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शनिवार, 16 अप्रैल 2022

चन्द्रप्रकाश पाण्डेय

नाम - चन्द्रप्रकाश पाण्डेय
श्रेणी- हाॅरर उपन्यासकार

हिंदी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में युवा लेखक चन्द्र प्रकश

 जी ने हाॅरर/पैरानोर्मल साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। इ‌नके उपन्यास मात्र घटना न होकर एक व्यवस्थित कथा पर आधारित होते हैं और कहानियाँ में किसी न किसी तथ्य को आधार बनाया गया है।


लेखक की उपलब्ध कृतियाँ (प्रकाशन क्रम के अनुसार) 

  1. फिर वही खौफ (हॉरर थ्रिलर) 
  2. अवंतिका (माइथालॉजिकल थ्रिलर) 
  3. मौत के बाद (हॉरर थ्रिलर) 
  4. आवाज़ (पैरानॉर्मल थ्रिलर) 
  5. विषकन्या (माइथालॉजिकल थ्रिलर) 
  6. अनहोनी (पैरानॉर्मल थ्रिलर) 
  7. रक्ततृष्णा (हॉरर थ्रिलर) 
  8. महल (पैरानॉर्मल थ्रिलर) (मई -2022)
  9. कोई लौट आया
  10. रुपांतरण

1. अस्तित्व- एक रहस्यमयी कहानी
2. गुमनाम है कोई


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

राकेश

नाम- राकेश 
प्रकाशक- धीरज पॉकेट बुक्स, मेरठ

लेखक राकेश के विषय में इनके एक उपन्यास 'खून का कर्ज' से ही हमें जानकारी मिली है। प्रथम दृष्टि तो 'राकेश' नाम एक Ghost writer ही नजर आता है। उपन्यास सूची से प्रतीत होता है राकेश सामाजिक उपन्यासकार हैं।

राकेश के उपन्यास

  1.  बड़ी बहू 
  2. चुभन सिंदूर की
  3. दूसरी लंका
  4. अधूरा इंसाफ
  5. रिश्ते नफरत के
  6. माँ का हत्यारा
  7. प्यार बिकता नहीं
  8. पत्नीव्रता
  9. खून का कर्ज
  10. आखरी अदालत 

रविवार, 10 अप्रैल 2022

मास्टर माइण्ड- शुभानंद

पुस्तक का नाम : मास्टरमाइंड 
° लेखक का नाम : शुभानंद 
• प्रकाशक एवं स्थान : सूरज पॉकेट बुक्स , ठाणे ( महाराष्ट्र )
• मूल्य ( पेपर बैक ) : ₹ 118
   किंडल : ₹ 50 ( अनलिमिटेड )
• पेज संख्या : 345
• भाषा : हिंदी 
लेखक के बारे में -
              IIT , बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षित शुभानंद ने बचपन से ही लिखने के लिए कलम उठा ली थी और लिखने के शौक के कारण उपन्यास लिखते चले गए । इनकी लिखने की खास बात यह है कि सरल भाषा शैली पर जटिल व तेज रफ्तार कहानी जो पाठक को एक ही सिटिंग में अंत तक पढ़ने के लिए बाध्य करती है । शुभानंद मुंबई में अपनी लेखिका व डॉक्टर पत्नी रुनझुन व पुत्र मानस के साथ रहते हैं । लेखन के अलावा संगीत सुनने , इंटरनेशनल टी.वी. सीरीज देखने में रुचि रखते हैं ।
पुस्तक के बारे में -
              अमेजॉन किंडल पर शुभानंद कृत जावेद , अमर , जॉन सीरीज का चतुर्थ उपन्यास मास्टरमाइंड पड़ा ।
       इस उपन्यास में तीन मुख्य पात्र हैं , जिनके नाम जावेद , अमर , जॉन हैं । यह तीन भारतीय सीक्रेट सर्विस के जांबाज़ जासूस हैं । अमर , जॉन को ' मेरी जान ' और जॉन , अमर को ' मेरे आम ' कहकर पुकारता है । जैसा कि इस उपन्यास के टाइटल  ' मास्टरमाइंड ' को देखकर विदित होता है कि यह आतंकवाद पर आधारित कहानी है । हां , तो यह असल में आतंकवाद और साजिश पर आधारित कहानी ही है । एक ऐसी साजिश जिसमें कदम कदम पर रोंगटे खड़े कर देने एवं चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं ।
        मास्टरमाइंड , इतना शातिर की सीक्रेट सर्विस को धता बताकर अपने मास्टर प्लान के तहत सीक्रेट सर्विस के जासूस के खिलाफ कुछ ऐसे सबूत प्लांट करता है , जिससे कि सीक्रेट सर्विस का जासूस जेल चला जाए और सीक्रेट सर्विस अपने जासूस को निर्दोष साबित करने में लग जाए ताकि वह अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचा सके । लेकिन सीक्रेट सर्विस अपने ही जासूस के जेल जाने के पीछे के कारणों को तलाशने लगती है और तेजी से इन्वेस्टिगेशन शुरू कर देती है । तब जाकर सीक्रेट सर्विस के अपनी जांच पड़ताल में कुछ ऐसे खुलासे होते हैं । जिन्हें जानकर सीक्रेट सर्विस के एजेंट एवं चीफ आश्चर्यचकित रह जाते हैं ।
         
