लेबल

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

मैं आवारा, इक बनजारा- अशोक कुमार शर्मा, भाग- 01

नमस्ते पाठक मित्रो, 
साहित्य देश इस बार प्रस्तुत कर रहा है लोकप्रिय साहित्य के एक और सितारे अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा। पेशे से अध्यापक अशोक जी राजस्थान के सीकर जिले के निवासी हैं। इन्होने ट्रेड नेम से भी लिखा और स्वयं के नाम से भी उपन्यास प्रकाशित हुये हैं।

लेखक परिचय-
नाम-     अशोक कुमार शर्मा
मु. पो. -  रूपगढ़,
वाया   -  कौछोर,
जिला -   सीकर [ राज ]
मो. न. -  9928108646
                
    मैं आवारा, इक बंजारा- भाग-01
          मैं अत्यंत ही आभारी हूं हम सब लेखकों के अति प्रिय आदरणीय श्री गुरप्रीत सिंह जी का [लेक्चरर- माउंट आबू।। निवासी - बगीचा, जिला -  गंगानगर, राजस्थान ]
जिन्होंने मुझे अपने ब्लॉग  साहित्य देश पर अपने लेखकीय जीवन की यह छोटी सी एक आत्मकथा, जिसका कि शीर्षक है -
'मैं आवारा, इक बंजारा' लिखने का मौका दिया। शुक्रिया गुरप्रीत सिंह जी, आपका लाख - लाख शुक्रिया।

मेरी इस लेखकीय आत्मकथा को पढ़ने वाले पाठकों को मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि अपनी इस आत्मकथा में जो कुछ भी मैंने लिखा है, वो सब ऊपरवाले को हाजिर - नाजिर जानकर पूरा का पूरा सच लिखा है और सच के सिवा और कुछ भी नहीं लिखा है।  हां, पर स्मृति दोष के कारण इसकी कुछ घटनाओं के काल खंड में और कुछ व्यक्ति या स्थान के नामो में भूल हो सकती है, जिसके कारण मैं एडवांस में ही आप जैसे उदार हृदय बंधुओ से क्षमा मांग लेता हूं ।
तो अब चलिए दोस्तों !
मेरे साथ मेरे लेखन जीवन की शुरुआत के कुछ सुहाने और कुछ दर्द भरे सफर पर, जिसमें कुछ गम भी है, तो कुछ खुशियां भी। कुछ फूल भी है, तो कुछ कांटे भी। 
कुछ मुस्कुराहटें है, तो कुछ आंसू भी ।
अगर मेरी इस आत्मकथा में लिखे कुछ शब्दों और वाक्यों की वजह से किसी महानुभाव की भावनाओं को अगर जरा सी भी कोई ठेस पहुंचे, तो मेरी उनसे हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट है कि वे मुझे अपनी इस बेअदबी के लिए अपना छोटा भाई समझ कर तुरन्त मुझे माफ कर देना ।
तो आइए दोस्तो । अब चलते है मेरे जीवन की उन टेढ़ी - मेढ़ी, ऊंची - नीची, पथरीली, कंटीली और रेतीली राहों पर, जिनपर मैं कभी बिना थके और बिना किसी से शिकायत का एक लफ्ज़ भी कहे कभी रोता, तो कभी हंसता, तो कभी एक आवारा बंजारे की तरह मस्ती से बांसुरी या अलगोजे की धुन बजाता हुआ बिना अपने पैरो में चुभे हुए कांटो की परवाह किए, निरन्तर नंगे पांव आगे, और आगे, और फिर उससे भी और आगे चलता ही गया, बस । चलता ही गया..........।
बिना रुके !
बिना थके !
दर कूंचा $$$ !
दर मंजलां $$$!
उन अनजानी मंजिलों की ओर, जिनकी न तो मुझे दिशा ही
मालूम थी और न ही दूरी ।
इसीलिए मैंने अपनी इस लेखकीय आत्मकथा का नाम एक निष्पक्ष और एक तटस्थ दृष्टा बनकर दिया है -मैं आवारा, इक बंजारा। 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

वेदप्रकाश शर्मा- पुण्यतिथि

 लोकप्रिय साहित्य के सितारे वेदप्रकाश शर्मा जी पुण्यतिथि पर जयदेव चावरिया जी का एक विशेष आर्टिकल।

 10 जून, 1955 को मेरठ में जन्मे वेद प्रकाश शर्मा जी हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार थे। उनके पिता पं. मिश्रीलाल शर्मा मूलतः बुलंदशहर के रहने वाले थे। वेद सर की एक बहन और सात भाइयों में सबसे छोटे हैं। एक भाई और बहन को छोड़कर सबकी मृत्यु हो गई। 1962 में बड़े भाई की मौत हुई और उसी साल इतनी बारिश हुई कि किराए का मकान टूट गया। फिर एक बीमारी की वजह से पिता ने खाट पकड़ ली। घर में कोई कमाने वाला नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी मां पर आ गई। मां के संघर्ष से इन्हें लेखन की प्रेरणा मिली और फिर देखते ही देखते एक से बढ़कर एक उपन्यास लिखते चले गये। 

