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मंगलवार, 6 जून 2023

रैना कहे पुकार के- उपन्यास पोस्टर

वेदप्रकाश शर्मा जी के उपन्यासों के कुछ पोस्टर






रैना कहे पुकार के- वेदप्रकाश शर्मा
उपन्यास पोस्टर, 




शुक्रवार, 2 जून 2023

प्यार करना तो बुरी बात है- हास्यरस

साहित्य देश की हास्य रस स्तम्भ में इस बार पढें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक धीरज के उपन्यास 'वतन के आँसू' का एक हास्यजनक किस्सा।

रामलाल ने अंदर आते ही शीला को अपने आलिंगन में ले लिया था तथा उसके लाल सुर्ख रसीले होंठों को अपने होंठों के मध्य भींच लिया था !

"छोड़ो भी...आप भी बस !"- शीला ने स्वयं को रामलाल की कैद से मुक्त कराते हुए कहा—शर्म से उसका चेहरा लाल-भभूका हो गया था तथा वह घबराई हुई नजरों से उस कोने की तरफ देखने लगी, जहां उनके दोनों बच्चे खड़े थे।

“आहा जी...पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली-पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली।” - सुमिता ताली पीटते हुए उछल-उछलकर कह रही थी ! 

"मैं तुम्हारी मम्मी को प्यार कर रहा था, सुमि !"

“ल....लेकिन प्यार करना तो बुरी बात है !" 

“तुमको किसने कहा ?"-  रामलाल के चेहरे पर नागवारी वाले भाव उभरे थे !

"परसों, जब राखी आंटी मौल्हले वाले एक अंकल से प्यार कर रही थीं, तो मौहल्लेवालों ने अंकल को कितना मारा था!"

मंगलवार, 23 मई 2023

नये उपन्यास - may-2023

सूरज पॉकेट बुक्स के तीन नये उपन्यास
इंतजार अब खत्म हुआ 🎉🎉
पुस्तकें अब सूरज की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं आज ही अपनी प्रतियां सुरक्षित कीजिए !!
पुस्तक विवरण :-

1. 7 जुलाई की रात (लेखक : विकास सी. एस. झा )

‘ड्रीम हाउस’ टेलीविजन की दुनियां का एक बेहद चर्चित रियलिटी शो था जहां 7 जुलाई की रात को शो के ग्रैंड फिनाले के दौरान शो की एक कंटेस्टेंट गीता भसीन की लाश ड्रीम हाउस के सेट से महज कुछ दूर पर ही पड़ी मिली थी। लोकल थाने ने लड़की की मौत को आत्महत्या करार दिया था मगर एक बार जब क्राइम ब्रांच ऑफिसर चंद्रशेखर त्यागी के कदम मौका-ए-वारदात पर पड़े तो तफ्तीश ने एक नया ही रुख अख्तियार कर लिया।
आत्महत्या के बेहद साधारण से लगने वाले इस केस ने एक बार तो त्यागी जैसे ऑफिसर को भी हैरान-परेशान कर डाला था। तफ्तीश के दौरान त्यागी के कदम जहां भी पड़े उसका सामना किसी-न-किसी लाश के साथ ही हुआ।
क्या ये वाकई एक आत्महत्या का मामला था या फिर कुछ और ही बात थी ?
एक सिलसिलेवार ढंग से हुई इन चार हत्याओं के पीछे की सच्चाई क्या थी ? जानने के लिए पढ़िए सी.एस.टी. सीरीज की नई किताब “सात जुलाई की रात”

रविवार, 14 मई 2023

पंकज उपन्यास सूची

 नाम- पंकज
प्रकाशक- नूतन पॉकेट बुक्स, मेरठ
श्रेणी- सामाजिक उपन्यासकार, Ghost writer

मेरठ से प्रकाशित होने वाले Ghost writer में एक नाम और पता चला है और वह नाम है - पंकज।

   पंकज एक सामाजिक उपन्यासकार हैं और इनके उपन्यास नूतन पॉकेट बुक्स,मेरठ से प्रकाशित होते रहे हैं। हालांकि इनके विषय में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। 


पंकज के उपन्यास

  1. फैसला
  2. बेकसूर
  3. दर्द की छांव
  4. सुहानी शाम
  5. वचन
  6. पायल
  7. प्यासी जोगन
  8. आइना
  9. ममता




