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शुक्रवार, 18 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -10

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 9   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे! जस्टिस महोदय का कहना था -  ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता! 
कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी! उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है! विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है! विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये! 
विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे! जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे! सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में  जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ! 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया!
उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली!  

गुरुवार, 17 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की -09

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 8   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
"तूने तो गद्दारी करने की ठान ली है, पर हमें तो व्यापार करना है! सारी खबरें रखनी ही पड़ेंगी!" गौरी भाई साहब मुस्कुराते हुए गर्दन हिलाते हुए बोले! 
"मैंने कौन सी गद्दारी कर दी...?" मैंने पूछा! 
"अब मेरा मुंह मत खुलवा!" गौरीशंकर गुप्ता बोले - "हमारे दुश्मनों के यहाँ रविवार को भी चाय नाश्ता करने पहुँचा हुआ था!  या कह दे नहीं गया था - रविवार को तू विजय पाकेट बुक्स में...!"
"जगदीश जी ने बताया है कुछ.,.?" 
"अरे जगदीश जी को देख कर तो तू और  राजभारती टी स्टाल में घुस गये थे! पता चलने पर राज भाई ने एक लड़के को साइकिल से राणा प्रताप बाग भेजा था! उसने तुझे भी वहाँ देखा था और बाकी सबको भी! चल, अब भी कह दे कि तू नहीं गया था विजय पाकेट बुक्स में...!" गौरीशंकर गुप्ता निरन्तर मुस्कुरा रहे थे! 
"असली जासूस तो आपलोग हो!" मैं हंसा - "आपने तो पूरी जासूसी एजेन्सी खोल रखी है! योगेश मित्तल सांस  भी लेता है तो आपको पता चल जाता है - कहाँ पर खड़े होकर सांस ली थी! पर उस दिन आप मुझे दरीबे में छोड़, अचानक कहाँ गायब हो गये थे...?"
"हम पटेलनगर गये थे, यह तो जगदीश जी ने तुझे बता ही दिया था बेटा... फिर क्यों पूछ रहा है?" गौरीशंकर गुप्ता बोले! राजकुमार गुप्ता इस बीच बिल्कुल खामोश रहे, लेकिन वह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे! 

कहानी उपन्यासकार राजहंस की-08

 राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 7   ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स
राणा प्रताप बाग पहुँचकर, फिर उसी हाल में महफ़िल जमी, जहाँ किताबों का भण्डार था और वीपी पैकेट और रेलवे के बण्डल तैयार किये जाते थे। 
आज की महफ़िल में वासुदेव और हरविन्दर नहीं थे! वे वापस कानपुर और लुधियाना चले गये थे, लेकिन आज की महफ़िल में इन्देश्वर जोशी भी हम सबके साथ ही एक फोल्डिंग कुर्सी पर बैठा था, जैसे वह विजय पाकेट बुक्स में नौकरी करने से पहले साथ ही बैठा करता था।
थोड़ी देर बाद कुछ और लोग आ गये, जिन्हें मैं नहीं जानता था, किन्तु वे सभी उम्रदराज थे, अत: मेरे लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि वे सब विजय कुमार मलहोत्रा के पुराने एवं घनिष्ठ मित्र हैं। 
विजय जी उन्हें राजहंस के हिन्द व मनोज में छपने का किस्सा सुनाने लगे। 
उन सब बातों में न मेरे लिए कुछ नया था, ना ही बताने योग्य नया। 
अचानक वालिया साहब ने एक दस का नोट इन्देश्वर जोशी की ओर बढ़ाते हुए धीरे से कहा - "इन्देश, यार मेरे लिए एक पान ले आ..!" फिर मेरी ओर देख कर बोले -"एक योगेश जी के लिए भी..!"
"आओ योगेश जी, चलते हो?" इन्देश ने उठते हुए मेरा हाथ थामते हुए मुझसे कहा -"चलो, पान ले आयें।"
मैंने पहले भी बताया है - मैं एकदम मस्तमौला था! छोटी-बड़ी गाड़ियों में बैठने और घूमने वालों से भी मेरी दोस्ती थी तो फटे और मैले कपड़ों में दिखने वालों से भी बहुत मुहब्बत भरे रिश्ते थे मेरे। 
       और एक आदत उन दिनों मेरी जिन्दगी का खास अंग थी, वह यह कि कितना ही जरूरी कहीं जाना हो, अचानक कोई भी किसी काम को कहे, मना करना तो मैंने सीखा ही नहीं था! 
यहाँ तक कि जब मैं बंगला साहब गुरुद्वारे के सामने कनाट प्लेस में रहता था, तब कई अड़ोसी-पड़ोसी मुझसे कभी कोई  मामूली सा बाज़ार का काम सौंप देते थे तो चाहें कितना ही व्यस्त रहा होऊँ, कभी इन्कार नहीं करता था! वहाँ के पड़ोसियों ने बाज़ार से आधा किलो चीनी ला देने और स्टुडियो से फोटो ला देने ही नहीं, रीगल या रिवोली सिनेमा हॉल में फिल्म 'हाऊस फुल' रही हो तो मुझसे फिल्मों के टिकट तक ला देने का काम लिया था!
मेरी कनाट प्लेस के सिनेमा हॉल्स के गेटकीपर्स से भी उन दिनों अच्छी खासी जान-पहचान थी, जिसे आप दोस्ती भी कह सकते हैं।