वेदप्रकाश शर्मा
वेदप्रकाश शर्मा
वेद सर का शुरुआती दौर काफी मुश्किलों से भरा हुआ था।जब वेद सर अपने पहले उपन्यास कि स्क्रिप्ट लेकर कई प्रकाशकों के चक्कर काटे पर कोई फायदा नहीं हुआ। सब प्रकाशक एक ही बात बोलते थे कि तुम्हारा उपन्यास किसी और के नाम से ही छाप सकते हैं वरना नहीं । लगभग ढाई साल प्रकाशकों के चक्कर काटने के बाद वेद सर ने कई उपन्यासों की स्क्रिप्ट लिख डाली। अंत में वेद सर ने सोचा मेरे नाम से ना सही पर पाठकों तक मेरी रचना तो पहुंचेगी। फिर वेद सर के शुरुआती उपन्यास कई प्रसिद्ध लेखकों के नाम से प्रकाशित हुए। वेद सर का पहला उपन्यास 'डायमंड किंग' लक्ष्मी पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। वेद सर के एक बाद एक सात उपन्यास प्रकाशित हुए । पाठक उनके द्वारा लिखे उपन्यास काफी पसंद कर रहे थे। पर हकीकत तो यह थी कि वह किसी अन्य लेखक के नाम से प्रकाशित हो रहे थे। वेद सर ने समाजिक उपन्यास भी लिखे जो  'राजेश' के नाम से प्रकाशित हुए । 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

संतोष आनंद

 नाम- संतोष आनंद

संतोष आनंद जी के एक उपन्यास के विषय में और उनके विषय में संक्षिप्त जानकारी मिली है।

संतोष आनंद के उपन्यास

1. टैरर(भय)- पारस पब्लिकेशन, मेरठ




रंजन

 नाम- रंजन

यह नाम मेरे लिए बिलकुल नया है। लेकिन नाम रोचक है। हालांकि इनके विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पायी है।

रंजन के उपन्यास

1. धूमकेतु

रंजन
रंजन


संतोष आनंद

शनिवार, 23 जनवरी 2021

6. साक्षात्कार- अनिल सलूजा

 सौ उपन्यासों का लेखक- अनिल सलूजा

ब्लॉग साहित्य देश साक्षात्कार की शृंखला में प्रसिद्ध उपन्यासकार अनिल सलूजा जी का साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहा है। अनिल सलूजा जी ने अपने पात्र बलराज गोगिया, रीमा राठौर, भेड़िया और अजय जोगी जैसे विशेष ख्याति अर्जित की है। 


1. अनिल जी साहित्य देश और पाठकवर्ग सबसे पहले आपका परिचय जानना चाहेगा, हालांकि पाठक आपको लेखक तौर पर जानते हैं लेकिन अपने प्रिय लेखक के जीवन से भी परिचय होना चाहते है।
अनिल सलूजा जी- मेरा जन्म 15 अप्रैल 1957 को हरियाणा के पानीपत में हुआ। मेरी शिक्षा भी यहीं हुयी है।
2. अपनी शिक्षा के बारे में कुछ बतायेंगे।

अनिल सलूजा जी- मैंने हायर सेकेंडरी के पश्चात ITI में रेडियो और टीवी मैकेनिक में डिप्लोमा किया है। और मेरी वर्तमान में शहर में रिपेरिंग की दुकान है।
3. आपका लेखन की तरफ रूझान कैसे हुआ?
अनिल सलूजा जी- मैं आठवी कक्षा में था। तब एक बार कहीं से वेदप्रकाश कांबोज जी का उपन्यास पढने को मिला, वह मुझे बहुत रोचक लगा। उसके बाद इधर-उधर से, किराये पर उपन्यास पढने आरम्भ कर दिया। फिर तात्कालिक लेखकों को पढा जैसे- ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश कांबोज जी, राजभारती है।

4. लेखन की तरफ कैसे आना हुआ?
अनिल सलूजा जी- पढने के साथ-साथ यह इच्छा भी बलवती होती गयी की इन लेखकों की तरह मेरी भी तस्वीर छपनी चाहिए।
कक्षा नौ वीं से ही लिखना आरंभ कर दिया था। मेरा पहला उपन्यास 'बेकसूर हत्यारा' मनोज पॉकेट बुक्स में ट्रेड नेम से प्रकाशित हुआ। यह सन् 1990 के लगभग की बात है।

