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Tuesday, July 12, 2022

दिलशाद अली

नाम- दिलशाद अली
माता-  फहमीदा बेगम
पिता-  साबुद्दीन अली
जन्म-
संपर्क- 8791260233
Emai- dilshadaali@gmail.com



उपन्यास सूची
1. सिटी ऑफ इविल - मई 2021(प्रथम उपन्यास) समीक्षा

साक्षात्कार- दिलशाद अली


Sunday, July 10, 2022

दिलशाद अली - साक्षात्कार

 मैं हाॅलीवुड को टक्कर देने वाले उपन्यास लिखना चाहता हूँ। 
दिलशाद अली- साक्षात्कार शृंखला- 11
    साहित्य देश की साक्षात्कार शृंखला में 'पहला उपन्यास- पहला साक्षात्कार' में इस बार प्रस्तुत है उत्तरप्रदेश के हापुड़ जिले के निवासी युवा उपन्यासकार दिलशाद अली का साक्षात्कार।
   Flydreams Publication से सन् 2021 में प्रकाशित '
सिटी ऑफ इविल' दिलशाद अली जी का प्रथम उपन्यास है।
1. सर्वप्रथम साहित्य देश की तरफ से आपका हार्दिक स्वागत है। आपके प्रथम उपन्यास 'सिटी ऑफ इविल' के लिए शुभकामनाएं। 
साक्षात्कार  के आरम्भ में हम आपका जीवन परिचय जानना चाहेंगे।
दिलशाद अली-   सर्वप्रथम गुरप्रीत जी का बहुत-बहुत आभार, जिंहोने मुझे इंटरव्यू के लायक समझा। तत्पश्चात साहित्य देश और सभी पाठकों का हृदय से आभार, आपने मुझे एक लेखक के रूप में स्वीकार किया। आशा है आपका प्यार हमेशा यूं ही बरकरार रहेगा। हालांकि अभी तक मेरा पहला नॉवल प्रकाशित हुआ है किन्तु आपके प्यार ने मुझे नए लेखक का एहसास नहीं होने दिया। आपके प्यार की बदौलत मैं लिख रहा हूँ और लिखता रहूँगा।
मेरा नाम दिलशाद आली है और मैं उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से हूँ। मैं पोस्ट ग्रेजुएशन के साथ बी.एड. किए हूँ।

2. वर्तमान इंटरनेट के समय में जब लोगों का मनोरंजन का माध्यम बदल गया है तो ऐसे समय में आप में साहित्य प्रेम जागृत कैसे हो गया?
दिलशाद अली-   एक समय था जब लोगों के पास मनोरंजन के लिए सीमित साधन उपलब्ध थे। सीमित साधनों के चलते लोगों की ज़िंदगी बेहतर और मनोरंजकपूर्ण बीत रही थी। 90 का समय क्या समय था, अगर किसी 90 के दशक जीने वाले से पूछे तो लोग दांतों तले अंगुलिया दबाकर वाकया सुनेंगे। उन्ही साधनों में साहित्य या फिर कहें लुगदी भी था। 90 के समय तक साहित्य अपने चरम पर था। 90 के समय तक अनेक लेखक उभरे। और फिर आया आधुनिकता का समय। मोबाइल और टीवी ही ने सभी मनोरंजन की कमर तोड़ दी। लोग जैसे जीना भूल गए। जीना चाहते हैं लेकिन जी नही पा रहे। कैसे जिये क्योंकि वो अब आधुनिकता की कैद में जो हैं।
    इसी के चलते साहित्य प्रेम भी आधुनिकता की चपेट में आ गया। मनोरंजन के साधन अत्यधिक थे तो साहित्य पर कौन समय देता। खैर, जो साहित्य जुनूनी थे उन्हें आधुनिकता जकड़ नहीं पायी। अनेक लेखकों, प्रकाशकों और आप जैसे लोगों ने साहित्य को जिंदा रखा। सेवा करते रहे। उसका फल यह है कि मोबाइल की कैद में रहने वाले भी आज किताबों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। उसी जुनून में मैं भी था। मैंने किताबें पढ़नी कभी नहीं छोड़ी। मन में एक जुनून था लिखने का जो अब जाकर पूरा हुआ।
3. किन- किन लेखकों से आप प्रेरित रहे, किन को ज्यादा पढा और उनमें क्या विशेष लगा?
दिलशाद अली-    मैंने लगभग सभी लेखकों को पढ़ा है। अपने जमाने के लुगदी साहित्य से पढ़ा। लेकिन ज़्यादातर मैंने वेद प्रकाश जी, अनिल मोहन जी, सुरेन्द्र मोहन पाठक जी, जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा जी को पढ़ा। आज भी अन्य लेखकों को पढ़ रहा हूँ। नयें लेखकों को भी पढ़ रहा हूँ जो अलग हटकर बहुत कुछ करने का दम रखते हैं। विशेषता की बात की जाये तो हर लेखक में अपनी विशेषता होती है। वेद जी की विशेषता थी वो पाठकों को इस तरह बांध देते थे कि नॉवल बिना पूरा किये उठ नहीं पाते थे। मुझे आज भी याद है अगर मेरा नॉवल अधूरा रह जाता था तो मैं बैचेन हो उठता था। रातों को कल्पना करता था उसका अंत कैसा होगा। 