बुधवार, 16 जून 2021

कहानी उपन्यासकार राजहंस की- 07

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 6  ========================
हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

आप सौ परसेन्ट एक ईमानदार और सच्चे इन्सान हैं, वफ़ादार और अच्छे इन्सान हैं, लेकिन कभी कभी वक़्त आपके खिलाफ हो जाता है और जब वक़्त आपके खिलाफ हो, आपकी ईमानदारी में दूसरे को बेईमानी नज़र आती है। सच्चाई में झूठ नज़र आता है। ऐसे समय कोई सफाई देना या अपने अज़ीज़ को यह समझाना कि आप ईमानदार हैं, सच्चे हैं, शुभचिन्तक हैं, दोस्त हैं, सब बेकार होता है। ऐसे समय खामोश रह जाना ही सबसे उत्तम कदम होता है।
         यह सब मैं इसलिये बता रहा हूँ, क्योंकि जो-जो लोग, मेरी पीठ पीछे भी हमेशा मेरी तारीफ करते थे, सराहना करते थे - राजहंस और हिन्द - मनोज के विजय पाकेट बुक्स से विवाद में एकदम अकारण मुझे शक की निगाहों से देखने लगे थे। हालांकि बाद में, मैं उन सबके लिए भी वही पहले वाला प्यारा-दुलारा योगेश मित्तल बन गया था, लेकिन कुछ समय तक मुझे कड़वाहटें, जिल्लतें और उपेक्षा भी सहनी पड़ी थी। 
       विजय पाकेट बुक्स में वासुदेव और हरविन्दर से भारती साहब ने उन्हीं दिनों मेरा प्रथम परिचय कराया था। बाद में तो हम कई बार मिले, पर उस रोज भी वासुदेव और हरविन्दर बहुत मुहब्बत से मिले। हाथ पकड़ कर वासुदेव ने कई बार हाथ हिलाया।
 उसने यह भी कहा -"आपका नाम तो कई बार सुना था। मिलने का अवसर पहली बार मिला है।"
हरविन्दर ने भी हाथ मिलाया, पर सहज अन्दाज़ में मुस्कुराते हुए हाथ मिलाकर छोड़ दिया। 
विजय कुमार मल्होत्रा उस समय एक साइड में खड़े, इन्देश्वर जोशी से पहले से, विजय पाकेट बुक्स में काम कर रहे पैकर को, वासुदेव, हरविन्दर, सावन और मीनू वालिया की पुरानी सभी किताबों के दो-दो बण्डल निकाल कर कार की डिकी में रखने का आदेश दे रहे थे। उस समय मुझे विजय कुमार मल्होत्रा के उस आदेश का मतलब समझ में नहीं आया था, पर बाद में सब पता चल गया था। 
     वे सारी किताबें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए निकलवाई जा रही थीं। दरअसल विजय कुमार मलहोत्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हमेशा राजहंस की किताबों की बिक्री पर ही ज्यादा जोर देते रहे थे, लेकिन अब उन्हें समझ आ गया था कि उन्हें अपने सभी लेखकों पर बराबर का जोर लगाना चाहिए था। 
उस समय विजय कुमार मल्होत्रा की पीठ मेरी तरफ थी। अपने वर्कर को सब कुछ समझाने के बाद जैसे ही वह पलटे, उनकी नज़र मुझपर पड़ी और छूटते ही वह बोले - "ये मनोज का जासूस कब आया?"
मुझे काटो तो खून नहीं। 