गोपालराम गहमरी

नाम- गोपालराम गहमरी 
जन्म- 1866, 
निधन- 1946
विशेष
- लगभग दो सौ उपन्यास की रचना।
- हिंदी कथा साहित्य में जासूसी साहित्य का आरम्भ कर्ता

हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के विकास में गोपालराम गहमरी का अतुलनीय और अविस्मरणीय योगदान है। हिंदी को जन-जन तक पहुँचाने के लिए कविताएँ लिखीं, उपन्यास लिखे, उपन्यासों का अनुवाद किया, नाटक लिखे, हास्य-व्यंग्य लिखे, पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, रिपोर्टें लिखीं, रिपोर्ताज लिखे। अपने गाँव गहमर से 'जासूस' नामक मासिक पत्र का संपादन और प्रकाशन किया। हिंदी में जासूस शब्द के प्रचलन की शुरुआत की।
'जासूस' का पहला अंक बाबू अमीर सिंह के हरिप्रकाश प्रेस से छपकर आया और पहले ही महीने में वी. पी.पी. से पौने दो सौ रुपए की प्राप्ति हुई। इसने अपने प्रवेशांक से ही लोकप्रियता की सारी हदों को पार करते हुए शिखर को छू लिया था। इसकी अपार लोकप्रियता को देखकर गोपालराम गहमरी जब जासूसी ढंग की कहानियों और उपन्यासों के लेखन की ओर प्रवृत्त हुए फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और न इसकी परवाह की कि साहित्य के तथाकथित अध्येता उनके बारे में क्या राय रखते हैं। गहमरी जी अपनी रचनाओं में पाठकों की रुचि का विशेष ध्यान रखते थे कि वे किस तरह की सामग्री पसंद करते हैं।

रविवार, 7 मई 2023

गोपाल- उपन्यास सूची

नाम- गोपाल

प्रकाशक- संगीता पॉकेट बुक्स, मेरठ
  उपन्यास जगत की Ghost writing में एक और नाम मिलता है- गोपाल।
  गोपाल के उपन्यास संगीता पॉकेट बुक्स मेरठ से प्रकाशित हुये हैं।

गोपाल के उपन्यास
1. सिंदूर गया हार
2. तुम वो नहीं



शनिवार, 6 मई 2023

निराली थी उपन्यासों‌ की दुनिया- प्रदीप पालीवाल

 बिमल चटर्जी...चन्दर...वेद प्रकाश काम्बोज...जनप्रिय लेखक 'ओम प्रकाश शर्मा'...

निराली थी...इन 'उपन्यासों' की दुनिया... 

मैंने जब अपनी 'बुक स्टॉल' संभाली...मैं इनके बारे में 'ABC...D' भी नहीं जानता था... 

'मजरूह' (  सुल्तानपुरी ) साहब के शब्द उधार लेना चाहूँगा...कि -

...  

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर 

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया...



इन उपन्यासों के बारे में 'साहित्य' के लोगों की राय अच्छी नहीं थी. आज भी नहीं है...वे इसे 'पल्प फिक्शन' ( लुगदी साहित्य ) कहकर लगभग 'पाक़िस्तान' भेजने की बात करते थे...उनका मानना था कि 'ये पुस्तकें बच्चों को बिगाड़ती हैं...' 

ऐसे में मेरी मुलाक़ात होती है वन एण्ड ओनली...जनप्रिय लेखक 'ओम प्रकाश शर्मा'...जी से...

देखते ही देखते साहित्य ( प्रेमचंद...राही मासूम रज़ा ( 'मिली' फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का पुरस्कार प्राप्त करने वाले...) का प्रेमी #प्रदीप_इटावा_वाला 'शर्मा' जी के अपनी ही दुकान #पालीवाल_बुक_सेण्टर पर उपलब्ध सभी उपन्यास पढ़ गया...मुझे तो वे कहीं से भी 'बच्चों' को बिगाड़ने वाले नहीं लगे...  

'ओम प्रकाश शर्मा'.जी...अपने नाम के आगे 'जनप्रिय लेखक' क्यों लगाते थे ?

जनप्रिय लेखक 'ओम प्रकाश शर्मा' जी...'विक्रांत'...सीरीज़ के 'ट्रेड' नाम वाले लेखक 'ओम प्रकाश शर्मा' जी ( ? ) से कैसे अलग थे...?

