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बुधवार, 9 सितंबर 2020

मौत का तांडव- संतोष पाठक

मौत का तांडव- संतोष पाठक
नये उपन्यास 'मौत का तांडव' का कुछ अंश...
अश्विन पण्डित सीरीज

कोहिमा में चांग और उसकी फौज से टकराने के बाद - या फिर यूं कह लें कि अपनी जान गंवाने से बाल बाल बचा - अश्विन पंडित आखिरकार सकुशल बेगूसराय पहुंचने में कामयाब हो गया। ये अलग बात थी कि लीना रेंगमा उसके साथ जोंक की तरह चिपकी हुई थी, आत्महत्या करने पर उतारू लीना ने उसकी हालत सांप छछूंदर वाली बना कर छोड़ी थी, लिहाजा न उगलते बनता था ना निगलते बनता था। लीना को मरता वह देख नहीं सकता था और उसकी जान बचाने की खातिर उसे साथ लिये लिये फिरना उसे मंजूर नहीं था। आखिरकार इस समझौते के तहत वह लीना को अपने साथ ले आया कि कुछ रोज वहां रहने के बाद लीना गुवाहाटी वापिस लौट जायेगी। 

          वैसा सोचते वक्त अश्विन को सपने में भी ख्याल नहीं आया था कि बेगूसराय में एक नया चांग - उसकी लाश गिराने को दृढ़ प्रतिज्ञ बैठा - उसका इंतजार कर रहा था। ऐसे में ना चाहते हुए भी लीना की भूमिका ‘मौत का तांडव‘ में अहम हो उठी। फिर शुरू हुआ घात-प्रतिघात का कभी ना खत्म होने वाला ऐसा खेल जिसने बेगूसराय की धरती को रक्तरंजित कर के रख दिया। 

बुधवार, 4 सितंबर 2019

साहित्य प्रचार में पाठक का योगदान

साहित्य प्रचार- प्रसार में आपका योगदान - संतोष पाठक
    साहित्य के प्रचार-प्रसार में एक पाठक का क्या योगदान होना चाहिए। इसके क्या अर्थ हैं। इसी विषय पर उपन्यासकार संतोष पाठक जी का एक आलेख प्रस्तुत है।

