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मंगलवार, 5 सितंबर 2017

सुरेश

सुरेश

सुरेश एक सामाजिक उपन्यासकार थे। इनके उपन्यास पुष्पी प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित होते थे।

सुरेश के उपन्यास
1. कील और कांटे
2. सूखे पत्ते

कमल शुक्ल

कमल शुक्ल

कमल शुक्ल के उपन्यास
1. पत्थर के बुत
2. मर्यादा के नूपुर
प्रकाशन- पुष्पी प्रकाशन इलाहाबाद

3. नर्क की अप्सरा(कोमल पॉकेट बुक्स)

गोविंद सिंह

हिंदी लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में सामाजिक उपन्यास के क्षेत्र में गोविंद सिंह ना नाम विशेष रुप से लिया जाता है। 
गोविंद सिंह के लेखन ना आरम्भ कुशवाहा कांत के प्रकाशन 'चिनगारी प्रकाशन' के अन्तर्गत हुआ था। उनका प्रथम उपन्यास राजरानी वहीं से छपा था। गोविंद सिंह ने अल्प समय में प्रसिद्धि पा ली थी।

गोविन्द सिंह के उपन्यास

 1. राजरानी - प्रथम उपन्यास
2. प्यासे नयना
3. लाल दुपट्टा
4. आशियाना
5. काली घटा
 6. सहारा
7. बहार
8. कागज के फूल
 9. पहीहा बोले आधी रात
 10. धीरे से घूंघट हटाये पिया
11. तारों भरी रात
 12. मिटती रेखायें
13. बदलते रास्ते
14. शमशीर
15. दीया जले रात भर
16. मैं भी इंसान हूँ
17. निशानी
 18. बरसात में
19. सुहाग
20. रेशमा
21. हसीना
22. चौरंगी
23. मौत ही मौत
24. साँवरिया
 25. बुलबुल
 26. बगावत
27. लगन
28. लाल हवेली
29. पैर की धूल
30. हमें जीने दो
31. मैं बेगुनाह हूँ
 32. आँधियों‌ की गोद में
33. काजल - क्रमांक 1-32 तक 'चिनगारी प्रकाशन- बनारस-१'
34. पाप की गुड़िया- रीता पॉकेट बुक्स- मेरठ(सीक्रेट सर्विस कार्यालय)
35. अधूरे रिश्ते
36. आधुनिक कामकला
37. परछाइयां
38. बदनाम गली
39. पति- पत्नी
40. बेहया (क्रम 35-40 तक उपन्यास पुष्पी प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित हुये हैं।)
41. बिके हुये लोग (कथाकार प्रकाशन)
 
अन्य आलेख-

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- sahityadesh@gmail.com


शंकर सुल्तानपुरी

शंकर सुल्तानपुरी।
अभी तक शंकर  सुल्यानपुरी के विषय में अभी तक कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं ।
इनके उपन्यास पुष्पी प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित होते थे।
 शंकर सुल्तानपुरी का आरम्भ सामाजिक लोकप्रिय उपन्यासों से हुआ लेकिन बाद में इन्होंने बाल साहित्य लेखन पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया।
        साहित्य के क्षेत्र में इन्हें खूब सम्मान मिला।


परिचय-
नाम- शंकर सुल्तानपुरी
वास्तविक नाम- शंकर दयाल श्रीवास्तव 
जन्म- 01.12. 1940
मृत्यु-  18.02.2019
सुल्तानपुर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

शंकर सुल्तानपुरी के उपन्यास

1. प्यास; जो बुझ न सकी
2. शमा बुझ गयी।
3. किसी से न कहना
4. पत्थर के सनम




सोमनाथ अकेला

सोमनाथ अकेला।
उक्त लेखक के विषय में अभी तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं ।

सोमनाथ अकेला के उपन्यास
1. वासना
2. गोरे चेहरे काले दिल- जून 1968 (सीक्ररे सर्विस कार्यालय)
3.
4.
5.

पारस

पारस
पारस एक सामाजिक उपन्यासकार थे। इनके उपन्यास पुष्पी प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित होते थे।

पारस के उपन्यास

1. अनदेखे बंधन
2. प्यार का फूल
3. पिया का घर
4. मेरे हमसफर
5. रातें प्यार की: पाप की।

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सोमवार, 21 अगस्त 2017

सुरेन्द्र मोहन पाठक

सुरेन्द्र मोहन पाठक को हिंदी का सर्वश्रेष्ठ मिस्ट्री राइटर माना जाता है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक की प्रथम कहानी सन् 1959 'सतावन साल पुराना आदमी' मनोहर कहानियाँ में प्रकाशित हुयी। उसके बाद  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हुयी।
1963 में इनका प्रथम उपन्यास 'पुराने गुनाह, नये गुनहगार' प्रकाशित हुआ। उसके पश्चात इनके एक से एक बढकर उपन्यास आये।
संपर्क-
smpmystrywriter@gmail.com

