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बुधवार, 9 अगस्त 2023

मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - योगेश मित्तल

 मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - योगेश मित्तल

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आदरणीय सुबोध भारतीय जी ने विगत दिनों में मेरी दो किताबें *प्रेत लेखन और वेद प्रकाश शर्मा - यादें बातें और अनकहे किस्से*, क्या छापी, एक मुर्दा लेखक ज़िन्दा हो गया. एक जमाने में मुझे दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद, कलकत्ता, बम्बई बनारस के अधिकांश प्रकाशक जानते थे. वे सभी भी - जिन्होंने कभी मेरी एक लाइन भी नहीं छापी. लेकिन पाठकों में मेरी कोई पहचान नहीं थी. आज लोग मुझे बहुत अच्छी तरह पहचान रहे हैं तो इसका सबसे अधिक श्रेय नीलम जासूस कार्यालय से मेरी पुस्तकें प्रकाशित करने वाले माननीय सुबोध भारतीय जी को जाता है. 

        मेरे बारे में जब भी कहीं कोई जिक्र आयेगा, डंके की चोट यह कहा जायेगा कि सुबोध भारतीय जी ने मुर्दा योगेश मित्तल को एक बार फिर ज़िन्दा कर दिया.
लेकिन अब मेरे पास बहुत सारे फोन आ रहे हैं कि जब मैं इतना अच्छा लिखता रहा हूँ तो पहले क्यों नहीं मशहूर हुआ.
मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ - इसके अनेक कारण हैं, जिसमें एक मुझे हर समय पैसों की जरूरत रहती थी और घोस्ट राइटिंग में, दूसरों के लिए लिखने के लिए अधिक पैसे मिलते थे और जल्दी मिलते थे, बल्कि एडवांस भी मिल जाते थे. मैंने अपने जीवन में सौ से ज्यादा लेखकों या यूँ कहें नामों के लिए लिखा है, घोस्ट राइटिंग की है, लेकिन यह मैं साबित नहीं कर सकता.
और तो और मैने अपनी कालोनी के स्कूली बच्चों के लिए भी कविताएँ व लेख लिखकर दिये हैं और उनके पैरेन्ट्स से अच्छे पैसे भी लिये हैं.
लेकिन मेरे मशहूर न होने का कारण सिर्फ यही नहीं है कि मैंने पैसों के लालच में हमेशा घोस्ट राइटिंग की (प्रेत लेखन किया). 
एक कारण और सबसे बड़ा कारण मेरा बचपन से सिर्फ आठ साल की उम्र से अस्थमा का रेगुलर 365 दिन का मरीज होना भी था. 
अस्थमा को ठीक करने के लिए मैंने होमियोपैथी, आयुर्वेद, प्राकृतिक सभी तरीके आजमाये, लेकिन एलोपैथी के अलावा कहीं आराम नहीं मिला.
मेरे एक मित्र हरिओम सिंघल ( उपन्यासकार सचिन) ने तो एक बार कमर कस ली थी कि तुझे अस्थमा से छुटकारा दिला कर रहूँगा और उन दिनों मेरे लिए उसने न जाने कितना खर्चा भी किया. ऐसे दोस्त बहुत कम लोगों को मिलते हैं.
और इसके अलावा एक कारण और भी प्रमुख कारण शायद मेरा इमोशनल होना भी रहा है.
दरअसल मैं बचपन से ही जरूरत से ज्यादा इमोशनल हूँ ( शायद मूर्खता की हद तक). और मेरे बारे में यह निष्कर्ष मेरा अपना नहीं है. समय समय पर ऐसे ही शब्द मेरे बहुत से मित्रों बिमल चटर्जी, अशीत चटर्जी, देवेन्द्र रस्तोगी ( साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सह सम्पादकों में से एक), कुमारप्रिय, यशपाल वालिया, राज भारती, आदि अनेक लोगों ने कहे थे. लेकिन सबसे अच्छी तरह मुझे यह बात नूतन पाकेट बुक्स, सूर्या पाकेट बुक्स और माया पाकेट बुक्स के जन्मदाता आदरणीय सुमत प्रसाद जैन ने समझाई थी और उम्र के उस पड़ाव पर समझाई थी कि उस समय मैं खुद को बदल पाता तो शायद नाम और पैसा बहुत पहले कमा लेता.