        वो कौन सा प्लान था जिसे जानने के बाद सीक्रेट सर्विस के एजेंट आश्चर्यचकित रह जाते हैं ? 
        आखिर उस मास्टरमाइंड का ऐसा कौन सा प्लान था जिसके तहत मास्टर माइंड ने सीक्रेट सर्विस को अन्य दिशाओं में उलझाकर रख दिया ?
        क्या मास्टरमाइंड अपने प्लान को अंजाम तक पहुंचा पाता है ?
        क्या सीक्रेट सर्विस को पता चल पाता है कि मास्टरमाइंड कौन है और किस के इशारे पर काम कर रहा था ?
        क्या सीक्रेट सर्विस असल मास्टरमाइंड तक पहुंच पाती है ?
        क्या सीक्रेट सर्विस का एजेंट जेल से आजाद हो पाता है ?
° मेरी रुचि का कारण -
          मुझे स्पाई ( जासूसी ) थ्रिलर बहुत पसंद हैं ।इस उपन्यास में अमर और रिंकी के बीच के वार्तालाप और क्रियाकलाप बहुत अच्छे लगे । अमर सीक्रेट सर्विस का एजेंट और रिंकी भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की एजेंट थी । जो अपने अपने मिशन के तहत एक दूसरे से अचानक मिल जाते हैं । अमर और रिंकी को ना जाने कब एक दूसरे से प्यार हो जाता है । अमर , रिंकी को अपनी सोलमेट मानने लगता है ।
पुस्तक के बारे में मेरी राय -
            यह उपन्यास अपने आप में पूर्ण उपन्यास है । लेकिन लेखक ने इस कहानी के अंत में कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिए जिससे कि पाठकों के मन में जिज्ञासा बढ़ जाती है कि अब इन किरदारों का आगे चलकर क्या होगा क्या नहीं । मेरी नजर में लेखक महाशय ऐसा ना करते तो भी उपन्यास की कहानी पूर्ण ही होती ।
मेरी संस्तुति
            यह उपन्यास जासूसी थ्रिलर पढ़ने वालों को बहुत पसंद आएगा । जो लोग जासूसी थ्रिलर पढ़ते हैं मैं उन्हें उपन्यास पढ़ने का सुझाव देना ज्यादा पसंद करूंगा ।
पाठक  : प्रेम कुमार मौर्य
• दिनांक : 31 मई 2020