सुरेन्द्र मोहन पाठक के समस्त उपन्यास सूची
सुनील सीरीज के उपन्यास
1.पुराने गुनाह नये गुनाहगार- अक्टूबर - 1963
2.समुद्र में खून (धरती का स्वर्ग)- मई - 1964
3. होटल में खून -  नवम्बर - 1965
4. बदसूरत चेहरे- दिसम्बर - 1965
5. ब्लेकमेलर की हत्या (एक तीर दो शिकार)फरवरी - 1966
6. हांगकांग में हंगामा (देश द्रोही)- मार्च - 1966
7. मूर्ति की चोरी- मार्च - 1966

सोमवार, 14 अगस्त 2017

नरेन्द्र नागपाल

नाम- नरेन्द्र नागपाल
दिल्ली निवासी
नरेन्द्र नागपाल के उपन्यास
  1. बाईस दिसंबर        (थ्रिलर)
  2. जुर्म का आशिक     (थ्रिलर)
  3. पांच लुटेरे             (थ्रिलर)
  4. मैडम एक्स           (थ्रिलर)
  5. दिल्ली का दरिंदा    (थ्रिलर)
  6. केशव पण्डित की हत्या (केशव कालका सीरीज)
  7. नौ करोड़ की हूर          (उरजा मस्तान सीरीज)
  8. पी. एम. की सुपारी       (केशव कालका सीरीज)
  9. मुजरिम मजनू               (थ्रिलर)
  10. हर्रामी नंबर एक            (केशव पण्डित सीरीज)
  11. सात साल का पति         (केशव पण्डित सीरीज)
  12. मैं यमराज हूँ                 (काली महाजन सीरीज)
  13. सात खून माफ              (केशव कालका सीरीज)
  14. मारा गया गुलफाम         (काली महाजन सीरीज)
  15. काली 
  16. नैना
  17. चीलबाज
  18. टाटा बाय टाटा
  19. किडनी--
नरेन्द्र नागपाल के समस्त उपन्यास तिथि अनुसार
01. 22 दिसम्बर -     1991|11|25
02. जुर्म का आशिक - 1991|09|28
03. पांच लुटेरे -          1991|12|11
04. मैडम एक्स -         1992|07|07
05. दिल्ली का दरिन्दा - 1996|11|06
06. केशव पंडित की हत्या- 1997|02|22
07. नौ करोड की हूर        1997|06|21
08. मुजरीम मजनू           1998|07|10
09. हरामी नम्बर वन       1998|09|09
10. सात साल का पति    1998|11|14
11. मै यमराज हूँ             1999|02|03
12. सात खून माफ          1999|01|23 
 

रविवार, 13 अगस्त 2017

विमल चटर्जी

नाम- विमल चटर्जी

      दिल्ली निवासी जासूसी उपन्यास जगत के लेखक श्री विमल चटर्जी जिनकी लोह लेखनी ने जासूसी उपन्यासों की शैली को एक अलग पहचान दी और पाठकों के दिलो-दिमाग पर छा गये। तीन सौ से अधिक जासूसी उपन्यास लिखने के बाद ये प्रसिद्धी के उस शिखर पर पहुँच चुके थे जहां पहुँच पाना किसी भी लेखक के लिए स्वप्न होता है।
विमल चटर्जी

      विमल जी का जन्म 07-07-1947 में ईस्ट बंगाल (अब बंगला देश) के फरीदपुर जिले के एक ग्राम में एक सम्पन्न परिवार में हुआ। चूंकि इनके पिता फौज में डॉक्टर थे और दिल्ली के लाल किले में कार्यरत थे, अतः इनका बचपन लाल किले में ही बीता। तत्पश्चात सन् 1961 में ये अपने परिवार सहित 2407, रघुवर पुरा न. 2 गली न. 9, गांधी नगर (यमुना पार) पूर्वी दिल्ली में आकर बस गए। 