मंगलवार, 15 जून 2021

पहली वैम्पायर- विक्रम ई. दीवान, उपन्यास समीक्षा

एक पिशाचनी की दिल दहला देने वाली ख़ौफ़नाक कहानी
उपन्यास :- पहली वैम्पायर
लेखक :     विक्रम ई. दीवान 
प्रकाशन :  बुक कैफे पब्लिकेशन
पृष्ठ संख्या -184
उपन्यास समीक्षा - संजय आर्य

वारलॉक श्रृंखला के बाद 'पहली वैम्पायर' का पाठकों को बेसब्री से इंतजार था। लगता है विक्रम ई.दीवान सर ने कसम खाई है कि वो पाठकों को नए नए तरीकों से डराकर ही रहेंगे। और इस बार पाठकों को उन्होंने एक ऐतिहासिक डरावनी कहानी के माध्यम से डराने का न केवल बेहतरीन प्रयास किया है बल्कि डराने में सफल भी रहे है। 
        कहानी की पृष्ठभूमि में है- सन 1818 का ब्रिटिश काल और उनका ठगों के साथ संघर्ष। ब्रिटिश कैप्टेन जोनाथन स्मिथ एक घमंडी और सनकी आदमी है उसके साथ इंग्लैंड की ही मानवविज्ञानी एलेन भी रहती है जो भारत घूमने आई है। स्मिथ को एक दिन जब अपने इलाके में एक आदमी की पेड़ पर उल्टी लटकी लाश मिलती है।और जैसे किसी जीव ने उसके शरीर से खून की आखरी बून्द तक  निकाल ली  हो, उसके बाद शुरू होती है स्मिथ की खोजबीन और उसका सामना होता है खून पीने वाली पिशाचिनी से और वो एक अघोरी की सहायता लेता है। 
पिशाचिनी की कहानी काफी रोचक और ख़ौफ़नाक है।एक बानगी देखिये।
"मुझे लगता है, तुम और कैप्टन दोनों इस जीव को बहुत हल्के में ले रहे हो।

वी. एम. अस्थाना

वी. एम. अस्थाना - संक्षिप्त चर्चा
आबिद रिजवी
वी.एम. अस्थाना  लेखन के शुरुआती समय से छपने तक  'हैलन' के उपन्यासों के साथ अनुवादकनामरूप से चिपके रहे जैसे इब्ने सफ़ी  हिन्दी नॉवलों (जासूसी दुनिया ) के साथ 'प्रेम प्रकाश ' का नाम। 'हैलन' के उपन्यासों के साथ वी.एम.अस्थाना का नाम उसी तरह सोने की अँगूठी मे जड़े नगीने की तरह शोभायमान - मूल्यवान साबित होता रहा जैसे गौरी पॉकेट बुक्स , मेरठ के केशव पण्डित के उपन्यासों के साथ  'केशव पण्डित'।
    मूल लेखक (राकेश पाठक, जो केशव पण्डित के नाम से भी लिखते थे) ने हरचन्द (भरसक) कोशिश की कि वे अपने नाम से ख़्याति अर्जित कर सकें , पर सफल न हुए। वी.एम.अस्थाना ने भी अपने नाम से मशहूरियत पाने के इच्छा लेकर  नॉवल लिखे। पर कामयाब न हुए।
      वी.एम.अस्थाना कानपुर के एक बैंककर्मी थे। सतीश जैन की उसी तरह कि खोज थे जैसे गौरी पॉकेट बुक्स वालों की राकेश पाठक। दोनों को ही उनके प्रकाशकों ने हरेक से गोपनीय रखने की पूरी चेष्टा की। ....पर, इस वाकिया नवीस से सब कुछ खुला रहा, इसकी वजह ये रही कि उक्त दोनों प्रकाशकों ने, उपर्युक्त संदर्भित दोनों लेखकों के शुरुआती नॉवल छापने से पहले मुझसे पढ़वाने और सुधरवाने में  'हरि इच्छा' मानी। गौरी पॉकेट बुक्स वाले अंतिम समय तक इस बात को प्रकाशकों और लेखकों के बीच कई बार खुले तौर पर कहा -- "आबिद रिज़वी ने केशव पण्डित का पहला उपन्यास को सुधारने का इतना अमॉउण्ट वसूला कि जितना मैंने उसके लिखने वाले को पारश्रमिक रूप में भी न दिया था।" अब पता नहीं ये कथन लेखक की डिवैल्यूएशन के लिए था या मेरी वैल्यूएशन केे लिए।  वैसे मेरा आंकलन पहले वाले विचार पर ही  है।
  @आबिद रिजवी के स्मृति कोष से
महत्वपूर्ण तथ्य


