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रविवार, 12 मई 2019

शौकत खान

शौकत खान के उपन्यास 'शौकत पॉकेट बुक्स-कैमूर, बिहार' से प्रकाशित होते थे। संभवतः यह इन्हीं का ही प्रकाशन संस्थान था। लेखक के विषय में ज्यादा जानकारी तो नहीं मिली, जो प्राप्त हुयी वह आपके समक्ष प्रस्तुत है।


संपर्क-
C.I.S.F.
यूनिट एम. पी. टी. -गोवा
पिन कोड- 403804

प्रकाशन संस्थान
ग्राम/पोस्ट- पतेरी,
जिला- भभुआ(कैमूर)
बिहार


शौकत खान के उपन्यास
1. सिसकती आवाज
2. मेरे भैया
3. जुर्म पैदा करने वाला



वेद प्रताप शर्मा

वेद प्रताप शर्मा के विषय में एक उपन्यास में प्रकाशित विज्ञापन से जानकारी प्राप्त हुयी है। ये वास्तविक लेखक थे या Ghost writer यह कहना संभव नहीं ।  इनके उपन्यास अनिल पॉकेट बुक्स से प्रकाशित होते रहे हैं।
   इनके उपन्यास विजय-विकास, विराज, वतन, रैना,रघुनाथ, सिंगही और अलफांसे जैसे पात्रों पर आधारित होते थे।

वेद प्रताप शर्मा के उपन्यास
1. वतन के दरिंदे
2. लिख दो नाम शहीदों में
3. सरहद

कुमार कदम

लेखक 'कुमार कदम' का एक उपन्यास 'इंकलाब' उपलब्ध हुआ है। जो की बाॅबी पॉकेट बुक्स- मेरठ से प्रकाशित हुआ है।
कुमार कदम 'विक्रांत, बटलर, जगत, बागरोफ, शेर अफगान' आदि पात्रों के उपन्यास लिखते थे।
उक्त लेखक के विषय किसी पाठक के पास कोई और जानकारी हो तो अवश्य शेयर करें।
धन्यवाद

कुमार कदम के उपन्यास
- इंकलाब


बुधवार, 1 मई 2019

अमित श्रीवास्तव जी के उपन्यास का लेखकीय

फरेब उपन्यास के लेखकीय से...

नमस्कार दोस्तों,
         आपके समक्ष अपना पहला उपन्यास प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी और गर्व का अनुभव हो रहा है। यह उपन्यास कई लोगो की मेहनत का नतीजा है। सर्वप्रथम मैं धन्यवाद अदा करता हूं अपने माता पिता और मेरी धर्मपत्नी शालिनी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा साथ दिया। और मेरे हर निर्णय का समर्थन किया। यदि शुभानंद जी और सूरज पाकेट बुक्स ने मुझ पर विश्वास नहीं दिखाया होता तो यह बुक आप के सामने नही आ पाती। यह बुक जो इतनी अच्छी बनी उसमे सूरज पाकेट बुक्स की क्रिएटिव टीम का बहुत बड़ा हाथ है। मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूं मिथिलेश गुप्ता जी, देवेन पांडे जी, एडिटर डॉ प्रदीप शर्मा जी, शाहनवाज भाई और निशांत मौर्य जी का जिन्होंने इसके कवर और डिजाईन पर मेहनत की, खास कर शाहनवाज भाई जी की मेहनत तो कबिले तारीफ थी, क्योंकि उन्होंने विभिन्न विचारों को ध्यान में रखकर कवर बनाया। विशेष आभार प्रकट करना चाहूँगा रमाकान्त मिश्र जी और आदित्य वत्स जी का जिन्होनें कदम-कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया, साथ ही शुभानंद जी का, जिनसे एक नया लेखक इस मुकाम पर पहुँचा। अंत मे आभार प्रकट करता हूं उन समस्त पाठकों का जिन्होने अपना बहुमूल्य समय देकर इस उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की। मैं उम्मीद करता हूं यह उपन्यास आप सब की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