           बात 1973 की है. तब मैं उम्र के लिहाज़ से पूरी तरह बालिग भी नहीं हुआ था, तब मेरा मेरठ आना जाना आरम्भ हो चुका था और मेरठ में ईश्वरपुरी तब प्रकाशकों का मुख्य गढ़ था, वहाँ अधिक समय बीतता था. कुछ समय छीपी बाड़ा में ओरियन्टल पाकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन के यहाँ बीतता था, जो कि मेरठ के प्रकाशन जगत में "मामा" के नाम से जाने जाते थे. (उनके बारे में आप सुबोध भारतीय जी द्वारा नीलम जासूस कार्यालय से प्रकाशित मेरी पुस्तक "वेदप्रकाश शर्मा : यादें, बातें और अनकहे किस्से में भी पढ़ चुके होंगे. तब वह लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के सर्वेसर्वा थे) 
एक दिन मैंने ईश्वरपुरी में प्रवेश ही किया ही था कि एक आवाज़ आई, " ओ लड़के...!"
हाँ, मेरठ के जैन भाइयों में से एक बड़े भाई आदरणीय सलेकचन्द जैन जी द्वारा पहली पहली बार मुझे ऐसे ही पुकारा गया था, किन्तु उस समय तक मैं ऐसी स्थिति में पहुँच चुका था कि अपने लिए 'लड़के' शब्द कहा जाना मेरी कल्पना में भी नहीं था. मैंने पलटकर भी नहीं देखा. आवाज़ दोबारा आई, "ओ लड़के, सुन तो... इधर देख...!"
और इस बार मैंने पलटकर देख ही लिया तो एक जेब वाली सफेद सेन्डो कट बनियान और चकाचक सफेद धोती में चश्माधारी सलेकचन्द दूर खड़े थे.
मुझे अपनी ओर आने का संकेत करते हुए बोले, "हाँ, तुझी से कह रहा हूँ... इधर आ...!"
          गली में मेरे आगे और कोई नहीं था. मेरे लिए समझना कठिन नहीं था कि सलेकचन्द जी मुझे ही बुला रहे थे.
        सलेकचन्द जी ने मुझे बुलाया और बीच की बातों का विवरण फिर कभी दूंगा, फिलहाल संक्षेप में यह कहूँगा कि उन्होंने मुझे मेरे नये उपनाम "प्रणय" के नाम से छापने का प्रपोजल दिया और मैने स्वीकार कर लिया. उपन्यास के बैक कवर पर मेरी लेटेस्ट फोटो भी दी जायेगी, यह भी तय हुआ.
मेरे पहले उपन्यास का नाम “पापी” सेलेक्ट हुआ और सलेकचन्द जी ने कहा, "एक अच्छी सी फोटो खिंचवाकर कृष्णानगर, दिल्ली के मशहूर बुक कवर आर्टिस्ट इन्द्र भारती तक पहुँचा दूं.
उन दिनों कलर फोटोग्राफी प्रचलन में नहीं आई थी. मैने गांधीनगर, दिल्ली की मुख्य रोड पर स्थित कंचन स्टुडियो से एक फोटो खिंचवाई और इन्द्र भारती तक पहुँचा दी. 
जब "पापी" उपन्यास प्रकाशित होकर मेरे हाथ में आया तो मैं यह देखकर हक्का बक्का रह गया कि उपन्यास के बैक कवर पर मेरा ब्लैक एंड व्हाइट फोटो कलर में छपा है.
तब मैं प्रकाशन जगत का पहला लेखक था, जिसकी तस्वीर उपन्यास के बैक कवर पर कलर में छपी थी.
उसके बाद मेरा दूसरा उपन्यास "कलियुग" भी आया और हिट हुआ. तीसरे उपन्यास का विज्ञापन भी दूसरे उपन्यास में दिया गया. तीसरे उपन्यास का नाम था - लोकलाज.
लेकिन तीसरा उपन्यास जब मैं लिख रहा था, मैं बुरी तरह बीमार पड़ गया. अस्थमा का जबरदस्त अटैक हुआ था. पूरा एक हफ्ता बिस्तर पर कुत्ते की तरह हांफते कांपते बीता. लिखना तो दूर की बात थी, कलम तक नहीं उठाई गई. 
खैर, ठीक होने के बाद उपन्यास लेकर मेरठ तो गया, लेकिन मुझे उपन्यास पहुँचाने में कुछ दिनों का बिलम्ब हो गया.