4. आपने अपना प्रथम उपन्यास ही जाॅम्बी टाइप रक्तपिपाशु लोगों पर लिखा, यह विचार कैसे आया? मेरे विचार से हिंदी साहित्य में ऐसे उपन्यास न के बराबर ही हैं।

दिलशाद अली-    मैंने हर जेनर के नॉवल पढे। मैंने सोचा अगर मैं कुछ लिखुंगा तो अलग ही हटकर लिखुंगा। बचपन से ही मुझे फिल्मे देखने का शौक था। ज्यादा प्रभावित मैं हॉलीवुड मूवी से हुआ और अभी भी हूँ। तो मैंने भी हॉलीवुड की तर्ज पर लिखने की सोची। मुझे ख्याल आया कि क्यों न भारत में भी हॉलीवुड की तरह कहानियाँ हो और उस पर फिल्में बने। जिससे बाहर देश के लोग भी भारत का लोहा माने। मेरा इरादा यही है कि मैं ज़्यादातर नॉवल हॉलीवुड मूवी को टक्कर देने के लिए ही लिखुंगा।

इसलिए मेरे दिमाग में सबसे पहले 'सिटी ऑफ इविल' लिखने का आइडिया आया। कह सकते हो कि मुझे 'सिटी ऑफ इविल' लिखने का आइडिया हॉलीवुड मूवी से आया।

5. प्रथम उपन्यास 'सिटी ऑफ इविल' के प्रकाशन पश्चात आपकी, परिवार और पाठकों की क्या प्रतिक्रिया रही? जब स्वयं की रचना प्रकाशित होती है तो एक अलग ही अनुभव होता है, वह अनुभव शेयर कीजिएगा।

दिलशाद अली-     मेरा पहला नॉवल 'सिटी ऑफ इविल' फ्लायड्रीम पब्लिकेशन से था। जब जयंत जी ने बताया आपका नॉवल हमारे पास आ गया है और जल्द ही आपको मिलेगा। मुझे विश्वास ही नही हो रहा था कि मेरा लिखा नॉवल आ चुका है और मेरे हाथों में आने वाला है। उससे पहले मेरे दोस्तों और पाठकों तक नॉवल पहुँच रहा था। मैं देखकर बेहद खुश हो रहा था। भला एक लेखक क्यों खुश न हो। और जब मेरे पास मेरा नॉवल पहुंचा तो देर तक मैं नॉवल को पकड़े निहारता रहा। कभी खोलता तो कभी बंद करता कभी पढ़ता तो कभी उसका फोटो खींचता। यह एहसास खुशी से लबालब भरा था।

दोस्तों की बात की जाये तो वो मुझसे भी ज्यादा खुश थे। नॉवल आने के बाद तो वो मुझे दिलशाद लेखक या लेखक साहब कहकर पुकारने लगे हैं। बहुत खुशी होती है।

6. वर्तमान में हार्डकाॅपी रचना प्रकाशन भी एक जटिल प्रक्रिया है। पाठक कम हैं, तो प्रकाशक संस्थान भी ज्यादा रिस्क नहीं लेते, आपके क्या अनुभव रहे, प्रथम उपन्यास प्रकाशन पर?