                       दिसम्बर 2012 में जब मैं पहली बार फेसबुक की दुनिया में शामिल हुआ तब लोगों में हिन्दी नावेल के प्रति जागरूकता नही थी। आज वक्त बदल चुका है। नये लेखकों को अच्छे मंच मिल चुके है। पुराने लेखकों ने फिर से कलम उठा ली है। उदाहरण परशुराम सर, एस सी बेदी सर, अमित खान सर हैं। यह बदलते वक्त की निशानी है। यह सब ऐसे ही नही बदला इसको बदलने में फेसबुक और वाट्सअप पर बन रहे अनेक ग्रुप का अभूतपूर्व योगदान भी रहा है। जिन्होने इस विधा में जान डाल दी। सर्वप्रथम मेरा जुड़ाव हुआ सुरेन्द्र मोहन पाठक ग्रुप और अनिल मोहन लिजेंड ग्रुप से, जहाँ मैने बहुत सी जानकारी प्राप्त की, अनील मोहन लिजेंड ग्रुप में मेरी मुलाकात हुई आदित्य वत्स जी से जिन्होने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। नौ सितम्बर 2016 मेरे जन्मदिन के दिन मुझे ऐसा गिफ्ट मिला जिसे मैं भूल नही सकता। आदित्य जी ने इस दिन एक ग्रुप बनाया "दिवाने दे क्रेजी" और इस का एडमीन मुझे बना दिया यहाँ से मुझे फरेब लिखने की प्ररेणा मिली और यहाँ से सूरज पॉकेट बुक्स और उनके लेखकों से मेरी जान-पहचान हुई जिनके कारण फरेब अपने मुकाम पर पहुँचा।


            ‌‌18 फरवरी 2017 की सुबह जब मैं सो कर उठा तो एक अशुभ समाचार मेरा इंतजार कर रहा था। लोगो के दिलो पर राज करने वाले स्व.वेद प्रकाश शर्मा जी नही रहे। यह घटना मुझे बहुत आहत करने वाली थी। मैं समझ नही पा रहा था इस घटना को कैसे सहन करूँ। उस समय फरेब अपने अन्तिम स्टेज पर था। यू तो मैने अपने जीवन में अनेक लेखको को पढ़ा पर अन्त में तीन लेखको को ही पढ़ता था जिन में सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनील मोहन, ओर स्व. वेद प्रकाश जी थे। सब अपनी विशेषताओं के कारण पंसद थे पर वेद जी का स्थान अलग था। मेरे उपन्यास की शुरुवात वेद जी से ही हुई। आज भी उनके नाम के साथ कई उपन्यास जहन में आते हैं जिनमे रामबाण, कठपुतली, डमरुवाला, बीवी का नशा, दहेज में रिवॉल्वर, देवकांता सन्तति, असली खिलाड़ी, शिखंडी, बहू मांगे इंसाफ, जिगर का टुकड़ा, प्रमुख हैं। उनकी यादें सदा इस दिल में रहेगी। फरेब समर्पित है स्व. वेद प्रकाश शर्मा जी को जिनके कारण यह छोटा कलमकार कुछ लिख पाया।
        फरेब की यह कहानी सुमित अवस्थी के मर्डर केस से प्रारंभ होती है। पुलिस लाख कोशिश के बाद भी कातिल को नही पकड़ पाती जब इस केस की जड़ें चंद्रेश मल्हौत्रा के केस से जुड़ती हैं। जिसकी बीवी कुछ दिनो से लापता है। तो कइयों की जिन्दगी में तूफान आते हैं। फरेब की ऐसी दास्तान सामने आती है जो आप के होश उड़ा देगी। सुमित अवस्थी के कातिल को जान कर आप हैरान हो जायेंगे। इस बुक के प्रति अपनी निष्पक्ष राय मुझे फेसबुक या मेल आईडी पर दें। आपके सुझावो के इंतजार में-


आपका
अमित श्रीवास्तव
लेखक- अमित श्रीवास्तव जी



गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

लोकप्रिय साहित्य के लिए...