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 17
 प्रस्तुति- योगेश मित्तल
मैं सतीश जैन के सामने था।
“तुम पागल हो?- सतीश जैन ने कहा।
वो तो मैं हूँ....पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है?” मैंने बेहद शान्ति से सवाल किया। 
तुम यारइसे जानते कितना हो?” - सतीश जैन का स्वर अभी भी गर्म था। 
इसे... किसे...?”- समझते हुए भी मैंने पूछा। 
इसी को...रामअवतार को....?”
नहीं जानता...।” -मैंने स्वीकार किया -”आपके यहाँ ही मिला हूँ।”
अरे मैं नहीं जानता उसे..। उसके घर के लोगों को...। कैसा आदमी हैकैसा परिवार हैऔर तुम.... तुम्हें उसने एक बार कहा और तुम उसके यहाँ खाने पहुँच गये। यार ये कोई तुक है। अक्ल-वक्ल कुछ है तुममें या दिमाग से एकदम पैदल होजितने का तुमने खाना नहीं खाया होगाउससे ज्यादा तो तुमने किराया खर्च कर दिया। कितना किराया खर्चा?”
साठ रुपये....।” - मैंने धीरे से कहा -"तीस जाने के...तीस आने के।”
इससे कम मेंतुम यहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठकर उससे अच्छा खाना खा सकते थेजैसा वहाँ खाया होगा।”
हाँखाना बेशक ज्यादा अच्छा खा सकता थालेकिन रेस्टोरेंट में वो माहौल... ।”
तुम यार बिल्कुल बेवकूफ हो। ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे के यहाँ खाना खाने कैसे जा सकते हो। तुम जासूसी उपन्यास लिखते होतुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे साथ कुछ ऊंच-नीच भी घट सकता है।”
टेन्शन मत लो यार...। कुछ हुआ तो नहीं। रामअवतार जी बहुत सिम्पल आदमी हैं।” - मैंने सतीश जैन को समझाना चाहापर उनका मूड सही नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे द्वारा रामअवतार जी के यहाँ खाना खाने से खफा हैं या मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया इसलियेपर सतीश जैन ने कुछ जाहिर नहीं किया। मुझसे ठीक से बात किये बिना ही वह ऑफिस की ओर पलट गये। मैं भी सतीश जैन के पीछे पीछे ऑफिस में दाखिल हुआ। 
       सतीश जैन कीऑफिस टेबल के अपोजिट बिछी फोल्डिंग चेयर पर बैठते हुए मैंने यूँ ही सवाल किया –“कितने दिन का टूर है?”
कम से कम दो हफ्ते तो लगेंगे ही।” सतीश जैन ने कहापर उनकी आवाज़ में अभी भी जो तल्खी थीमुझे समझ में आ गया कि उनका मूड अभी भी सही नहीं है। 

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

साक्षात्कार- सत्यपाल

  साहित्य मस्तिष्क के संवाद का विषय है- सत्यपाल

   साक्षात्कार श्रृंखला -11

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में ऐसे अनेक सितारे हुये हैं जिन्होंने अपनी कलम से उपन्यास साहित्य को अनमोल मोती प्रदान किये हैं और इस क्षेत्र में एक विशेष पहचान स्थापित की है।

     साहित्य देश अपने साक्षात्कार स्तंभ में लोकप्रिय साहित्य के सामाजिक उपन्यासकार 'सत्यपाल' जी का साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत कर रहा है, जिसमें अपने लेखन, तात्कालिक समय और अपने उपन्यासों के संबंध में विस्तृत चर्चा की है।

सत्यपाल उपन्यासकार
सत्यपाल
01.लोकप्रिय सामाजिक उपन्यासकारों में 'सत्यपाल' एक विशेष नाम रहा है। लेकिन ज्यादातर पाठकों की जानकारी 'सत्यपाल' नाम तक ही सीमित है। आप एक बार पाठकों को अपना संपूर्ण परिचय अवश्य दीजिए। (जन्म, शिक्षा, परिवार आदि के बारे में)

