लेबल

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

बेला सिन्हा

रूपम पॉकेट बुक्स (यथासंभव) बेला सिन्हा नामक एक जासूसी उपन्यासकार का नाम देखने को मिला है।
  इसने विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है।

बेला सिन्हा के उपन्यास
1. एक मोती का खून
2.
3.
4.
5.

दयानंद अनंत

जासूसी साहित्य में एक लेखक दयानंद अनंत की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त हुयी है।
    
दयानंद अनंत के उपन्यास
1. कोकरनाग की प्रेतात्मा
2.
3.
4.
5.

इन्द्रदेव

रूपम पॉकेट बुक्स से एक और लेखक की जानकारी प्राप्त हुयी है। हालांकि यह कन्फर्म नहीं की यह लेखक (इन्द्रदेव)वास्तविक लेखक है या fake, Ghost writing है।
किसी पाठक मित्र को इस विषय में जानकारी हो तो शेयर करें।
 इन्द्रदेव के उपन्यास
1. हत्यारिन प्रेमिका
2. अंधेरी गली
3.
4.
5.

कुमार श्री

उपन्यासकार कुमार श्री के विषय में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त हुयी है। उनके उपन्यास रूपम पॉकेट बुक्स से प्रकाशित होते रहे हैं।
        वैसे रूपम पॉकेट बुक्स के उपन्यासकारों के विषय में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं होती, इस पॉकेट बुक्स से अच्छे जासूसी उपन्यास प्रकाशित होते रहे हैं।

कुमार श्री के उपन्यासों की सूची
1. खून पीने वाली लाशें
2. मुरदे की वसीयत
3.
4.
5.


शनिवार, 11 जुलाई 2020

कैलाश शर्मा

उपन्यासकार कैलाश शर्मा के विषय में एक उपन्यास से कुछ जानकारी प्राप्त हुयी है।
   कैलाश शर्मा के उपन्यास विमल पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुये हैं। ये विजय- रघुनाथ और अलफांसे आदि पात्रों को लेकर उपन्यास लिखते थे।

कैलाश शर्मा के उपन्यास
1. अलफांसे का कैदी  (विजय- रघुनाथ सीरीज)


शंकर घोड़के

उपन्यासकार शंकर घोड़के के विषय में कोई ज्यादा और विशेष सूचना तो नहीं प्राप्त होती।
   इनका एक उपन्यास डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था।
शंकर घोड़के के उपन्यास
1. तलाश एक हिरोइन की।

इस लेखक के विषय में अगर किसी के पास कोई जानकारी हो तो संपर्क करें।
धन्यवाद।
Emai- sahityadesh@gmail.com

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

रोमा चौधरी

रोमा चौधरी- केशव पॉकेट बुक्स मेरठ
लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में Ghost Writing का काला समय भी रहा है।
    एक तो Ghost writing और दूसरा Ghost writer दोनों जब एक साथ हो तो क्या कहना और उस पर भी उपन्यास का पात्र भी किसी और प्रकाशक का हो तो.....चलो रहने दो यार।
    मेरठ का एक प्रकाशक था 'केशव पॉकेट बुक्स' उसी के अन्तर्गत रोमा चौधरी के उपन्यास प्रकाशित होते थे। रोमा चौधरी एक छद्म नाम था। 
 ध्यान रहे रोमा चौधरी के छद्म उपन्यास सूर्या पॉकेट बुक्स से भी प्रकाशित होते थे। मेरे विचार से दोनों में कोई संबंध तो न था, बस नाम की समानता संयोग से रही होगी।

रोमा चौधरी के उपन्यास- केशव पॉकेट बुक्स से
1. आई पाॅयजन
2. 