               साहित्य देश ब्लॉग के लिए
       इस असीम(लोकप्रिय साहित्य के) महासागर का अभी मैं अंजुली भर जल हूँ, इस बारे में कुछ लिखूं ये मेरा सौभाग्य है।
अपने से पहले वाले लेखकों को प्रणाम करते हुए मैं अपनी बात शुरू करता हूं (गलतियां सारी मेरी, बधाइयां सारी वरिष्ठ लेखकों की)।

   "वो किताब, किताब नहीं जिसका कोई पाठक न हो।
   वो किताब, किताब नहीं जो पुस्तकालय में सिर्फ सजती हों।"

      बड़े भैया के उपन्यासों को छुप छुप कर पढ़ना शुरू किया तो मैं सातवीं में था। संडे मॉर्निंग मिक्की माउस कार्टून देखने के लिए बेकरार रहता था और, इवनिंग में विक्रम-बेताल।
            कॉमिक्स की दुनियां में नागराज पैदा ही हुआ था और, सुमन-सौरभ, नंदन, राम-रहीम, राजन-इक़बाल औऱ बिल्लू, चाचा चौधरी जलवा बिखेर रहे थे।
             उसी दौरान भैया अपने  दोस्तों के साथ विजय की बातें किया करते थे। मेरी उत्सुकता का कोई ठिकाना नहीं था जब मैं भैया को तुकबंदी करते हुए विजय बनने की कोशिश करते देखा करता था।
         फिर किसी दिन ओमप्रकाश शर्मा जी का नॉवेल भी देखा। इतनी बड़ी-बड़ी किताबें कैसे पड़ते हैं भैया... वो भी बिना चित्रों के। ये सवाल था मेरा।
         फिर भैया पढ़ाई के बाद कंप्यूटर कोर्स करने लगे।
हमारी भाभी (जो बड़े भैया की भी भाभी थीं) उन दिनों रानू, गुलशन नन्दा और जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा के नॉवेल पढ़ा करती थीं। सवाल वही की बिना चित्रों के कैसे इतने मोटे नॉवेल पढ़ती हैं।
            खैर,  वक़्त गुज़रा (वक़्त हमेशा क्या तेज़ी से ही गुजरता है ?)। भैया अपनी ज़िंदगी में - नौकरी में बिजी हो गए। बड़ी भाभी जी बच्चों में और फिर ज़माना भी बदल गया-नॉवेल, कॉमिक की जगह टीवी आ गया। फिर भी यदा-कदा घर में कॉमिक्स और नोवेल्स के दर्शन हो ही जाते थे(ये शौक़ इतनी आसानी से जाता भी नहीं)।
           स्कूलिंग के बाद  मेरा इंजीनियरिंग में एडमिशन हुआ। चार साल दुनियां से बेखबर पढ़ाई और मौज मस्ती में गुजरे गए। पढ़ने का सिलसिला टूट-सा गया। फिर नौकरी औऱ छोकरी ने वक़्त न दिया।
             आशिकी में जब कुछ न कर पाए तो नौकरी ही कर लें-इस भावना से दिलो दिमाग को अपने ऑफिस में गिरवी रख दिया। नतीज़ा ये की इमेज अच्छी बन गयी, और हम भी सीनियर हो गए।
        ऐसे में एक दिन दिल्ली में निर्भया कांड हो गया जो मुझे रुला गया (मैं कई सालों से रोया नहीं था-पिता जी के न रहने पर भी)।
      फिर मेरा एक्सीडेंट हो गया(बहुत अच्छा हुआ!) और मैं 4 महीनें बेड पर रहा। ऐसे में मैंने वक़्त गुजरने के लिए कुछ लिखना-पढ़ना शुरू किया तो भैया ने कुछ पुराने नॉवेल दिए(उस वक़्त तो मना करते थे)। मैंने पढ़े औऱ पढ़ता ही गया।
सब पढ़ा-कम्बोज जी, ओमप्रकाश जी, पाठक जी, रानु जी, गुलशन  नंदा जी कुछ जीवनियां भी पढ़ी जो आबिद रिज़वी जी की लिखी हुई थीं।
             और आज तक पढ़ रहा हूँ सोचता हूँ कि हर चीज में कुछ न कुछ सकारात्मक होता है तो एक्सीडेंट ने मुझे लोकप्रिय साहित्य की दुनियां से परिचय करवा दिया। आजकल शरतचन्द्र, टैगोर, प्रेमचंद, कृष्णचंदर के आलवा वेद प्रकाश कंबोज जी,सुरेंद्र मोहन पाठक जी, जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी, वेदप्रकाश शर्मा जी सभी पढ़ रहा हूं। जो मिल जाता है चन्दर, आरिफ मरहवीं, कुशवाहा कांत, शिवानी पढ़ने की कोशिश करता हूँ।

