साहित्य देश इस बार प्रस्तुत कर रहा है लोकप्रिय साहित्य के एक और सितारे अशोक कुमार शर्मा जी की आत्मकथा। पेशे से अध्यापक अशोक जी राजस्थान के सीकर जिले के निवासी हैं। इन्होने ट्रेड नेम से भी लिखा और स्वयं के नाम से भी उपन्यास प्रकाशित हुये हैं।
लेखक परिचय-
नाम- अशोक कुमार शर्मा
मु. पो. - रूपगढ़,
वाया - कौछोर,
जिला - सीकर [ राज ]
मो. न. - 9928108646
मैं आवारा, इक बंजारा- भाग-01
जिन्होंने मुझे अपने ब्लॉग साहित्य देश पर अपने लेखकीय जीवन की यह छोटी सी एक आत्मकथा, जिसका कि शीर्षक है -
'मैं आवारा, इक बंजारा' लिखने का मौका दिया। शुक्रिया गुरप्रीत सिंह जी, आपका लाख - लाख शुक्रिया।
मेरी इस लेखकीय आत्मकथा को पढ़ने वाले पाठकों को मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि अपनी इस आत्मकथा में जो कुछ भी मैंने लिखा है, वो सब ऊपरवाले को हाजिर - नाजिर जानकर पूरा का पूरा सच लिखा है और सच के सिवा और कुछ भी नहीं लिखा है। हां, पर स्मृति दोष के कारण इसकी कुछ घटनाओं के काल खंड में और कुछ व्यक्ति या स्थान के नामो में भूल हो सकती है, जिसके कारण मैं एडवांस में ही आप जैसे उदार हृदय बंधुओ से क्षमा मांग लेता हूं ।
तो अब चलिए दोस्तों !
मेरे साथ मेरे लेखन जीवन की शुरुआत के कुछ सुहाने और कुछ दर्द भरे सफर पर, जिसमें कुछ गम भी है, तो कुछ खुशियां भी। कुछ फूल भी है, तो कुछ कांटे भी।
कुछ मुस्कुराहटें है, तो कुछ आंसू भी ।
अगर मेरी इस आत्मकथा में लिखे कुछ शब्दों और वाक्यों की वजह से किसी महानुभाव की भावनाओं को अगर जरा सी भी कोई ठेस पहुंचे, तो मेरी उनसे हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट है कि वे मुझे अपनी इस बेअदबी के लिए अपना छोटा भाई समझ कर तुरन्त मुझे माफ कर देना ।
तो आइए दोस्तो । अब चलते है मेरे जीवन की उन टेढ़ी - मेढ़ी, ऊंची - नीची, पथरीली, कंटीली और रेतीली राहों पर, जिनपर मैं कभी बिना थके और बिना किसी से शिकायत का एक लफ्ज़ भी कहे कभी रोता, तो कभी हंसता, तो कभी एक आवारा बंजारे की तरह मस्ती से बांसुरी या अलगोजे की धुन बजाता हुआ बिना अपने पैरो में चुभे हुए कांटो की परवाह किए, निरन्तर नंगे पांव आगे, और आगे, और फिर उससे भी और आगे चलता ही गया, बस । चलता ही गया..........।
बिना रुके !
बिना थके !
दर कूंचा $$$ !
दर मंजलां $$$!
उन अनजानी मंजिलों की ओर, जिनकी न तो मुझे दिशा ही
मालूम थी और न ही दूरी ।
इसीलिए मैंने अपनी इस लेखकीय आत्मकथा का नाम एक निष्पक्ष और एक तटस्थ दृष्टा बनकर दिया है -मैं आवारा, इक बंजारा।







