में जानकारी देने का ।
हालांकि हमने ब्लॉग पर पहले भी काफी प्रकाशकों के विषय में जानकारी शेयर की है।
  आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं दिल्ली के एक पुराने प्रकाशन 'कंवल पॉकेट बुक्स' के विषय में ।
इसके मालिक का नाम 'जगदीश कंवल' था, जो दिल्ली के निवासी थे। इनके प्रकाशन का एक उपन्यास 'कत्ल के बाद कत्ल' पढने को मिला, जिसके लेखक संजय नागपाल हैं। इस उपन्यास मं दिये गये विज्ञापनों से यही प्रतीत होता है की इस प्रकाशन का अधिकांश लेखन 'छद्म लेखन' में ही आता है।
आप भी इनको के नाम देख लीजिये- कंवल, संजय नागपाल, जगदीश, चन्द्रेश, कामना इत्यादि।
'जगदीश' नाम स्वयं प्रकाशक महोदय का था। उन्हे लिखने का शौक था। यह नाम वास्तविक भी है।
दूसरा इन्होंने अपने 'कंवल' नाम से पॉकेट बुक्स स्थापित की और इसी नाम से उपन्यास प्रकाशित किये ।
संजय नागपाल नाम थोड़ा वास्तविक प्रतीत होता है, पर इसकी सत्यता हम नहीं परख सकते।
शेष दो नाम 'चन्द्रेश' और 'कामना' समान्यत Ghost writing ही है।
   आदरणीय योगेश मित्तल जी के शब्दों में - "हां, यह प्रकाशन बन्द हो चुका है। ज्यादा सैट नहीं निकले। जगदीश कंवल को लेखक बनने का शौक था। कोई छापने वाला नहीं मिला। पास में पैसा था। खुद प्रकाशक बन गये। इस तरह के प्रकाशन कभी ज्यादा नहीं चलते। हद से हद दो तीन सैट्स तक ही ज़िन्दगी होती है इनकी। फिर बन्द हो जाते हैं। यह भी बन्द हो गया।"

 कंवल पाकेट से प्रकाशित कुछ उपन्यासों की जानकारी
जगदीश-          कांच के टुकड़े, दर्द भरा आंचल, उनके सितम
कंवल-              दर्द के रिश्ते, थोड़ा सा प्यार, उजड़ा आशियाना
संजय नागपाल- कत्ल के बाद कत्ल, जहरीली नागिन
चन्द्रेश-             चूड़िया, नया सुहाग, मुकद्दर
कामना-          ‌  भाई बहन, अधूरी सुहागिन


मंगलवार, 29 अक्टूबर 2024

सुभाष प्रभाकर

नाम- सुभाष प्रभाकर
प्रकाशक- तरंग पॉकेट बुक्स, मेरठ
जासूसी कथा साहित्य की खोज में एक और नाम देखने को मिला है- सुभाष प्रभाकर ।
  मेरठ के प्रकाशन 'तरंग पॉकेट बुक्स' का एक विज्ञापन देखने को मिला है जिसमें सुभाष प्रभाकर के एक उपन्यास का वर्णन है।
हालांकि सुभाष प्रभाकर वास्तविक नाम है या छद्म लेखन (Ghost Writer) यह तो नहीं कहा जा सकता है। और न हीं सुभाष प्रभाकर का अभी तक कोई उपन्यास देखने को मिला है।
 किसी पाठक के पास सुभाष प्रभाकर जी से संबंधित कोई सूचना हो तो हमसे अवश्य शेयर करें।
Sahityadesh@gmail.com