अब समझ आने लगा है कि बिना चित्रों के कैसे इतनी मोटी नावेल पढ़ी जाती है/थी।

         ये एक अजीब ही दुनियां है। इसमें पुराने समय के दिग्गज और नए जमाने के लेखक दोनों ही अपनी लेखनी से मनोरंजन प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
            जब गृहकार्य से निपट कर महिलायें किसी लव स्टोरी को पढ़ती थीं और अपने सर्किल में इनके पात्रों के बारे में बतियाती थीं, ठीक ऐसे ही जैसे आजकल सीरियल की डिस्कशन होती है। वो दिन क्या कभी लौट के आएंगे--किसी ने पूछा था क्या ऐसा हो सकता है।
              होने को तो सभी कुछ हो सकता है पर उसके लिए तो हमें अपनी धरोहरों को बचाना होगा। उस सहित्य को जीवंत रखना होगा जिसकी मशाल को एक सदी से पहले के लेखकों ने हमारे हाथों में दी।
        इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर श्री गुरप्रीत सिंह जी ने साहित्य ब्लॉगस्पोट के जरिये एक शुरुआत की है -उस दौर के सुनहरे इतिहास को, किस्सों को, लेखकों की कहानियों को और लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इस लोकप्रिय साहित्य को संजोने की।
सौभाग्य से
कम्बोज जी, पाठक जी,आबिद जी, योगेश मित्तल जी, धरम राकेश जी, अनिल मोहन जी (अन्य किसी लेखक के बारे सूचित करें) आज हमारे बीच हैं जिनके सामने ये इतिहास बना था।

राम 'पुजारी'
( लेखक 'अधूरा इंसाफ...एक और दामिनी' तथा 'लव जिहाद...एक चिड़िया' जैसी चर्चित उपन्यासों के लेखक हैं।)
राम पुजारी

सफलता के दो वर्ष

साहित्य देश ब्लॉग के दो वर्ष पूर्ण होने पर...

        समस्त पाठक मित्रों को ब्लॉग के दो वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक शुभकामनाएँ।
         साहित्य देश ब्लॉग और लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के समस्त पाठकों के स्नेह और सहयोग से ब्लॉग ने अपने सफलतापूर्वक दो वर्ष पूर्ण कर लिये।
      ब्लॉग का निर्माण 'लोकप्रिय साहित्य संरक्षण' (उपन्यास लेखक और उपन्यासों की जानकारी) के लिए किया गया था। धीरे-धीरे उद्देश्य विस्तृत होते गये।
           मेरा बचपन साहित्य पठन में ही बीता है, समय के साथ परिवर्तन होते गये और मनोरंजन के साधनों में परिवर्तन आया और इसी परिवर्तन की चपेट में उपन्यास जगत अंधेरे में खोता चला गया। सन् 2017 में जब सोशल मीडिया के माध्यम से मैं पाठक मित्रों के संपर्क में आया तब पाठक एक-दूसरे से लेखकों के उपन्यासों के नाम पूछा करते थे। किसी के पास कोई संतुष्टिजनक उत्तर नहीं होता था। वहीं अगर किसी लेखक के जीवन के विषय में कोई बात चलती तो एक-दो लेखकों के अतिरिक्त किसी लेखक का कोई पता ही नहीं चलता था। हालांकि बहुत से अच्छे लेखक थे, उनके उपन्यासों की आज भी चर्चा होती है।
            बस यहीं से मुझे प्रेरणा मिली की लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के लिए कुछ किया जाये और उसी का परिणाम है साहित्य देश ब्लॉग।

          साहित्य देश ब्लॉग/टीम इस उद्देश्य के साथ आरम्भ हुआ था की लोकप्रिय उपन्यास साहित्य संरक्षण के लिए 'कुछ' किया जाये। यह 'कुछ' किस स्तर का होगा यह हालांकि तय न था। लेकिन फिर भी एक प्रयास था की लेखकों की जानकारी एकत्र की जाये और आज सभी सहयोगी मित्रों की प्रेरणा और मदद से हमने बहुत से ज्ञात और अज्ञात लेखकों की जानकारी एकत्र की और ब्लॉग पर शेयर की। इसी क्रम में 'साहित्य देश' नाम से YouTube चैनल पर कुछ साक्षात्कार भी प्रस्तुत किये। youtube  चैनल लिंक साहित्य देश