फिर जो कुछ हुआ, मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था.                      सलेकचन्द मुझ पर राशन पानी लेकर चढ़ गये और गुस्से में उन्होंने वो अल्फ़ाज़ निकाले कि मैं डर के मारे थर थर कांपने लगा. आखिर में उन्होंने कहा, "निकल जा यहाँ से वरना टांगें तोड़ दूंगा. तेरे जैसे झूठे गद्दार से मैंने कोई रिश्ता नहीं रखना."
और उस दिन मैं उठकर मेरठ से ऐसा भागा कि महीनों तक अन्य प्रकाशकों के बुलावे पर भी मेरठ नहीं गया.
खैर, आखिर एक बार बिमल चटर्जी पीछे पड़ गये कि योगेश जी, मैं हूँ ना. मैं हर समय आपके साथ रहूँगा और मेरे साथ होते हुए किसी की मज़ाल नहीं कि आपकी टांगें तोड़ दे."
बिमल चटर्जी से जो लोग मिले हैं. उनकी पर्सनैलिटी देखी है, वे समझ सकते हैं कि बिमल चटर्जी के आश्वासन ने मुझे कितना आश्वस्त किया होगा.
डील डौल पर्सनैलिटी से उस समय बिमल चटर्जी किसी पहलवान से कम नज़र नहीं आते थे, किन्तु बाद में शायद ज्यादा देर बैठे बैठे काम करने से उनका पेट आगे निकल आया तो यार दोस्त उन्हें "मोटे और मोटू भी कहने लगे थे.
खैर, हम मेरठ गये तो मैंने साफ कह दिया कि मैं सामने वाले मुख्य रास्ते से ईश्वरपुरी नहीं जाऊँगा, क्योंकि ईश्वरपुरी में प्रवेश के साथ अन्य सभी प्रकाशकों से पहले सलेकचन्द जी की कोठी थी.
बिमल चटर्जी ने मुझे बहुत समझाया - मैं हूँ ना. पर अन्त में उन्होंने मेरी मान - पीछे से नाले के पास के संकरे रास्ते से ईश्वरपुरी जाना स्वीकार कर लिया.
           हम ईश्वरपुरी पहुँचे तो संयोग ही था कि उस दिन सलेकचन्द जी से बिल्कुल सामना नहीं हुआ, लेकिन उनके छोटे भाई सुमतप्रसाद जैन ने मुझे बुलाया और मुझसे पूछा, "अमर पाकेट बुक्स में तेरे दोनों उपन्यास बहुत अच्छे गये थे. देता रहता तो बहुत नोट कमाता. हम भी तेरे दो चार उपन्यास साल में छाप लेते. तूने उपन्यास देना बन्द क्यों कर दिया?"
"मैंने बन्द नहीं किया." मैंने कहा और सारा किस्सा सुमत प्रसाद जैन उर्फ एसपी भाईसाहब को बताया तो वह बोले, "अरे पागल है तू, जाने से पहले एक बार मुझसे मिलता तो सही, सब ठीक करवा देता, अरे सलेक भाई साहब दिल के खरा सोना हैं, पर गुस्सा उनकी नाक पर धरा रहता है. बीमार भी बहुत रहते हैं. तू एक बार पांव पकड़ लेता तो सब ठीक हो जाता, उन्हें जितनी जल्दी गुस्सा आता है, उतनी जल्दी हवा भी हो जाता है. तूने बेवकूफी की, इतना अच्छा नाम से छप गया था. पाकेट बुक्स में पहला लेखक था, जिसकी बैक कवर में कलर फोटो छपी थी. अगर छपता रहता तो अब तक तो तेरी "सेल" पांच-छ: हजार से ज्यादा हो जाती, नोट भी भाईसाहब बहुत अच्छे देते, वो औरों की तरह कंजूस नहीं हैं. अब है, वो उपन्यास तेरे पास...?" 
"नहीं..!" मैंने धीरे से कहा, "मुझे नोटों की जरूरत थी तो वो उपन्यास वालिया साहब (यशपाल वालिया) को दे दिया और वो उनके नाम से धम्मी के भाई के पब्लिकेशन में छप भी गया है."
तो दोस्तों, यह किस्सा मैंने बहुत सी बातों को गोल कर संक्षेप में प्रस्तुत किया है, यदि आपने चाहा तो विस्तार में अपनी आगामी पुस्तक में लिखूँगा. लेकिन सिर्फ यही किस्सा नहीं है, मेरे मशहूर न होने का.
मेरे मशहूर न होने के और भी कई किस्से हैं, जिन्हें आप मेरी बेवकूफियों के किस्से भी नामज़द कर सकते हैं.
लेकिन सारे किस्से तभी कलमबद्ध करूँगा, जब आपका प्यार मिलेगा और आप जानना चाहेंगे.
फिलहाल बस....! 
‼️योगेश मित्तल‼️
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