दिलशाद अली-     हाँ, यह सवाल सही है। साहित्य दौर अभी ऊपर उठना शुरू हुआ है। यानि साहित्य का स्तर इतना भी नही उठा है कि लेखक गर्व से कह सके उसकी इतनी कॉपी बिक गयी हैं। इतना जरूर हुआ है सालों पहले जो स्तर खत्म हो चुका था वापस आने को बेताब हुआ है। आज के लोग किताब से पहले सिनेमा, मोबाइल या अन्य साधन में खर्च करना पसंद करते हैं। इसीलिए प्रकाशक हर किसी पर रिस्क उठाना पसंद नही करता। इसके चलते लेखक सेल्फ पब्लिकेशन की तरफ भागते हैं या फिर प्रकाशन कराने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं।

लेकिन मेरे साथ ऐसा नही हुआ। मेरा नसीब अच्छा था। शुरुआत में ही मुझे फ्लायड्रीम पब्लिकेशन मिला। मैं अपने आपको बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ जो बिना संघर्ष के पहला नॉवल प्रकाशित करा सका। इसके लिए सारा श्रेय फ्लायड्रीम पब्लिकेशन को जाता है।

07. 'सिटी ऑफ इविल' का द्वितीय भाग कब तक प्रकाशित होगा और भविष्य में आपके और कौन कौन से उपन्यास आने वाले हैं?

दिलशाद अली-  हाँ, मानता हूँ 'सिटी ऑफ एविल' के दूसरे भाग के आने में लंबा समय लग गया है। मैंने कहानी लिख तो ली थी। फिर मुझे ख्याल आया कि पाठक को ज्यादा लंबा इंतजार नहीं कराना चाहिए। गलती तो हो ही चुकी थी इसलिए मैंने वह कहानी प्रकाशित कराने से रोक दी। क्योंकि उसका तीसरा भाग भी आना था। मैंने सोचा क्यों न दूसरा और तीसरा पार्ट का चक्कर ही खत्म कर दिया जाये और फाइनल ही पार्ट निकालकर कहानी को समाप्त कर दिया जाये। उसके चक्कर में मुझे लंबा समय लगा। कहानी मुझे बेहतर लिखनी थी और ढेरों सवालों को भी पूरा करना था। पाठकों को बता दूँ मैंने 'सिटी ऑफ एविल' की फाइनल कहानी पूरी कर दी है। इसी साल में पाठक उसे पढ़ सकते हैं। समय तो लगा लेकिन उम्मीद से भी बेहतर बन पड़ा है।

मेरा दूसरा नॉवल ‘युगांतर एक प्रेम कथा’ शब्दगाथा प्रकाशन से आ रहा है। युगांतर की कहानी के लिए मैंने बहुत मेहनत की है। यकीन मानना जब आप एक बार उसका अंत करेंगे तो शायद आपकी फेवरेट नॉवल बन जाएगी। युगांतर साईस फिक्सन, थ्रिल, सस्पेंस और रोमांस सब कुछ समेटे हुए है। जुलाई 2022 के अंत तक आपके हाथों में होगी।

तीसरा नोवल 'सिटी ऑफ एविल' फाइलन कहानी के साथ आपको मिलेगा।

अगला नॉवल ‘लिमिट ऑफ लव’ पूरा हो चुका है। वह भी जल्द ही आपको मिलेगा। यह नॉवल मर्डर-मिस्ट्री की चाशनी में डूबा मिलेगा।

08. आपका नया उपन्यास 'युगांतर' आ रहा है, पाठकों में भी उसकी काफी चर्चा है। क्या आप अपने पाठकों के साथ युगांतर के विषय में कुछ चर्चा करना चाहेंगे?