   ब्लॉग पर दो सौ से ज्यादा लेखक की जानकारी उपलब्ध है (हालांकि यह अधूरी है) और इन दो सालों में साठ हजार से भी ज्यादा बार ब्लॉग को पाठकों द्वारा पढा (देखा) गया है। यह सब पाठक मित्रों के सहयोग का ही परिणाम है। इन दो वर्षों में कुछ अनुभव भी मिले, जो भविष्य में सहायक हो।
                  बहुत से पाठक मित्रों के पास आज भी पुराने उपन्यास उपलब्ध हैं लेकिन पता नहीं किस संकोचवश वे उनको शेयर नहीं कर पा रहे। एक किस्सा याद आ रहा है। मेरे एक दोस्त के पास कुछ उपन्यास थे। वह किसी को भी पढने के लिए नहीं देता था‌। उनको छुपा कर रखता। एक दिन उनके घर वालों ने घर की सफाई की तो वो सब उपन्यास रद्दी वाले को बेच दिये। उस दोस्त ने एक दिन यह घटना मुझे बताई की मेरे सारे उपन्यास घरवालों ने बेच दिये। यह किस्सा सिर्फ पाठकों तक ही सीमित नहीं, लेखकों तक विस्तृत है।
          यही स्थिति अधिकांश पाठकों के साथ हो रही है। वे अपने संग्रह को सार्वजनिक नहीं करना चाहते। वक्त का पता भी नहीं चलेगा और सब खत्म हो जायेगा। अगर हम पुराने उपन्यासों को ONLINE उपलब्ध करवा सके तो यह बहुत अच्छा रहेगा। हालांकि ज्यादातर इसमें प्रकाशक और लेखक की सहमति का झंझट है। आज न तो वे प्रकाशक रहे और न ही लेखक। एक बार मैंने एक लेखक से बात की और उनसे कहां की आप अपने उपन्यास ONLINE उपलब्ध करवा दीजिएगा तो लेखक महोदय ने कहा 'एक दिन फिर वही दौर आयेगा और मेरे उपन्यास उसी प्रकार पुन: बिकेंगे'। अब यह पता नहीं कब संभव होगा।
            मेरा उद्देश्य किसी को बुरा बताना नहीं है। मेरे कहने का तात्पर्य मात्र यही है की उपन्यास साहित्य संरक्षण के लिए कोई भी गंभीर नहीं है। न प्रकाशक, न लेखक और न पाठक। आज अगर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी को छोड़ दिया जाये तो और किसी लेखक के पास स्वयं के उपन्यासों की व्यवस्थित सूची उपलब्ध नहीं है।

