यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की- 16
प्रस्तुति- योगेश मित्तल
मेरे द्वारा काम करने के बाद वो पुराना उपन्यास
इतना नया हो जाता था कि जिस किसी ने भी पहले पढ़ भी रखा हो, उसे पढ़ा-पढ़ा सा बेशक लगे, पर उसे आसानी से पता
नहीं चल सकता था कि यह उपन्यास कहाँ पढ़ा है। इसका कारण यह भी था, मुझसे काम करवाने के बाद सतीश जैन अक्सर अन्दर के कुछ पात्रों के नाम
स्वयं बदल देते थे या किसी से बदलवा देते थे और पुराना घिसा पिटा उपन्यास नया हो
जाता था।
एक तरह से यह पाठकों से चीटिंग थी और इस चीटिंग
में प्रकाशक का साथ देने वाला शख्स आपका अपना योगेश मित्तल था, जिसे कि प्रकाशक सबसे ईमानदार और सच्चा लेखक मानते थे और कहते भी थे।
पर तब मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। मुझे
ऐसा नहीं करना चाहिए।
मेरी सोच बस, यह थी कि मैं लेखक
हूँ और मुझे लिखने का जो भी काम मिल रहा है, करना चाहिए और
फिर मुझे अपनी बीमारी की वजह से हर समय पैसों की जरूरत रहती थी। दवाएँ और डाक्टरी
इलाज, उस समय की कमाई के हिसाब से बहुत मंहगा पड़ता था। मेरा
सोचना यह भी होता था कि मैं यदि घर खर्च के लिए घर के लोगों की बहुत मदद न भी
करवाऊँ, कम से कम अपनी बीमारी, अपने
इलाज के खर्च का बोझ तो घर पर न डालूँ।
सतीश जैन ने दूसरा जो उपन्यास मुझे दिया, वह विक्रान्त सीरीज़ का ही था।
मैंने दोनों लिफाफे थामते हुए पूछा - “कब तक चाहिये?”
“इस बार कोई जल्दी नहीं है।” - सतीश जैन बोले -”बेशक आप दिल्ली ले जाओ। जब
चक्कर लगे, तब दे जाना। स्पेशली आने की जरूरत नहीं है।”
यह मेरे लिए घोर अचरज़ की बात थी। सतीश जैन के लिए मैं जब से काम कर
रहा था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था।
“ठीक है, फिर मैं अभी चलूँ।”- मैंने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, लेकिन उठा नहीं।