कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 02
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पुरानी यादें कभी सिलसिलेवार क्रम से याद नहीं आतीं। अक्सर ऐसा होता है, पहले की कोई बात बाद में और बाद की कोई बात पहले - याद आ जाती है तो लिखने में भी ऐसा ही होना निश्चित है।
लेकिन आज का हर पाठक लेखक से ज्यादा महान है! उसे लेखक की बकवास पढ़ने मे कोई दिलचस्पी नहीं होती, जहाँ बेकार की बात नज़र आई, निगाहें चार- पांच -छ: लाइन छोड़ती चली जाती हैं। और जब ऐसी किसी हकीकत में हम आगे की घटना पीछे तथा पीछे की आगे कह जाते हैं, पाठक का दिमाग उसे अपने आप दुरुस्त कर लेता है।
आप में से बहुत से लोग सुमन पाकेट बुक्स में रतिमोहन के नाम से सामाजिक उपन्यास लिखने वाले गोविन्द सिंह से अवश्य मिले होंगे। वैसे गोविन्द सिंह, गोविन्द सिंह नाम से भी बहुत छपे हैं!
गोविन्द सिंह ने एक बार मुझसे कहा - "पढ़ने वाला लिखने वाले से बहुत ज्यादा अक्लमंद होता है।"
"क्या बात कह रहे हैं सर...! लिखने वाला तो दिमाग लगाता है! कहानी का ताना-बाना बुन कहानी की कान्टीन्यूटी कायम रखता है! फिर सारे लिंक समेट कर शानदार सा अंत करता है! लिखने वाले का तो खूब दिमाग लगता है तो पढ़ने वाला ज्यादा अक्लमंद कैसे हो सकता है?"
"ऐसे कि... " पान की पीक थूकते हुए गोविन्द सिंह ने जवाब दिया - "लिखने वाला दो तीन चार महीने या कुछ भी टाइम लगाकर एक सौ दो सौ पेज की किताब लिखता है और पढ़ने वाला, उसे दो घंटे में पढ़कर दस गलतियां निकाल देता है, जो उसके बताने से पहले लिखने वाले को पता ही नहीं होती थीं!"
गोविन्द सिंह की इस बात का मेरे पास कोई काट न था न ही कोई जवाब!
खैर यह सब लिखने का मुख्य कारण यह है कि जो कुछ मैं लिख गया हूँ, अब कुछ घटनाएँ उससे पहले की बताना चाहता हूँ!
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पुरानी यादें कभी सिलसिलेवार क्रम से याद नहीं आतीं। अक्सर ऐसा होता है, पहले की कोई बात बाद में और बाद की कोई बात पहले - याद आ जाती है तो लिखने में भी ऐसा ही होना निश्चित है।
लेकिन आज का हर पाठक लेखक से ज्यादा महान है! उसे लेखक की बकवास पढ़ने मे कोई दिलचस्पी नहीं होती, जहाँ बेकार की बात नज़र आई, निगाहें चार- पांच -छ: लाइन छोड़ती चली जाती हैं। और जब ऐसी किसी हकीकत में हम आगे की घटना पीछे तथा पीछे की आगे कह जाते हैं, पाठक का दिमाग उसे अपने आप दुरुस्त कर लेता है।
आप में से बहुत से लोग सुमन पाकेट बुक्स में रतिमोहन के नाम से सामाजिक उपन्यास लिखने वाले गोविन्द सिंह से अवश्य मिले होंगे। वैसे गोविन्द सिंह, गोविन्द सिंह नाम से भी बहुत छपे हैं!
गोविन्द सिंह ने एक बार मुझसे कहा - "पढ़ने वाला लिखने वाले से बहुत ज्यादा अक्लमंद होता है।"
"क्या बात कह रहे हैं सर...! लिखने वाला तो दिमाग लगाता है! कहानी का ताना-बाना बुन कहानी की कान्टीन्यूटी कायम रखता है! फिर सारे लिंक समेट कर शानदार सा अंत करता है! लिखने वाले का तो खूब दिमाग लगता है तो पढ़ने वाला ज्यादा अक्लमंद कैसे हो सकता है?"
"ऐसे कि... " पान की पीक थूकते हुए गोविन्द सिंह ने जवाब दिया - "लिखने वाला दो तीन चार महीने या कुछ भी टाइम लगाकर एक सौ दो सौ पेज की किताब लिखता है और पढ़ने वाला, उसे दो घंटे में पढ़कर दस गलतियां निकाल देता है, जो उसके बताने से पहले लिखने वाले को पता ही नहीं होती थीं!"
गोविन्द सिंह की इस बात का मेरे पास कोई काट न था न ही कोई जवाब!
खैर यह सब लिखने का मुख्य कारण यह है कि जो कुछ मैं लिख गया हूँ, अब कुछ घटनाएँ उससे पहले की बताना चाहता हूँ!