5. आपके वास्तविक नाम से कब प्रकाशित हुआ?
अनिल सलूजा जी- सन् 1994-95 में मेरा प्रथम उपन्यास 'फंदा' प्रकाशित हुआ, यह बलराज गोगिया सीरीज का उपन्यास था। उसके बाद तो वास्तविक नाम से और ट्रेड नाम से यह सफर निरंतर चलता रहा।
6. आपने अब तक कितने उपन्यास लिखे हैं?
अनिल सलूजा जी- मेरे नाम अनिल सलूजा से सौ उपन्यास प्रकाशित हुये हैं और ट्रेड नेम से लगभग सवा दो सौ उपन्यास प्रकाशित हुये हैं।
7. आपने किस -किस नाम से और किस -किस प्रकाशन के‌ लिए ट्रेड नेम से लिखा है?
उपन्यासकार अनिल सलूजा जी
उपन्यासकार अनिल सलूजा जी
अनिल सलूजा जी- मेरी शुरुआत ही ट्रेड लेखन से हुयी है। उसके बाद तो मनोज पॉकेट बुक्स में, अर्जुन पण्डित, रवि और महेश नाम से लिखा, तुलसी पॉकेट बुक्स में प्रकाश पारासर नाम से लिखा है, रवि पॉकेट बुक्स में कबीर कोहली नाम से, शिवा पॉकेट बुक्स में शिवा पण्डित, धीरज पॉकेट बुक्स में केशव पण्डित और भी बहुत से नाम जैसे आशीर्वाद आदि से भी लिखा है।
8. आपके स्वयं के पात्र कौन-कौन से रहे हैं?
अनिल सलूजा जी- मेरे नाम से मेरा पात्र बलराज गोगिया सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ है। इसके अतिरिक्त रीमा राठौर, अजय जोगी, भेड़िया।
  अजय जोगी के तीन-चार उपन्यास हैं। भेडिया के सात-आठ उपन्यास हैं।
9. अजय जोगी काफी चर्चित पात्र रहा लेकिन आपने उस आगे नहीं बढाया, इसकी कोई विशेष वजह?
अनिल सलूजा जी- मैं‌ शिवा पॉकेट बुक्स के लिए शिवा पण्डित भी लिखता था जिसका पात्र अर्जुन त्यागी काफी चर्चित था। वहीं से कुछ मित्रों ने सलाह दी की आपका पात्र तो खूब चर्चित है लेकिन आपका नाम कहीं भी नहीं। तब मैंने अपने नाम अनिल सलूजा के नाम से अजय जोगी आरम्भ किया, जो की एक स्मैकिया और धोखेबाज किस्म का व्यक्ति था।
   जब शिवा पण्डित ट्रेड नेम रवि पॉकेट बुक्स वालों‌ के पास आया तो मनेष जी (रवि पॉकेट बुक्स के मालिक) की सलाह पर मैंने अजय जोगी को छोड़ कर अर्जुन त्यागी पर ही ध्यान केन्द्रित किया।
10. तात्कालिक किन लेखकों से आपका संपर्क रहा है?
अनिल सलूजा जी- मैं रिजर्व किस्म का व्यक्ति रहा हूँ। मेरा बाहरी संपर्क कम रहा है। फिर भी प्रकाशक के यहाँ या अन्य कार्यक्रमों में अक्सर लेखक मित्रों से मुलाकात हो जाती थी। इनमें से राज भारती जी, अनिल मोहन जी और योगेश मित्तल जी से मेरा विशेष संपर्क रहा है।
अनिल सलूजा जी इस विशेष साक्षात्कार के लिए साहित्य देश टीम आपका हार्दिक आभार व्यक्त करती है।

शनिवार, 2 जनवरी 2021

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

उपन्यास जगत : सुनहरे दौर की एक झलकी - राम पुजारी

            “जासूस शब्द सुनते ही दो नाम मस्तिष्क की दीवारों पर उभरते हैं पहला शरलक होम्स और दूसरा इसके रचियता सर आर्थर कानन डॉयल । 221 B, बेकर स्ट्रीट में रहने वाला शरलक वह जासूस है जो अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर अनुमान लगाता है, तर्क करता है और फिर निष्कर्ष पर पहुँचता है और अंत में अपराधियों का पता लगा लेता है ।”

            हिन्दी भाषा में जासूस के लिए गुप्तचर शब्द का इस्तेमाल किया जाता था बाद में इसकी जगह जासूस शब्द प्रचलित होता चला गया । आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव और संचालन के लिए गुप्तचरों के एक ऐसे तंत्र की रचना की जोकि अभेद्य थी । उस काल खंड से लेकर आज के आधुनिक काल तक प्रशासन की सफलता गुप्तचरों अथवा जासूसों पर ही निर्भर रहती है । पुलिस विभाग में जब कोई व्यक्ति एक रकम के एवज में कोई सूचना या इन्फोर्मेशन देता है तो उसे इन्फोर्मर कहा जाता है । 