दिलशाद अली- युगांतर प्री ऑर्डर पर लगाया गया था। पाठकों की शानदार प्रतिक्रिया मिल रही है। कुछ दृश्यों को पढ़कर ही पाठक नाॅवल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कहानी की बात करें तो युगांतर की कहानी एक लड़के से शुरू होती है जो अपनी पुरानी स्मृति खो चुका है। स्वयं को खोजते हुए वह एक लड़की से टकराता है, इत्तेफाकन लड़की भी स्वयं के बारे में ही खोज रही होती है। वह भी पुरानी यादों को भूल चुकी होती है। इसी दौरान मेले में दोनों एक बूढ़े से मिलते हैं। बूढ़ा दोनों को देखकर चौंक जाता है। वह कहता है उसने बचपन में दोनों को देखा था। दोनों उसकी दुकान पर आते थे। बूढ़े को आश्चर्य होता है कि वह बूढ़े क्यों नहीं हुए। वह पूछता भी है कि क्या तुम उन दोनों की संतान हो। बूढ़ा इससे ज्यादा कुछ नहीं जानता था। तब वो एक गिरोह के चंगुल में जा फंसते हैं। गिरोह के सभी सदस्य उन्हें नहीं जानते केवल एक को छोड़कर। वह दोनों को देखकर कांप जाता है। उसे यकीन नही हो पाता कि बचपन में दोनों ने हम सबको तबियत से धोया था। गोली भी लड़के का कुछ नही बिगाड़ पाई थी। यह जान लड़का और लड़की चौंक जाते हैं। ढेरों रहस्यों के जवाब आपको मिलेंगे 'युगांतर- एक प्रेम कहानी'- में जो आपको शुरू से अंत तक बांधे रखेंगे। आपने शायद ऐसा नाॅवल कभी न पढ़ा हो।

10. क्या कारण है आपने फ्लाईड्रिम्स पब्लिकेशन से शब्दगाथा प्रकाशन का रुख किया?

दिलशाद अली- ऐसा नहीं है कि मैने फ्लाइड्रीम छोड़ दिया। मेरे पास कई प्रोजेक्ट पड़े थे। मैने सोचा कि मुझे एक साल में कई नाॅवल निकालने हैं तो फ्लाइड्रीम के साथ अन्य का सहारा लेना होगा। यह बात मैने जयंत जी और गुप्ता जी को बताई। वो बोले आप दूसरी तरफ से भी प्रकाशित करा सकते हो। इसलिए मैने शब्दगाथा पब्लिकेशन की तरफ रुख किया। फ्लाइड्रीम ने मेरे सपने पूरे किए। मुझे लेखक बनाया इसलिए उसे छोड़ने का विचार तो मैं कर ही नहीं सकता। आप जल्द ही मेरा नाॅवल सिटी ऑफ इविल का दूसरा और फाइनल पार्ट पढ़ेंगे जो फ्लाइड्रीम से ही आएगा। 11. वर्तमान में किताबों के क ई रूप सामने आ रहे हैं, जैसे पुस्तक हार्डकाॅपी, eBook और ऑडियो बुक्स आप का इन विभिन्न माध्यमों के प्रति क्या विचार है?

दिलशाद अली- वर्तमान में साहित्य पुनः पटरी पर आता दिखाई दे रहा है किंतु ऐसा भी नहीं है है जैसा बीते समय में था। क्योंकि महंगाई और समय की मांग के आगे अभी भी पाठक उस लाइन को पकड़ने में पीछे हैं। फिर भी आशा है बीता समय कुछ तो वापस आ रहा है और शायद वही समय आ जाए। फिर लगता है उलझन भरी और भागदौड़ भरी जिंदगी में नामुमकिन सा लगता है। समय की मांग के साथ साहित्य ने भी अपना मार्ग ढूंढा है जैसे ईबुक्स और ऑडियो बुक्स। पाठक सरलतापूर्वक महंगाई से बचते हुए साहित्य से जुड़ सकते हैं। मेरा मत है ईबुक्स और ऑडियो बुक्स ही सबसे ज्यादा प्रचलन में आने वाला है। क्योंकि मोबाइल जिंदगी का हिस्सा बन चुका है जो हार्ड कॉपी को अपनाने में अभी पीछे है। जबकि ईबुक्स और ऑडियो बुक्स कभी भी कहीं भी प्रयोग कर सकते हैं और कर रहे हैं। पाठकों की बहुत बड़ी संख्या इस साधन की तरफ रुख किए हुए है और आने वाले पाठक भी इससे जुड़े बिना नहीं रह सकते। मैं तो यही कहूंगा इसके बिना अब शायद साहित्य आगे बढ़ नहीं पाएगा। साहित्य को ऊंचाई पर पहंचाने में अन्य साधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं

11. अपने पाठकों और साहित्य देश ब्लॉग के लिए कोई संदेश/ दो शब्द। 

दिलशाद अली- एक लेखक के लिए पाठक ही सब कुछ होता है। अगर पाठक ही न हो तो लेखक लेखक ही न रहेगा। मैं सौभाग्य शाली हूँ कि मुझे पाठक मिले। एक से बढ़कर एक पाठक मिले। पाठकों से यही कहना चाहूँगा आपका प्यार इसी तरह मुझे मिलता रहे।

और अंत में अपने सभी पाठकों, गुरप्रीत जी और साहित्य देश को प्यार भरा धन्यवाद।

अन्य महत्वपूर्ण लिंक-

समीक्षा- सिटी ऑफ एविल

लेखक परिचय- दिलशाद अली

अन्य साक्षात्कार

वेदप्रकाश काम्बोज

जयदेव चावरिया

अनिल सलूजा


Friday, July 8, 2022

सरोज

 नाम- सरोज

मध्य प्रदेश से एक पॉकेट बुक्स का प्रकाशन होता था जिसका नाम था -सरोज पॉकेट बुक्स।

   इसी प्रकाशन के अन्तर्गत सरोज नामक उपन्यासकार के उपन्यास प्रकाशित होते थे। हालांकि हमें अभी तक एक उपन्यास का विज्ञापन ही प्राप्त हुआ है, यह भी ज्ञात नहीं की यह उपन्यास प्रकाशित हुआ या नहीं, या इसके अतिरिक्त 'सरोज' के अन्य उपन्यास कौनसे थे।

   'सरोज पॉकेट बुक्स' से मृगेन्द्रनाथ के उपन्यास प्रकाशित हुये थे, यह विज्ञापन वहीं से मिला है।

सरोज के उपन्यास

1. सौतेला दर्द



मृगेन्द्रनाथ का परिचय -

मृगेन्द्रनाथ 


Thursday, July 7, 2022

आनंद सागर श्रेष्ठ

नाम - आनंद सागर श्रेष्ठ

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में जब पत्रिका का समय था तब जासूसी साहित्य में आनंद सागर श्रेष्ठ का नाम भी सामने आता है। अभी तक उनके विषय में दो उपन्यासों के अतिरिक्त कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं है।

आनंद सागर श्रेष्ठ के उपन्यास
1. खूनी गद्दार    
2. नीली आँखों के दायरे

किंडल लिंक - खूनी गद्दार



Saturday, June 18, 2022

यादें वेदप्रकाश शर्मा जी की -21

यादें वेद प्रकाश शर्मा जी -22

प्रस्तुति- योगेश मित्तल

           ==============

उसके बाद हमारे बीच पारिवारिक बातें होती रही। उन्हीं बातों के बीच एक बार चाय और आ गई, लेकिन इस बार चाय के साथ नमकीन और बिस्कुट भी थे। हम चाय खत्म भी नहीं कर पाये थे कि घर में बने पकौड़े आ गये। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरे सामने वेद ने पकौड़ों का कोई आदेश नहीं दिया था।

यह पहला अवसर नहीं था, इससे पहले भी और बाद में भी अनेक अवसर ऐसे आये, जब वेद के यहाँ अपनेपन का गहरा स्पर्श मैंने महसूस किया। वेद की मेहमाननवाजी और सत्कार ने हर बार मेरे दिल में उसका कद पहले से अधिक ऊंचा किया था।

चाय नाश्ते के बाद वेद ने फिर कहा -"तो फिर नावल कब से शुरू करेगा?"

"फिलहाल दस-पन्द्रह दिन तो तुम्हारे विजय विकास सीरीज़ के उपन्यास पढ़ने में लगाऊँगा, उसके बाद ही टाइपिंग आरम्भ करूँगा।" मैंने कहा! 