रोमा चौधरी - सूर्या पॉकेट बुक्स
सचिन मोहन परिचय- केशव पॉकेट बुक्स

सचिन मोहन

वेदप्रकाश शर्मा जी द्वारा रचित प्रसिद्ध पात्र केशव पण्डित पर असंख्य लेखकों ने लिखा है।
   इस किरदार के नाम से तो कई लेखक भी मैदान में आ गये थे और यह तो  एक  शृंखला की तरह फैल गया था। फिर तो बहुसंख्यक लेखक और प्रकाशक केशव पण्डित और उसके साथी मित्रों के नाम से उपन्यास लिखने लगे थे।
  इसी संदर्भ में एक और लेखक का वर्णन आता है वह है सचिन‌ मोहन। सचिन मोहन के उपन्यास जिस प्रकाशन से आते थे उसका तो नाम भी 'केशव पॉकेट बुक्स' था।
  सचिन मोहन तात्कालिक प्रसिद्ध पात्र केशव पण्डित, विजय, रघुनाथ, सिहंगी या कहे तो वेदप्रकाश शर्मा जी के पात्रों को लेकर अपनी कलम चलाते थे।

सचिन मोहन के उपन्यास
1. केशव पण्डित और अलफांसे
2. केशव पण्डित और सिहंगी
3. केशव पण्डित और विजय का चूहेदान

सोमवार, 6 जुलाई 2020

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत

जनसेविका पुलिस- कुशवाहा कांत
 (लोकप्रिय साहित्य के सितारे कुशवाहा कांत जी के प्रकाशन से 'चिनगारी' मासिक पत्रिकाएं निकला करती थी। पत्रिका में 'श्री चमगादड़' नाम से वे कुछ हास्य- व्यंग्यात्मक स्तंभ भी लिखा करते थे। बाद में इन्हीं हास्य-व्यंग्य को एक पुस्तक रूप में 'उड़ते-उड़ते' शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य 'जनसेविका पुलिस' उसी पुस्तक से लिया गया है।- साहित्य देश

    साहबों! अगर अपने राम सच न बोल, तो पुलिस के समान जनसेवक कर्मचारी भूत-भविष्य-वर्तमान कभी भी नहीं मिलेंगे। हमारे प्रांत की पुलिस तो सेवा भाव में सबसे 'फ्रण्ट' पर है। ट्रेनिंग पीरियड में इन्हें जबानी अभ्यास भी कराया जाता है, ताकि आगे चलकर ये सेवक जनता की माँ-बहनों को धड़ाके के साथ याद रख सकें।
भारत में सुराज होने पर इन जनसेवकों का रोजगार कुछ ठ-ठ-ठप्प पड़ गया है, वर्ना अंग्रेजी पीरियड में आँखों के एक ही इशारे पर इनकी जेबें भर जाती थी। आजकल तो इन बेचारों को कोई ठोस कार्य ही नहीं रह गया है, अत: हम जनता का कर्तव्य है कि इन्हें कोई नवीन कार्य सौंपें।
         एक दिन की बात सुना दूँ। बीच बाजार में अपने एक मित्र जी मिल गये, गोद में चारसालीय 'प्रोडक्शन' लादे। बच्चा बड़ा प्यारा लग रहा था, सो अपनेराम ने बड़े लाड़-प्यार-दुलार से उसे चूमा-चाटा, फिर बातचीत का सिलसिला जो चला तो अन्त में सिनेमा देखने के निश्चय पर आकर रूका। अब मित्रजी बड़े फेर में पड़े। सिनेमा देखने का निश्चय हो चुका, समय भी दस-बारह मिनट ही रह गये, सामने सिनेमा भवन का लाउडस्पीकर रेंक रहा था...मगर गोद का बच्चा वे किसे दें? घर दूर था, पहुँच कर लौटने में काफी देर हो जाती।
"रहने दो कल देख लेंगे..."- अपनेराम‌ ने तसल्ली दी।
       वे बोले-"नहीं यार! आज ही देखेंगे। इतने दिन के बाद तो घोंसले से निकले हो...इस बच्चे को मैं लाया ही क्यों? इसे लेकर सिनेमा में बैठे भी नहीं सकता। शैतान रो-रो दूसरों से गाली सुनवायेगा। इसे खड़े-खड़े लिये रहो तो चुप, जरा भी बैठे कि रोनाध्याय प्रारंभ... "
       तभी अपनेराम की नजर सामने जा पड़ी-थाना! ...बस उपाय दिमाग में आ गया। चट बोला-"मित्र! बच्चा मुझे दो..."
"क्या करोगे?"-कहते हुए मित्र जी ने बच्चे को दे दिया। मैं तूफानमेलीय रफ्तार से बच्चे को लेकर थाने की ओर भागा। अगर वे मेरे अन्तरंग मित्र न होते तो 'उचक्का मेरा बच्चा ले भागा' था, अत: चुपचाप वही मूर्ति बनकर खड़े रहे।
थाने में आया। थानेदार साहब कुर्सी पर बैठे हुए मेज पर टाँग पसार रहे थे।
" क्या है?.."
"सा-साहब! यह ब-ब-बच्चा खो गया है।"- अपनेराम ने कहा।
" खो गया है?..कैसे?..."
"ऐसे ही...हमें उस मोड़ पर रोता हुआ मिला..."
"आपको मिला?...".
" जी हाँ...यों समझ लीजिए, हमने इसे प-प-पाया...आप इसे सम्हालिये...मैं चला..."
"सुनिये...अपना नाम-पता तो बता दीजिये.."
"जरूर-जरूर! लिखिये श्री-श्री...जरा जल्दी कीजिए मुझे सिनेमा जाना है..?"
थानेदार साहब ने मेरी हुलिया लिख ली।
         अपनेराम की सूझ पर मित्रजी दंग रह गये। ठाट से हम लोगों ने साथ-साथ सिनेमा देखा। फिर लौट कर दोनों आदमी थाने गये तो देखा मित्रजी का बच्चा ठाट से जलेबी तोड़ रहा था।
थानेदार साहब बोले-"यह बच्चा तो साहब बड़ा रोता है...पुलिस दौड़ रही है, मगर इसके बाप का पता नहीं"
"मैं खोज लाया साहब !... ये हैं..."- अपनेराम ने कहा।
" आप इसके बाप हैं?"
" जी हाँ"- मित्रजी ने कहा।
"जी हाँ- सेंट-पर-सेंट असली बाप साहब! बड़ी मुश्किल से इनका पता लगा सि-सि-सिनेमा के अन्दर..." मैं बोला।
"सिनेमा के अन्दर?"
"जी-जी नहीं, सिनेमा के बा-बाहर ...ये बिचारे रोते हुए इसे खोज रहे थे।"
"लीजिये साहब। आप अपना लड़का सम्हालिये..बड़े लापरवाह हैं आप लोग...इन्होंने आपके बच्चे को यहाँ पहुँचाया है और आपको यहाँ तक लाये भी हैं, इसलिये इन्हें कुछ इनाम..."
"अवश्य..."-मित्रजी ने पाँच का नोट मेरी ओर बढाया।
हम लोग हँसते हुए वापस हुए।
पुलिस के लिये यह नया काम कैसा रहा साहब? इति श्री इलस्ट्रेटेड-वीकलीयो नम:।
पुस्तक - उड़ते-उड़ते
लेखक-  कुशवाहा कांत