कहानी बहुत लम्बी है...मेरे 'सीने' में इन उपन्यासों को 'पल्प फिक्शन' की गाली देकर 'पुकारने' वालों के प्रति 'शिकायत' दफ़न है...विशाल अनुभव और अध्ययन तो है ही...

नीचे कुछ कोट कर रहा हूँ... 

"मैंने उससे दुबारा मेरठ जाने पर पूछा, ''प्रेमचंद और शरतचंद के बीच तुम किसे महान समझते हो ?''

मैंने सोचा कि वही रटा रटाया उत्तर कि दोनों. पर मैं स्वयं तनिक स्तब्ध रह गया, उसका उत्तर सुनकर. उसने कहा प्रेमचंद को ध्यान से पढ़ोगे तो जानोगे कि वह एक ऐसा कायस्थ था जिसका संपूर्ण साहित्य ब्राह्मण विरोधी था जबकि ब्रिटिश युग में ब्राह्मण भी साधारण प्रजा था. आज तो कुछ है ही नहीं.''

...ये किससे मुलाक़ात की 'चर्चा' थी ?

कौन था...जो...बातचीत में तुम...उसका...उसने...जैसे 'आत्मीय' संबोधन यूज़ कर रहा था...?

ये थे...ये तो बाद में बताऊंगा...वो भी यदि मौक़ा लगा... 

लेकिन प्रेमचंद जी को... ब्राह्मण विरोधी बताने वाले थे... 

वन एण्ड ओनली...जनप्रिय लेखक 'ओम प्रकाश शर्मा'...जी !

राजेश,जगत,जगन,बन्दूक सिंह जैसे 'यादगार' चरित्र को लेकर 'सीरीज़' लिखने वाले दिवंगत 'शर्मा' जी के...दो जासूसी उपन्यासों ( 'एक नवाब पन्द्रह चोर' और  'सुधाकर हत्याकांड' )  का मुख्य पृष्ठ निम्न में शामिल है... 

शुरुआत में ही... 

शामे-अवध अवश्य प्रसिद्ध है । 

परन्तु अवध की दोपहर...जून का महीना ।

चुंबक की तरह 'जकड़' लेने वाले...शर्मा जी...उनके पढ़े उपन्यास बहुत याद आते हैं... 

आमीन... 

लेकिन दुःखी मन से... 

#प्रदीप_इटावा_वाला 

( 9761453660 )

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

कॉपीराइट : प्रकाशकाधीन - योगेश मित्तल

कॉपीराइट : प्रकाशकाधीन 

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पुराने उपन्यासों में कॉपीराइट के आगे प्रकाशकाधीन लिखा होना एक आम बात थी। कुछ प्रकाशकों ने एक पेजी कॉपीराइट फॉर्म बना रखा था तो कुछ प्रकाशकों का चार पेजी कॉपीराइट फॉर्म होता था। 

नाम से छपने वाले लेखकों से कॉपीराइट फॉर्म भरवाना एक रूटीन प्रक्रिया थी, जबकि मेरे जैसे नाम से न लिखने वाले बदनाम से कॉपीराइट फॉर्म भरवाना इतना जरूरी भी नहीं समझा जाता, बल्कि मुझसे तो बहुत कम बार बहुत कम प्रकाशकों ने कॉपीराइट फॉर्म भरवाये। 

मैंने 'प्रणय' नाम से छपे उपन्यासों के लिए या 'मेजर बलवन्त' नाम से छपे उपन्यास के लिए अथवा 'योगेश' नाम से छपे उपन्यासों के लिए भी कभी कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरा। 

लेकिन मैंने कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरा, इसे मेरी तड़ी मत समझिये कि मैंने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया या कोई बहुत बड़ी तोप चला दी। 

दरअसल यह प्रकाशकों की दयादृष्टि ही थी कि वे मुझसे कॉपीराइट फॉर्म नहीं भरवाते थे। 

पर क्यों ? एक दिन यह राज भी फाश हो गया। प्रकाशक साहब का नाम नहीं लूँगा, पर अब जो मैं बताने जा रहा हूँ - वह शत-प्रतिशत सच है, बल्कि ऐसा सच है, जिसे जानने के बाद आप कहेंगे - यह तो आम बात है। ऐसा तो होता ही आया है। 