कुछ कहना चाहता हूं।
आज के लेखन और लेखकों के संदर्भ में, आज के प्रकाशकों के संदर्भ में। वैंटीलेटर पर कृतिम ढंग से सांस लेते मनोरंजक साहित्य के संदर्भ में।
   ये तीनों ही बड़ी कठिनता से - आपस में सामंजस्य बैठाने की मुश्किल कोशिश करते हुए - घिसट-घिसट कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
  उक्त हालात के लिए कौन जिम्मेदार है और कौन नहीं, फिलहाल यह मेरा मुद्दा नहीं है।
       मैं बात करना चाहता हूं, लेखक, प्रकाशक और उनके सामंजस्य से छपकर सामने आ रहीं, आने वाली रचनाओं की। उन किताबों की जिनकी कुछ हजार प्रतियां छापकर, उनमें से कुछ सौ प्रतियां बेचकर प्रकाशक चैन की सांस लेता है कि चलो पब्लिशिंग का खर्चा तो निकला। दूसरी तरफ लेखक उस किताब को सोशल मीडिया पर डालकर, हजारों लोगों में से कुछ की प्रशंसा और कुछ पाठकों की आलोचना झेलकर ये सोचकर अपने को तसल्ली दे लेता है कि चलो, किताब छपकर मार्केट में आई तो सही।
सवाल ये है कि इससे हासिल क्या हुआ?
लेखक ने राॅयल्टी नहीं कमाई, प्रकाशक ने ऊंचे दाम पर किताब बेचकर भी बस प्रकाशन का खर्चा भर वसूल लिया। लेखक को लेखक कहलाने का गौरव - जो कि अधिकतर मामलों में बस मुंहदेखी बात होती है - हासिल हुआ। प्रकाशक को प्रकाशक कहलाने का गौरव - जो वास्तव में किसी गिनती में नहीं आता - हासिल हुआ।
चेहरे पर दिखावे की मुस्कान और बेस्ट सेलर होने का दावा, किताब के आउट आॅफ स्टाॅक तो जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हो - भले ही वह किताब पांच सौ ही छापी गई हो - सोशल मीडिया पर प्रमुखता से प्रचारित होने लगता है।
         वह भी ऐसे ऐसे ग्रुप में जहां हर पाठक अपने आप में एक लेखक है लिहाजा किताब का पोस्टमार्टम शुरू हो जाता है। इसके विपरीत 'तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा' की तर्ज पर वाहवाही भी मिलती है। नतीजा ये होता है कि एक अच्छी किताब पाठकों तक पहुंचने से पहले ही अपना वजूद खो देती है। इसके विपरीत ऐसी किताब जिसके आपको पांच पन्ने भी पढ़ना गवारा न हो कुछ नये पाठकों के हाथों तक पहुंच जाती है।
नतीजा फिर भी वही रहता है ढाक के तीन पात।
और हम क्या करते हैं?
भसड़ फैलाने वाली पोस्ट को शेयर कर के दुनिया भर में फैला देते हैं। राजनीति पर ऐसे ऐसे कमेंट करते हैं कि हमारे नेताओं ने अगरी बेशरमी में डिप्लोमा ना कर रखा हो तो अब तक जाने कितने सुसाईड कर चुके होते।
       संप्रदायिकता की भावनाओं को भड़काने वाले पोस्ट को लाईक करते हैं, कमेंट करते हैं, शेयर करते हैं। पोस्ट किसी खूबसूरत दिखने वाली मोहतरमा की हो तो उनकी छींक की खबर पर भी पूछ बैठते हैं कि डाॅक्टर को दिखाया या नहीं, या फिर हकीम लुकमान बनकर दो चार सलाह दे डालते हैं।
मगर एक बार भी हम वहां दिखाई दे रही किसी पुस्तक को या उसके रीव्यू को शेयर करने की जहमत नहीं उठाते। कहीं हमारे ऐसा करने से किताब की सेल ना बढ़ जाय। अरे भाई किताब नहीं पढ़ी कोई बात नहीं, अच्छी नहीं लगी कोई बात नहीं, बहुत अच्छी लगी तो भी कोई बात नहीं मगर सामने दिखाई दे रही किताब को शेयर कर देंगे तो हमारे पाॅकेट से क्या गया। कुछ और लोग किताब के बारे में जान जायेंगे हो सकता है उन हजार लोगों में से कोई एक किताब खरीद भी ले। हमारा क्या गया? सिवाय इसके कि हमारेे इस किंचित प्रयास से अमुक किताब की एक प्रति ज्यादा बिक गई।
          हम किताब पढ़ते हैं, अच्छी लगे तो हम सैकड़ों लोगों में से एक उसके बारे में दो लाईन लिख देता है। बुरी लगे तो लेखक को बुरा ना लगे इस भावना के तहत अधिकतर लोग किताब के बारे में कुछ नहीं लिखते।
         जबकि जरूरत दोनों ही बातों की है। ईमानदारी पूर्वक की गई हमारी समीक्षा हमेशा लेखन को बढ़ावा देती है, लेखक को और अच्छा लिखने की प्रेरणा देती है, भले ही किताब की बुराई सुनकर थोड़ी देर के लिए उसका मन खिन्न हो जाए।
इसलिए सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर किताब को शेयर करें। भले ही उसका लेखक हमारे संपर्क में हो या न हो! हम उसे व्यक्तिगत तौर पर जानते हों या नहीं जानते हों।
आइए मिलकर मनोरंजक साहित्य को फिर से बुलंदियों पर पहुंचाने की कवायद में जुट जाएं।
लेखक का फायदा - किताबें ज्यादा बिकेंगी तो राॅयल्टी ज्यादा मिलेगी। वह ज्यादा मेहनत से अपने लेखन कार्य को अंजाम दे सकेगा।
प्रकाशक का फायदा - किताबें ज्यादा बिकेंगी तो वह ज्यादा कमाई करेगा और पुस्तक का मूल्य कम करने में कामयाब होगा। आज दो सौ बीस में बिकने वाली किताबें कल डेढ़ सौ, एक सौ तीस में मिलने लगेंगी।
पाठक का फायदा - पढ़ने के लिए कम पैसे खरचने पड़ेंगे। आज जिस मूल्य में एक किताब खरीदते हैं हो सकता है कल को उसी कीमत में उसी स्तर की दो किताबें हासिल हो जायं।

प्रस्तुति- संतोष पाठक
लेखक- संतोष पाठक
फेसबुक की मूल पोस्ट

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

तीन लेखक

उपन्यास जगत के लेखक त्रय एक साथ।
 वेदप्रकाश कांबोज जी के घर पर।
बायें से- संतोष पाठक जी,वेदप्रकाश कांबोज जी,एम. इकराम फरीदी जी