         ‌ब्लॉग पर ऐसे बहुत से पाठक आते हैं जो पुराने लेखकों को पढना चाहते हैं लेकिन हमारे पास ऐसा कोई विकल्प ही नहीं है जो उन्हें उपन्यास उपलब्ध करवा सके। अगर देखा जाये तो हिन्दी जासूसी उपन्यास साहित्य (Pulp fiction) के क्षेत्र में आज तक कोई सार्थक कार्य हुआ ही नहीं। किसी ने भी इस क्षेत्र में, इस क्षेत्र के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम तक नहीं उठाया।
         आज अधिकांश लेखकों का तो अता-पता भी नहीं, और जिनके विषय में जानकारी है उनके उपन्यास तक स्वयं उनके पास भी उपलब्ध नहीं और जिनके पास कुछ उपन्यास उपलब्ध हैं वे कहीं भी Online उपलब्ध नहीं करवा पा रहे।
वर्तमान उपन्यास साहित्य चाहे एक लाभदायक व्यवसाय नहीं है लेकिन आप एक समर्पित व्यक्तित्व की तरह इसके लिए कुछ कर सकते हैं। आपकी कृतियां तो सुरक्षित रहेंगी। आप का नाम तो अमिट रहेगा, पाठक तो आपको याद करेंगे।
           हमारा प्रयास है पुराने लेखकों के उपन्यास भी सुरक्षित किये जायें अगर संभव हो तो उनका पुनः प्रकाशन किया जाये या Online पाठन हेतु प्रस्तुत किये जायें। यह काम किसी भी एक व्यक्ति के द्वारा संभव नहीं है यह तो एक टीमवर्क के द्वारा ही संभव है।
             उपन्यास साहित्य संरक्षण के लिए साहित्य देश ब्लॉग के अतिरिक्त और भी बहुत से मित्र सक्रिय हैं लेकिन कोई सामूहिक प्रयास नजर नहीं आता। लेकिन जो भी प्रयासरत है उनका कार्य प्रशंसनीय है। हालांकि अब कुछ लेखक भी सक्रिय हुये हैं‌ लेकिन यह सक्रियता अभी अधूरी है।
              दो वर्ष पूर्ण होने पर साहित्य देश ब्लॉग अपने पाठकों के लिए कुछ न कुछ नया विचार लाता रहेगा। इसी क्रम में लेखक 'राम पुजारी' का आर्टिकल लोकप्रिय साहित्य के लिए.. भी ब्लॉग पर प्रकाशित है। अगर संभव हुआ तो हम कुछ उपन्यास भी ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे। (अगर कोई अच्छा टाइपिस्ट मिल गया तो)।
            वर्तमान में बहुत से लेखक हमारे संपर्क में हैं लेकिन समयाभाव के कारण उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा और उनके साक्षात्कार भी ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं कर पा रहे।
             उपन्यास जगत के सभी पाठक, लेखक और प्रकाशक मित्रों से निवेदन है की हम सामूहिक रूप से इस क्षेत्र के लिए प्रयास करें। आज अनिवार्यता महसूस हो रही है की हमें कोई सामूहिक और ठोस कार्य करना चाहिए ताकी इस विरासत को सुरक्षित किया जा सके। आप भी अपने क्षेत्र में देखेंगे तो कोई‌ न कोई लेखक शायद नजर आ जाये। आज जरूरत हैं उन लेखकों को उनका उचित सम्मान देने की जिन्होंने साहित्य लेखक कर हमें मनोरंजन प्रदान किया।
          हमें उम्मीद है आपका सहयोग लोकप्रिय उपन्यास साहित्य संरक्षण में सहयोगी साबित होगा।
             एक बार पुनः उन पाठक मित्रों का हार्दिक धन्यवाद जिन्होंने उपन्यास जगत से संबंधित जानकारी हमें प्रदान की।
आओ हम सब मिलकर कदम बढायें।
आपके उत्तर का इंतजार रहेगा।

साहित्य देश टीम
Email- sahityadesh@gmail.com


शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

मृगेन्द्र नाथ

नाम - मृगेन्द्रनाथ
जासूसी उपन्यासकार मृगेन्द्र नाथ के विषय में सामान्य सी जानकारी प्राप्त हुयी है। अप्राप्य जानकारी अनुसार मृगेन्द्रनाथ मध्य प्रदेश के रिवा जिले के निपनिया से संबंधित हैं। (उपन्यास में यह एड्रेस है) इनके उपन्यास सरोज पॉकेट बुक्स और माया पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुये हैं। 
 'सरोज पॉकेट बुक्स' का एड्रेस भी वही है जो लेखक महोदय का है। इसी पॉकेट बुक्स से 'सरोज' नामक उपन्यासकार के उपन्यास भी प्रकाशित हुये हैं।
 उक्त लेखक के विषय में किसी के पास कोई भी जानकारी हो तो अवश्य संपर्क करें।
धन्यवाद।
सम्पर्क
सरोज पॉकेट बुक्स/ मृगेन्द्रनाथ
1/132, निपनिया
जिला- रीवा, मध्य प्रदेश

मृगेन्द्र नाथ के उपन्यास
1. मुझे फांसी चढा दो
2. खून से नहला दूंगा
3. लूट की दुल्हन

सरोज पॉकेट बुक्स से नरेन्द्र नाथ नामक लेखक के उपन्यास भी प्रकाशित होते रहे हैं।

 