ऐसा होता ही रहता है। 

एक दिन एक प्रकाशक साहब ढेर सारे कागजों में कुछ तलाश कर रहे थे। किसी लेखक को एडवांस कैश नोट दिए थे, जिसका बाउचर था, जो ढूंढें नहीं मिल रहा था। 

मैंने उनका नाम लेकर पूछा, "हुज़ूर, क्या ढूंढ रहे हैं। इज़ाज़त हो तो खाकसार भी कुछ मदद कर दे।" 

उन्होंने ढेर सारी फाइलें मेरी ओर बढ़ा दीं, "ज़रा देख, इसमें फलाँ राइटर को फलाँ पेमेन्ट का एक बाउचर कहीं बीच में न घुसा पड़ा हो।"


मैं एक-एक फ़ाइल देखने लगा तो एक फ़ाइल पर मेरी निगाहें ठिठक गयीं, जिसमे मेरे नाम के बाउचर और मेरे नाम के कॉपीराइट थे। दोनों में साइन मेरे नहीं थे, लेकिन जिसके भी थे - एक ही राइटिंग थी। 

और ख़ास बात क्या थी - जानते हैं ? 

कल्पना कीजिये............

मैं उन दिनों एक उपन्यास के आठ सौ से पन्द्रह सौ तक लेता था, लेकिन बाउचर और कॉपीराइट में पाँच हज़ार की रकम भरी हुई थी। 

प्रस्तुति- योगेश मित्तल 

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

धाँय- धाँय- धाँय और योगेश मित्तल

 साहित्य देश के 'रोचक किस्सा' स्तम्भ में प्रस्तुत है 
   योगेश मित्तल जी ने स्वयं के नाम के अतिरिक्त अन्य लेखकों के नाम से भी लेखन किया है। जैसे 'एच. इकबाल' नाम से 'धाँय- धाँय- धाँय' उपन्यास लेखन।
योगेश मित्तल जी के जीवन का एक रोचक किस्सा उन्हीं के शब्दों में। 

जब मैं पहली बार भारती पॉकेट बुक्स में गया, रजिस्टर में लिखी जा रही इमरान सीरीज की यही स्क्रिप्ट मेरे हाथ में थी, नाम पढ़कर भारती पॉकेट बुक्स के स्वामी लालाराम गुप्ता ने कहा, "धाँय-धाँय-धाँय" यह भी कोई नाम है। योगेश जी आपको तो नाम रखने भी नहीं आते।"

रविवार, 9 अप्रैल 2023

क्लब में हत्या- ओमप्रकाश शर्मा

किस्सा तीन हत्याओं का
क्लब में हत्या- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

