राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 9 ========================
हिन्द व मनोज Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था - ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता!
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये!
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!
हिन्द व मनोज Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था - ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता!
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये!
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!