"टाइपिंग...?" - वेद चौंक गया -"टाइपराइटर ले लिया है तूने?"

"नहीं, एक सेकेण्ड हैण्ड फोर एट सिक्स ले लिया है, आजकल उसी पर टाइपिंग करता हूँ।"

"फोर एट सिक्स...?"

"कम्प्यूटर...।"

"तूने कम्प्यूटर ले लिया...?"-  वेद ने आश्चर्य व्यक्त किया।

"हाँ..., दरअसल भारती साहब ने पिछले दिनों एक जासूसी पत्रिका 'अपराध कथाएँ' आरम्भ की थी और उसकी टाइपिंग के लिये पालम गाँव के एक शख्स के यहाँ सैटिंग की थी। बस, पहली बार वहीं कम्प्यूटर देखा, फिर पता चला उत्तमनगर में हमारे घर के पास भी रामगोपाल नाम के एक व्यक्ति ने कम्प्यूटर लगा रखा है। अपराध कथाएँ का दूसरा अंक और मैंने 'रजत राजवंशी' नाम के लिये अपना पहला उपन्यास वहीं टाइप करवाया था, उसके बाद अचानक ऐसी जरूरत आ पड़ी कि कम्प्यूटर खरीदना पड़ा।"-  मैंने कहा! 

"ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी?" - वेद ने पूछा! 

"दिल्ली में एक प्रकाशन संस्था है - ड्रीमलैण्ड पब्लिकेशन, उन्हें लोटपोट में मोटू पतलू की चित्रकथाएं बनाने वाले हरविन्द्र माँकड़ ने गणेश जी पर एक किताब लिखने के लिये मेरा नाम सुझाया था। उनसे बात की तो वह बोले कि स्क्रिप्ट उन्हें कम्प्यूटर पर टाइप चाहिये, इसलिये कम्प्यूटर ले लिया।"

"तो तू...यार... गणेश जी पर भी कुछ लिख रहा है?"

"हाँ।" 

"फिर मेरा काम कब करेगा?"

"करूँगा न... तुम्हारे काम के लिये रोज दो घण्टे रात को लगाया करूँगा।"

"पर यार, सब कुछ हाच-पाच नहीं हो जायेगा। एक तरफ तूने रजत राजवंशी लिखना है, अपराध कथाएँ, खेल खिलाड़ी, नन्हा नटखट, मानसी कहानियाँ जैसी मैगज़ीन तू एडिट कर रहा है। गणेश जी पर धार्मिक पुस्तक तू लिख रहा है तो विजय-विकास पर कैसे लिखेगा?" - वेद को यकीन नहीं हो रहा था कि मैं उसके लिये उपन्यास लिखूँगा।

"यार, तुम्हें मालूम है ना कि मैं एक ही वक़्त में अनेक काम करता रहता हूँ।"

"तो ठीक है, तू लिखना स्टार्ट कर, जब चार-पांच फार्म का काम हो जाये मुझे लाकर दिखा देना। उसके आगे का उसके बाद लिखना।"-  वेद ने कहा।

 मैंने स्वीकार कर लिया।

              वेद ने पढ़कर विकास का कैरेक्टर स्टडी करने के लिये मुझे विकास सीरीज़ के एक दर्जन उपन्यासों का बण्डल बंधवा कर दिया, लेकिन दिल्ली पहुँचने के बाद मैंने सारे उपन्यास नहीं पढ़े। चार उपन्यास पढ़कर ही मुझे विकास का चरित्र समझ में आ गया और विजय-विकास को लेकर क्या लिखना है, मैंने कुछ ही घण्टों में फाइनल कर लिया।

                उन दिनों बीस-पच्चीस हज़ार करोड़ के नकली स्टाम्प पेपर घोटाले का मामला बहुत गर्म था। अब्दुल करीम तेलगी का नाम रोज़ ही अखबारों में चर्चा का विषय रहता था। 