सुभाष प्रभाकर के उपन्यास
  1.  शतरंज के मोहरे

तरंग पॉकेट के एक सैट की सूचना


मंगलवार, 18 जून 2024

कानून का पाण्डव, करेगा ताण्डव- केशव पण्डित, उपन्यास अंश

 साहित्य देश के लोकप्रिय स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार पढें चर्चित उपन्यासकार केशव पण्डित का दहकते शोले सा उपन्यास 'कानून का पाण्डव करेगा ताण्डव' का एक रोचक अंश ।
"मुझे सबसे बड़ा अफसोस तो मिस्टर केशव पण्डित पर हो रहा है योर ऑनर ! मिस्टर पण्डित ने अपनी जिन्दगी में मुजरिमों के खिलाफ केस लड़े तो उन्हें मुजरिम साबित करके सजा दिलवाई। किसी निर्दोष की पैरवी की तो उसे निर्दोष साबित करके बा-इज्जत बरी कराया। यानि इन्होंने हमेशा कानून की मदद की। इन्साफ के इस मन्दिर में मुजरिमों को सजा और मजलूमों को इन्साफ ही दिलवाया। कभी भी किसी मुजरिम को बचाने और मजलूम या निर्दोष को फंसाने की चेष्टा नहीं की। इन्हें जब पूरा विश्वास हो गया कि इनका मुवक्किल सच्चा और निर्दोष है, तभी उसे अपना मुवक्किल बनाया और मुजरिम को सजा दिलवाकर उसे इन्साफ दिलवाया। लेकिन...।"
          अधेड़ व अधगंजे सरकारी वकील कालीचरण वर्मा ने अपनी वाणी को अल्प-विराम दिया, फिर कठघरे में मुल्जिम के रूप में खड़े दढ़ियल युवक को घृणा भरी नजरों से देखा, फिर न्याय की कुर्सी पर विराजमान जज महोदय से सम्बोधित होकर बोला "... लेकिन इस बार मिस्टर पण्डित कैसे गच्चा खा गये... मेरी समझ से परे की बात है। मैं ये इल्जाम भी नहीं लगा सकता कि मिस्टर पण्डित ने जानबूझकर एक मुजरिम को बचाने के लिये ये केस अपने हाथ में लिया। क्योंकि मुजरिम मजनूं एक टैक्सी ड्राइवर है, जो कि स्वयं को बचाने के लिये बहुत मोटी रकम खर्च नहीं कर सकता। मिस्टर पण्डित लाख-दो लाख रुपयों के लिये तो अपना ईमान नहीं बेचेंगे... अपने जमीर का गला नहीं घोटेंगे। मुजरिम कोई बड़ी हस्ती होता तो सोचा भी जा सकता था कि मिस्टर पण्डित ने मोटी रकम के लालच में एक मुजरिम को निर्दोष साबित करने को ये केस ले लिया। वैसे भी मिस्टर पण्डित की सच्चे और ईमानदार वकील की छवि है। इनसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये कानून और अदालत को भ्रमित करके इन्साफ का गला घोंटने की चेष्टा करेंगे...।"
"आप कहना क्या चाहते हैं मिस्टर वर्मा...?" भीनी-भीनी मुस्कान के साथ पूछा जज महोदय ने।
"यही कि जिन्दगी में पहली मर्तबा मिस्टर पण्डित से गलती हो गई है। शायद मुजरिम इनके सामने रोया-गिड़गिड़ाया होगा झूठी कसमें खाकर स्वयं को निर्दोष बतलाया होगा और मिस्टर पण्डित भावनाओं में बह गये होंगे। एक मुजरिम को निर्दोष समझकर इन्होंने उसकी पैरवी करने की गलती कर डाली। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मिस्टर पण्डित अपनी जिन्दगी में पहली बार कोई केस हारेंगे। इनके लगातार जीतने का रिकॉर्ड टूटेगा। इनकी वो काबिलियत धूल में मिल जाने वाली है, जिसके कारण लोग इन्हें दिमाग का जादूगर कहते हैं। मुझे इनके हारने का अफसोस तो है ही, लेकिन इस बात पर गर्व भी महसूस हो रहा है कि दिमाग के जादूगर को शिकस्त देने का श्रेय मुझे मिलेगा। क्योंकि आज ही मैं ये साबित कर दूंगा कि कठघरे में खड़े मजनूं नाम के इस भोले-भाले नजर आने वाले हैवान ने ही सलोनी का कत्ल करके मेरे मुवक्किल मिस्टर प्रकाश की दुनिया उजाड़ डाली है...।" 

सोमवार, 17 जून 2024

एच. इकबाल (सोमदत्त शर्मा)

 नाम- एच. इकबाल

 जासूसी कथा साहित्य में नकल का हमेशा से बोलबाल रहा है। इस क्षेत्र ने चाहे धुरंधर जासूस पैदा कर लिये, जटिल केस हल कर लिये, शातिर ठग-चोरों का पर्दाफास किया और भी न जाने कितने रहस्य हल किये और कितनों को इंसाफ दिलाया। बहुत से आदर्शवादी जासूस भी सामने आये, पर यह खेल सिर्फ शब्दों और पृष्ठों कर जाल से बाहर न निकल सका।
  अगर निकल पाता तो शायद स्वयं के क्षेत्र में इतने घपले न होते, शायद लेखक शोषण से बचते, शायद नकली उपन्यासों का संसार बंद हो जाता।