-  मेरा पूरा नाम सत्यपाल चावला है। मेरा जन्म अप्रैल 1955 में एक कृषक परिवार में गाँव बनियानी, जिला रोहतक, हरियाणा, भारत में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। तत्पश्चात परिवार दिल्ली आ गया। शेष शिक्षा दिल्ली में ही हुई। लिखने का शौक कहिए या जुनून बचपन से ही था। तुकबंदी करना छटी कक्षा से ही शुरू हो गया था। हायर सेकंडरी तक आते-आते निबंध, कहानी और मुक्त कविताएं इत्यादि भी लिखना शुरू कर दिया था। क्योंकि परिवार निम्न मध्यम वर्ग में था, माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। छोटे स्तर की एक डेयरी से भरण-पोषण चलता था। मैं पढ़ने में तेज था। अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ट्यूशन देने के कारण मेरा स्वयं का शिक्षा का आधार भी मजबूत हो जाता था और कुछ आय भी हो जाती थी। समाज के लिए उपयोगी था इसलिए मुझे प्यार ओर आदर मिलता था। स्कूलिंग के उपरान्त हालांकि मुझे पहली ही लिस्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय के डी.ए.वी. कॉलेज में बी.काम.आनर्स में प्रवेश मिला किंतु आर्थिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मुझे आगे की पढ़ाई पत्राचार द्वारा करनी पड़ी। मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी.काम. कर ली। घर की तरफ से स्पष्ट आदेश था कि पहले नौकरी प्राप्त करो। और कागज़ काले (लिखना) करना बंद करो। ट्यूशन, नौकरी के लिए कम्पीटीशन, सैल्फ स्टडी और लेखन सब साथ-साथ चले। कुछ नौकरियां कुछ-कुछ दिन ही चली। स्टेट बैंक की कलैरिकल परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण कर लिया तब लगा कि अब चैन मिला। इधर शादी भी हो गई। एक पुत्री और दो पुत्रों जन्म हुआ आज मैं रिटायर्ड हूँ। परिवार सैटल है। मैं हिन्दी में स्नातकोत्तर करना चाहता था। मैंने रिटायर होने के बाद इग्नू से हिन्दी स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में पास कर लिया। 

रविवार, 3 अप्रैल 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16

प्रस्तुति- योगेश‌ मित्तल

मेरे द्वारा काम करने के बाद वो पुराना उपन्यास इतना नया हो जाता था कि जिस किसी ने भी पहले पढ़ भी रखा हो, उसे पढ़ा-पढ़ा सा बेशक लगे, पर उसे आसानी से पता नहीं चल सकता था कि यह उपन्यास कहाँ पढ़ा है। इसका कारण यह भी था, मुझसे काम करवाने के बाद सतीश जैन अक्सर अन्दर के कुछ पात्रों के नाम स्वयं बदल देते थे या किसी से बदलवा देते थे और पुराना घिसा पिटा उपन्यास नया हो जाता था। 

एक तरह से यह पाठकों से चीटिंग थी और इस चीटिंग में प्रकाशक का साथ देने वाला शख्स आपका अपना योगेश मित्तल था, जिसे कि प्रकाशक सबसे ईमानदार और सच्चा लेखक मानते थे और कहते भी थे। 

पर तब मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। 

मेरी सोच बस, यह थी कि मैं लेखक हूँ और मुझे लिखने का जो भी काम मिल रहा है, करना चाहिए और फिर मुझे अपनी बीमारी की वजह से हर समय पैसों की जरूरत रहती थी। दवाएँ और डाक्टरी इलाज, उस समय की कमाई के हिसाब से बहुत मंहगा पड़ता था। मेरा सोचना यह भी होता था कि मैं यदि घर खर्च के लिए घर के लोगों की बहुत मदद न भी करवाऊँ, कम से कम अपनी बीमारी, अपने इलाज के खर्च का बोझ तो घर पर न डालूँ। 

सतीश जैन ने दूसरा जो उपन्यास मुझे दिया, वह विक्रान्त सीरीज़ का ही था। 

मैंने दोनों लिफाफे थामते हुए पूछा - “कब तक चाहिये?”