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गुरुवार, 10 जून 2021

लोकप्रिय साहित्य पर चर्चा- शरद कुमार दूबे


लुगदी साहित्य को सस्ता, फुटपाथी और घासलेटी साहित्य जैसे नामों से भी अलंकृत किया जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे पल्प फिक्शन (Pulp fiction) कहा जाता है। मैंने गूगल पर pulp fiction meaning in hindi टाइप किया तो जवाब आया 'उत्तेजित करने वाला सस्ता उपन्यास'।
वैसे लुगदी साहित्य का सबसे इज्जतदार नाम है, 'लोकप्रिय साहित्य'। यानी कम गुणवत्ता वाले सस्ते कागज पर छपने वाला वो साहित्य जो आम लोगों की जेब पर भारी नहीं पड़ता और वो रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड की दुकानों पर आम बिकते इस साहित्य को खरीदकर अपने पढ़ने की तलब को पूरी कर पाता है। सही मायनों में यही वो साहित्य है जो पाठकों के मन में रोचकता पैदा करता है और उन्हें इससे जोड़े रखता है। लोकप्रिय साहित्य लिखा नहीं जाता बल्कि लिखा जाकर लोकप्रिय होता है।
हिंदी उपन्यास के संसार में उपन्यास को दो श्रेणियों में बाँटा गया, 'सामाजिक उपन्यास और जासूसी उपन्यास'। यहाँ हम बात कर रहे हैं जासूसी उपन्यासों और उनके लेखकों की। 100 साल से भी अधिक पुराने, हिन्दी जासूसी उपन्यासों के इतिहास में, 200 से भी अधिक जासूसी उपन्यासों के लेखक, गोपाल राम गहमरी का योगदान अविस्मरणीय है। सन 1900 में उन्होंने जासूस नामक पत्रिका भी प्रारम्भ की थी जो अगले चार दशकों तक प्रकाशित होती रही। ऐंसे ही देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' का योगदान भी अतुलनीय है।
किसी भी उपन्यास को पढ़ने का मुख्य उद्देश्य होता है पाठक का मनोरंजन। लेकिन ये भी सत्य है कि, पढ़ने से ढेरों उपलब्धियाँ भी हासिल होती हैं। जैसे, ज्ञान प्राप्त होना, शब्द भंडार में वृद्धि होना आदि।
पिछले 50-60 बरस के कामयाब जासूसी उपन्यास लेखकों की बात करें तो उनमें, इब्ने शफी,  कर्नल रंजीत, जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश काम्बोज, परशुराम शर्मा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक आदि के नाम स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।
पुराने समय में जब मनोरंजन के साधन कम थे तब लोगों में पढ़ने का बड़ा चाव था और जासूसी उपन्यास भी खूब पढ़े जाते थे। मनोरंजन के साधन बढ़े तो लोगों का वक्त दूसरे साधनों पर खर्च होने लगा और पढ़ने में रुचि कम होती गई। फिर हुआ ये कि, लोकप्रिय लेखक भी कम छपने लगे और बिकने और भी कम हो गए।
यहाँ मैं तारीफ करना चाहूँगा वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक की कि, पाठकों में इनकी लोकप्रियता कम न हुई। दोनों खूब छपते और बिकते रहे। 17 फरवरी 2017 को वेद प्रकाश शर्मा का देहांत हो गया। लोकप्रिय साहित्य में वेद प्रकाश शर्मा का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।
लुगदी साहित्य का पहला लेखक जो लुगदी अथवा सस्ते कागज से ऊपर उठकर बेहतरीन वाइट पेपर पर छपा, वो है सुरेन्द्र मोहन पाठक। अपनी मेहनत, लगन और लेखन की वजह से पाठक जी ने यह मुकाम हासिल किया और अब तो उनका हर उपन्यास वाइट, उम्दा पेपर पर ही छपता है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक विशाल पाठक वर्ग है जो उनके हर नए उपन्यास का बेताबी से इंतजार करता है। 81 बरस के पाठक जी आज भी लेखन में सक्रिय हैं और उसी शिद्दत से लिख रहे हैं जैसे पहले लिखते थे। लेकिन ऐंसा लगता है मानो पाठक जी, लोकप्रिय लेखन के आखरी हस्ताक्षर हैं और नहीं लगता कि, सस्ते साहित्य का कोई और लेखक अब इस मुकाम तक पहुँच पाएगा क्योंकि वर्तमान में जो भी नए लेखक लिख रहे हैं वो पाठकों की पसंद पर खरा उतरने लायक नहीं है।।
प्रस्तुति-
शरद कुमार दुबे  