रविवार, 16 जून 2024

श्याम चित्रे

 नाम- श्याम चित्रे

 कुशवाहा कांत जी द्वारा स्थापित 'चिनगारी प्रकाशन' ने बहुत से उपन्यासकारों को स्थान दिया है। जिसमें कुशवाहा परिवार के लेखक कुशवाहा कांत, जयंत कुशवाहा, सजल कुशवाहा और गीता रानी कुशवाहा के अतिरिक्त गोविन्द सिंह,  प्यारे लाल आवारा, ज्वालाप्रसाद केसर, मधुर और अब एक और नाम पता चला है, वह है -श्याम चित्रे ।

    चिनगारी प्रकाशन क्रांतिकारी साहित्य सर्जन में अग्रणीय रहा है। कुशवाह कांत जी का उपन्यास 'लाल रेखा' तो मील का पत्थर है। 
क्रांतिकारी साहित्य में श्याम चित्रे ने भी 'गदर' और 'इंकलाब' जैसी रचनाएँ की हैं।
  इनके प्राप्त उपन्यास 'गदर' के अनुसार एक एड्रेस उत्तर प्रदेश के इटावा जिले का 'जुआ' गांव था।
 हालांकि श्याम चित्रे जी के विषय में अन्य कोई महत्वपूर्ण जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है।
किसी सज्जन कोई कोई जानकारी उपलब्ध हो तो हमसे संपर्क करें।
email- Sahityadesh@gmail.com
श्याम चित्रे के उपन्यास

  1. घुटन
  2. पत्थर का दर्द
  3. लाल दिन
  4. बागी
  5. गदर (प्रथम भाग)
  6. इंकलाब (द्वितीय भाग)

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

जीने का हक- प्रकाश पाराशर, उपन्यास अंश

साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार पढें  उपन्यास 'जीने का हक' का रोचक अंश।
रवि माथुर - जीने का हक
प्रकाशक- दुर्गा पॉकेट बुक्स, मेरठ

'हैलो यंगमैन।' मैंने उसे उठाते हुये कहा- 'तुम यहां छिपे हुये क्या कर रहे हो ?'
'मैं तुमसे नहीं बोलता।' वह कुछ अकड़ कर बोला ।
'क्यों ? अब तो साबित हो चुका है कि मैं तुम्हारी आंटी का पर्स चुराने वाला चोर नहीं हूँ। मैंने उन्हें मारा भी नहीं है।'
'अब तुम यहां क्यों आये हो ?' उसने फिर अकड़ कर पूछा और साथ ही मुझे कुछ शक भरी नजरों से देखा ।
'तुमसे मिलने । तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।' मैं मुस्करा कर बोला ।

बुधवार, 13 मार्च 2024

मदन प्रसाद

 नाम- श्री मदन प्रसाद
लेखक मदन प्रसाद के विषय में जो जानकारी प्राप्त हुयी है उसका आधार इलाहाबाद के प्रकाशन 'फ्रेण्डस एण्ड कम्पनी' की पत्रिका 'जासूसी चक्कर' के अंक जुलाई 1965 के अंक 114 है। 
 फ्रेण्डस एण्ड कम्पनी की एक और पत्रिका है 'उर्मी' जिसमें मदन प्रसाद का उपन्यास प्रकाशित हुआ।
मदन प्रसाद के उपन्यास
1. अपराध, अपराधी और सजा



सोमवार, 11 मार्च 2024

युगल किशोर पाण्डेय

नाम- युगलकिशोर पाण्डेय
जब इलाहाबाद उपन्यास साहित्य का केन्द्र था तब इलाहाबाद से बहुत सी जासूसी पत्रिकाएं प्रकाशित होती थी। इन पत्रिकाओं में एक उपन्यास और एक-दो पृष्ठ पर समाचार होते थे। इनका मुख्य उद्देश्य उपन्यास प्रकाशन ही था। समाचार तो बस पत्रिका होने के रूप में प्रकाशित करने पड़ते थे।
इलाहाबाद का प्रकाशन था 'फ्रेण्डस एण्ड कम्पनी' जिसके अंतर्गत 'जासूसी चक्कर' पत्रिका प्रकाशित होती थी। इस पत्रिका का 'जुलाई 1964' का अंक 114 में लेखक युगल किशोर पाण्डेय का उपन्यास प्रकाशित हुआ था। 
युगल किशोर जी की यह जानकारी उसी उपन्यास से प्राप्त हुयी है।
युगल किशोर पाण्डेय के उपन्यास
1. सड़क छाप मजनू - 1964, जुलाई
2. तीन चक्कर




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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...