इस बार कोई जल्दी नहीं है।” - सतीश जैन बोले -”बेशक आप दिल्ली ले जाओ। जब चक्कर लगे, तब दे जाना। स्पेशली आने की जरूरत नहीं है।”

यह मेरे लिए घोर अचरज़ की बात थी। सतीश जैन के लिए मैं जब से काम कर रहा था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था।

ठीक है, फिर मैं अभी चलूँ।”-  मैंने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, लेकिन उठा नहीं। 

गुरुवार, 31 मार्च 2022

Ghost Writer का दर्द

 लेखन साहित्य में Ghost Writing का दौर हमेशा से रहा है। और इस दर्द को एक लेखक ही अच्छे से समझ सकता है। लेखक नरेन्द्र कोहली जी के उपन्यास 'आतंक' में ऐसा ही एक किस्सा नजर आया, जो Ghost writer के दर्द को बहुत अच्छे से व्यक्त करता है, वहीं लेखक और प्रकाशक के संबंधों का यथार्थवादी चित्रण भी करता है।
बलराम अपने प्रकाशक के यहाँ पहुँचा तो उसका काफ़ी तपाक से स्वागत हुआ। 
“आपकी बड़ी प्रतीक्षा थी मुझे।” उसके प्रकाशक जगदीश जी ने दोनों पैर समेटकर कुर्सी पर पालथी मार ली। दाहिने हाथ से सिर पर काफ़ी पीछे रखी हुई गाँधी टोपी को और पीछे की ओर खिसकाया और हथेलियों की मुट्ठियाँ बाँधकर अपनी टाँगों को, परात में पड़े आटे के समान गूँधने लगे। 
“कहिए।” 
“ऐ भाई।” जगदीश जी ने शून्य में आवाज़ लगाई, “ज़रा वह किताब लाइयो, जो मथुरा से छपकर आज आई है।” 
दुकान में काम करने वाला लड़का उन्हें एक पुस्तक दे गया। यह ‘ऐ भाई’ सम्बोधन उसी लड़के के लिये था, वह जानता था। और दुकान पर आने-जाने वाला हर अन्य व्यक्ति भी जल्दी ही समझ जाता था।
     बलराम ने जगदीश जी के हाथ में पकड़ी हुई पुस्तक को देखा—कोई पॉकेट बुक थी। काफ़ी चिकना और रंगदार कवर था। 
       जगदीश जी कुछ देर तक उस पुस्तक को निहारते रहे और फिर उन्होंने पुस्तक उसकी ओर बढ़ा दी, “यह देखो।” 

रविवार, 27 मार्च 2022

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी की - 15

यादें वेद पकाश शर्मा जी की - 15
प्रस्तुति- योगेश मित्तल

क्या काम कराना होगा?” - पूछते हुए मेरे चेहरे पर वही मुहब्बत भरी मुस्कान उभर आई, जिसे आपने मेरे रजत राजवंशी नाम से छपे कुछ उपन्यासों की तस्वीरों तथा फेसबुक की तस्वीरों में देखा है। 
वेद भाई ने बड़े रहस्यमय अन्दाज़ में चेहरा आगे किया और धीरे से पूछा –“बता दूँ...?”
हाँ...हाँ...बताओ।” - मैं भी कुछ मज़े लेने वाले मूड में आ गया था। 
तो सुन...मामा... एस. पी. साहब से नूतन पॉकेट बुक्स में छपे कुछ पुराने-सुराने उपन्यास विक्रांत और विजय सीरीज़ के फ्री में लाया होगा, उन्हीं को कवर-सवर फाड़ के योगेश मित्तल के सामने फेंकेगा, ताकि योगेश मित्तल को पता न चले, यह उपन्यास पहले कहाँ छपे हैं, फिर योगेश मित्तल से कहेगा कि यार, इसमें आधा-आधा फार्म शुरू और आखिर में बढ़ा दो और हर चैप्टर की शुरू और आखिर के तीन-तीन चार-चार लाइन चेन्ज कर दो।”
वेदप्रकाश शर्मा
हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 

हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?”-  मैंने पूछा। 
किसी और से भी ले सकै है, प्रभात पॉकेट बुक्स से भी ले सकै है। तिलक चन्द जी के भी पांव पकड़ सकै है, पर एस. पी. साहब का नाम मैंने इसलिए लिया है, क्योंकि मेरा ख्याल है - एस. पी. साहब से 'मामा' की कुछ ज्यादा ही पटती है।”
पटती है?”- मैं हँसा। 
वेद प्रकाश शर्मा के चेहरे पर भी हँसी आ गई, एकदम ही वह बोले - “तू कहीं गलत तो नहीं समझ रहा  मैंने कहा - पटती है। 'फटती है' नहीं कहा है।”
नहीं, मैं गलत नहीं समझा।” मैंने 'पटती है' ही समझा है। तुम तो जानते ही हो, मैं आमिष  शब्दों का प्रयोग नहीं करता। उपन्यासों में बेशक किसी लफंट-लम्पट-मवाली के मुंह से नानवेजिटेरियन शब्द बुलवा दूं, व्यक्तिगत जीवन में खुद कभी इस्तेमाल नहीं करता।” 

मंगलवार, 15 मार्च 2022

नये उपन्यास - 2022

उपन्यास - महल
लेखक - चन्द्रप्रकाश पाण्डेय
प्रकाशक - थ्रिल वर्ल्ड
         
          जमुना के मन में संदेह के साँप ने सिर उठाया और उसकी आँखें गोल हो गयीं। पशुपति को हसीनाबाद में डेरा डाले हुए महीने भर से ऊपर हो रहा था और इस वक्फे में एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा था, जब जमुना उसकी ओर से निश्चिंत रहा हो। पशुपति की ओर से उसे जो उजरत हासिल होती थी, उसमें इस बात का भी करार हुआ था कि वह उसके लिए दोपहर और रात का भोजन भी ले आया करेगा। जमुना इस करार को मुसलसल पूरा भी कर रहा था लेकिन आज पहली दफा हुआ था, जब भोजन के वक्त पशुपति कहीं जाने की तैयारी कर रहा था; वो भी रात के दस बजे, जब पूरा जंगल और समूचा कस्बा अँधेरे व कुहरे की दोहरी चादर ओढ़कर सो रहा था।
जमुना ने भयभीत निगाहों से पूरे चाँद की ओर देखा। कस्बे में जब से वह रहस्यमयी मेहमान आया था, तब से पूर्णमासी की रात उसके लिए खौफ और दहशत का बायस बनकर आती थी। वह इस कदर खौफ़जदा रहता था कि उस रात को आँखों ही आँखों में गुजार देता था और जब भोर की पहली किरण धरा का आलिंगन करती थी, पक्षियों का कलरव जन-जीवन को जिजीविषा का बोध कराता था तो वह यूँ लम्बी साँस लेता था, जैसे उसे नया जीवन मिला हो।
वह तुरंत एक पेड़ की ओट में हो गया और पशुपति की हरकतों पर नजर रखने लगा। दूर जंगल से कबाइलियों के नाचने-गाने की आवाजें आ रही थीं।
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मधुर

नाम - मधुर
पूरा नाम - ब्रह्मदेव 'मधुर'
मधुर के उपन्यास
1. लपटें
2. छैला (दो भाग)
3. चोट
उपन्यास 'छैला'  की कहानी में कुशवाहा कांत के चर्चित उपन्यास 'पराया' को आगे बढाया गया है।

ब्रह्मदेव 'मधुर' के विषय में किसी पाठक को कोई और जानकारी हो तो शेयर कीजिएगा।
Email- sahityadesh@gmail.com


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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...