           उपन्यास साहित्य में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। जितना सम्मान पाठक ओमप्रकाश शर्मा का करते हैं उतने ही सम्मानजनक इनके पात्र होते हैं। शर्मा जी का एक विशेष पात्र है राजेश।  प्रस्तुत उपन्यास 'क्लब में हत्या' राजेश -जयंत शृंखला का है। जो की एक मर्डर मिस्ट्री कथा है।
राजेश और जयन्त संयोगवश इस मामले में सम्बन्धित हुये । वह दोनों झाँसी से लौट रहे थे और घटना रात के ग्यारह बजे की है जब उनकी कार दिल्ली की सीमा में प्रविष्ट होकर मथुरा रोड पर दौड़ रही थी। जयन्त कार चला रहा था और राजेश पिछली सीट पर बैठे एक उपन्यास पढ़ने में तल्लीन थे ।
   रास्ते में एक एक्सीडेंट देखकर दोनों को रुकना पड़ा था। जयंत ने राजेश को भी वहाँ बुला लिया।
" राजेश, जरा आओ तो ।”
- "क्या बात है ?"
-"एक्सीडेंट है एक, बिल्कुल अजीब-सा एक्सीडेंट ।” राजेश उठे। उनकी कार के आगे लगभग दस कारें खड़ी थीं । उसके बाद...... उसके बाद था एक ट्रक और ट्रक के पिछले पहियों में दबा हुआ था एक नवयुवक।
   वहाँ उपस्थित सब इंस्पेक्टर चतरसेन का मानना था की यह एक दुर्घटना है। लेकिन परिस्थितियों का विश्लेषण करने के पश्चात राजेश ने घोषणा की कि यह महज एक दुर्घटना नहीं बल्कि सोच- समझकर किया गया कत्ल है।
   चतुर चतुरसेन ने राजेश से अनुरोध न किया की वह इस मामले में उसकी मदद करे। वहीं बाद में केन्द्रीय खूफिया विभाग ने भी राजेश को इस केस पर नियुक्त कर दिया था।
    मृतक का नाम प्रमोद कुमार था और वह 'विश्राम लोक क्लब, नई दिल्ली' में असिस्टेंट मैनेजर था। राजेश- जयंत और सब इंस्पेक्टर की जाँच का केन्द्र अब विश्राम क्लब था। क्लब प्रमोद कुमार की शोक सभा में ही जब राजेश ने यह घोषणा की कि कातिल इस क्लब में ही उपस्थित है तो एक बार वहां सन्नाटा छा गया।
    क्लब के अवैतनिक मैनेजर रंगबिहारी लाल और मालकिन मोहिनी देवी नहीं चाहते थे की क्लब की बदनामी हो। लेकिन उनके चाहने न चाहने से कुछ नहीं होने वाला था।
   राजेश की जाँच अभी चल ही रही थी कि क्लब में हत्या हो गयी। इस बार हत्यारे ने क्लब के सदस्य को क्लब में ही मार दिया, हंगामा तो होना ही था।
और राजेश ने यह प्रण किया की वह शीघ्र असली अपराधी तक पहुंच जायेगा।
राजेश तनिक मुस्कराए— “ आप बिल्कुल बजा फरमाते हैं. मिर्जा साहब, सवाल सिर्फ हत्यारे की खोज का नहीं है। सवाल यह है कि शमा ने खुद जलकर कितने परवाने जला दिए ? मुझे इसका हिसाब जानना है और यकीन कीजिए मिर्जा साहब ! हिसाब जानकर ही रहूंगा।
     और एक हंगामें के चलते राजेश भी अपराधियों की गिरफ्त में आ गया। और यही अपराधियों के लिए खतरनाक साबित हुआ।
    उपन्यास मर्डर मिस्ट्री कथा पर आधारित है। उपन्यास में‌ कुल तीन हत्याएं होती हैं।
उपन्यास का जो सशक्त पक्ष है वह है जासूस राजेश। शर्मा जी द्वारा रचित पात्रों में राजेश सबसे अलग है। अन्य जासूस साथी भी राजेश का अत्यंत सम्मान करते हैं।
राजेश का नैतिक पक्ष अत्यंत मजबूत है। वह अपराधी के साथ भी क्रूरता नहीं करता।
   राजेश का प्रमोद की पत्नी को बहन कहकर संबोधित करना, उस के साथ यह वायदा करना की प्रमोद से संबंधित कोई भी अनुचित बात जनता नहीं पहुंचेगी।
   राजेश एक जासूस है और जासूस अपने बुद्धिबल से कार्य करता है। राजेश की जो कार्यशैली वह इसलिए भी प्रभावित करती है की वह एक संदिग्ध व्यक्ति को पकड़कर शेष अपराधियों तक अपने चातुर्य और बुद्धि से पहुंचता है।
   उपन्यास के अंत में राजेश और प्रमोद की पत्नी रत्ना का संवाद अत्यंत प्रभावशाली है।‌ (पृष्ठ संख्या 105)
विशेष कथन-
धरती का आकर्षण, जो भी आवारा घुमक्कड़ तारा धरती की आकर्षण परीक्षा में आ जाता है, बिना जले रहता नहीं । जलता है और फिर राख होकर धरती के अंक में समा जाता है ।
- कौन जान सकता है, पुरुष के भाग्य को और स्त्री के चरित्र को ?
    जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी द्वारा लिखित 'क्लब में हत्या' एक मर्डर मिस्ट्री रचना होने के साथ-साथ एक सामाजिक संदेश भी है। हत्या क्यों होती है? इसका कारण जो प्रत्यक्ष होता है, आवश्यक नहीं की वही हो, अप्रत्यक्ष कारण भी बहुत होते हैं।
एक पठनीय मार्मिक मर्डर मिस्ट्री है।

उपन्यास-  क्लब में हत्या
लेखक-    ओमप्रकाश शर्मा- जनप्रिय लेखक
प्रकाशक-   मारुति प्रकाशन, मेरठ
पृष्ठ-         110

क्लब में हत्या - ओमप्रकाश शर्मा novel

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 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...