शनिवार, 10 नवंबर 2018

आदर्श -मनोरंजन साहित्य- संतोष पाठक

आदर्श साहित्य बनाम मनोरंजक साहित्य - संतोष पाठक

मेरा निजी ख्याल है कि मुख्यधारा के साहित्य और लुग्दी साहित्य को ‘आदर्श साहित्य‘ और ‘मनोरंजक साहित्य‘ के नाम से जाना जाना चाहिए। उक्त दोनों नाम ऐसे हैं जो दोनों को तत्काल अलग अलग कर देने में पूरी तरह सक्षम हैं।
              इससे दोनों की अपनी निजी पहचान कायम होती है, जो कि उनके बारे में बात करते वक्त सहज ही समझ में आ जाती है कि बात आखिर हो किसकी रही है।
वैसे भी अब लुग्दी, लुग्दी ना रहा, वो तो इम्पोर्टेड पेपर पर छपने लगा है, फिर क्यों हम आज भी उसे लुग्दी के नाम से ही संबोधित करते रहें।
                  अब मैं मुख्य मुद्दे पर आता हूं। किसने क्या पढ़ा और किसने क्या नहीं पढ़ा! किसे कौन सा लेखक पसंद है और किसे कौन सा लेखक पढ़ने के काबिल ही नहीं लगता! ये बात कोई मायने नहीं रखती इसलिए इसे बहस का मुद्दा बनाना ही बेकार है।
                     अब बात आती है आदर्श साहित्य का आज के दौर में कम पाॅपुलर होना, तो जनाब जरा सोचकर देखिए, एक बच्चा जिसे प्ले स्कूल में ही क से कबूतर की बजाय ए फाॅर एप्पल का ज्ञान दिया जाने लगता है, वो क्या जीवन में कभी कंकाल, कामायनी, आधा गांव, धरती धन न अपना, से लेकर आज के दौर में शह और मात, एक इंच मुस्कान, फिजिक्स कैमेस्ट्री और अलजबरा, आवान इत्यादि किताबों के साथ जुड़ पायेगा। जुड़ेगा तो कैसे जुड़ेगा? सच्चाई तो ये है कि इन या इनके जैसी हजारों की तादात में लिखी जा चुकी रचनायें उसके सिर के ऊपर से गुजर जायेगी। इसलिए गुजर जायेगी क्योंकि उसे पढ़ने के हिंदी का जो ज्ञान अनिवार्य है उससे वो वंचित होगा। मैंने जब फिजिक्स कैमेस्ट्री और अलजबरा नामक कहानी पढ़ी थी तो उसके मर्म तक पहुंचने के लिए उसे तीन बार पढ़नी पड़ी थी जबकि मैं उस दौर में हिंदी साहित्य से ना सिर्फ एमए कर रहा था बल्कि हिंदी अकादमी द्वारा उत्कृष्ट कथा लेखन के सम्मानित किया जा चुका था। तीन बार इसलिए पढ़ी क्योंकि मेरे मन में कहीं ना कहीं ये बात जरूर थी ‘हंस‘ जैसी पत्रिका में छपी कोई कहानी निरउद्देश्य हरगिज भी नहीं हो सकती थी। यही हाल राजेंद्र यादव जी के शह और मात के साथ हुआ।
कहने का तात्पर्य ये कोई कहानी या पुस्तक सिर्फ इसलिए हेय नहीं हो जाती क्योंकि वो हमारी समझ से बाहर है, उल्टा ये उसकी उत्कृष्टता को दर्शाता है। जाहिर सी बात है एक पीएचडी कर चुका लेखक जब कुछ लिखेगा तो उसकी बातों के मर्म तक पहुंचने के लिए हमें कम से कम एमए की उपाधि तो हासिल होनी ही चाहिए। यही वजह है कि आदर्श साहित्य की कई एक पंक्तियां ऐसी निकल आती हैं जिनका अर्थ तलाशने की कोशिश में कई कई पन्ने भर दिये जाते हैं।
                  आदर्श साहित्य भाषा के साथ-साथ, समाज को उन्नति प्रदान करता है। वो समाज की कुरीतियों उसकी खमियों के विरूद्ध आवाज बुलंद करता है। वो लगातार समाज को एक नई दिशा देने की कोशिश में लगा रहता है। वो ठीक वैसी ही जिम्मेदारी निभाता है जैसा बाॅर्डर पर खड़ा एक सैनिक निभाता है। बस दोनों का कार्यक्षेत्र अलग होता है दोनों अपने अपने स्तर पर अपने कर्म को अंजाम देते हैं।
ऐसे में मनोरंजक साहित्य को उसकी तुलना में खड़ा कर देना क्या सूरज को मोमबत्ती से कंपेयर करने जैसा नहीं होगा।
               सच्चाई यही है कि मनोरंजक साहित्य लेखक को समृद्ध कर सकता है, पाठक को चार-पांच घंटे का मनोरंजन प्रदान कर सकता है। वो भाषा के सैकड़ों नये पाठक पैदा कर सकता है, मगर सामाजिक स्तर पर उसका योगदान नागण्य ही होता है।  ऐसा ही फिल्मों के साथ होता है। जरा परेश रावल जी की फिल्म रोड टू संगम देखिए और फिर आक्रोश देखिए। फिर हेरा फेरी देखिए, दोनों में आपको आदर्श साहित्य और मनोरंजक साहित्य जैसा ही अंतर देखने को मिलेगा। बीच में कुछ फिल्में ओ माई गाॅड जैसी भी आ जाती हैं, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ एक खास उद्देश लिए हुए होती हैं।  हो सकता है हममें से कुछ लोगों ने ‘रोड टू संगम‘ देखा भी ना हो, या घर पर देखते वक्त बीच में ही छोड़ दिया हो। मगर इसका मतलब ये हरगिज भी नहीं है कि फिल्म अच्छी नहीं थी! हां कमाई के लिहाज से फिल्म निचले पायदान पर ही रही और उसने रहना भी था।
अगर हम ये समझते हैं कि आदर्श साहित्य का कोई लेखक मनोरंजक साहित्य नहीं लिख सकता इसलिए वो आदर्श साहित्य से पल्ला नहीं झाड़ पाता तो इससे बढ़कर कोई अहमकाना बात हो ही नहीं सकती।
अंत में सिर्फ इतना कहूंगा कि आदर्श साहित्य के सामने मनोरंजक साहित्य उद्देश के मामले में सूरज के आगे दीपक जैसा ही है।
                      बहरहाल ये मेरी निजी सोच है, इससे आप सभी महानुभावों में से किसी एक का भी सहमत होना कतई जरूरी नहीं है। क्योंकि हर पाठक के पास एक अलग किस्म का तराजू होता है जिसपर वो किसी रचना या उसके लेखक को तौलता है, तौलकर उससे हासिल का अंदाजा लगाता है और ये फैसला करता है कि भविष्य में उसे उक्त लेखक की किसी रचना को पढ़ना है या नहीं पढ़ना।
बावजूद उपरोक्त बातों के मुझे ये स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं कि क्राइम फिक्शन मेरा पसंदीदा विषय है। पढ़ने के लिए भी और लिखने के लिए भी।
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लेखक- संतोष पाठक
संतोष जी मूलतः उपन्यासकार हैं। इनके कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।
संतोष पाठक जी के संबंध में जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें। संतोष पाठक

