साहित्य देश की साक्षात्कार शृंखला में इस बार आपके लिए प्रस्तुत है युवा लेखक आनंद कुमार सिंह का साक्षात्कार ।
माता शांति सिंह और पिता अजित प्रसाद सिंह के घर पैदा हुये आनंद कुमार सिंह को बचपन से ही पढने में रूचि रही है। कभी बालमन बाल साहित्य में रूचि रखता था और समय के साथ यह रूचि लेखन में परिवर्तित हो गयी।
आनंद कुमार सिंह पेशे से पत्रकार हैं।
पत्रकारिता के अब तक के अपने 20 वर्ष के करिअर में उन्हें तीन बार श्रेष्ठ पत्रकार होने का पुरस्कार मिल चुका है।
वे क्राइम, राजनीति, स्पोर्ट्स, बिजनेस आदि क्षेत्रों में गहरी रुचि रखते हैं।
कहानी लिखने का उन्हें हमेशा से शौक रहा है। कहानी लेखन की कई प्रतियोगिताओं में वे विजेता रह चुके हैं।
उन्हें शतरंज खेलने का भी काफी शौक है। प्रेस क्लब, कोलकाता के वह लगातार तीन वर्षों से चैंपियन हैं।
मूल रूप से बिहार के रहने वाले आनंद कुमार सिंह का जन्म, पढ़ाई-लिखाई, कोलकाता में हुई। हालांकि बचपन का उनका बड़ा हिस्सा रेणुकूट में गुजरा है।
यह साक्षात्कार ekbookjournal के संचालक श्री विकास नैनवाल जी के सहयोग से यहाँ प्रकाशन हुआ है।
प्रश्न – लेखन क्षेत्र में आज लेखक आनंद कुमार सिंह का नाम पाठक वर्ग के लिए अपरिचित नहीं रहा है। लेकिन जैसा की साक्षात्कार की परम्परा है उसी परम्परा अनुसार हम आपका विस्तृत परिचय जानना चाहेंगे ?उत्तर – मेरा जन्म कोलकाता में हुआ हालांकि जन्म के बाद ही पिताजी की नौकरी के कारण हम लोग रेणुकूट चले गये। मेरी प्रारंभिक शिक्षा (चौथी कक्षा तक) वहीं हुई। पिताजी को पढ़ने का शौक था तो वहीं से शौक मुझे भी आ गया। बचपन, चंपक, नंदन, चंदामामा, कॉमिक्स से शुरू होते ही जल्द ही एससी बेदी के राजन-इकबाल सीरीज तक पहुंच गया। घर में उस वक्त सरिता, रीडर्स डाइजेस्ट से लेकर कई अन्य पत्रिकाएं आती थीं। मैं सबकुछ पढ़ जाता था भले ही वो बच्चों के लिए न हो। रेणुकूट के पहाड़ी इलाके में बारिश के बाद जंगली पत्तों की जो खुशबू आती थी वो आज भी जेहन में रची-बसी है। उस वक्त खेलकूद के अलावा मनोरंजन का साधन केवल किताबें-मैगजीन आदि पढ़ना ही था।
इसके बाद हम लोग वापस कोलकाता आ गये। पांचवीं से बीएससी तक की पढ़ाई मैंने यहीं की। यहाँ आने के बाद भी किताबें पढ़ने का शौक बरकरार रहा। मुझे वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का चस्का लग गया। तीन तिलंगे, विधवा का पति, केशव पंडित, कानून का बेटा, कोख का मोती की यादें आज भी हैं। स्कूली जीवन में ही मुझे सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास मिल गया। हालांकि यह याद नहीं कि पहले मैंने उनके जेम्स हेडली चेज के अनुवादित उपन्यास पढ़े या फिर उनके स्वरचित उपन्यास। लेकिन जो भी उनकी लेखनी बेहद धमाकेदार लगी। दुस्साहसिक, ऑन टू योर फेस..वाली। जहाँ वीपीसी हमें मनोरंजन की दुनिया का रोलर-कोस्टर राइड कराते थे वहीँ एसएमपी रियलिस्टिक दुनिया के दायरे में रहकर इंटरटेनमेंट का तड़का प्रदान करते थे। पैसे न होने के कारण किराये पर किताबें लेकर पढ़ता था और खूब पढ़ता था। एसएमपी को पढ़ने के बाद अन्य किसी हिंदी लेखक की किताबें कम ही पढ़ी। एसएमपी के अलावा मैं अंग्रेजी नॉवल पढ़ने लगा। इसमें शुरूआत सिडनी शेल्डन के उपन्यासों से हुई। लेकिन मेरे लिए लेखक मायने नहीं रखता था...कोई भी किताब मिल जाये...तमन्ना बस यही रहती थी। किताबें पढ़ने का सिलसिला आज भी जारी है।
प्रश्न- जैसा की आपने बताया बचपन में ही आपको पढने की रूचि थी। फिर यह रूचि पढने से लेखन की तरफ कब बढ गयी ?