राम मंदिर के पास
रेलटोली, गोंदिया,
महाराष्ट्र (पिन- 441614)


बुधवार, 9 जून 2021

बिच्छू का खेल- अमित खान

साहित्य देश अपने ब्लॉग पर एक नया स्तम्भ आरम्भ कर रहा है- उपन्यास समीक्षा। जिसमें आप विभिन्न पाठकों द्वारा लिखी ्यी रोचक समीक्षाएं पढेंगे। 
इस क्रम में सब से पहले हम हरियाणा निवासी सुनील भादू जी द्वारा लिखित एक समीक्षा यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
  अगर आप भी किसी उपन्यास पर समीक्षा लिखते हैं तो हमें भेज सकते हैं। 
Emial- sahityadesh@gmail.com
उपन्यास- बिच्छू का खेल
लेखक- अमित खान
प्रकाशक- Book cafe
एमेजन‌ लिंक- बिच्छू का खेल
उपन्यास समीक्षा- सुनील भादू
पर सुपरहिट वेब सीरीज़ बनी। पर वेब सीरीज और उपन्यास दोनों की कहानी अलग लग रही है।

कहानी की शुरुआत मुख्य किरदार अखिल से होती है। अखिल के पिता उसे एक वकील बनाना चाहते है। अखिल का एडमिशन लॉ कॉलेज में करवाने के लिए उनको एक लाख की जरूरत होती है। वो अगले दिन उस्मान भाई के पास जाता है पर उस्मान भाई उसे एक भी पैसा नही देते,  रात को अखिल के पिता देर से आते हैं और अपने साथ एक लाख रुपए लेकर आते हैं। 
     अगले दिन सुबह पुलिस इंस्पेक्टर तिवारी आता है और अखिल के पिता को उस्मान भाई की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लेता है। 
उस्मान भाई की वाइफ सभी वकीलों को अखिल के पिता का केस लड़ने से मना कर देती है पर क्रिमिनल लॉयर तलोनी अखिल के पिता का केस लेता है और उसे लड़ता है। पर तलोनी उस केस को हार जाता है और अखिल उर्फ़ ‘बिच्छू’ के पिता को एक झूठे मर्डर के इल्ज़ाम में फाँसी हो जाती है। 
फिर अखिल को पता चलता है कि उनकी मौत के लिये तलोनी ज़िम्मेदार है, तब अखिल अपने फ़ादर की मौत का बदला लेने के लिये तलोनी के मर्डर की प्लानिंग बनाता है। यह ‘बिच्छू का खेल’ था - ज़बरदस्त खेल ।
- क्या सच में तलोनी ने अखिल (बिच्छू) के साथ धोखा किया था? 
- ऐसी कौनसी बात थी जो तलोनी ने अखिल से छुपाई?
- अब क्या करने वाला था बिच्छू? क्या सजा देने वाला था वो
- तलोनी को या फिर उसे कुछ नही करने वाला था ?
- क्या सच में अखिल के पिता ने उस्मान भाई का कत्ल किया था ?