संतोष पाठक


गुरुवार, 3 अगस्त 2017

संतोष पाठक







लेखक-परिचय


नाम- संतोष पाठक
जन्म- 19 जुलाई 1978
माता- श्री मति उर्मिला पाठक
पिता- श्री ओमप्रकाश पाठक
दादा-  श्री ऋषि मुनि पाठक






लेखक संतोष पाठक का जन्म 19 जुलाई 1978 को, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में बेटाबर खूर्द गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके दादा जी स्व. श्री ऋषि मुनी पाठक, बेहद नामचीन शख्सियत थे। जिन्होंने सेना में अपनी अधिकारिक नौकरी के दौरान ढेरों मैडल हासिल किए थे। लेखक ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव से पूरी की जिसके बाद वर्ष 1987 में आप अपने पिता श्री ओमप्रकाश पाठक और माता श्रीमति उर्मिला पाठक के साथ दिल्ली चले गये। जहां से आपने उच्च शिक्षा हासिल की। आपकी पहली रचना वर्ष 1998 में मशहूर हिन्दी अखबार नवभारत टाईम्स में प्रकाशित हुई, जिसके बाद आपने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2004 में आपको हिन्दी अकादमी द्वारा उत्कृष्ट लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया। आपने सच्चे किस्से, सस्पेंस कहानियां, मनोरम कहानियां इत्यादि पत्रिकाओं तथा शैक्षिक किताबों का सालों तक सम्पादन किया है। आपने हिन्दी अखबारों के लिए न्यूज रिपोर्टिंग करने के अलावा सैकड़ों की तादाद में सत्यकथाएं, फिक्शन, कहानी संग्रह तथा उपन्यास लिखे हैं।

मनोहर कहानियां, सस्पेंश कहानियाँ जैसी पत्रिकाओं के संपादक रहे संतोष पाठक ने उपन्यास क्षेत्र में भी हाथ आजमाया था।
इनके उपन्यास जासूसी, सस्पेंश व रोमांच से भरपूर हैं।
संतोष पाठक के उपन्यास
1. अनदेखा खतरा
2. आखिरी शिकार
3. कत्ल की पहेली
4. दस जून की रात
संपर्क
Email- skpathaknovel@gmail.com
Mob No.- 8800501416

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