बुधवार, 1 जुलाई 2020

एक थी तुरन

           एक थी तुरन....
किस्सा कुशवाहा कांत जी के प्रेम जीवन का।

लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में रोमांटिक उपन्यासकार के रूप में 'कुशवाहा कांत जी' का नाम खूब चर्चित रहा है। प्रेम रंग में रंगे इनके उपन्यास युवा हृदय की धड़कन होते थे। प्रेम का मार्मिक, स्वच्छंद और हृदय की गहराइयों को छू लेने वाला चित्रण इनके उपन्यासों में खूब होता था, इसलिए इन्हें रोमांटिक उपन्यासकार कहा जाता था।
        कुशवाहा कांत जी के नाम के साथ एक और नाम चर्चित रहा है, वह नाम है 'तुरन'। जिन्होंने ने कुशवाहा कांत के उपन्यास पढे हैं, उनके लिए यह नाम हमेशा रहस्य रहा है।
क्या आपने यह नाम पहले कभी सुना है?
क्या आप तुरन को जानते हैं?

       अगर आपने तुरन का नाम नहीं सुना तो यह आलेख पढें, आपको जान जायेंगे आखिर कौन थी तुरन।
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण ही रोमांटिक उपन्यासकार कहलाने लगे थे?
- क्या कुशवाहा कांत तुरन के कारण रोमांटिक उपन्यास लिखते थे?
- क्या एक लेखक की जान तुरन के लिए ही चली गयी? या फिर कोई और कारण था?

अतीत की गर्द के नीचे छिपे किए ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आज मिलना असंभव है।
काश आज तुरन‌ मिल जाती तो हम पूछते- बताओ तुरन सच क्या है? 

Featured Post

मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...