बुधवार, 26 जुलाई 2023

मिलते - जुलते शीर्षक

साहित्य देश के स्तम्भ 'शीर्षक' के इस पोस्ट में हम 'मिलते- जुलते शीर्षक' शामिल कर रहे हैं। 
समय- समय पर यह पोस्ट अपडेट होती रहेगी।

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सबसे बडा डाॅन - ओमप्रकाश शर्मा (द्वितीय)

सबसे बडा शैतान - राज

सबसे बडा रुपया - राजहस

वो कौन था- अनिल मोहन

वो कौन थी- सुरेन्द्र मोहन पाठक

वह कौन था- कर्नल रंजीत

डायल 100- सुरेन्द्र मोहन पाठक

डायल 101- रजत राजवंशी


सोमवार, 10 जुलाई 2023

राकेश

लेखक - राकेश

लेखक राकेश का एक उपन्यास उपलब्ध है 'चीनी षड्यंत्र' जो की मेरठ से प्रकाशित है।
प्राप्त उपन्यास में प्रकाशक 'सीक्रेट सर्विस कार्यालय-मेरठ' और वितरक 'प्रभात पॉकेट बुक्स-मेरठ' लिखा है।
  अल्प जानकारी अनुसार 'राकेश' एक एक्शन लेखक थे।

राकेश के उपन्यास


1. चीनी षड्यंत्र

उक्त लेखक के  विषय में‌ अन्य कोई जानकारी हो तो अवश्य शेयर करें।
धन्यवाद
Email- Sahityadesh@gmail.com
विशेष- धीरज पॉकेट बुक्स के एक लेखक 'राकेश' भी थे, जिनके उपन्यास सामाजिक श्रेणी के थे।

sahityadesh

राकेश - धीरज पॉकेट बुक्स


 नाम- अशोक तरुण

दिल्ली के निवासी अशोक तरुण जी, प्राप्त संक्षिप्त जानकारी कर अनुसार एक एक्शन उपन्यासकार के रूप में सामने आते हैं। 

हालांकि उनके विषय में उनके उपन्यासों से ही जानकारी प्राप्त होती है जो अप्राप्य है।

अशोक तरुण के उपन्यास
  1. विकास और खूनी षड्यंत्र
  2. विकास और चीनी दरिंदे
लेखक अशोक तरुण के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध हो तो हमसे अवश्य संपर्क करें।
Email- Sahityadesh@gmail.com

लेखक का एड्रेस
अशोक तरुण
2466, बाजार सीताराम
दिल्ली-6
Ashok sahityadesh


शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

मजेदार समोसे- रोचक किस्सा

साहित्य देश के हास्य रस स्तम्भ में प्रस्तुत है प्रसिद्ध उपन्यासकार कर्नल रंजीत के उपन्यास 'वह कौन था' का एक हास्यपूर्ण किस्सा।