वार्ष्णय टाइम्स, दिसंबर 2020
वार्ष्णय टाइम्स, दिसम्बर2020
           विश्व युद्ध के दौरान जासूसों की देशभक्ति और जांबाजी के कई किस्से अखबारों और पत्रिकाओं के द्वारा लोकप्रिय होते चले गए । ये वो दौर था जब युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक देश दूसरे देश में अपने जासूसों के जाल को बेहद गुप्त रूप से बुनता था और जरूरी सूचनाएँ हासिल करने में लगा रहता था । 

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

नये उपन्यास 2020

अंबर राजु

 नाम- अम्बर राजु

मूल नाम- हादी हसन

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में Ghost लेखन और उपनाम नाम का भी एक दौर रहा है।

  इस दौर में कुछ प्रतिभावान लेखक भी हुये जिन्हें स्वयं के नाम से कभी प्रकाशित होने का मौका न मिला लेकिन अन्य नाम और अपनी तस्वीर के साथ अवश्य प्रकाशित हुये। 

ऐसा ही एक नाम है अम्बर राजु। अम्बर राजु जी का वास्तविक नाम हादी हसन है लेकिन कभी इनका कोई उपन्यास वास्तविक नाम से प्रकाशित न हुआ। हां कुछ उपन्यासों पर इनकी तस्वीर अवश्य आयी पर लेखक की जगह कोई अन्य नाम प्रयुक्त हुआ। यां यू कहें की हादी हसन जी द्वितीय नाम अम्बर राजु जी के नाम से लेखन करते रहे।

अम्बर राजु के उपन्यास

1. सौतन बनी सुहागन (गंगा पॉकेट बुक्स)


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

मेरे लेखन की शुरुआत- अनुराग कुमार जीनियस

मेरे लेखन जीवन की शुरुआत- अनुराग कुमार जीनियस
   साहित्य देश ब्लॉग हमेशा कुछ नया करने का प्रयास करता है। इसी क्रम में हमने लेखकों के प्रथम उपन्यास के संदर्भ में उनके रोचक वर्णन यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। 
   इस स्तंभ के प्रथम चरण में पढें लोकप्रिय साहित्य के सितारे अनुराग कुमार जीनियस के अनुभव।


मुझे बचपन से ही पढ़ने का बेहद शौक रहा। घर पर उस समय खूब किताबें आती थी। किताबों का एक जमाना था। बच्चों की कहानियों की किताबों के साथ साथ उपन्यास भी खूब आते थे। चंपक, नंदन, बालहंस, मोगली की कहानी और ढेर सारी कॉमिक्स जिनमें लाल बुझक्कड़, नागराज, चाचा चौधरी आदि की संख्या ज्यादा होती थी। पत्रिकाओं में सरस सलिल, सरिता, हंस, इंडिया टूडे आदि पत्रिकाएं भी बहुत आती थी। उस समय मैंने बहुत सारे उपन्यासकारों को पढ़ा जिनमें प्रमुख थे वेद प्रकाश शर्मा जी, सुरेंद्र मोहन पाठक जी, रानू, अनिल मोहन जी, मनोज, रीमा भारती, दिनेश ठाकुर, परशुराम शर्मा जी, प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, कमलेश्वर स्वयं प्रकाश आदि। वेद प्रकाश शर्मा सुरेंद्र मोहन पाठक अनिल मोहन जी से मैं बहुत ज्यादा प्रभावित रहा।
पढ़ने का सिलसिला यूं ही चलता रहा।
    कक्षा 9 में आते ही मुझे लगा कि मुझे भी कुछ लिखना चाहिए। क्योंकि उस समय नाॅवल ज्यादा पढ़ता था नॉवल से ही शुरुआत की। एक नाॅवल पढा, नॉवेल का नाम था बदला। पर शीघ्र ही मन उचट गया। कई बार कोशिश की पर उसे कभी पूरा नहीं कर पाया। कुछ दिनों बाद फिर से दिल में तरंग उठी लिखने की तो इस बार कहानी पर हाथ आजमाया और उसे पूरा भी किया। इसके बाद कई छोटी-बड़ी कहानियां लिखी। इंटर के बाद फिर से उपन्यास लिखने का ख्याल आया। इस बार मैंने पहले से ही तय कर लिया था कि नॉवेल पूरा जरूर करूंगा। और इस बार मैंने जो नॉवेल शुरू किया उसका नाम था अनोखा कातिल जिसे मैंने पूरा भी किया। फिर मन में एक विश्वास आ गया कि मैं नाॅवल पूरा लिख सकता हूँ। इसीलिए फिर मैं नॉवेल लिखने लगा और उसे पूरा भी करता था। 

Featured Post

मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...