                         ऐसे में मैंने अपने उपन्यास के अपराधी का नाम अब्दुल करीम तेलगी से कुछ मिलता-जुलता रखा। क्या रखा था, आज अच्छी तरह याद नहीं आ रहा, मगर मान लीजिये कि वो नाम अब्दुल रहीम तेलगी था। पर मेरे उपन्यास का अपराधी सिर्फ स्टाम्प घोटाले का मास्टर माइंड नहीं था, वह विजय - विकास सीरीज़ के उपन्यासों के शहर राजनगर का सबसे बड़ा माफिया डान था और उसके एक नहीं, अनेक बुरे धन्धे थे। 

                   स्टाम्प घोटाले का स्कैम सामने आने के बाद अब्दुल रहीम तेलगी राजनगर में कहाँ छिप गया, कहाँ गायब हो गया, किसी को कानोंकान खबर तक न थी। ऐसे में विजय द्वारा विकास को अब्दुल रहीम तेलगी को ढूँढ निकालने और गिरफ्तार करके लाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी। 

                 विकास को किसी मुखबिर से पता चलता है कि अब्दुल रहीम तेलगी राजनगर के बाहरी क्षेत्र में नई नई  फल फूल रही जरायम बस्ती में छिपा हुआ है।

             सर्दी के उन दिनों में विकास उस बस्ती में जाता है, जहाँ सिर्फ अपराधी बसते थे, लेकिन इससे पहले कि वह अब्दुल रहीम तेलगी तक पहुँच पाता, एक मोटर साइकिल सवार उसका रास्ता रोक लेता है, जिसके सिर पर पीकैप थी, आँखों पर काला चश्मा, बदन पर काले चमड़े की शानदार जैकेट और वैसी ही पैण्ट थी। 

           वह मोटर साइकिल सवार विकास का रास्ता रोक लेता है।  फिर विकास की उस मोटर साइकिल सवार से फाइट होती है।

                विकास पैदल होता है और वह मोटर साइकिल सवार मोटर साइकिल पर सवार। पूरी फाइट में वह मोटर साइकिल सवार अपनी मोटर साइकिल पर ही सवार रहता है और विकास को पता चलता है कि वह शख्स मोटर साइकिल के करतबों का भी जबरदस्त माहिर है। 

                   बिमल चटर्जी के साथ बैठकर तथा उनके उपन्यासों में भी लिखने के कारण मैं फाइट सीन लिखने में भी जबरदस्त उस्ताद बन चुका था। और उन दिनों मेरे लिखे फाइट सीन काफी लम्बे लम्बे होने के बावजूद इतने दिलचस्प होते थे कि पाठक बीच में उपन्यास नहीं छोड़ सकते थे।

                विकास और उस मोटर साइकिल सवार की फाइट का सीन लगभग दस ग्यारह पेज तक लम्बा खिंचा, उसके बाद अचानक ही विकास की होशियारी के कारण उसकी मोटर साइकिल सड़क पर लुढ़क जाती है और तब उसकी पीकैप भी सिर से नीचे सड़क पर गिर जाती है और उसके लम्बे बाल खुलकर पीठ पर लहरा जाते हैं और तब विकास को पता चलता है कि वह मोटर साइकिल सवार एक लड़की थी।

                   उन दिनों हैलमेट लगाना जरूरी नहीं हुआ करता था। या शायद मैंने पीकैप की जगह हैलमेट ही लिखा हो, यह भी हो सकता है।

           वह लड़की अब्दुल रहीम तेलगी की इकलौती बेटी मुस्कान थी। इससे पहले कि विकास मुस्कान को पकड़ पाता, वह तेजी से मोटर साइकिल सम्भाल पलट कर भाग निकलती है! उसकी कैप सड़क पर पड़ी रह जाती है।

               विकास उसकी कैप उठा लेता है, लेकिन उसका पीछा नहीं करता, क्योंकि उसे अब्दुल रहीम तेलगी को पकड़ना था, लेकिन जब वह अब्दुल रहीम तेलगी के ठिकाने पर पहुँचता है तो पता चलता है कि जितनी देर उसने मुस्कान से फाइट की, उतनी देर में अब्दुल रहीम तेलगी अपने गुप्त ठिकाने से निकल भागा था। वास्तव में मुस्कान ने विकास का रास्ता अपने पिता को उससे बचाने के लिये ही रोका था।