"बाबा, तुम समोसे क्या बनाते हो, गजब ढाते हो !" मेजर कहा ।
   ठाकुर हिम्मत सिंह मेजर की इस प्रशंसा पर प्रसन्न हुए। उन्होंने ऊंची आवाज में कहा - "बाबा नन्दू, इधर आओ और इनको बताओ कि तुम हमारे घर में नौकर कैसे हुए थे !"
"सरकार, मैं यह कहानी इतनी बार मेहमानों को सुना चुका हूं कि अब उसे दुहराते हुए शर्म आती है।" नन्दू बाबा ने निकट आकर कहा – “मगर मालिक का हुक्म कौन टाल सकता है, साहब ? मैं बावर्ची की नौकरी की खोज में था। बड़े ठाकुर साहब यानी मालिक के दादाजी ने मुझे देखा तो उनको विश्वास न आया कि मैं बावर्ची भी हो सकता हूं। खैर उन्होंने मुझे आजमाने की ठान ली। हुक्म हुआ कि मैं रसोईघर में जाकर दोपहर का खाना तैयार करूं, सबसे पहले वे खाकर देखेंगे। सो हुजूर, खाना बन गया।
       ठाकुर साहब खाने के लिए बैठे। मैंने नौकरानी के हाथ पाली परोसकर भिजवाई। थाली में केवल दाल की कटोरी थी और परांठे थे। में धड़कते दिल के साथ रसोई में इन्तजार कर रहा था । वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद थी। बड़े ठाकुर साहब ने बार-बार दाल मंगवाई, यहां तक कि उनका पेट भर गया। फिर वे रसोई में आकर बोले- 'मैं तो सिर्फ दाल ही खाता रहा, बाकी जो चीजें तुमने पकाई होंगी, वे तो पड़ी रह गई...!" मैंने केवल एक बरतन उनके आगे रख दिया जिसमें दाल थी और कहा- 'मैंने और कुछ नहीं बनाया था, सरकार ! बस दाल ही बनाई थी और इस विश्वास के साथ बनाई थी कि आप इसके सिवा और कोई चीज मांग ही नहीं सकेंगे ।' बड़े ठाकुर साहब ने मेरी पीठ बनवाई और उसी दिन से मैं इस घर का सेवक चला आ रहा हूं।" नन्दु बाबा ने हाथ हिलाकर कहा मेजर की नजरें उसके हाथों पर पड़ी तो वह आश्चर्य से उसके मैले हाथों की ओर देखने लगा ।
   नन्दू बाबा ने मेजर की निगाहें अपने हाथों पर जमी देखी तो उसने तुरन्त अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे छिपा लिए।

उपन्यास-  वह कौन था
लेखक -    कर्नल रंजीत

बुधवार, 28 जून 2023

तथास्तु- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास अंश

साहित्य देश के स्तम्भ 'उपन्यास अंश' में इस बार प्रस्तुत है प्रसिद्ध उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा जी के पुत्र शगुन शर्मा जी के उपन्यास 'तथास्तु' का एक रोचक अंश।
तथास्तु - शगुन शर्मा

अपने आलीशान चैंबर में अपनी ऊंची पुश्तगाह वाली चेयर पर मौजूद रागिनी ने रिवाल्विंग चेयर को घुमाया और अपने सामने मेज के पार बैठे शख्स का खुर्दबीनी से मुआयना किया।

