साहित्य देश के संस्मरण स्तम्भ में पढें आदरणीय योगेश मित्तल जी की विक्रांत सीरीज के उपन्यासकार कुमार कश्यप जी के साथ बीते कुछ यादगार पलों की एक झलक।
कुमार कश्यप जब बहुत बुलन्दी पर थे, तब उनसे हमेशा मेरठ में किसी न किसी प्रकाशक के यहाँ ही मिलना हुआ, पर जब भी वह मिलते हमेशा जल्दी में रहते थे, "नमस्ते - जय राम जी की" से आगे बात कम ही बढ़ी।
आम तौर पर उन्हें बाहरी चाय की दुकान पर चाय पीते कभी देखा नहीं, पर एक बार सुबह-सुबह वह ईश्वरपुरी के बाहर ही गिरधारी चाय वाले की दुकान पर दिख गये।
मेरठ में ईश्वरपुरी के बाद अगली ही गली हरिनगर की है, जिसका पहला और काफी बड़ा मकान मेरे मामाओं का था, मकान के चार हिस्सों में मेरे चार मामा रहते थे, जिनमें दूसरे नम्बर के मामा रामाकान्त गुप्ता के यहाँ मैं ठहरा हुआ था!
मैं उन्हीं के यहाँ से बाहर सिगरेट फूंकने के लिए निकला था, तब मैं सिगरेट पीने लगा था, किन्तु बड़ों के सामने... न बाबा न, इतना माडर्न और बेहिचक नहीं हुआ था।
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| कुमार कश्यप |
गिरधारी चाय वाले की दुकान पर मैं सिगरेट लेने ही पहुँचा था कि बेंच पर बैठे कुमार कश्यप जी की आवाज आई- " आओ योगेश जी, आओ! चाय पीते हैं।"
हमने चाय पी। सिगरेट भी पी। पैसे कुमार कश्यप जी ने ही दिये।
मेरे बहुत कहने पर भी उन्होंने मुझे नहीं देने दिये।
दरअसल कुमार कश्यप जी को जिस पब्लिशर से मिलना था, उसका आफिस तब तक खुला नहीं था, इसलिए हमारे बीच औपचारिकता से आगे बढ़ने की शुरुआत होगी।
उसके बाद हम इटावा में मिले, तब मेरे सबसे बड़े बहनोई शान्तिभूषण जैन इटावा में यूपी रोडवेज़ में आर. एम. की पोस्ट पर थे।
बहन का घर रेलवे स्टेशन के पास ही था।
मैं दिल्ली वापस जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचा ही था कि उसी समय किसी ट्रेन से वापस लौटे कुमार कश्यप जी की नज़र मुझ पर पड़ी - "अरे योगेश जी!"
हमने चाय पी। सिगरेट भी पी। पैसे कुमार कश्यप जी ने ही दिये।
मेरे बहुत कहने पर भी उन्होंने मुझे नहीं देने दिये।
दरअसल कुमार कश्यप जी को जिस पब्लिशर से मिलना था, उसका आफिस तब तक खुला नहीं था, इसलिए हमारे बीच औपचारिकता से आगे बढ़ने की शुरुआत होगी।
उसके बाद हम इटावा में मिले, तब मेरे सबसे बड़े बहनोई शान्तिभूषण जैन इटावा में यूपी रोडवेज़ में आर. एम. की पोस्ट पर थे।
बहन का घर रेलवे स्टेशन के पास ही था।
मैं दिल्ली वापस जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचा ही था कि उसी समय किसी ट्रेन से वापस लौटे कुमार कश्यप जी की नज़र मुझ पर पड़ी - "अरे योगेश जी!"