डाॅ. नरेन्द्र नाथ गुप्ता

नरेन्द्र नाथ गुप्ता के विषय में उ‌नके उपन्यास 'पुलिस निगरानी' से कुछ जानकारी प्राप्त हुयी है।
प्रस्तुत जानकारी का यही एक माध्यम है। उक्त लेखक के विषय में कोई और जानकारी उपलब्ध हो तो अवश्य संपर्क करें।

डाॅ. नरेन्द्र नाथ गुप्ता के उपन्यास 'सरोज पॉकेट बुक्स' और 'माया पॉकेट बुक्स-मेरठ' से प्रकाशित होते रहे हैं।
संपर्क
डाॅ. नरेन्द्र नाथ गुप्ता
C/O सरोज पॉकेट बुक्स
1/132 निपनिया, रीवा
मध्य प्रदेश- 486001

डाॅ. नरेन्द्र नाथ गुप्ता
1. कायर कहीं का
2. पुलिस निगरानी (प्रथम भाग)
3. भूकम्प का इंसाफ (द्वितीय भाग)
4. कत्ल हुआ कातिल का
5. मेरा जुर्म (जादूई सीरिज नरेन)



बुधवार, 17 अप्रैल 2019

अमित खान जी के लिए

कुछ टिप्पणियाँ अख़बारों से लेख़क  के बारे में


1. अमित खान—हिन्दी पल्प फिक्शन का बेहद मशहूर और सबसे युवा चेहरा।-  हिन्दुस्तान टाइम्स


2. हिन्दी पल्प साहित्य के सबसे युवा लेखक, जिनकी निगाह लेखन के इस बदलते युग में इंटरनेट व्यवसाय पर भी है।-    फेमिना


3. अमित खान—वह लेखक, जिन्होंने अपनी ज़िद और शर्तों पर ज़िन्दगी जी।- दैनिक जागरण


4. अमित खान—थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में एक प्रभावशाली नाम है।- मिड डे


5. बारह साल की उम्र में पहली कहानी। 15 साल की उम्र में पहला धारावाहिक उपन्यास। यह किसी कहानी के किरदार का ज़िक्र नहीं है बल्कि ‘अमित खान’नाम के एक ऐसे शख्स का परिचय है—जिसका लिखा बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने पढ़ा और अब पर्दे पर लाखों लोग देख रहे हैं।- दैनिक जनवाणी


6. अमित खान—वह नाम, जो लेखन की दुनिया का अद्भुत व्यक्तित्व है।- द फ्री प्रेस जनरल


7. चेतन भगत वर्सिस अमित खान- दिव्य भास्कर

अमित खान

रविवार, 14 अप्रैल 2019

उपन्यास साहित्य का रोचक संसार-31,32

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें - 31
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          उस दिन फूलचन्द सुबह-सुबह घर आ गया ! वह अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान था और उसके माता-पिता उसकी इतनी ज्यादा चिन्ता करते थे, जितनी कोई माँ-बाप अपनी जवान बेटी की भी नहीं करते।

           फूलचन्द गाँधीनगर में रहने पर शुरुआती दौर में बने मेरे दोस्तों नरेश कुमार गोयल और अरुण कुमार शर्मा का सहपाठी रह चुका था और उन दोनों का ही अच्छा दोस्त था, लेकिन मेरी उससे सिर्फ पहचान ही थी।

           फूलचन्द कद में मुझसे खास बड़ा नहीं था, सिर्फ इंच-दो इंच का रहा होगा, लेकिन उसका शारीरिक गठन बहुत अच्छा था और सबसे खास बात यह थी कि उसका रंग एकदम गोरा-चिट्टा था ! चेहरे पर हमेशा मासूमियत छाई रहती थी ! किन्तु उसके चेहरे पर मूँछ-दाढ़ी का अभाव था।

         वह इतना खूबसूरत था कि यदि साड़ी-ब्लाऊज में सामने आ जाये तो गली-मोहल्ले के दिलफेंक लड़के 'अश्-अश्' कर उठें और उस पर लाइन मारने के अवसर ढूँढने लगें।

       नवीं-दसवीं में तीन साल फेल होने के कारण वह नरेश और अरुण से पिछड़ अवश्य गया था, किन्तु बचपन से साथ-साथ पढ़ने के कारण बनी दोस्ती बरकरार थी।

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...