रागिनी का पूरा नाम रागिनी माथवन था। वह यौवनावस्था के नाजुक दौर को पहुंची किसी ताजा खिले गुलाब-सी सुंदर युवती थी उसकी आवाज में जैसे जादू और आंखों में हद दर्जे का आकर्षण था। बला के हसीन चेहरे पर शैशव का अल्हड़पन तथा गजब का आत्मविश्वास था।
           वह मुंबई फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड की नामचीन प्लेबैक सिंगर थी और आज निर्विवाद रूप से वालीवुड की टॉप सिंगर कही जाती थी। उसकी मधुर आवाज हिंदुस्तान के कोने-कोने में गूंज रही थी।
महज उन्नीस बरस की आयु में यह आज कामयाबी की उस बुलंदी पर पहुंच चुकी थी जो केवल विरलों को ही नसीब होती थी।
उसके सामने बैठे शख्स का नाम भीखाराम भंसाली था। जो कि बाॅलीवुड का सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक था। जिसकी वालीवुड में चौतरफा डिमांड थी और जिसके बारे में यह कहते आम सुना जा सकता था कि किसी फिल्म के साथ उसका नाम जुड़ना ही उस फिल्म की कामयाबी की लगभग गारंटी था।
रागिनी को इस तरह अपनी तरफ देखता पाकर भंसाली के चेहरे पर असंमजस के भाव आ गए।
"लगता है मुझे यहां देखकर आपको कोई खुशी नहीं हुई मिस रागिनी?" भंसाली तनिक खिन्न भाव से बोला ।
"यह आपकी गलतफहमी है जनाब भंसाली साहब।" दुनिया की सबसे मथुर आवाज की स्वामिनी ने अपने होठों पर एक चित्ताकर्षक मुस्कराहट लाते हुए कहा- "आप जैसी शख्सियत से मिलकर भला कौन होगा जो खुश नहीं होगा। खैर... जाने दीजिए।" उसने निःश्वास
भरी- 'और यह बताइए कि आप क्या लेना पसंद करेंगे। ठंडा या... ।"

मंगलवार, 27 जून 2023

राजा- उपन्यास सूची

नाम- राजा 
प्रकाशक- मनोज पॉकेट बुक्स, दिल्ली
श्रेणी-  बाल उपन्यासकार

उपन्यास साहित्य में असंख्य छद्म लेखकों की पंक्ति में एक और नाम पता चला है। वह नाम है मनोज पॉकेट बुक्स के Ghost writer 'राजा' का।

   बाद में मनोज पॉकेट बुक्स से अलग होकर इनकी इन शाखा 'राज पॉकेट बुक्स' और फिर नाम परिवर्तित होकर 'राजा पॉकेट बुक्स' बनी थी। हालांकि लेखक राजा के उपन्यास मनोज पॉकेट बुक्स से ही प्रकाशित हुये थे। और वह भी कोई ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाये। 

   प्राप्त जानकारी अनुसार छद्म लेखक राजा के बाल उपन्यास की संख्या न्यूनतम ही रही थी।

राजा के उपन्यास
  1. काली औरत
  2. इच्छाधारी सांप
  3. बदसूरत आदमी
  4. सफेद परछाई





गुरुवार, 22 जून 2023

52 गज का बौना- केशव पण्डित, उपन्यास अंश

52 गज का बौना- केशव पण्डित
उपन्यास अंश

"तुम अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हो बावन गज के बौने। तुम कुँए के मेंढक हो, जो स्वयं को पानी का राजा समझ बैठता है। वो ऊंट हो जो कभी पहाड़ के करीब से गुजरा ही नहीं। दीवार पर रेंगती वो छिपकली हो जिसने कभी मगरमच्छ को देखा ही नहीं। वो पिल्ले हो, जिसने कभी शेर की तस्वीर भी नहीं देखी। तुम सिर्फ बावन इंच के हो लेकिन अपनी परछाई को देखकर ये गलतफहमी पाल बैठे कि तुम्हारा कद बावन गंज का है। बिल्ली का बच्चा भी चूहों पर हुकूमत कर सकता है लेकिन जब वो शेर के सामने पड़ता है तो भीगी बिल्ली बन जाता है। इसी तरह तुमने जुर्म के चूहों पर हुकूमत करके खुद को बावन गज का राक्षस समझ लिया है। लेकिन अब तुम्हारा पाला कानून के शेर से पड़ा है तो अपनी औकात मालूम हो जायेगी। कांच का टुकड़ा भले ही कितना मोटा हो, लेकिन वो पत्थर से टकराने पर चकनाचूर हो जाता है। तुम तो कानून की चक्की में कूदने की भूल कर रहे हो। दो पाटों के बीच फंसकर चूरमचूर हो जाओगे।”
उपन्यास के मुख्य पात्र
बिच्छू - एक लड़की के पीछे पड़ा गुमनाम व सनकी आदमी, जो लड़की के दुश्मनों तथा चाहने वालों का जानी दुश्मन है।
सलीम लंगड़ा -लंगड़ा गैंगस्टर, जो क्रिकेट का शौकीन है और दुश्मन को बैट से मारता है।
भीखू भिखारी - गैंगस्टर भी है और मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठकर भीख भी मांगता है। 
शकीला बेगम-सौतेली मां द्वारा बना दिया गया हिजड़ा, जो शैतान से भी चार कदम आगे है। 
टोनी गोवानी-टी.बी. का मरीज गैंगस्टर, जो अपने शिकार को जहर के इंजेक्शन लगाता है।
बावन गंज का बौना-बार-बार भेष बदलने वाला वो छलावा, जो गैंगस्टर्स से भी टैक्स वसूलता है।
और इनके मुकाबले पर सीना ताने खड़ा है-

