नाम- अशोक तरुण
दिल्ली के निवासी अशोक तरुण जी, प्राप्त संक्षिप्त जानकारी कर अनुसार एक एक्शन उपन्यासकार के रूप में सामने आते हैं।
हालांकि उनके विषय में उनके उपन्यासों से ही जानकारी प्राप्त होती है जो अप्राप्य है।
नाम- अशोक तरुण
दिल्ली के निवासी अशोक तरुण जी, प्राप्त संक्षिप्त जानकारी कर अनुसार एक एक्शन उपन्यासकार के रूप में सामने आते हैं।
हालांकि उनके विषय में उनके उपन्यासों से ही जानकारी प्राप्त होती है जो अप्राप्य है।
"बाबा, तुम समोसे क्या बनाते हो, गजब ढाते हो !" मेजर कहा ।
ठाकुर हिम्मत सिंह मेजर की इस प्रशंसा पर प्रसन्न हुए। उन्होंने ऊंची आवाज में कहा - "बाबा नन्दू, इधर आओ और इनको बताओ कि तुम हमारे घर में नौकर कैसे हुए थे !"
"सरकार, मैं यह कहानी इतनी बार मेहमानों को सुना चुका हूं कि अब उसे दुहराते हुए शर्म आती है।" नन्दू बाबा ने निकट आकर कहा – “मगर मालिक का हुक्म कौन टाल सकता है, साहब ? मैं बावर्ची की नौकरी की खोज में था। बड़े ठाकुर साहब यानी मालिक के दादाजी ने मुझे देखा तो उनको विश्वास न आया कि मैं बावर्ची भी हो सकता हूं। खैर उन्होंने मुझे आजमाने की ठान ली। हुक्म हुआ कि मैं रसोईघर में जाकर दोपहर का खाना तैयार करूं, सबसे पहले वे खाकर देखेंगे। सो हुजूर, खाना बन गया।
ठाकुर साहब खाने के लिए बैठे। मैंने नौकरानी के हाथ पाली परोसकर भिजवाई। थाली में केवल दाल की कटोरी थी और परांठे थे। में धड़कते दिल के साथ रसोई में इन्तजार कर रहा था । वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद थी। बड़े ठाकुर साहब ने बार-बार दाल मंगवाई, यहां तक कि उनका पेट भर गया। फिर वे रसोई में आकर बोले- 'मैं तो सिर्फ दाल ही खाता रहा, बाकी जो चीजें तुमने पकाई होंगी, वे तो पड़ी रह गई...!" मैंने केवल एक बरतन उनके आगे रख दिया जिसमें दाल थी और कहा- 'मैंने और कुछ नहीं बनाया था, सरकार ! बस दाल ही बनाई थी और इस विश्वास के साथ बनाई थी कि आप इसके सिवा और कोई चीज मांग ही नहीं सकेंगे ।' बड़े ठाकुर साहब ने मेरी पीठ बनवाई और उसी दिन से मैं इस घर का सेवक चला आ रहा हूं।" नन्दु बाबा ने हाथ हिलाकर कहा मेजर की नजरें उसके हाथों पर पड़ी तो वह आश्चर्य से उसके मैले हाथों की ओर देखने लगा ।
नन्दू बाबा ने मेजर की निगाहें अपने हाथों पर जमी देखी तो उसने तुरन्त अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे छिपा लिए।
उपन्यास साहित्य में असंख्य छद्म लेखकों की पंक्ति में एक और नाम पता चला है। वह नाम है मनोज पॉकेट बुक्स के Ghost writer 'राजा' का।
बाद में मनोज पॉकेट बुक्स से अलग होकर इनकी इन शाखा 'राज पॉकेट बुक्स' और फिर नाम परिवर्तित होकर 'राजा पॉकेट बुक्स' बनी थी। हालांकि लेखक राजा के उपन्यास मनोज पॉकेट बुक्स से ही प्रकाशित हुये थे। और वह भी कोई ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाये।
प्राप्त जानकारी अनुसार छद्म लेखक राजा के बाल उपन्यास की संख्या न्यूनतम ही रही थी।

साहित्य देश की हास्य रस स्तम्भ में इस बार पढें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक धीरज के उपन्यास 'वतन के आँसू' का एक हास्यजनक किस्सा।
रामलाल ने अंदर आते ही शीला को अपने आलिंगन में ले लिया था तथा उसके लाल सुर्ख रसीले होंठों को अपने होंठों के मध्य भींच लिया था !
"छोड़ो भी...आप भी बस !"- शीला ने स्वयं को रामलाल की कैद से मुक्त कराते हुए कहा—शर्म से उसका चेहरा लाल-भभूका हो गया था तथा वह घबराई हुई नजरों से उस कोने की तरफ देखने लगी, जहां उनके दोनों बच्चे खड़े थे।
“आहा जी...पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली-पापा ने मम्मी की पप्पी ले ली।” - सुमिता ताली पीटते हुए उछल-उछलकर कह रही थी !
"मैं तुम्हारी मम्मी को प्यार कर रहा था, सुमि !"
“ल....लेकिन प्यार करना तो बुरी बात है !"
“तुमको किसने कहा ?"- रामलाल के चेहरे पर नागवारी वाले भाव उभरे थे !
"परसों, जब राखी आंटी मौल्हले वाले एक अंकल से प्यार कर रही थीं, तो मौहल्लेवालों ने अंकल को कितना मारा था!"
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...