लता तेजेश्वर

समीक्षा : हवेली

प्रेम के विदरूप सच को उजागर करती :हवेली

'हवेली' लता तेजेश्वर का पहला उपन्यास है। छब्बीस अनुच्छेदों से विभक्त उपन्यास का तानाबाना एक पुरानी हवेली के इर्द-गिर्द बुना गया है जहां घटित होनेवाली अनेक घटनाओं के कारण रहस्य व रोमांच की स्थिति उत्पन्न होती है। 
उपन्यास का आरंभ अजनीश के माध्यम से होता है जो अपने इमार पिता, माँ और कॉलेज में पढ़ रहे छोटे भाई को गाँव में छोड़ कर जीवनयापन के लिए अपना रुख मुम्बई की ओर करता है। यहाँ आते ही वह ठगी का शिकार होता है लेकिन एक अजनबी उसकी मदद कर इंसानियत का परिचय देता है। ऑफिस में नौकरी पाने के बाद समुद्र तट पर एक बार फिर उसकी मुलाकात उस अजनबी से होती है जो मेयर चंद्र शेखर होते हैं। उनके परिवार में पत्नी अवनि के अलावा बेटी अन्वेशा व बेटा राहुल है। कॉलेज में पढ़ने वाली अन्वेशा को यदा कदा डरावने सपने आते रहते हैं। अन्वेशा व राहुल में आपसी बाल सुलभ नोंक झोंक चलती है। अन्वेशा को अपने कुत्ते पलटु से गहरा लगाव है। पानी में तैरने के बाद अन्वेशा की तबियत बिगड़ती है तब उनके चिकित्सक डॉ रमेश शर्मा उसके लिए किसी मनोचिकित्सक से सलाह लेने की सोचते हैं। दूसरे ओर पेशे से अध्यापिका मेहंदी मुम्बई के भीड़ भाड़ वाले इलाके में अपनी माँ गौतमी और छोटी बहिन स्वागता के साथ दो बैडरूम वाले फ्लैट में रहती है। गौतमी पहले नर्स के रूप में काम करती थी लेकिन बाद में ह्रदय रोग से पीड़ित होने पर उसे नौकरी छोड़ कर घर बैठना पड़ता है। गौतमी का पति उसे छोड़ कर चला जाता है इसलिए उसका विश्वास घात मेहंदी हर पुरुष में देखती है। स्वागता अन्वेशा के साथ ही कॉलेज में पढ़ती है। 
कॉलेज के पिकनिक के जाते समय किसी कारण कुछ बच्चे बस से उतर जाते है और जंगल में खो जाते हैं। अन्वेशा के खो की खबर पा कर चंद्र शेखर अजनीश को भेजते हैं तो स्वागत की खोज में मेहंदी चल पड़ती है। रास्ते में नोंक झोंक के बीच दोनों की मुलाकात होती है फिर वह हवेली पहुँच वहीँ रहने लगते हैं। 
हवेली में रहते हुए एक रात अन्वेशा रहस्यमय ढंग से उसके तहखाने में बेहोश मिलती है फिर ऐसे ही घटना मेहंदी के साथ भी घटित होती है। यहीं अजनीश व मेहंदी की निकटता भी बढ़ने लगती है। वहीँ अंकिता हवेली में ही आत्महत्या की प्रयास करते मेहंदी उसे बचाती है।  दोनों तरह की स्थितियों को लता ने सामने रखा है। 
मेहंदी व अजनीश के प्रेम प्रसंग के साथ ही मेयर चंद्र शेखर, उनकी पत्नी अवनि, अन्वेशा, राहुल, मेहंदी की माँ गौतमी, स्वागत के सहपाठी निखिल, सुहाना नीरज, संजय, नीलिमा, अभिषेक, जुई, प्रो.सुनील, अमृता, फातिमा, वृद्धा जैसे पात्रों के सहारे उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है। वाचमैन, रघुकाका, पूर्णिमा, डॉ रमेश , महेश के माध्यम से उपन्यास अपने चरम तक पहुँचता है। उपन्यास में जुई एक शरारती छात्र के रूप में सामने आती है। 
उपन्यास की भाषा सरल है। और शैली में रोचकता ऐसी कि एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो कौतूहलवश पढ़ते ही जाते हैं। उपन्यास का आवरण अच्छा है लेकिन मुद्रण का कुछेक कमियाँ जरूर खटकती है। उपन्यास की भूमिका में प्रशिद्ध कथाकार संतोष श्रीवास्तव ने इसे विभिन्न घटनाओं से गुजरती हवेली का सच कहा है। मेरी नज़र में यही सच उसे रोचक व पठनीय बनाता है।
प्रकृति व व्यक्ति का चित्रण अनेक स्थान पर लता ने बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से किया है -
" पत्थरों को काटते हुए नदी सरगम गया रही थी, दूर पहाड़ से गिरते हुए जल प्रपात सूर्य की झिलमिलाती हुई रंगीन किरणे उस जल प्रपात में घुल कर और भी सोभियमान दिख रही थी। सूर्य कि रश्मि जल की तरंगों में प्रतिविम्बित हो कर दूर हवेली में अपनी सुंदरता को निहार रही थी। (पृष्ठ-72)
प्रकृति से मनुष्य के सम्बन्ध व उसके प्रति गहरे अनुराग को लता भी गहनता से महसूसती है।
" प्रदूषण भरी हवा, गाड़ियों का शोर शराबा, एक दूसरे से आगे बढ़ जाने की अधीरता हमें इस सुंदर प्रकृति से दूर ले जाती है।"(पृष्ठ-74)
भले ही लता तेजेश्वर ने 'हवेली' को पूरी तरह काल्पनिक उपन्यास बनाया है और पात्रों का सच्चाई के साथ वे कोई सम्बन्ध नहीं बताती लेकिन सही मायने में देखें तो रहस्य व रोमांच के बहाने 'हवेली' प्रेम के चरम व उत्कर्ष, उसकी सफलता-विफलता विदृप सच को हमारे सामने लाने का सार्थक प्रयास है।
समीक्षक : महावीर रवांलटा
संभावना - महरगाँव
पत्रलय:मोल्टाड़ी, पुरोला
उत्तरकाशी (उत्तराखंड)

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मेरठ उपन्यास यात्रा-01

 लोकप्रिय उपन्यास साहित्य को समर्पित मेरा एक ब्लॉग है 'साहित्य देश'। साहित्य देश और साहित्य हेतु लम्बे समय से एक विचार था उपन्यासकार...