सोमवार, 7 जून 2021

एक मुलाकात कुमार कश्यप से- योगेश मित्तल

साहित्य देश के संस्मरण स्तम्भ में पढें आदरणीय योगेश मित्तल जी की विक्रांत सीरीज के उपन्यासकार कुमार कश्यप जी के साथ बीते कुछ यादगार पलों की एक झलक।

कुमार कश्यप जब बहुत बुलन्दी पर थे, तब उनसे हमेशा मेरठ में किसी न किसी प्रकाशक के यहाँ ही मिलना हुआ, पर जब भी वह मिलते हमेशा जल्दी में रहते थे, "नमस्ते - जय राम जी की" से आगे बात कम ही बढ़ी।
आम तौर पर उन्हें बाहरी चाय की दुकान पर चाय पीते कभी देखा नहीं, पर एक बार सुबह-सुबह वह  ईश्वरपुरी के बाहर ही गिरधारी चाय वाले की दुकान पर दिख गये। 
      मेरठ में ईश्वरपुरी के बाद अगली ही गली हरिनगर की है, जिसका पहला और काफी बड़ा मकान मेरे मामाओं का था, मकान के चार हिस्सों में मेरे चार मामा रहते थे, जिनमें दूसरे नम्बर के मामा रामाकान्त गुप्ता के यहाँ मैं ठहरा हुआ था! 
मैं उन्हीं के यहाँ से बाहर सिगरेट फूंकने के लिए निकला था, तब मैं सिगरेट पीने लगा था, किन्तु बड़ों के सामने... न बाबा न, इतना माडर्न और बेहिचक नहीं हुआ था।  
कुमार कश्यप
कुमार कश्यप

गिरधारी चाय वाले की दुकान पर मैं सिगरेट लेने ही पहुँचा था कि बेंच पर बैठे कुमार कश्यप जी की आवाज आई- " आओ योगेश जी, आओ! चाय पीते हैं।"
हमने चाय पी। सिगरेट भी पी। पैसे कुमार कश्यप जी ने ही दिये।
मेरे बहुत कहने पर भी उन्होंने मुझे नहीं देने दिये।
दरअसल कुमार कश्यप जी को जिस पब्लिशर से मिलना था, उसका आफिस तब तक खुला नहीं था, इसलिए हमारे बीच औपचारिकता से आगे बढ़ने की शुरुआत होगी।

उसके बाद हम इटावा में मिले, तब मेरे सबसे बड़े बहनोई शान्तिभूषण जैन इटावा में यूपी रोडवेज़ में आर. एम. की पोस्ट पर थे।
बहन का घर रेलवे स्टेशन के पास ही था।
मैं दिल्ली वापस जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचा ही था कि उसी समय किसी ट्रेन से वापस लौटे कुमार कश्यप जी की नज़र मुझ पर पड़ी - "अरे योगेश जी!"

मंगलवार, 1 जून 2021

वी.एम. अस्थाना

 नाम- वी. एम. अस्थाना

वी.एम. अस्थाना
वी.एम. अस्थाना
 मेरठ निवासी उपन्यासकार वी. एम. अस्थाना ओरियंटल पॉकेट बुक्स, मेरठ के लिए  अनुवादक का काम करते थे।

ओरियंटल बुक्स के लिए  'हैलन सीरीज' के उपन्यास अनुवादित करते थे।
   बाद में स्वयं मौलिक लेखन के क्षेत्र में हाथ आजमाया।
वी.एम. अस्थाना के प्रकाशित मौलिक उपन्यास
1. प्रलय की रात
2. प्यार का मौसम
3. बादल और बिजली
4. चोर लूटेरा
5. नौ-दो ग्यारह
6. तीन चोर - जुलाई-2977
7. खजाना
उक्त समस्त उपन्यास ओरिएंटल पॉकेट बुक्स, मेरठ से प्रकाशित
वी.एम. अस्थाना जी पर आबिद रिजवी जी की संक्षिप्त जानकारी यहाँ पढें- वी. एम. अस्थाना

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...