दिमाग का जादूगर-केशव पण्डित । 

तेज रफ्तार व अविस्मरणीय कथानक
Keshav pandit novel केशव पण्डित

अब पढें 'बावन गज का बौना' उपन्यास अंश

"मैं गैंगस्टर बाहुबली सिंह बोल रहा हूं केशव पण्डित.... बाहुबली । मेरे आदमियों ने तेरी गाड़ी को चारों तरफ से घेरा हुआ है। उनके पास ना सिर्फ एक से एक खतरनाक हथियार हैं, बल्कि वो बमों से भी लैस हैं। अगर तू एक मिनट के भीतर बाहर नहीं निकला तो ये लोग पहले तेरी गाड़ियों पर अन्धाधुन्ध फायरिंग करेंगे और बम फेंककर तुझ समेत तेरी गाड़ी के भी परखच्चे उड़ा देंगे।” 

सोमवार, 19 जून 2023

हरविंदर - उपन्यास सूची

नाम - हरविंदर
श्रेणी- सामाजिक उपन्यासकार
लोकप्रिय उपन्यासकारों की सूची में एक और नाम शामिल हुआ हैऔर वह नाम है हरविंदर।
हरविंदर उपन्यास harvinder novel
  
हरविंदर के उपन्यास
1. अहसास - (सितंबर- 1977) प्रथम सामाजिक उपन्यास
2. चुभन
3. सिंदूर की लाली
4. मासूम
5. बदलते चेहरे
6. महक
7. बस और नहीं
8. अहसास
9. अधूरा इंसान (क्रमांक 01-09 तक विजय पॉकेट बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित)
10. आवारा लहू
11. दुल्हन एक रात की (क्रमांक 10 से 11तक, दुर्गा पॉकेट बुक्स, मेरठ से प्रकाशित)

12. बुजदिल
लेखक हरविंदर के विषय में किसी सज्जन के पास कोई भी जानकारी उपलब्ध हो तो हमसे संपर्क करें
Email- Sahityadesh@gmail.com


प्रसिद्ध उपन्यासकार योगेश मित्तल जी के हरविंदर के विषय में विचार-
                हरविन्दर बहुत प्यारे इंसान हैं। विजय पॉकेट बुक्स में अनेक बार मिला हूँ। बहुत ज्यादा बातें कभी भी नहीं हुईं, क्योंकि आरम्भ के दिनों में हरविन्दर कुछ मितभाषी भी थे। या हर एक से न खुलते रहे हों। लेकिन जब भी जितनी भी बात हुई - हमेशा बहुत अच्छा लगा। पहले लुधियाना, फिर डलहौज़ी रहे। तब मोबाइल नहीं हुआ करते थे। लैंडलाइन भी हर एक के यहां नहीं होते थे, इसलिए हम टच में नहीं रहे। अपने बारे में खुद हरविन्दर ही सबसे बेहतर बता सकेंगे। मैं तो  इतना जानता हूँ कि विजय पॉकेट बुक्स के स्वामी हरविन्दर के बारे में बड़े ऊँचे ख्यालात रखते थे। उनका विचार था कि हरविन्दर दिल्ली रहने लगे तो राजहंस से भी आगे निकल जाएगा। राज भारती और यशपाल वालिया भी हरविन्दर से एक दिन तहलका मचाने की उम्मीद रखते थे।        

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...