       उन दिनों मैं अधिकांश लेखन कार्य कम्प्यूटर पर ही करने लगा था। शुक्रिया ड्रीमलैण्ड पब्लिकेशन्स के आदरणीय वेद प्रकाश चावला जी का, उनकी इस डिमांड ने कि उन्हें श्रीगणेश महापुराण की स्क्रिप्ट कम्प्यूटर द्वारा टाइप्ड चाहिये, मुझे कम्प्यूटर टाइपिंग सिखा दी और वो भी एक ही दिन में, लेकिन वो किस्सा फिर कभी...।


(शेष फिर ) 


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Thursday, June 16, 2022

एक शीर्षक- अनेक लेखक

 'एक शीर्षक- अनेक लेखक' स्तम्भ के अंतर्गत हम कुछ ऐसे शीर्षकों से आपका परिचय करवा रहे हैं, जहाँ एक ही शीर्षक से भिन्न- भिन्न लेखकों ने उपन्यास लेखन किया है। 
   यहाँ मात्र उपन्यास शीर्षक की ही सामानता दर्शायी गयी है उपन्यासों में कहानी अलग-अलग है।

एक शीर्षक- अनेक लेखक
  1. कानखजूरा-   विमल शर्मा, दिनेश ठाकुर
  2. रक्त मंदिर -    कुशवाहा कांत, राज भारती
  3. चाण्डाल चौकड़ी - प्रकाश भारती, सुरेन्द्र मोहन पाठक, नागपाल
  4. मायाजाल - राज भारती, अनिल मोहन
  5. सीक्रेट एजेंट-  सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, राहुल
  6. प्रेत सुंदरी-     परशुराम शर्मा, रजत राजवंशी
  7. बगावत -   गोविन्द सिंह, जयंत कुशवाहा
  8. कागज के फूल- गोविन्द सिंह,  राजहंस
  9. कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना- लाट साहब, अनिल मोहन
  10. जजमैंट - वेदप्रकाश शर्मा, अनिल सलूजा
  11. चकमा - वेदप्रकाश शर्मा, केशव पण्डित
  12. खतरनाक आदमी - गुप्तदूत, अनिल मोहन, अमित खान
  13. मुँह तोड़ जवाब-  केशव पण्डित, बादल (पवन पॉकेट बुक्स)
  14. देखो और मार दो- राजभारती, प्रेम कुमार शर्मा
  15. चोट पर चोट- अनिल मोहन, रीमा भारती (धीरज पॉकेट बुक्स)




Sunday, June 12, 2022

हरेन्द्र हिलालपुरी

नाम- हरेन्द्र हिलालपुरी

      हिंदी जासूसी साहित्य में मेरी अब तक की यात्रा में हमने (साहित्य देश टीम) साहित्य सागर का जितना मंथन किया है, हमारे हाथ नया मोती ही लगा है। उपन्यासकारों की जानकारी मात्र उनके लिखे उपन्यास ही हैं, स्वयं लेखकों को खोजना और भी कठिन कार्य है। 


फिर भी हमारे प्रयास यथासंभव जारी रहेंगे।

    एक उपन्यासकार हरेन्द्र हिलालपुरी के विषय में संक्षिप्त जानकारी मिली है,वह भी उनके प्रथम उपन्यास से। इनके उपन्यास 'चन्द्रहास' प्रकाशन से प्रकाशित होते रहे हैं, ध्यान रहे स्वयं 'चन्द्रहास' भी एक उपन्यासकार रहे हैं। हरेन्द्र हिलालपुरी का उपन्यास इन्हीं चन्द्रहास के प्रकाशन बिहार से प्रकाशित हुआ है।

हरेन्द्र हिलालपुरी के उपन्यास

  1. मार दो साले को (प्रथम उपन्यास)
  2. गाँधी वाला गुण्डा 
संपर्क
हरेन्द्र हिलालपुरी

हिलालपुरी, बिदुपुर
वैशाली - बिहार- 844509


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             नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेला- 2019     विश्व पुस्तक मेले में पहुंचने का यह मेरा पहला अवसर है। ख्वाहिश एक लंबे समय से थी, जिसे ...